स्वयं प्रकाश का जन्म सन् 1947 में इंदौर (मध्यप्रदेश) में हुआ। मैकेनिकल इंजीनियरिंग की पढ़ाई करके एक
औद्योगिक प्रतिष्ठान में नौकरी करने वाले स्वयं प्रकाश का
बचपन और नौकरी का बड़ा हिस्सा राजस्थान में बीता।
ये वसुधा पत्रिका के संपादन से जुड़े रहे। आठवें दशक में उभरे स्वयं प्रकाश आज समकालीन कहानी के महत्वपूर्ण हस्तक्षर हैं। उनके तेरह कहानी संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं जिनमें सूरज कब निकलेगा, आएँगे अच्छे दिन भी, आदमी जात का आदमी और संधान उल्लेखनीय हैं। उनके बीच में विनय और ईंधन उपन्यास चर्ित रहे हैं। उन्हें पहल सम्मान, बनमाली पुरस्कार, राजस्थान साहित्य अकादेमी पुरस्कार आदि पुरस्कारों से पुरस्कृत किया
जा चुका है। इनका निधन 2019 में हुआ।
मध्यवर्गीय जीवन के कुशल चितेरे स्वयं प्रकाश की कहानियों में वर्ग-शोषण के विरुद्द चेतना है तो हमारे सामाजिक जीवन में जाति, संप्रदाय और लिंग के आधार पर हो रहे भेदभाव के खिलाफ़ प्रतिकार का स्वर भी है। रोचक किस्सागोई शैली में लिखी गई उनकी कहानियाँ हिंदी की वाचिक परंपरा को समृद्ध करती हैं।

चारों ओर सीमाओं से घिरे भूभाग का नाम ही देश नहीं होता। देश बनता है उसमें रहने वाले सभी नागरिकों, नदियों, पहाड़ों, पेड़-पौधों, वनस्पतियों, पशु-पक्षयों से और इन सबसे प्रेम करने तथा इनकी समृद्ध के लिए प्रयास करने का नाम देशभक्ति है। नेताजी का चश्मा कहानी कैप्टन चश्मे वाले के माध्यम से देश के करोड़ों नागरिकों के योगदान को रेखाकित करती है जो इस देश के नि्मण में अपने-अपने तरीके से सहयोग करते हैं कहानी यह कहती है कि बड़ ही नहीं बच्चे भी इसमें शामिल हैं|
नेताजी का चश्मा
हालदार साहब को हर पॅद्रहवें दिन कंपनी के काम के सिलसिले में उस कस्बे से गुजरना पड़ता था। कस्बा बहुत बड़ा नहीं था। जिसे पक्का मकान कहा जा सके वैसे कुछ ही मकान और जिसे बाजार कहा जा सके वैसा एक ही बाजार था। कस्े में एक लड़कों का स्कूल, एक लड़कियों का स्कूल, एक सीमेंट का छोटा-सा कारखाना, दो ओपन एयर सिनेमाघर और एक ठो नगरपालिका भी थी। नगरपालिका थी तो कुछ-न-कुछ करती भी रहती थी। कभी कोई सड़क पक्की करवा दी, कभी कुछ पेशाबघर बनवा दिए, कभी कबूतरों की छतरी बनवा दी तो कभी कवि सम्मेलन करवा दिया। इसी नगरपालिका के किसी उत्साही बोर्ड या प्रशासनिक अधिकारी ने एक बार 'शहर' के मुख्य बाज़ार के मुख्य चौराहे पर नेताजी सुभाषचंद्र बोस की एक संगमरमर की प्रतिमा लगवा दी। यह कहानी उसी प्रतिमा के बारे में है, बल्क उसके भी एक छोटे-से हिस्से के बारे में।
