यह दंतुरहित मुस्कान/फसल (नागार्जुन) - CBSE Class 10 Hindi Notes

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Chapter Study Guide & Summary

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Key Concepts & Syllabus Topics

Important Definitions & Terminology

यह दंतुरहित मुस्कान/फसल (नागार्जुन) Overview
The central theme and foundational concept covered in Class 10 Hindi Chapter 5, emphasizing conceptual clarity, NCERT curriculum alignment, and exam readiness.
NCERT Curriculum Alignment
Structured study material adhering strictly to CBSE board guidelines, learning objectives, and standardized assessment criteria for Class 10.
Active Recall & Revision
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Quick Revision & Key Points

Full NCERT Chapter: यह दंतुरहित मुस्कान/फसल (नागार्जुन)

नागार्जुन का जन्म बिहार के दरभंगा जिले के सतलखा गाँव में सन् 1911 में हुआ। उनका मूल नाम वैध्रनाथ मिश्र था। आरभिक शिकषा संस्कृत पाठशाला में हुई, फिर अध्ययन के लिए वे बनारस और कलकत्ता (कोलकाता) गए। 1936 में वेश्ीलंका गए, और वहीं बौद् धर्म में दीक्षित हुए दो साल प्रवास के बाद 1938 में स्वदेश लौट आए। घुमक्कड़ी और अक्खड़ स्वभाव के धनी नागार्जन ने अनेक बार संपूर्ण भारत की यात्रा की। सन् 1998 में उनका देहांत हो गया। नागार्जुन की प्रमुख काव्य कृतियाँ है-युगधारा, सतरंगे पंखों वाली, हजार-हजार बाँहों वाली, तुमने कहा था, पुरानी जूतियों का कोरस, आखिर ऐसा क्या कह दिया मैने, मैं मिलटरी का बूढ़ा घोड़ा। नागार्जुन ने कविता के साथ-साथ उपन्यास और अन्य गद विधाओं में भी लेखन किया है। उनका संपूर्ण कृतित्व नागारजुन रचनावली के सात खंड़ों में प्रकाशित है। साहित्यिक योगदान के लिए उन्हं अनेक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया जिनमें प्रमुख हैं हिंदी अकादमी, दिल्ली का शिखर सम्मान, उत्तर प्रदेश का भारत भारती पुरस्कार एवं बिहार का राजेंदर प्रसाद पुरस्कार। मैथिली भाषा में कविता के लिए उन्हं साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्रदान किया गया। राजनैतिक सक्रयता के कारण उन्हें अनेक बार जेल जाना पड़ा। हिंदी और मैथिली में समान रूप से लेखन करने वाले नागार्जन ने बांग्ला और संस्कृत में भी कविताएँ लिखीं। मातृभाषा मैथिली में वे 'यात्री' नाम से प्रतिष्ठित हैं। लोकजीवन से गहरा सरोकार रखने वाले नागार्जुन श्रष्टाचार, राजनीतिक स्वारथ और समाज की पतनशील स्थितियों के प्रति अपने साहित्य में विशेष सजग रहे। वे व्यंग्य में माहिर हैं,

इसलिए उन्हें आधुनिक कबीर भी कहा जाता है। छायावादोत्तर दौर के वे ऐसे अकेले कव हैं, जिनकी कविता गाँव की चौपालों और साहित्यिक दुनिया में समान रूप से लोकप्िय रही। वे वास्तविक अथं में जनकव हैं। सामयिक बोध से गहराई से जुड़े नागा्जुन की आंदोलनधर्मी कविताओं को व्यापक लोकप्रयता मिली। नागाजुन ने छंदों में काव्य-रचना की और मुक्त छंद में भी।

यह दंतुरित मुसकान कविता में छोटे बच्चे की मनोहारी मुसकान देखकर कवि के मन में जो भाव उमड़ते हैं उन्हें कविता में अनेक बिबों के माध्यम से प्रकट किया गया है। किव का मानना है कि इस सुंदरता में ही जीवन का संदेश है। इस सुदरता की व्याप्त ऐसी है कि कठोर से कठोर मन भी पिघल जाए। इस दंतुरित मुसकान की मोहकता तब और बढ़ जाती है जब उसके साथ नजरों का बाकपन जुड़ जाता है। परंतु फसल है क्या और उसे पैदा करने में किन-किन त्वों का योगदान होता है, बताया है नागाजने अपनी कविता फसल मे कविता यह भी रखाकित करती है कि प्रकृति और मनुषय के सहयोग से ही सृजन संभव है। बोलचाल की भाषा की गति और लय कविता को प्रभावशाली बनाती है।

कहना न होगा कि यह कविता हमें उपभोक्ता-संस्कृति के दौर में कृष-संस्कृति के निकट ले जाती है।

यह दंतुरित मुसकान

तुम्हारी यह दंतुरित मुसकान
मृतक में भी डाल देगी जान
धूल-धूसर तुम्हारे ये गात...
छोड़कर तालाब मेरी झोंपड़ी में खिल रहे जलजात परस पाकर तुम्हारा ही प्राण,
पिघलकर जल बन गया होगा कठिन पाषाण

छू गया तुमसे कि झरने लग पड़े शेफालिका के फूल
बाँस था कि बबूल?
तुम मुझे पाए नहीं पहचान?
देखते ही रहोगे अनमेष!
थक गए हो?
आँख लू मैं फेर?
क्या हुआ यदि हो सके परिचित न पहली बार?
यदि तुम्हारी माँ न माध्यम बनी होती आज
मैं न सकता देख
मैं न पाता जान
तुम्हारी यह दंतुरित मुसकान
धन्य तुम, माँ भी तुम्हारी धन्य!
चिर प्रवासी मैं इतर, मैं अन्य!
उगलियाँ माँ की कराती रही हैं मधुपर्क
देखते तुम इधर कनखी मार
तब तुम्हारी दंतुरित मुसकान और होतीं जब कि आँखें चार rer
मुझे लगती बड़ी ही छविमान!

