जयशंकर प्रसाद का जन्म सन् 188 में वाराणसी में हुआ। काशी के प्रसिद्ध क्वींस कॉलेज में वे पढ़ने गए परंतु स्थितियाँ अनुकूल न होने के कारण आठवीं से आगे नहीं पढ़ पाए। बाद में घर पर ही संस्कृत, हंदी, फ़ारसी का अध्ययन किया। छायावादी काव्य प्रवृत्त के प्रमुख कवियों में से एक जयशंकर प्रसाद का सन् 1937 में निधन हो गया। उनकी प्रमुख काव्य-कृतियाँ है-चित्राधार, कानन-कुसुम, झरना, आँसू, लहर और कामायनी। आधुनिक हिंदी की श्रे्ठतम काव्य-कृति मानी जाने वाली कामायनी पर उन्हें मंगलाप्रसाद पारितोषिक दिया गया। वे कवि के साथ-साथ सफल गध्यकार भी थे। अजातशत्र, चंद्रगुप्त, स्कंदगुप्त और धुवस्वामिनी उनके नाटक है तो कंकाल, तितली और इरावती उपन्यास। आकाशदीप, आँधी और इंद्रजाल उनके कहानी संग्रह हैं।
प्रसाद का साहित्य जीवन की कोमलता, माधुर्य, शक्त और ओज का साहित्य माना जाता है। छायावादी कविता की अतिशय काल्पनिकता, सौंदर्य का सू्ष्म चित्रण, प्रकृति-प्रेम, देश-प्रम और शैली की लाक्षणिकता उनकी कविता की प्रमुख विशेषताएँ हैं। इतिहास और दर्शन में उनकी गहरी रुचि थी जो उनके साहित्य में स्पष्ट दिखाई देती है।
प्रेमचंद के संपादन में हंस (पत्रिका) का एक आत्मकथा विशेषांक निकलना तय हुआ था। प्रसाद जी के मित्ों ने आग्रह किया कि वे भी आत्मकथा लिखें प्रसाद जी इससे सहमत न थे। इसी असहमति के तक से पैदा हुई कविता है-आत्मकथ्य। यह कविता पहली बार 1932 में हंस के आत्मकथा विशेषांक में प्रकाशित हुई थी। छायावादी शैली में लिखी गई इस कविता में जयशंकर प्रसाद
ने जीवन के यथार्थ एवं अभाव पक्ष की मार्मिक अभिव्यक्त की है। छायावादी सूक्षमता के अनुरूप ही अपने मनोभावों को अभिव्यक्त करने के लिए जयशंकर प्रसाद ने ललित, सुंदर एवं नवीन शब्दों और बिबों का प्रयोग किया है। इन्हीं शब्दों एवं बिंबों के सहारे उन्होने बताया है कि उनके जीवन की कथा एक सामान्य व्यक्त के जीवन की कथा है। इसमे ऐसा कुछ भी नहीं है जिसे महान और रोचक मानकर लोग वाह-वाह करेगे। कुल मिलाकर इस कविता में एक तऱफ कव द्ारा यथार्थ की स्वीकृत है तो दूसरी तऱफ एक महान कव की विनम्रता भी।
आत्मकथ्य
मधुप गुन-गुना कर कह जाता कौन कहानी यह अपनी, मुरझाकर गिर रहीं पत्तियाँ देखो कितनी आज घनी। इस गंभीर अनंत-नीलिमा में असंख्य जीवन-इतिहास यह लो, करते ही रहते हैं अपना व्यगय-मलिन उपहास तब भी कहते हो-कह डालू दुर्लता अपनी बीती। तुम सुनकर सुख पाओगे, देखोगे-यह गागर रीती। किंतु कहीं ऐसा न हो कि तुम ही खाली करने वाले- अपने को समझो, मेरा रस ले अपनी भरने वाले। यह विडंबना! अरी सरलते तेरी हंसी उड़ऊँ मैं। भूलें अपनी या प्वंचना औरों की दिखलाँ मैं। उज्ज्वल गाथा कैसे गाऊँ, मधुर चाँदनी रातों की। अरे खिल-खिला कर हँसते होने वाली उन बातों की मिला कहाँ वह सुख जिसका मैं स्वप्न देखकर जाग गया। आलिगन में आते-आते मुसक्या कर जो भाग गया। जिसके अरुण-कपोलों की मतवाली सुंदर छाया में। अनुरागिनी उषा लेती थी निज सुहाग मधुमाया में। उसकी स्मृति पाथेय बनी है थके पथिक की पंथा की। सीवन को उधेड़ कर देखोगे क्यों मेरी कंथा की? छोटे से जीवन की कैसे बड़ी कथाएँ आज कहू? क्या यह अच्छा नहीं कि औरों की सुनता मैं मौन रहूँ? सुनकर क्या तुम भला करोगे मेरी भोली आत्म-कथा? अभी समय भी नहीं, थकी सोई है मेरी मौन व्यथ
ा। कवि आत्मकथा लिखने से क्यों बचना चाहता है?