पूरी बात तो अब पता नहीं, लेकिन लगता है कि देश के अच्छे मूर्तिकारों की जानकारी नहीं होने और अच्छी मूति की लागत अनुमान और उपलब्ध बजट से कहीं बहुत ज्यादा होने के कारण काफ़ी समय ऊहापोह और चि्टी-पत्ी में बरबाद हुआ होगा और बोर्ड की शासनावधि समाप्त होने की घड़ियों में किसी स्थानीय कलाकार को ही अवसर देने का निर्णय किया गया होगा, और अंत में कस्बे के इकलौते हाई स्कूल के इकलौते डाइंग मास्टर-मान लीजिए मोतीलाल जी-को ही यह काम सौंप दिया गया होगा, जो महीने-भर में मूर्ति बनाकर ि
जैसा कि कहा जा चुका है, मू्ति संगमरमर की थी। टोपी की नोक से कोट के दूसरे बटन तक कोई दो फुट ऊँची। जिसे कहते हैं बस्ट। और सुंदर थी। नेताजी सुदर लग रहे थे। कुछ-कुछ मासूम और कमसिन। फ़ौजी वर्दी में। मूर्ति को देखते ही 'दिल्ली चलो' और 'तुम मुझे खून दो..'वगैरह याद आने लगते थे। इस दृष्ट से यह सफल और सराहनीय प्रयास था। केवल एक चीज की कसर थी जो देखते ही खटकती थी। नेताजी की आँखों पर चश्मा नहीं था। यानी चश्मा तो था, लेकिन संगमरमर का नहीं था। एक सामान्य और सचमुच के
चश्मे का चौड़ा काला फ्रम मूति को पहना दिया गया था। हालदार साहब जब पहली बार इस कस्बे से गुजरे और चौराहे पर पान खाने रुके तभी उन्होंने इसे लक्षत किया और उनके चेहरे पर एक कौतुकभरी मुसकान फैल गई। वाह भई! यह आइडिया भी ठीक है। मूर्तं पत्थर की, लेकिन चश्मा रियल!
जीप कस्बा छोड़कर आगे बढ़ गई तब भी हालदार साहब इस मूति के बारे में ही सोचते रहे, और अंत में इस निष्कर्ष पर पहुचे कि कुल मिलाकर कस्बे के नागरिकों का यह प्रयास सराहनीय ही कहा जाना चाहिए। महत्व मूति के रंग-रूप या कद का नहीं, उस भावना का है वरना तो देश-भक्त भी आजकल मजञाक की चीज होती जा रही है।
दूसरी बार जब हालदार साहब उधर से गुजरे तो उन्हें मूति में कुछ अंतर दिखाई दिया। ध्यान से देखा तो पाया कि चश्मा दूसर है। पहले मोटे फ्ेमवाला चौकोर चश्मा था, अब तार के फ्रेमवाला गोल चश्मा है। हालदार साहब का कौतुक और बढ़ा। वाह भई! क्या आइडिया है। मू्ति कपड़े नहीं बदल सकती लेकिन चश्मा तो बदल ही सकती है।
तीसरी बार फिर नया चश्मा था।
हालदार साहब की आदत पड़ गई, हर बार कस्बे से गुजरते समय चौरहे पर रुकना, पान खाना और मूर्ति को ध्यान से देखना। एक बार जब कौतूहल दुर्दमनीय हो उठा तो पानवाले से ही पूछ लिया, क्यों भई! क्या बात है? यह तुम्हारे नेताजी का चश्मा हर बार बदल कैसे जाता है?
पानवाले के खुद के मुँह में पान टुसा हुआ था। वह एक काला मोटा और खुशमिजाज आदमी था। हालदार साहब का प्रशन सुनकर वह आँखों-ही-आँखों में हूँसा। उसकी तोंद थिरकी। पीछे घूमकर उसने दुकान के नीचे पान थूका और अपनी लाल-काली बत्तीसी दिखाकर बोला, कैप्टन च्मेवाला करता है।
क्या करता है? हालदार साहब कुछ समझ नहीं पाए। चश्मा चेंज कर देता है। पानवाले ने समझाया।
क्या मतलब? क्यों चेंज कर देता है? हालदार साहब अब भी नहीं समझ पाए। कोई गिराक आ गया समझो। उसको चौड़े चौखट चाहिए। तो कैप्टन किदर से लाएगा?
