
1857जंग-ए-आजादी के शहीदों को सलाम
सन् 1857 के बागी सैनिकों का कौमी गीत
- हम हैं इसके मालिक हिंदुस्तान हमारा
- पाक वतन है कौम का जन्नत से भी प्यारा
- ये है हमारी मिल्कयत हिंदुस्तान हमारा
- इसकी रूहानियत से रोशन हैजग सारा
- कितनी कदीम कितना नईम, सब दुनिया से न्यारा
- करती है जरखेज जिसे गंगो-जमुन की धारा
- ऊपर बफ़फीला पर्वत पहरेदार हमारा
- नीचे साहिल पर बजता, सागर का नक्कारा
- इसकी खानें उगल रहीं सोना हीरा पारा
- इसकी शान-शौकत का दुनिया में जयकारा
- आयाफिंगी दूर से ऐसा मंतर मारा
- लूटा दोनों हाथ से प्यारा वतन हमारा
- आज शहीदों ने है तुमको अहले वतन ललकारा
- तोड़ो गुलामी की जंजीरें बरसाओ अंगारा
- हिंदू मुसलमां सिख हमारा भाई भाई प्यारा
- यह है आजादी का झंडा इसे सलाम हमा।।
1. सूरदास
सूरदास का जन्म सन् 1478 में माना जाता है। एक मान्यता के अनुसार उनका जन्म मथुरा के निकट रुनकता या रणुका क्षत्र में हुआ जबक दूसरी मान्यता के अनुसार उनका जन्म-स्थान दिल्ली के पास सीही माना जाता है। महाप्रभु वल्लभाचार्य के शिष्य सूरदास अष्टछाप के कवियोंमें सर्वाधिक प्रसिद्ध हैं। वे मथुरा और वृंदावन के बीच गऊघाट पर रहते थे और श्रीनाथ जी के मंदिर में भजन-कीर्तन करते थे। सन् 1583 में पारसौली में उनका निधन हुआ। उनके तीन ग्रथो सूरसागर, साहिय लहरी और सर सारावली में सूरसागर ही सव्वाधिक लोकप्रिय हुआ। खेती और पशुपालन वाले भारतीय समाज का दैनिक अंतरंग चित्र और मनुष्य की स्वाभाविक वृत्ियों का चित्रण सूर की कविता में मिलता है। सूर 'वातसतल्य' और 'शंगार' के श्रे् कवि माने जाते हैं कृष्ण और गोपियों का प्रेम सहज मानवीय प्रेम की प्रतिष्ठा करता है। सूर ने मानव प्रेम की गौरवगाथा के माध्यम से सामान्य मनु्यों को हीनता बोध से मुक्त किया, उनमें जीने की ललक पैदा की।
उनकी कविता में ब्रजभाषा का निखरा हुआ रूप है। वह चली आ रही लोकगीतों की परंपरा की ही श्रे्ठ कड़ी है।
यहाँ सूरसागर के श्रमरगीत से चार पद लिए गए हैं कृष्ण ने मथुरा जाने के बाद स्वयं न लौटकर उद्व के जरिए गोपियों के पास संदेश भेजा था। उद्व ने निगुण ब्रह एवं योग का उपदेश देकर गोपियों की विरह वेदना को शांत करने का प्रयास किया। गोपियाँ जान मार्ग की बजाय प्रम मार्ग को पसंद करती थीं। इस कारण उन्हें उद्धव का शुष्क संदेश पसंद नहीं आया। तभी वहाँ एक भौरा आ पहुँचा। यहीं से भ्रमरगीत का प्ारंभ होता है। गोपियों ने श्रमर के बहाने उद्व पर व्यंय बाण छोड़ं। पहले पद में गोपियों की यह शिकायत वाज़िब लगती है कि यदि उद्व कभी स्नेह के धागे से बँधे होते तो वे विरह की वेदना को अनुभूत अवश्य कर पाते। दूसरे पद में गोपियों की यह स्वीकारोक्ति कि उनके मन की अभिलाषाएँ मन में ही रह गई कृष्ण के प्रति उनके प्रेम की गहराई को अभिव्यक्त करती है। तीसरे पद मे वे उद्व की योग साधना को कड़वी ककड़ी जैसा बताकर अपने एकनष् परेम में दृढ़ विश्वास प्रकट करती है। चौथे पद में उद्व को ताना मारती हैं कि कृष्ण ने अब राजनीति पढ़ ली है। अंत में गोपियों दवार उद्व को राजधर्म (प्रजा का हित) याद दिलाया जाना सूरदास की लोकधर्मिता को दशाता है।
