नौबतखाने में इबादत (यतींद्र मिश्र) - CBSE Class 10 Hindi Notes

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Chapter Study Guide & Summary

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Key Concepts & Syllabus Topics

Important Definitions & Terminology

नौबतखाने में इबादत (यतींद्र मिश्र) Overview
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NCERT Curriculum Alignment
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Active Recall & Revision
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Quick Revision & Key Points

Full NCERT Chapter: नौबतखाने में इबादत (यतींद्र मिश्र)

यतींद्र मिश्र का जन्म सन् 1977 में अयोध्या (उत्तर प्रदेश) में हुआ। उन्होंने लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ से हिंदी में एम.ए. किया। वे आजकल स्वतंत्र लेखन के साथ अद्दवार्षिक सहित पत्रिका का संपादन कर रहे हैं। सन् 1999 में साहित्य और कलाओं के संवद्दन और अनुशीलन के लिए एक सास्कृतिक न्यास 'विमला देवी फाउंडेशन' का संचालन भी कर रहे हैं।
यतींद्र मिश्र के तीन काव्य-संग्रह प्रकाशित हुए है-यदा-कदा, अयोध्या तथा अन्य कविताएँ, ड्योढ़ी पर आलाप। इसके अलावा शास्त्रीय गायिका गिरिजा देवी के जीवन और संगीत साधना पर एक पुस्तक गिरिजा लिखी। रीतिकाल के अंतिम प्रतिनिधि कवि द्विजदेव की ग्रथावली (2000) का सह-संपादन किया। कुवर नारायण पर केंद्रित दो पुस्तकों के अलावा स्पक मैके के लिए विरासत-2001 के कार्यक्रम के लिए रूपंकर कलाओं पर केंद्रित थाती का संपादन भी किया। युवा रचनाकार यतंद्र मिश्र को भारत भूषण अग्रवाल कविता सम्मान, हेमंत स्मृति कविता पुरस्कार, तऋतुराज सम्मान आदि कई पुरस्कार प्राप्त हुए हैं। कविता, संगीत व अन्य ललित कलाओं के साथ-साथ समाज और संस्कृति के विविध क्षत्रो में भी उनकी गहरी रुचि है।

‘नोबतखाने में इबादत’ प्रसिद्ध शहनाई वादक उस्ताद बिस्मिल्ला खाँ पर रोचक शैली में लिखा गया व्यक्ति-चित्र है। यतीन्द्र मिश्र ने बिस्मिल्ला खाँ का परिचय तो दिया ही है, साथ ही उनकी रुचियों, उनके अंतर्मन की बनावट, संगीत की साधना और लगन को संवेदनशील भाषा में व्यक्त किया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया गया है कि संगीत एक साधना है। इसका विधि-विधान है। इसका शास्त्र है, इस शास्त्र से परिचय आवश्यक है, सि़्फ परिचय ही नहीं उसका अभ्यास जुरूरी है और अभ्यास के लिए गुरु-शिष्य परंरा जरूरी है, पूर्ण तन्मयता जरूरी है, धैर्य जरूरी है, मंथन जरूरी है। वह लगन और धैर् बिस्मल्ला खाँ में रहा है। तभी 80 वर्ष की उम्र में भी उनकी साधना चलती रही है। यतींद्र मि्र संगीत की शास्त्ीय परंपरा के गहरे जानकार हैं, इस पाठ में इसकी कई अनुगूजे हैं जो पाठ को बार-बार पढ़ने के लिए आमंत्रत करती हैं भाषा सहज, प्रवाहमयी तथा प्संों और संदरभां से भरी हुई है।

