गद्य-खंड
प्रेमचंद का जन्म वाराणसी जिले के लमही ग्राम में हुआ था। उनका मूल नाम धनपतराय था। प्रेमचंद की प्रारभिक शिक्षा वाराणसी में हुई। मैट्टिक के बाद वे अध्यापन करने लगे। स्वाध्याय के रूप में ही उन्होंने बी.ए. तक शिक्षा ग्रहण की। असहयोग आंदोलन के दौरान उन्होंने सरकारी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और पूरी तरह लेखन-कार्य के प्रति समर्ित हो गए।
प्रमचंद ने अपने लेखन की शुरुआत पहले उद्ू में नवाबराय के नाम से की, बाद में हिंदी में लिखने लगे उन्होंने अपने साहित्य में किसानों, दलितों, नारियों की वेदना और वर्ण-व्यवस्था की कुरीतियों का मार्मिक चित्रण किया है। वे साहित्य को स्वांत: सुखाय न मानकर सामाजिक परिवर्तन का एक सशक्त माध्यम मानते थे। वे एक ऐसे साहित्यकार थे, जो समाज की वास्तविक स्थिति को पैनी दृष्टि से देखने की शक्ति रखते थे उन्होंने समाज-सुधार और राष्रीय-भावना से ओतप्रोत अनेक उपन्यासों एवं कहानियों की रचना की। कथा-संगठन, चरित्र-चित्रण, कथोपकथन आदि की दृष्ट से उनकी रचनाएँ बेजोड़ हैं। उनकी भाषा बहुत सज़ीव, मुहावरेदार और बोलचाल के निकट है। हिंदी भाषा को लोकप्िय बनाने में उनका विशेष योगदान है। संस्कृत के प्रचलित शब्दों के साथ-साथ उद्द की रवानी इसकी विशेषता है, जिसने हिंदी कथा भाषा को नया आयाम दिया।
उनकी प्रमुख कृतियँ हैं - मानसरोवर (आठ भाग), गुपतधन (दो भाग) (कहानी संग्रह); निर्मला, सेवासदन, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, कर्मभूमि, गबन, गोदान (उपन्यास); कर्बला, संग्राम, प्रेम की वेदी (नाटक); विविध प्रसंग (तीन खंडों में साहित्यिक और राजनीतिक निबंधों का संग्रह); कुछ विचार
प्रेमचंद

(सन् 1880-1936)
(साहित्यिक निबंध)। उन्होने माधुरी, हंस, मर्यादा, जागरण आदि पत्रिकाओं का संपादन भी किया। इस पाठ्यपुस्तक में उनकी ईदगाह कहानी दी गई है।
हिंदी में बाल-मनोविज्ञान से संबधित कहानियाँ बहुत कम लिखी गई हैं प्रेमचंद उन दुल्लभ कथाकारों में से है जिन्होंने पूरी प्रामाणिकता एवं त्मयता के साथ बाल-जीवन को अपनी कहानियों में जगह दी है। उनकी कहानियाँ भारत की साझी संस्कृति एवं ग्रामीण जीवन के विविध रंगों से सराबोर है।
ईदगाह प्रेमचंद की इन्हीं विशेषताओं को अभिव्यक्त करने वाली प्रतिनिधि कहानी है। इस कहानी में ईंद जैसे महत्वपूर्ण त्योहार को आधार बनाकर ग्रामीण मुस्लिम जीवन का सुंदर चित्र प्र्तुत किया गया है। हामिद का चरित्र हमें बताता है कि अभाव उम्र से पहले बच्चों में कैसे बड़ों जैसी समझदारी पैदा कर देता है। मेले में हामिद अपनी हर चाह पर संयम रखने में विजयी होता है। साथ ही रुस्तमे हिंद चिमटे के माध्यम से प्रेमचंद ने श्रम के सौदर्य एवं महत्व को भी उद्घाटित किया है। चित्ात्मक भाषा की दृष्ट से भी यह कहानी अनूठी है।
Chapter 1
ईदगाह