पद
(1)
ऊधौ, तुम हौ अति बड़भागी। अपरस रहत सनेह तगा तै, नाहिन मन अनुरागी। पुरनि पात रहत जल भीतर, ता रस देह न दागी। ज्यौं जल माह तेल की गागरि, बूंद न ताकौं लागी। प्रीति-नदी मैं पाउ न बोस्चयौ, दृष्ट न रूप परागी। 'सूरदास' अबला हम भोरी, गुर चाँटी ज्यौं पागी।।

(2)
मन की मन ही माँझ रही।
कहिए जाइ कौन पै ऊधौ, नाहीं परत कही। अवधि अधार आस आवन की, तन मन बिथा सही। अब इन जोग संदसनि सुनि-सुनि, बिरहिनि बिरह दही। चाहति हुतीं गुहारि जितहं तैं, उत तैं धार बही। 'सूरदास' अब धीर धरहिं क्यौं, मरजादा न लही॥।
(3)
हमारें हिरि हारिल की लकरी। मन क्रम बचन नंद-नंदन उर, यह दृढ़ करि पकरी। जागत सोवत स्वप दिवस-निसि, कान्ह-कान्ह जक री। सुनत जोग लागत है ऐसौ, ज्यौं करुई ककरी। सु तौ ब्याधि हमकौं लै आए, देखी सुनी न करी। यह तौ 'सूर' तिनहिं लै सौपौ, जिनके मन चकरी।
(4)
हरि हैं राजनीति पढ़ि आए। समुझी बात कहत मधुकर के, समाचार सब पाए। इक अति चतुर हुते पहिलैं ही, अब गुरु ग्ंथ पढ़ाए। बढ़ी बुद्ध जानी जो उनकी, जोग-सँदेस पठाए। ऊधौ भले लोग आगे के, पर हित डोलत धाए। अब अपनै मन फेर पाइहैं, चलत जु हुते चुराए। ते क्यों अनीति करैं आपुन, जे और अनीति छुडाए। राज धरम तौ यहै 'सूर', जो प्रजा न जाहिं सताए परन-आयासा
प्रश्न-अभ्यास
- गोपियों द्वारा उद्व को भाग्यवान कहने में क्या व्यंगय निहित है?
- उद्धव के व्यवहार की तुलना किस-किस से की गई है?
- गोपियों ने किन-किन उदाहरणों के माध्यम से उद्धव को उलाहने दिए हैं?
- उद्धव द्वारा दिए गए योग के संदेश ने गोपियों की विरहाग्न में घी का काम कैसे किया?
- 'मरजादा न लही' के माध्यम से कौन-सी मर्यादा न रहने की बात की जा रही है?
- कृष्ण के प्रति अपने अन्य प्रम को गोपियों ने किस प्रकार अभिव्यक्त किया है?
- गोपियों ने उद्धव से योग की शिक्षा कैसे लोगों को देने की बात कही है?
- प्रस्तुत पदों के आधार पर गोपियों का योग-साधना के प्रति दृष्टिकोण स्पष्ट
- गोपियों के अनुसार राजा का धर्म क्या होना चाहिए?
- गोपियों को कृष्ण में ऐसे कौन-से परिवर्तन दिखाई दिए जिनके कारण वे अपना मन वापस पा लेने की बात
कहती हैं? - गोपियों ने अपने वाकृचातुर्य के आधार पर जानी उद्व को परास्त कर दिया, उनके वाकृचातुर्य की विशेषताएँ
लिखिए? - संकलित पदों को ध्यान में रखते हुए सूर के भ्रमरगीत की मुख्य विशेषताएँ बताइए?