नोबतखाने में इबादत

सन् 1916 से 1922 के आसपास की काशी। पंचगंगा घाट स्थित बालाजी मंदिर की ड्योढी। ड्योढ़ी का नौबतखाना और नौबतखाने से निकलने वाली मंगलध्वनि। अमीरुदीन अभी सिफ् छ: साल का है और बड़ा भाई शम्सुदहीन नौ साल का। अमीरुदीन को पता नहीं है कि राग किस चिड़िया को कहते हैं। और ये लोग हैं मामूजान वगैरह जो बात-बात पर भीमपलासी और मुलतानी कहते रहते हैं क्या वाजिब मतलब हो सकता है इन शब्दों का, इस लिहाज से अभी उम्र नहीं है अमीरु्वीन की, जान सके इन भारी शब्दों का वजन कितना होगा। गोयाइतना जरूर है कि अमीरुद्वीन व शम्सुद्वीन के मामाद्य सादिक हुसैन तथा अलीबखश देश केजानेमाने शहनाई वादक हैं विभिन रियासतों के दरबार में बजाने जाते रहते हैं। रोजनामचे में बालाजी का मंदिर सबसे ऊपर आता है। हर दिन की शुरुआत वहीं ड्योढ़ी पर होती है। मंदिर के विग्रों को पता नहीं कितनी समझ है, जो रोज बदल-बदलकर मुलतानी, कल्याण, ललत और कधी भैखख रागों को सुनते रहते हैं। ये खानदानी पेशा है अलीबख्खा के घर का। उनके अब्बाजानभी/यहीं ड्योढ़ी पर शहनाई बजाते रहते हैं।

अमीरुदीन का जन्म डुमराव, बिहार के एक संगीत प्रमी परिवार में/हुआ है। 5-6 वर्ष ुमराव मं विताकर वह नाना के घर, ननिहाल काशी में आ गयाहै डुमराव का इतिहास में कोई स्थान बनता हो, ऐसा नहीं लगा कभी भी। पर यह ज़रूर है कि शहनाई और डुमराँव एक-दूसरे के लिए उपयोगी हैं शहनाई बजाने के लिए रीड का प्रयोग होता है। रीड अंदर से पोली होती है जिसके सहारे शहनाई को फूँका जाता है। रीड, नरकट (एक प्रकार की घास) से बनाई जाती है जो डुमराँव में मुख्यत: सोन नदी के किनारों पर पाई जाती है। इतनी ही महत्ता है इस समय डुमराँव की जिसके कारण शहनाई जैसा वादछ बजता है। फिर अमीरुद्ीन जो हम सबके प्िय हैं, अपने उस्ताद बिस्मल्ला खाँ साहब हैं उनका जन्म-स्थान भी डुमराँव ही है। इनके परदादा उस्ताद सलार हुसैन खाँ डुमराँव निवासी थे। बिस्मल्ला खाँ उस्ताद पैगंबरबखश खाँ और मिटुन के छोटे साहबजादे हैं।

अमीरुदीन की उम्र अभी 14 साल है। मसलन बिस्मल्ला खाँ की उम्र अभी 14 साल है। वही काशी है। वही पुराना बालाजी का मंदिर जहाँ बिस्मल्ला खाँ को नौबतखाने रियाज के लिए जाना पड़ता है। मगर एक रास्ता है बालाजी मंदर तक जाने का। यह रास्ता रसूलनबाई और बतूलनबाई के यहाँ से होकर जाता है। इस रास्ते से अमीरुदीन को जाना अच्छा लगता है। इस रास्ते न जाने कितने तरह के बोल-बनाव कभी ठुमरी, कभी टप्पे, कभी दादरा के मार्फत ड्योढ़ी तक पहुँचते रहते हैं। रसूलन और बतूलन जब गाती हैं तब अमीरुद्वीन को खुशी मिलती है। अपने ढेरों साक्षात्कारों में बिस्मल्ला खाँ साहब ने स्वीकार किया हैकि उन्हें अपने जीवन के आरंभिक दिनों में संगीत के प्रति आसक्त इन्हीं गायिका बहिनों को सुनकर मिली है। एक प्रकार से उनकी अबोध उम्र में अनुभव की स्लेट पर संगीत प्रेरणा की वर्णमाला रसूलनबाई और बतूलनबाई ने उकेरी है।