ता उसका मूतवाला ५ ।दया। उदर दूसरा ।बठा ।५या। अब हालदार साहब को बात कुछ-कुछ समझ में आई। एक चश्मेवाला है जिसका नाम कैप्टन है। उसे नेताजी की बगैर चश्मेवाली मूत्ति बुरी लगती है। बल्क आहत करती है, मानो चशमे के बगैर नेताजी को असुविधा हो रही हो। इसलिए वह अपनी छोटी-सी दुकान में उपलब्ध गिने-चुने फ्रेमों में से एक नेताजी की मूर्ति पर फिट कर देता है। लेकिन जब कोई ग्राहक आता है और उसे वैसे ही फ्रेम की दरकार होती है जैसा मूति पर लगा है तो कैप्टन
चश्मेवाला मूर्ति पर लगा फ्रेम-संभवत: नेताजी से क्षमा माँगते हुए-लाकर ग्राहक को दे देता है और बाद में नेताजी को दूसरा फ्रेम लौटा देता है। वाह! भई खूब! क्या आइडिया है। लेकिन भाई! एक बात अभी भी समझ में नहीं आई। हालदार साहब ने पानवाले से फिर पूछा, नेताजी का ओरिजिनल चश्मा कहाँ गया?
पानवाला दूसरा पान मुँह में ूस चुका था। दोपहर का समय था, 'दुकान' पर भीड़-भाड़ अधिक नहीं थी। वह फिर आँखों-ही-आँखों में हँसा। उसकी तोंद थिरकी। कत्थे की डंड़ी फेंक, पीछे मुड़कर उसने नीचे पीक थूकी और मुसकराता हुआ बोला, मास्टर बनाना भूल गया।
पानवाले के लिए यह एक मजेदार बात थी लेकिन हालदार साहब के लिए चकित और द्रवित करने वाली। यानी वह ठीक ही सोच रहे थे। मूर्ति के नीचे लिखा 'मूर्तिकार मास्टर मोतीलाल' वाकई कस्बे का अध्यापक था। बेचारे ने महीने-भर में मूर्ति बनाकर पटक देने का वादा कर दिया होगा। बना भी ली होगी लेकिन पत्थर में पारदशी चश्मा कैसे बनाया जाए-कॉँचवाला-यह तय नहीं कर पाया होगा। या कोशिश की होगी और असफल रहा होगा। या बनाते-बनाते 'कुछ और बारीकी' के चक्कर में चश्मा टूट गया होगा। या पत्थर का चश्मा अलग से बनाकर फिट किया होगा और वह निकल गया होगा। उफ़..!
हालदार साहब को यह सब कुछ बड़ा विचित्र और कौतुकभरा लग रहा था। इन्हीं खयालों में खोए-खोए पान के पैसे चुकाकर, चश्मेवाले की देश-भक्त के समक्ष नतमस्तक होते हुए वह जीप की तऱफ़ चले, फिर रुके, पीछे मुड़े और पानवाले के पास जाकर पूछा, क्या कैप्टन चश्मेवाला नेताजी का साथी है? या आज़ाद हिंद फ़ौज का भूतपूर्व सिपाही?
पानवाला नया पान खा रहा था। पान पकड़े अपने हाथ को मुह से डेढ़ इंच दूर रोककर उसने हालदार साहब को ध्यान से देखा, फिर अपनी लाल-काली बत्तीसी दिखाई और मुसकराकर बोला-नहीं साब! वो लॉँगड़ा क्या जाएगा फ़ौज में पागल है पागल! वो देखो, वो आ रहा है। आप उसी से बात कर लो। फ़ोटो-वोटो छपवा दो उसका कहीं।
हालदार साहब को पानवाले द्ारा एक देशभक्त का इस तरह मजाक उड़ाया जाना अच्छा नहीं लगा। मुड़कर देखा तो अवाक रह गए। एक बेहद बूढ़ा मरियल-सा लँगड़ा आदमी सिर पर गांधी टोपी और आँखों पर काला चश्मा लगाए एक हाथ में एक छोटी-सी संदूकची और दूसरे हाथ में एक बाँस पर टैंगे बहुत-से चश्मे लिए अभी-अभी एक गली से निकला था और अब एक बंद दुकान के सहारे अपना बाँस टिका रहा था। तो इस बेचारे की दुकान भी नहीं! फेरी लगाता है! हालदार साहब चक्कर में पड़ गए। पूछना चाहते थे, इसे कैप्टन क्यों कहते हैं? क्या यही इसका वास्तविक नाम है? लेकिन पानवाले ने साफ़ बता दिया था कि अब वह इस बारे में और बात करने को तैयार नहीं। ड़ाइवर भी बेचैन हो रहा था। काम भी