रचना और अभिव्यक्ति
- गोपियों ने उद्व के सामने तरह-तरह के तर्क दिए हैं, आप अपनी कल्पना से और तर्क दीजिए।
- उद़्व ज़ानी थे, नीति की बातें जानते थे; गोपियों के पास ऐसी कौन-सी शक्त थी जो उनके वाकचातुर्य में मुखरित हो उठी?
- गोपियों ने यह क्यों कहा कि हरि अब राजनीति पढ़ आए हैं? क्या आपको गोपियों के इस कथन का विस्तार समकालीन राजनीति में नज़र आता है, स्पष्ट कीजिए।
पाठेतर सक्रियता
- प्रस्तुत पदों की सबसे बड़ी विशेषता है गोपियों की 'वाग्विदग्धता'। आपने ऐसे और चरित्रों के बारे में पढ़ा या सुना होगा जिन्होंने अपने वाकचातुर्य के आधार पर अपनी एक विशिष्ट पहचान बनाई; जैसे-बील, तेनालीरम, गोपालभाँड,म ुल्ला नसीरदीन आदि। अपने किसी मनपसंद चरि के कुछ किस्से संकलित कर एक अलबम तैयार करें।
- सूर रचित अपने प्रिय पदों को लय व ताल के साथ गाएँ।
शब्द-संपदा
बड़भागी — भाग्यवान
अवसरस — अतिलिप, नीरस, अधूरा
तागा — धागा, बंधन
पुरइन पात — कमल का पत्ता
ध्वजा — दाग, ध्वजा
माँहें — में
प्रीति-नदी — प्रेम की नदी
पाँव — मेरे
बोरेयो — डुबायो
पगनी — सुथर होना
गुर चींटी ज्यों पागी — जिस प्रकार चींटी गुड़ में लिपटी है, उसी प्रकार हम भी कृष्ण के प्रेम में अनुरक्त हैं
अधार — आधार
आगम — आगमन
बिथा — व्यथा
विरहिन — वियोग में जीने वाली
विरह दही — विरह की आग में जल रही हैं
हरी — श्री
गुहारि — रक्षा के लिए पुकारना
जितहीं तैं — जहाँ से
उत तैं — उधर, वहाँ
धार — योग की प्रबल धारा
धीर — धैर्य
मरजादा — मर्यादा, प्रतिष्ठा
न रही — नहीं रही, नहीं रखी
हारिल — हारिल एक पक्षी है जो अपने पैरों में सदा एक लकड़ी लिए रहता है, उसे छोड़ता नहीं है
नंद-नंदन उर...पकड़ी — नंद के नंदन कृष्ण को हमने भी अपने हृदय में बसाकर कसकर पकड़ा हुआ है
जक री — रहती रहती है
सु — वह
व्याधि — रोग, पीड़ा पहुँचाने वाली वस्तु
करी — भोगा
तिन्हाहिं — उनको
मन चकरी — जिनका मन स्थिर नहीं रहता
मधुकर — भौंरे, उद्दण्ड के लिए गोपियों द्वारा प्रयुक्त संबोधन
हुतो — थे
पठायो — भेजा
आगे के — पहले के
पर हित — दूसरों के कल्याण के लिए
डोलत धाए — घूमते-फिरते थे
फेर — फिर से
पायेंगे — पा लेंगे
अनति — अन्याय
यह भी जानें
हारिल : यह पीली टाँगों वाला हरे रंग का कबूतर की जाति का पक्षी है जिसे हरियल, हारीत (संस्ृकत), कॉमन ग्रीन पिजन भी कहा जाता है। यह पक्षी भारत में घने पेड़ों वाले कषे्रों में पाया जाता है। 'हारिल की लकड़ी' लोक में मुहावरे के रूप में प्रचलित है।