वैदिक इतिहास में शहनाई का कोई उनल्लेख नहीं मिलता। इसे संगीत शास्रातर्गत 'सुषर-वाधघों' में गिना जाता है। अरब देश में फूँककर बजाए जाने वाले वाघ जिसमें नाड़ी (नरकट या रीड) होती है, को 'नय' बोलते हैं शहनाई को 'शाहेनय' अर्थात् 'सुषर वादयों में शाह' की उपाध दी गई है। सोलहवीं शताब्दी के उत्तराद्ध में तानसेन के द्ा रची बंदिश, जो संगीत राग कल्पटठम से प्ाप्त होती है, में शहनाई, मुरली, वंशी, शृंगी एवं मुरछंग आदि का वर्णन आया है।

अवधी पारंपरिक लोकगीतों एवं चैती में शहनाई का उल्लेख बार-बार मिलता है। मंगल का परिवेश प्रतिष्ठित करने वाला यह वादध इन जगहों पर मांगलिक विधि-विधानों के अवसर पर ही प्रयुक्त हुआ है। दक्षण भारत के मंगल वाद् 'नागस्वरम' की तरह शहनाई, प्रभाती की मंगलध्वन का संपूरक है।

शहनाई के इसी मंगलध्वन के नायक बिस्मल्ला खाँ साहब अस्सी बरस से सुर माँग रहे हैं। सच्चे सुर की नेमत। अस्सी बरस की पाँचों वक्त वाली नमाज इसी सुर को पाने की प्र्थना में खर्च हो जाती है। लाखों सजदे, इसी एक सच्चे सुर की इबादत में खुदा के आगे झुकते है। वे नमाज के बाद सजदे में गिड़गिड़ाते है-'मेरे मालिक एक सुर बख्छा दे। सुर में वह तासीर पैदा कर कि आँखों से सच्चे मोती की तरह अनगढ़ आँसू निकल आएँ' उनको यकीन है, कभी खुदा यूं ही उन पर मेहरबान होगा और अपनी झोली से सुर का फल निकालकर उनकी ओर उछालेगा, फिर कहेगा, ले जा अमीरुद्ीन इसको खा ले और कर ले अपनी मुराद पूरी।

अपने ऊहापोहों से बचने के लिए हम स्वयं किसी शरण, किसी गुफ़ा को खोजते हैं जहाँ अपनी दुश्चताओं, दु्बलताओं को छोड़ सकें और वहाँ से फिर अपने लिए एक नया तिलिस्म गढ़ सकें। हिरन अपनी ही महक से परेशान पूरे जंगल में उस वरदान को खोजता है जिसकी

गमक उसी में समाई है। अस्सी बरस से बिस्मल्ला खाँ यही सोचते आए हैं कि सातों सुरं को बरतने की तमीज उन्हें सलीके से अभी तक क्यों नहीं आई। बिस्मल्ला खाँ और शहनाई के साथ जिस एक मुस्लम पर्व का नाम जुड़ा हुआ है, वह मुहर्म है। मुहर्म का महीना वह होता है जिसमें शिया मुसलमान हज़रत इमाम हुसैन एवं उनके कुछ वंशजों के प्रति अज़ादारी (शोक मनाना) मनाते हैं। पूरे दस दिनों का शोक। वे बताते हैं कि उनके खानदान का कोई व्यक्त मुहरम के दिनों में न तो शहनाई बजाता है, न ही किसी संगीत के कार्क्रम में शिरकत ही करता है। आठवीं तारीख उनके लिए खास महत्व की है। इस दिन खाँ साहब खड़े होकर शहनाई बजाते हैं व दालमंडी में फातमान के करीब आठ किलोमीटर की दूरी तक पैदल रोते हुए, नौहा बजाते जाते हैं इस दिन कोई राग नहीं बजता। राग-रागिनियों की अदायगी का निषेध है इस दिन। 0