था। हालदार साहब जीप में बैठकर चले गए। दो साल तक हालदार साहब अपने काम के सिलसिले में उस कस्बे से गुजरते रहे और नेताजी की मूर्ति में बदलते हुए चश्मों को देखते रहे। कभी गोल चश्मा होता, तो कभी चौकोर, कभी लाल, कभी काला, कभी धूप का चश्मा, कभी बड़ काँचों वाला गोगो चश्मा. ..पर कोई-न-कोई चश्मा होता जरू..उस धूलभरी यात्रा में हालदार साहब को कौतुक और प्रफुल्लता के कुछ क्षण देने के लिए।

फिर एक बार ऐसा हुआ कि मूति के चेहरे पर कोई भी, कैसा भी चश्मा नहीं था। उस दिन पान की दुकान भी बंद थी। चौराहे की अधिकांश दुकानें बंद थीं। अगली बार भी मूर्ति की आँखों पर चश्मा नहीं था। हालदार साहब ने पान खाया और धीरे से पानवाले से पूछा-क्यों भई, क्या बात है? आज तुम्हारे नेताजी की आँखों पर चश्मा नहीं है? पानवाला उदास हो गया। उसने पीछे मुड़कर मुह का पान नीचे थूका और सिर झुकाकर अपनी धोती के सिरे से आँखें पोंछता हुआ बोला - साहब! कैप्टन मर गया। और कुछ नहीं पूछ पाए हालदार साहब। कुछ पल चुपचाप ख़ रहे, फिर पान के पैसे चुकाकर जीप में आ बैठे और रवाना हो गए।
बार-बार सोचते, क्या होगा उस कौम का जो अपने देश की खातिर घर-गृहस्थी-जवानी-जिदगी सब कुछ होम देनेवालों पर भी हँसती है और अपने लिए बिकने के मौके ढूँढ़ती है। दुखी हो गए। पंदरह दिन बाद फिर उसी कस्बे से गुजरे। कस्बे में घुसने से पहले ही खयाल आया कि
कस्बे की हृदयस्थली में सुभाष की प्रतिमा अवश्य ही प्रतिष्ठापित होगी, लेकिन सुभाष की ऑँखों पर चश्मा नहीं होगा..क्योंकि मास्टर बनाना भूल गया..और कैप्टन मर गया। सोचा, आज वहाँ रुूकेंगे नहीं, पान भी नहीं खाएँे, मू्ति की तरफ़ देखेंे भी नहीं, सीधे निकल जाएँगे। ड़ाइवर से कह दिया, चौराहे पर रुकना नहीं, आज बहुत काम है, पान आगे कहीं खा लेंगे।
लेकिन आदत से मजबूर आँखें चौराहा आते ही मूति की तरफ़ उठ गई। कुछ ऐसा देखा कि चीखे, रोको! जीप स्पीड में थी, ड्राइवर ने जोर से ब्ेक मारे। रास्ता चलते लोग देखने लगे। जीप रुकते-न-रुूकते हालदार साहब जीप से कूदकर तेज-तेज कदमों से मूर्ति की तरफ़ लपके और उसके ठीक सामने जाकर अटेंशन में खड़ हो गए
मूर्ति की आँखों पर सरकंडे से बना छोटा-सा चश्मा रखा हुआ था, जैसा बच्चे बना लेते हैं हालदार साहब भावुक हैं। इतनी-सी बात पर उनकी आँखें भर आई।
प्रश्न-अभ्यास
सेनानी न होते हुए भी चश्मेवाले को लोग कैप्टन क्यों कहते थे?
हालदार साहब ने डाइवर को पहले चौराहे पर गा़ी रोकने के लिए मना किया था लेकिन बाद में तुरंत रोकने को कहा-
(क) हालदार साहब पहले मायूस क्यों हो गए थे? (ख) मूर्ति पर सरकंडे का चश्मा क्या उम्मीद जगाता है? (ग) हालदार साहब इतनी-सी बात पर भावुक क्यों हो उठे?