फसल

एक के नहीं,
दो के नहीं,
ढेर सारी निदियों के पानी का जादू:
एक के नहीं,
दो के नहीं,
लाख-लाख कोट-कोटि हाथों के स्पर्श की गरिमा:
एक की नहीं,

दो की नहीं, हजार-हजार खेतों की मिट्टी का गुण धर्म:

फसल क्या है?
और तो कुछ नहीं है वह
नदियों के पानी का जादू है वह
हाथों के स्पर्श की महिमा है
भूरी-काली-संदली मिट्टी का गुण धर्म है
रूपांतर है सूरज की किरणों का
सिमटा हुआ संकोच है हवा की थिरकन का!

प्रश्न-अभ्यॉस

यह दंतुरित मुसकान

  1. बच्चे की दंतुरित मुसकान का कवि के मन पर क्या प्रभाव पड़ता है?

  2. बच्चे की मुसकान और एक बड़े व्यक्ति की मुसकान में क्या अंतर है?

  3. कवि ने बच्चे की मुसकान के सौदर्य को किन-किन बिबों के माध्यम से व्यक्त किया है?

  4. भाव स्पष्ट कीजिए-

(क) छोड़कर तालाब मेरी झोंपड़ी में खिल रहे जलजात। (ख) छू गया तुमसे कि झरने लग पड़े शेफालिका के फूल बास था कि बबूल?

रचना और अभिव्यक्ति

  1. मुसकान और क्रोध भिन्न-भिन्न भाव है। इनकी उपस्थिति से बने वातावरण की भिन्नता का चित्रण कीजिए।
  2. दंतुरित मुसकान से बच्चे की उ्र का अनुमान लगाइए और तर्क सहित उतर दीजिए।
  3. बच्चे से कवि की मुलाकात का जो शब्द-चित्र उपस्थित हुआ है, उसे अपने शब्दं में लिखिए।

पाठेतर सक्रियता

  • आप जब भी किसी बच्चे से पहली बार मिलें तो उसके हाव-भाव, व्यवहार आदि को सूक्मता से
    देखिए और उस अनुभव को कविता या अनुच्छेद के रूप में लिखिए।
  • एन.सी.ई.आर.टी. द्वारा नागार्जुन पर बनाई गई फ़िल्म देखिए।

फसल

  1. कवि के अनुसार फसल क्या है?
  2. से हैं?
  3. फसल को 'हाथों के स्प्श की गरिमा' और 'महिमा' कहकर कवि क्या व्यक्त करना
  4. भाव स्पष्ट कीजिए– (क) रूपांतर है सूरज की किरणों का

रचना और अभिव्यक्ति

  1. कवि ने फसल को हजार-हजार खेतों की मिटी का गुण-धर्म कहा है-

(क) मिद्टी के गुण-धर्म को आप किस तरह परिभाषित करेंगे?
(ख) वर्तमान जीवन शैली मिट्टी के गुण-धर्म को किस-किस तरह प्रभावित करती है?
(ग) मिट्ी द्वारा अपना गुण-धरम छोड़ने की स्थित में क्या किसी भी प्रकार के जीवन की कल्पना की जा सकती है?
(घ) मिट्टी के गुण-धर्म को पोषित करने में हमारी क्या भूमिका हो सकती है?

पाठेतर सक्रियता

  • इलेक्टॉनिक एवं प्रिट मीडिया द्वारा आपने किसानों की स्थिति के बारे में बहुत कुछ सुना, देखा और पढ़ा होगा। एक सुदृढ कृष-व्यवस्था के लिए आप अपने सुझाव देते हुए अखबार के संपादक को पत्र लिखिए।
  • फसलों के उत्पादन में महिलाओं के योगदान को हमारी अर्थव्यवस्था में महत्व क्यों नहीं दिया जाता है? इस बारे में कक्षा में चर्चा कीजिए।

शब्द-संपदा

  • दंतुरित — बच्चों के नए-नए दाँत
  • धूलि-धूसर गात — धूल मिट्टी से सने अंग-प्रत्यंग
  • जलजात — कमल का फूल
  • अनिमेष — बिना पलक झपकाए लगातार देखना
  • इतर — दूसरा
  • मधुपर्क — दही, घी, शहद, जल और दूध का योग जो देवता और अतिथि के सामने रखा जाता है। आम लोग इसे पंचामृत कहते हैं। कविता में इसका प्रयोग बच्चे को जीवन देने वाला आतिथ्य को निःस्वार्थ से युक्त माँ के प्यार के रूप में हुआ है
  • कनखी — तिरछी निगाह से देखना
  • छविमान — सुंदर
यह दंतुरहित मुस्कान/फसल (नागार्जुन) - CBSE Class 10 Hindi Notes