उनकी आँखें इमाम हुसैन और उनके परिवार के लोगों की शहादत में नम रहती हैं। अज़ादारी होती है। हज़ारों आँखें नम। हजार बरस की परंपरा पुनजीवित। मुहरम संपन्न होता है। एक बड़े कलाकार का सहज मानवीय रूप ऐसे अवसर पर आसानी से दिख जाता है।

मुहर्रम के गमजदा माहौल से अलग, कभी-कभी सुकून के क्षणों में वे अपनी जवानी के दिनों को याद करते हैं। वे अपने रियाज को कम, उन दिनों के अपने जुनून को अधिक याद करते है। अपने अब्बाजान और उस्ताद को कम, पक्का महाल की कुलसुम हलवाइन की कचौड़ी वाली दुकान व गीताबाली और सुलोचना को ज्यादा याद करते हैं। कैसे सुलोचना उनकी पसंदीदा हीरोइन रही थीं, बड़ी रहस्यमय मुस्कराहट के साथ गालों पर चमक आ जाती है। खाँ साहब की अनुभवी आँखें और जल्दी ही खिस्स से हँस देने की ईश्वरीय कृपा आज भी बदस्तूर कायम है।

इसी बालसुलभ हँसी में कई यादे बंद हैं। वे जब उनका जिक्र करते हैं तब फिर उसी नैसग्गिक आनंद में आँखें चमक उठती हैं। अमीरुद्ीन तब सिफ़्े चार साल का रहा होगा। छुपकर नाना को शहनाई बजाते हुए सुनता था, रियाज के बाद जब अपनी जगह से उठकर चले जाएँ तब जाकर ढेरों छोटी-बड़ी शहनाइयों की भीड़ से अपने नाना वाली शहनाई ढूढ़ता और एक-एक शहनाई को फेंक कर खारिज करता जाता, सोचता-'लगता है मीठी वाली शहनाई दादा कहीं और रखते हैं' जब मामू अलीबखश खाँ (जो उस्ताद भी थे) शहनाई बजाते हुए सम पर आएँ, तब धड़ से एक पत्थर जमीन पर मारता था। सम पर आने की तमीज उन्हें बचपन में ही आ गई थी, मगर बच्चे को यह नहीं मालूम था कि दाद वाह करके दी जाती है, सिर हिलाकर दी जाती है, पत्थर पटक कर नहीं। और बचपन के समय फ़िल्मों के बुखार के बारे में तो पूछना ही क्या? उस समय थ्ड क्लास के लिए छ: पैसे का टिकट मिलता था। अमीरुदीन दो पैसे मामू से, दो पैसे मौसी से और दो पैसे नानी से लेता था फिर घंटों लाइन में लगकर टिकट हासिल करता था।