- आशय स्पष्ट कीजिए-
"बार-बार सोचते, क्या होगा उस कौम का जो अपने देश की खातिर घर-गृहस्थी-जवानी-जिंदगी सब कुछ होम देनेवालों पर भी हँसती है और अपने लिए बिकने के मौके ढूँढ़ती है।"
- पानवाले का एक रेखाचित्रप्र्तुत कीजिए।
- "वो लॉँगड़ा क्या जाएगा फ़ौज में। पागल है पागल!" कैप्टन के प्रति पानवाले की इस टिप्पणी पर अपनी प्रतिक्रिया लिखिए।
रचना और अभिव्यक्ति
- निम्नलिखित वाक्य पात्रो की कौन-सी विशेषता की ओर संकेत करते हैं-
(क) हालदार साहब हमेशा चौराहे पर रुकते और नेताजी को निहारते।
(ख) पानवाला उदास हो गया। उसने पीछे मुड़कर मुह का पान नीचे थूका और सिर झुकाकर अपनी धोती के सिरे से आँखें पोंछता हुआ बोला-साहब! कैप्टन मर गया।
(ग) कैप्टन बार-बार मूर्ति पर चश्मा लगा देता था।
जब तक हालदार साहब ने कैप्टन को साक्षात् देखा नहीं था तब तक उनके मानस पटल पर उसका कौन-सा चित्र रहा होगा, अपनी कल्पना से लिखिए।
कस्बों, शहरों, महानगरों के चौराहों पर किसी न किसी ्षेत्र के प्रसिद्र व्यक्त की मू्ति लगाने का प्रचलन-सा हो गया है-
(क) इस तरह की मूर्ति लगाने के क्या उदेश्य हो सकते हैं? (ख) आप अपने इलाके के चौराहे पर किस व्यक्त की मूर्ति स्थापित करवाना चाहेंगे और क्यों? (ग) उस मूति के प्रति आपके एवं दूसरे लोगों के क्या उत्तरदायित्व होने चाहिए?
सीमा पर तैनात फ़ौजी ही देश-प्रेम का परिचय नहीं दे। हम सभी अपने दैनिक कायों में किसी न किसी रूप में देश-प्रे प्रकट करते हैं; जैसे-सार्वजनिक संपत्त को नुकसान न पहुँचा, प्यावरण संक्षण आदि। अपने जीवन-जगत से जुड़े ऐसे और कारयं का उल्लेख कीजिए और उन पर अमल भी कीजिए।
निम्नलिखित पंक्तयों मे स्थानीय बोली का प्रभाव स्पष्ट दिखाई देता है, आप इन पक्तयों को मानक हिंदी में लिखिए- कोई गिराक आ गया समझो। उसको चौड़े चौखट चाहिए। तो कैप्टन किदर से लाएगा? तो उसको मूर्तिवाला दे दिया। उदर दूसरा बिठा दिया।
'भई खूब! क्या आइडिया है।' इस वाक्य को ध्यान में रखते हुए बताइए क एक भाषा में दूसरी भाषा के शब्दों के आने से क्या लाभ होते हैं?
भाषा-अध्ययन
- निम्नलिखित वाक्यों े निपात छॉटिए और उनसे नए वाक्य बनाइए
(क) नगरपालिका थी तो कुछ न कुछ करती भी रहती थी।
(ख) किसी स्थानीय कलाकार को ही अवसर देने का निर्णय किया गया होगा।
(ग) यानी चश्मा तो था लेकिन संगमरमर का नहीं था
(घ) हालदार साहब अब भी नहीं समझ पाए।
(ड) दो साल तक हालदार साहब अपने काम के सिलसिले में उस कस्बे से गुजरते रहे।
- निम्नलिखित वाक्यों को कर्मवाच्य में बदलिए-
(क) वह अपनी छोटी-सी दुकान में उपलब्ध गिने-चुने फ्रेमों में से नेताजी की मू्ति पर फिट कर देता है।
(ख) पानवाला नया पान खा रहा था।
(ग) पानवाले ने साफ़ बता दिया था।
(घ) डाइवर ने जोर से ब्रेक मारे।
(ड) नेताजी ने देश के लिए अपना सब कुछ त्याग दिया।
(च) हालदार साहब ने चश्मेवाले की देशभक्त का सम्मान किया।
- नीचे लिखे वाक्यों को भाववाच्य में बदलिए- जैसे-अब चलते हैं। -अब चला जाए।
(क) माँ बैठ नहीं सकती। (ख) मैं देख नहीं सकती। (ग) चलो, अब सोते हैं। (घ) माँ रो भी नहीं सकती।
पाठेतर सक्रियता
- लेखक का अनुमान है कि नेताजी की मूर्ि बनाने का काम मजबूरी में ही स्थानीय कलाकार को दिया गया-
(क) मूर्ति बनाने का काम मिलने पर कलाकार के क्या भाव रहे होंगे? (ख) हम अपने इलाके के शिल्पकार, संगीतकार, चित्रकार एवं दूसरे कलाकारों के काम को कैसे महत्व और प्ोत्साहन दे सकते है, लिखिए।
- आपके विद्ालय में शारीरिक रूप से चुनौतीपूर्ण विद्यार्ी हैं। उनके लिए विद्यालय परिसर और कक्षा-कक् मे किस तरह के प्ावधान कए जाएँ ्रशासन को इस संदरभ में पत्रद्वा सुझा दीजिए।
- कैप्टन फेरी लगाता था।
फेरीवाले हमारे दिन-प्रतिदिन की बहुत-सी ज़रूरतों को आसान बना देते है। फेरीवालों के योगदान व समस्याओं पर एक संपादकीय लेख तैयार कीजिए। - नेताजी सुभाषचं्र बोस के व्यक्त्व और कृतित्व पर एक प्रोजेक्ट बनाइए।
- अपने घर के आस-पास देखिए और पता लगाइए कि नगरपालिका ने क्या-क्या काम करवाए हैं? हमारी भूमिका उसमें क्या हो सकती है?