रमजान के परे तीस रोजों के बाद ईंद आई है। कितना मनोहर, कितना सुहावना प्रभात है। वृकषों पर कुछ अजीब हरियाली है, खेतों में कुछ अजीब रौनक है, आसमान पर कुछ अजीब लालिमा है। आज का सू्य देखो, कितना प्यारा, कितना शीतल है मानो संसार को ईंद की बधाई दे रहा है। गाँव में कितनी हलचल है। ईदगाह जाने की तैयारियाँ हो रही हैं किसी के कुरते में बटन नहीं है, पड़ोस के घर से सुई-तागा लेने दौड़ा जा रहा है। किसी के जूते कड़े हो गए हैं, उनमें तेल डालने के लिए तेली के घर भागा जाता है। जल्दी-जल्दी बैलों को सानी-पानी दे दें। ईदगाह से लौटते-लौटते दोपहर हो जाएगा। तीन कोस का पैदल रास्ता, फिर सैकड़ों आदमियों से मिलना-भेंटना, दोपहर के पहले लौटना असंभव है।लड़के सबसे ज्यादा प्रन्न हैं। किसी ने एक रोजा रखा है, वह भी दोपहर तक, किसी ने वह भी नहीं; लेकिन ईदगाह जाने की खुशी उनके हिस्से की चीज है। रोजे बड़े-बूढ़ों के लिए होंगे। इनके लिए तो ईद है। रोज ईद का नाम रटते थे आज वह आ गई। अब जल्दी पड़ी है कि लोग ईदगाह क्यो नहीं चलते। इन्हें गृहस्थी की चिताओं से क्या प्रयोजन! सेवैयों के लिए दूध और शक्कर घर में है या नहीं, इनकी बला से, ये तो सेवैयाँ खाएँगे। वह क्या जानें कि अब्बाजान क्यों बदहवास चौधरी कायमअली के घर दौड़े जा रहे हैं। उन्हें क्या खबर कि चौधरी आज आँखें बदल लें, तो यह सारी ईंद मुहर्रम हो जाए। उनकी अपनी जेबों में तो कुबेर का धन भरा हुआ है। बार-बार जेब से अपना खज़ाना निकालकर गिनते हैं और खुश
होकर फिर रख लेते हैं महमूद गिनता है, एक-दो, दस-बारह! उसके पास बारह पैसे हैं। मोहसिन के पास एक, दो, तीन, आठ, नौ, पंद्रह पैसे हैं। इन्हीं अनगिनती पैसों मे अनगिनती चीज़े लाएँगे - खिलौने, मिठाइयाँ, बिगुल, गेंद और जाने क्या-क्या! और सबसे ज्यादा प्रसन्न है हामिद। वह चार-पाँच साल का गरीब-सूरत, दुबला-पतला लड़का, जिसका बाप गत वर्ष हैजे की भेंट हो गया और माँ न जाने क्यों पीली होती-होती एक दिन मर गई। किसी को पता न चला, क्या बीमारी है। कहती तो कौन सुनने वाला था। दिल पर जो कुछ बीतती थी, वह दिल में ही सहती थी और जब न सहा गया तो संसार से बिदा हो गई। अब हामिद अपनी बूढ़ी दादी अमीना की गोद में सोता है और उतना ही प्रसन् है। उसके अब्बाजान रुूपये कमाने गए हैं बहुत-सी थैलियाँ लेकर आएँे। अम्मीजान अल्लाह मियाँ के घर से उसके लिए बड़ी अच्छी-अच्छी चीजें लाने गई हैं; इसलिए हामिद प्रसन् है। आशा तो बड़ी चीज है, और फिर बच्चों की आशा! उनकी कल्पना तो राई का पर्वंत बना लेती है। हामिद के पाँव में जूते नहीं हैं, सिर पर एक पुरानी-धुरानी टोपी है, जिसका गोटा काला पड़ गया है, फिर भी वह प्रसन्न है। जब उसके अब्बाजान थैलियाँ और अम्मीजान नियामतें लेकर आएँगी, तो वह दिल के अरमान निकाल लेगा। तब देखेगा महमूद, मोहसिन, नरे और सम्मी कहाँ से उतने पैसे निकालेंगे। अभागिन अमीना अपनी कोठरी में बैठी रो रही है। आज ईद का दिन और उसके घर में दाना नहीं! आज आबिद होता तो क्या इसी तरह ईद आती और चली जाती! इस अंधकार और निराशा में वह डूबी जा रही है। किसने बुलाया था इस निगोड़ी ईंद को? इस घर में उसका काम नहीं; लेकिन हामिद! उसे किसी के मरने-जीने से क्या मतलब? उसके अंदर प्रकाश है, बाहर आशा। विपति अपना सारा दलबल लेकर आए, हामिद की आनंद भरी चितवन उसका विध्वंस कर देगी।