इधर सुलोचना की नयी फ़िल्म सिनेमाहाल में आई और उधर अमीरुदीन अपनी कमाई लेकर चला फ़िल्म देखने जो बालाजी मंदर पर रोज शहनाई बजाने से उसे मिलती थी। एक अठन्नी मेहनताना। उस पर यह शौक जबरदस्त कि सुलोचना की कोई नयी फ़िल्म न छूटे और कुलसुम की देशी घी वाली दुकान। वहाँ की संगीतमय कचौड़ी। संगीतमय कचौड़ी इस तरह क्योंकि कुलसुम जब कलकलाते घी में कचौड़ी डालती थी, उस समय छन्न से उठने वाली आवाज में उन्हें सारे आरोह-अवरोह दिख जाते थे। राम जाने, कितनों ने ऐसी कचौड़ी खाई होंगी। मगर इतना तय है कि अपने खाँ साहब रियाज़ी और स्वादी दोनों रहे हैं और इस बात में कोई शक नहीं कि दादा की मीठी शहनाई उनके हाथ लग चुकी है। काशी में संगीत आयोजन की एक प्रचीन एवं अद्भुत परंपरा है। यह आयोजन पिछले कई बरसों से संकटमोचन मंदर में होता आया है। यह मंदिर शहर के दक्षिण में लंका पर स्थित है व हनुमान जयंती के अवसर पर यहाँ पाँच दिनों तक शास्तरीय एवं उपशास्त्रीय गायन-वादन की उत्कृष्ट सभा होती है। इसमें बिस्मल्ला खाँ अवश्य रहते हैं। अपने मजहब के प्रति अत्यधिक समपित उस्ताद बिस्मल्ला खाँ की श्रद्वा काशी विश्वनाथ जी के प्रति भी अपार है। वे जब भी काशी से बाहर रहते हैं तब विश्वनाथ व बालाजी मंदर की दिशा की ओर मुँह करके बैठते हैं, थोड़ी देर ही सही, मगर उसी ओर शहनाई का प्याला घुमा दिया जाता है और भीतर की आस्था रीड के माध्यम से बजती है। खाँ साहब की एक रीड 15 से 20 मिनट के अंदर गीली हो जाती है तब वे दूसरी रीड का इस्तेमाल कर लिया करते हैं।

अक्सर कहते है-'क्या करें मियाँ, ई काशी छोड़कर कहाँ जाएँ, गंगा मइया यहाँ, बाबा विश्वनाथ यहाँ, बालाजी का मंदर यहाँ, यहाँ हमारे खानदान की कई पुशतों ने शहनाई बजाई है, हमारे नाना तो वहीं बालाजी मंदर में ब़ प्रतिष्ित शहनाईवाज रह चुके हैं। अब हम क्या करें, मरते दम तक न यह शहनाई छूटेगी न काशी। जिस जमीन ने हमें तालीम दी, जहाँ से अदब पाई, वो कहाँ और मिलेगी? शहनाई और काशी से बढ़कर कोई जन्नत नहीं इस धरती पर हमारे लिए।'

काशी संस्कृति की पाठशाला है। शास्त्ों में आनंदकानन के नाम से प्रतिष्ठत। काशी में कलाधर हनुमान व नृत्य-विश्वनाथ हैं। काशी में बिस्मल्ला खाँ हैं। काशी में हजारों सालों का इतिहास है जिसमें पंडित कंठे महाराज हैं, विद्याधरी हैं, बड़े रामदास जी हैं, मौजु्वीन खाँ हैं व इन रसिकों से उपकृत होने वाला अपार जन-समूह है। यह एक अलग काशी है जिसकी अलग तहज़ीब है, अपनी बोली और अपने विशिष्ट लोग हैं। इनके अपने उत्सव हैं, अपना गम। अपना सेहरा-बन्ना और अपना नौहा। आप यहाँ संगीत को भक्त से, भक्त को किसी भी धर्म के कलाकार से, कजरी को चैती से, विश्वनाथ को विशालाक्षी से, बिस्मल्ला खाँ को गंगाद्वार से अलग करके नहीं देख सकते।

अकसर समारोहों एवं उत्सवों में दुनिया कहती है ये बिस्मल्ला खाँ हैं बिस्मल्ला खाँ का मतलब-बिस्मल्ला खाँ की शहनाई। शहनाई का तात्पर्य-बिस्मल्ला खाँ का हाथ। हाथ से आशय इतना भर कि बिस्मल्ला खाँ की फूँक और शहनाई की जादुई आवाज का असर हमारे सिर चढ़कर बोलने लगता है। शहनाई में सरगम भरा है। खाँ साहब को ताल मालूम है, राग मालूम है। ऐसा नहीं कि बेताले जाएँगे। शहनाई में सात सुर लेकर निकल पड़ं। शहनाई में परवरदिगार, गंगा मइया, उस्ताद की नसीहत लेकर उतर पड़। दुनिया कहती-सुबहान अल्लाह, तिस पर बिस्मल्ला खा कहते है-अलहमदुलिल्लाह। छोटी-छोटी उपज से मिलकर एक बड़ा आकार बनता है। शहनाई का करतब शुरू होने लगता है। बिस्मल्ला खाँ का संसार सुरीला होना शुरू हुआ। फूक में अजान की तासीर उतरती चली आई। देखते-देखते शहनाई डेढ़ सतक के साज से दो सतक का साज बन, साजों की कतार में सरताज हो गई। अमीरुदीन की शहनाई गूज उठी उस फकीर की दुआ लगी जिसने अमीरुदीन से कहा था-"बजा, बजा।"