नीचे दिए गए निबंध का अंश पदढिए और समझिए कि गछ की विविध विधाओं में एक ही भाव को अलग-अलग प्रकार से कैसे व्यक्त किया जा सकता है- 1.
देश-प्रेम
देश-प्रे है क्या परेम ही तो है इस प्रेम का आलंबन क्या है? सारा देश अर्थात मनुषय पशु, पक्षी, नदी, नाले, वन पर्वत सहित सारी भूमि। यह प्रम किस प्रकार का है? यह साहचर्यगत प्रेम है। जिनके बीच हम रहते हैं, जिन्हें बराबर आँखों से देखते हैं, जिनकी बाते बराबर सुनते रहते है, जिनका हमारा हर घड़ी का साथ रहता है, सारांश यह है कि जिनके सान्निध्य का हमें अभ्यास पड़ जाता है, उनके प्रति लोभ या राग हो सकता है। देश-प्रेम यदि वास्तव में अंतः:करण का कोई भाव है तो यही हो सकता है। यदि यह नहीं है तो वह कोरी बकवास या किसी और भाव के संकेत के लिए गढ़ा हुआ शब्द है। यदि किसी को अपने देश से सचमुच पे है तो उसे अपने देश के मनुष्य, पशु, पक्षी,लता गुल्म, पेड़, वन, पर्वत, नदी, निझर आदि सबसे प्रेम होगा, वह सबको चाहभरी दृष्ट से देखेगा; वह सबकी सुध करके विदेश में आँसू बहाएगा। जो यह भी नहीं जानते क कोयल किस चिड़या का नाम है, जो यह भी नहीं सुनते कि चातक कहाँ चिल्लाता है, जो यह भी आँख भर नहीं देखते कि आम प्रणय-सौरभपर्ण मंजरियों से कैसे लदे हुए हैं, जो यह भी नहीं झकते कि किसानों के झोंपड़ों के भीतर क्या हो रहा है, वे यदि बस बने-उने मित्रों के बीच प्त्येक भारतवासी की औसत आमदनी का परता बताकर देश-प्रेम का दावा करें तो उनसे पूछना चाहिए कि भाइयो! बिना रूप परिचय का यह प्रे कैसा? जिनके दुख-सुख के तुम कभी साथी नहीं हुए उन्हें तुम सुखी देखना चाहते हो, यह कैसे समझे? उनसे कोसों दूर बैठे-बैठे, पड़े-पड़ या खड़े-ख़े तुम विलायती बोली में'अर्शास्त्' की दुहाई दिया करो, पर प्रेम का नाम उसके साथ न घसीटो। प्रम हिसाब-किताब नहीं है। हिसाब-किताब करने वाले भाड़़े पर भी मिल सकते हैं, पर प्रेम करने वाले नहीं।
हिसाब-किताब से देश की दशा का ज़ान-मात्रहो सकता है। हित-चितन और हित-साधन की प्रवृत्ति कोरे जञान से भिन्न है। वह मन के वेग या भाव पर अवलंबित है, उसका संबंध लोभ या प्रेम से है, जिसके बिना अन्य पक् में आवश्यक त्याग का उत्साह हो नहीं सकता।
—आचार्य रामचंद्र शुक्ल