प्रश्न-अभ्यास
कवि आत्मकथा लिखने से क्यों बचना चाहता है?
आत्मकथा सुनाने के संदर्भ में 'अभी समय भी नहीं' कव ऐसा क्यों कहता है?
स्मृति को 'पाथेय' बनाने से कवि का क्या आशय है?
भाव स्पष्ट कीजिए-
(क) मिला कहाँ वह सुख जिसका मैं स्वप् देखकर जाग गया। आलिंगन में आते-आते मुसक्या कर जो भाग गया।
(ख) जिसके अरुण कपोलों की मतवाली सुंदर छाया में। अनुरागिनी उषा लेती थी निज सुहाग मधुमाया में।
'उज्ज्वल गाथा कैसे गाऊँ, मधुर चाँदनी रातों की'-कथन के माध्यम से कवि क्या कहना चाहता है?
'आत्मकथ्य' कविता की काव्यभाषा की विशेषताएँ उदाहरण सहित लिखिए।
कवि ने जो सुख का स्वप्ण देखा था, उसे कविता में किस रूप में अभिव्यक्त किया है?
रचना और अभिव्यक्ति
इस कविता के माध्यम से प्रसाद जी के व्यक्त्व की जो झलक मिलती है, उसे अपने शब्दोंमें लिखिए।
आप किन व्यक्तियों की आत्मकथा पढ़ना चाहंे और क्यों?
कोई भी अपनी आत्मकथा लिख सकता है। उसके लिए विशिष्ट या बड़ा होना जरूरी नहीं। हरियाणा राज्य के गुड़गाँव में घरेलू सहायिका के रूप में काम करने वाली बेबी हालदार की आत्मकथा "आलो आंधार" बहुतों के द्वरा सराही गई। आत्मकथात्मक शैली में अपने बाे में कुछ लिखिए।
पाठेतर सक्रियता
- किसी भी चर्चित व्यक्त का अपनी निजता को साव्जनिक करना या दूसरों का उनसे ऐसी अपक्ष करना सही है-इस विषय के पक्ष-विपक्ष में कक्षा में चर्चा कीजिए।
- बिना ईमानदारी और साहस के आत्मकथा नहीं लिखी जा सकती। गांधी जी की आत्मकथा 'सत्य के प्रयोग' पढ़कर पता लगाइए कि उसकी क्या-क्या विशेषताएँ हैं?
शब्द-संपदा
- मधुप — मधु रूपी भौंरा
- अनंत नीलिमा — असीम विस्तार
- व्यंग्य मलिन — खराब ढंग से निंदा करना
- गागर-रीति — ऐसा मन जिसमें कोई भाव नहीं, खाली घड़ा
- प्रवचन — भाषण
- मुसकान कर — मुस्कराकर
- अरुण-कपोल — लाल गाल
- अनुरागिनी उपमा — प्रेम भरी भौंरा
- स्मृति पाथेय — स्मृति रूपी संबल
- पंथ — रास्ता, राह
- कक्षा — अंतः, गुड़ी
यह भी जानें
- प्रगतिशील चेतना की साहित्यिक मासिक पत्रका हंस प्रेमचंद ने सन् 1930 से 1936 तक निकाली थी। पुन: सन् 1986 से यह साहित्यिक पत्रिका निकल रही है और इसके संपादक राजेंद्र यादव हैं।
- बनारसीदास जैन कृत अर्धकथानक हिंदी की पहली आत्मकथा मानी जाती है। इसकी रचना सन् 1641 में हुई और यह पदधयात्मक है।
आत्मकथ्य का एक अन्य रूप यह भी देखें-
- मैं वह खंडहर का भाग लिए फिरता हूँ।
- मैं रोया, इसको तुम कहते हो गाना,
- फूट पड़ा, तुम कहते, छंद बनाना;
- क्यों कवि कहकर संसार मुझे अपनाए,
- मैं दुनिया का हू एक नया दीवाना!
- मैं दीवानों का वेश लिए फिरता
- मै मादकता निःशेष लिए फिरता हूँ
- जिसको सुनकर जग झूम, झुके, लहराए,
- मैंमस्ती का सदेश लिए फिरता हूँ।
- कवि बच्चन की आत्म-परिचय कविता का अंश