किसी दिन एक शिष्या ने डरते-डरते खाँ साहब को टोका, "बाबा! आप यह क्या करते हैं, इतनी प्रतिष्ठा है आपकी। अब तो आपको भारतरल भी मिल चुका है, यह फटी तहमद न पहना करें। अच्छा नहीं लगता, जब भी कोई आता है आप इसी फटी तहमद में सबसे मिलते हैं'" खाँ साहब मुसकराए। लाड़ से भरकर बोले, "धत्! पगली ई भारतरल हमको शहनईया पे मिला है, लुंगिया पे नाहीं। तुम लोगों की तरह बनाव सिंगार देखते रहते, तो उमर ही बीत जाती, हो चुकती शहनाई।" तब क्या खाक रियाज हो पाता। ठीक है बिटिया, आगे से नहीं पहनेंगे, मगर

इतना बताए देतेहैं कि मालिक से यही दुआ है, "फटा सुर न बख्शों। लुंगिया का क्या है, आज फटी है, तो कल सी जाएगी।"

सन् 2000 की बात है। पक्का महाल (काशी विश्वनाथ से लगा हुआ अधिकतम इलाका) से मलाई बरफ़ बेचने वाले जा चुके है। खाँ साहब को इसकी कमी खलती है। अब देशी घी में वह बात कहाँ और कहाँ वह कचौड़ी-जलेबी। खाँ साहब को बड़ी शिदत से कमी खलती है। अब संगतियों के लिए गायकों के मन में कोई आदर नहीं रहा। खाँ साहब अफसोस जताते हैं। अब घंटों रियाज को कौन पूछता है? हैरान है बिस्मल्ला खाँ। कहाँ वह कजली, चैती और अदब का जमाना?

सचमुच हैरान करती है काशी-पक्का महाल से जैसे मलाई बऱ गया, संगीत, साहित्य और अदब की बहुत सारी परंपराएँ लुप्त हो गई। एक सच्चे सुर साधक और सामाजिक की भाँत बिस्मल्ला खाँ साहब को इन सबकी कमी खलती है। काशी में जिस तरह बाबा विश्वनाथ और बिस्मला खाँ एक-दूसरे के पूरक रहे हैं उसी तरह मुहरम-ताजिया और होली-अबीर, गुलाल की गंगा-जमुनी संस्कृति भी एक दूसरे के पूरक रहे हैं अभी जल्दी ही बहुत कुछ इतिहास बन चुका है। अभी आगे बहुत कुछ इतिहास बन जाएगा। फिर भी कुछ बचा है जो सिफ्फ काशी में है। काशी आज भी संगीत के स्वर पर जगती और उसी की थापों पर सोती है। काशी में मरण भी मंगल माना गया है। काशी आनंदकानन है। सबसे बड़ी बात है कि काशी के पास उस्ताद बिस्मल्ला खाँ जैसा लय और सुर की तमीज सिखाने वाला नायाब हीरा रहा है जो हमेशा से दो कौमों को एक होने व आपस में भाईचारे के साथ रहने की प्रणा देता रहा।

भारतरल से लेकर इस देश के ढेरों विश्वविद्यालयों की मानद उपाधियों से अलंकृत व संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार एवं पद्मविभूषण जैसे सम्मानों से नहीं, बल्क अपनी अजेय संगीतयात्रा के लिए बिस्मल्ला खाँ साहब भविष्य में हमेशा संगीत के नायक बने रहेंगे। नब्बे वर्ष की भरी-पूरी आयु में 21 अगस्त 2006 को संगीत रसिकों की हार्दिक सभा से विदा हुए खाँ साहब की सबसे बड़ी देन हमें यही है कि पूरे अस्सी बरस उन्होंने संगीत को संपूर्णत व एकाधिकार से सीखने की जिजीविषा को अपने भीतर जिंदा रखा।

प्रश्न-अभ्यास

  1. शहनाई की दुनिया में डुमराव को क्यों याद किया जाता है?

  2. बिस्मल्ला खाँ को शहनाई की मंगलध्वन का नायक क्यों कहा गया है?

  3. सुषिर-वाघयो से क्या अभिप्राय है? शहनाई को 'सुषिर वा्यो में शाह' की उपाधि क्यों दी गई होगी?

  4. आशय स्पष्ट कीजिए-

(क) 'फटा सुर न बख्शों। लुंगिया का क्या है, आज फटी है, तो कल सी जाएगी।' (ख) 'मेरे मालिक सुर बखा दे। सुर में वह तासीर पैदा कर कि आँखों से सच्चे मोती की तरह अनगढ़ ऑसू निकल आएँ' 1

  1. काशी में हो रहे कौन-से परिवर्तन बिस्मल्ला खाँ को व्यथित करते थे?

  2. पाठ में आए किन प्रसंगों के आधार पर आप कह सकते हैं कि- (क) बिस्मल्ला खाँ मिली-जुली संस्कृति के प्रतीक थे। (ख) वे वास्तविक अथों में एक सच्चे इनसान थे।

  3. बिस्मल्ला खाँ के जीवन से जुड़ी उन घटनाओं और व्यक्तियों का उल्लेख करें जिन्होंने उनकी संगीत साधना को समृद्धर किया?

रचना और अभिव्यक्ति

  1. बिस्मल्ला खाँ के व्यक्त्व की कौन-कौन सी विशेषताओं ने आपको प्भावित किया?

  2. मुहरम से बिस्मल्ला खाँ के जुड़ाव को अपने शब्दों मं लिखिए।

  3. बिस्मल्ला खाँ कला के अन्य उपासक थे, तर्क सहित उत्तर दीजिए।

भाषा-अध्ययन

  1. निम्नलिखित मिश्र वाक्यों के उपवाक्य छॉँटकर भेद भी लिखिए- (क) यह ज़रूर है कि शहनाई और डुमरॉँव एक-दूसरे के लिए उपयोगी हैं। (ख) रीड अंदर से पोली होती है जिसके सहारे शहनाई को फूँका जाता है। (ग) रीड नरकट से बनाई जाती है जो डुमराँव में मुख्यत: सोन नदी के किनारों पर पाई जाती है। (घ) उनको यकीन है, कभी खुदा यूं ही उन पर मेहरबान होगा।

(ड) हिरन अपनी ही महक से परेशान पूरे जंगल में उस वरदान को खोजता है जिसकी गमक उसी में समाई है।
(च) खाँ साहब की सबसे बड़ी देन हमे यही है कि पूरे अस्सी बरस उन्होंने संगीत को संपूर्णता व एकाधिकार से सीखने की जिजीविषा को अपने भीतर जिंदा रखा।

  1. निम्नलिखित वाक्यों को मिश्रित वाक्यों में बदलिए-

(क) इसी बालसुलभ हँसी में कई यादें बंद हैं।
(ख) काशी में संगीत आयोजन की एक प्राचीन एवं अद्भुत परंपरा है।
(ग) धत्! पगली ई भारतरल हमको शहनईया पे मिला है, लुंगिया पे नाहीं।
(घ) काशी का नायाब हीरा हमेशा से दो कौमों को एक होकर आपस में भाईचारे के साथ रहने की प्रणा देता रहा। 0

पाठेतर सक्रियता

  • कल्पना कीजिए कि आपके विदधालय में किसी प्रसिद्ध संगीतकार के शहनाई वादन का कार्यक्रम आयोजित किया जा रहा है। इस कार्यक्रम की सूचना देते हुए बुलेटिन बोर्ड के लिए नोटिस बनाइए।
  • आप अपने मनपसंद संगीतकार के बारे में एक अनुच्छेद लिखिए।
  • हमारे साहित्य, कला, संगीत और नृत्य को समृद्र करने में काशी (आज के वाराणसी) के योगदान पर चर्चा कीजिए। काशी का नाम आते ही हमारी आँखों के सामने काशी की बहुत-सी चीज़ें उभरने लगती हैं, वे कौन-कौन सी हैं?

शब्द-संपदा

  • देहली — दहलीज

  • नौबतखाना — प्रवेश द्वार के ऊपर मंगल ध्वनि बजाने का स्थान

  • रियाज — अभ्यास

  • माकिन — द्वारा

  • शृंगी — सींग का बना वाद्ययंत्र

  • मुरछना — एक प्रकार का लोक वाद्ययंत्र

  • निमा — ईश्वर को दीन, सुख, धन दौलत

  • सजदा — माथा टेकना

  • इबादत — उपासना

  • तासीर — गुण, प्रभाव, असर

  • ध्वनि — शब्दध्वनि

  • उलाहना — उलझन, अतिशयता

  • तिलिस्म — जादू

  • गमक — खुशबू, सुगंध

  • अज़ादारी — मातम करना, दुख मनाना

  • बखूबी — कायदे से, तरीके से

  • सान्निध्य — स्वाभाविक, प्राकृतिक

  • दाद — शाबाशी

  • तालीम — शिक्षा

  • अदब — कायदा, साहित्य

  • अदबमुल्लाह — तमाम तारीफ ईश्वर के लिए

  • जिजीविषा — जीने की इच्छा

  • शिरकत — शामिल होना

यह भी जानें

सम

ताल का एक अंग, संगीत में वह स्थान जहाँ लय की समाप्त और ताल का आरंभ होता है।

श्रुति

एक स्वर से दूसरे स्वर पर जाते समय का अत्यंत सूक्षम स्वरांश

वाद्ययंत्र

हमारे देश में वाध यंतरों की मुख्य चार श्रेणियाँ मानी जाती है

  • तत-वितत - तार वाले वाद्-वीणा, सितार, सारंगी, सरोद
  • सुषिर - फूंक कर बजाए जाने वाले वाध-बाँसुरी, शहनाई, नागस्वरम, बीन
  • घनवाद्य -आघात से बजाए जाने वाले धातु वाध—झाँझ, मंजीरा, घुँघरू
  • अवनद्ध - चमड़ से मढ़ वाध-तबला, ढोलक, मृदंग आदि।

चैती

चढ़ल चडत चित लागे ना रामा
बाबा के भवनवा
बीर बमनवा सगुन बिचारो
कब होइहैं पिया से मिलनवा हो रामा
चढ़ल चइत चित लागे ना रामा

ठुमरी

बाजुबंद खुल-खुल जाए जादू की पुडिया भर-भर मारी हे! बाजुबंद खुल-खुल जाए

टप्पा

बागाँ विच आया करो बागाँ विच आया करो
मक्खियाँ तों डर लगदा गुड़ ज़रा कम खाया करो।

दादरा

तड़प तड़प जिया जाए
सावरिया बिना
गोकुल छाड़़े मथुरा में छाए किन संग प्रीत लगाए तड़प तड़प जिया जाए

नौबतखाने में इबादत (यतींद्र मिश्र) - CBSE Class 10 Hindi Notes