हामिद भीतर जाकर दादी से कहता है - तुम डरना नहीं अम्माँ, मैं सबसे पहले आऊँगा। बिलकुल न डरना।
अमीना का दिल कचोट रहा है। गाँव के बच्चे अपने-अपने बाप के साथ जा रहे हैं। हामिद का बाप अमीना के सिवा और कौन है! उसे कैसे अकेले मेले जाने
दे? उस भीड-भाड़ में बच्चा कहीं खो जाए तो क्या हो? नहीं, अमीना उसे यों न जाने देगी। न्हीं-सी जान! तीन कोस चलेगा कैसे! पैर में छाले पड़ जाएँगे। जूते भी तो नहीं हैं। वह थोड़ी-थोड़ी दूर पर उसे गोद ले लेगी; लेकिन यहाँ सेवैयाँ कौन पकाएगा? पैसे होते तो लौटते-लौटते सब सामग्री जमा करके चटपट बना लेती। यहाँ तो घंटों चीजे जमा करते लगेंगे। माँगे ही का तो भरोसा ठहरा। उस दिन फ़हीमन के कपड़ सिले थे। आठ आने पैसे मिले थे। उस अठन्नी को ईमान की तरह बचाती चली आती थी इसी ईद के लिए, लेकिन कल ग्वालन सिर पर सवार हो गई तो क्या करती! हामिद के लिए कुछ नहीं है, तो दो पैसे का दूध तो चाहिए ही। अब तो कुल दो आने पैसे बच रहे हैं। तीन पैसे हामिद की जेब में, पाँच अमीना के बटुवे में। यही तो बिसात है और ईद का त्योहार, अल्लाह ही बेड़ा पार लगाए। धोबन और नाइन और मेहतरानी और चूड़िहारिन सभी तो आएँगी। सभी को सेवैयाँ चाहिए और थो़ा किसी की आँखों नहीं लगता। किस-किस से मुंह चुराएगी। और मुह क्यो चुराए? साल-भर का त्योहार है। जिंदगी खैरियत से रहे, उनकी तकदीर भी तो उसी के साथ है। बच्चे को खुदा सलामत रखे, दिन भी कट जाएँगे।
गाँव से मेला चला। और बच्चों के साथ हामिद भी जा रहा था। कभी सब-के-सब दौड़कर आगे निकल जाते। फिर किसी पेड़ के नीचे खड़े होकर साथवालों का इंतज़्ार करते। यह लोग क्यों इतना धीरे-धीरे चल रहे हैं! हामिद के पैरों में तो जैसे पर लग गए हैं। वह कभी थक सकता है! शहर का दामन आ गया। सड़क के दोनों ओर अमीरों के बगीचे हैं। पक्की चारदीवारी बनी हुई है। पेड़ो में आम और लीचियाँ लगी हुई हैं। कभी-कभी कोई लड़का कंकड़ी उठाकर आम पर निशाना लगाता है। माली अंदर से गाली देता हुआ निकलता है। लड़के वहाँ से एक फलाग पर हैं खूब हँंस रहे हैं। माली को कैसा उल्लू बनाया है।
बड़ी-बड़ी इमारतें आने लगीं। यह अदालत है, यह कालेज है, यह क्लब-घर
है! इतने बड़ कालेज में कितने लड़के पढ़ते होंगे? सब लड़के नहीं है जी! बड़े-बड़ आदमी हैं, सच! उनकी बड़ी-बड़ी मूछे हैं। इतने बड़ हो गए, अभी तक
पढ़ने जाते हैं। न जाने कब तक पढ़ंगे और क्या करेंगे इतना पढ़कर, हामिद के मदरसे में दो-तीन बड़ेबड़े लड़के हैं, बिलकुल तीन कौड़ी के। रोज मार खाते है, काम से जी चुराने वाले। इस जगह भी उसी तरह के लोग होंगे और क्या। क्लब-घर में जादू होता है। सुना है, यहाँ मु्द की खोपड़ियाँ दौड़ती हैं। और बड़े-बड़ तमाशे होते हैं, पर किसी को अंदर नहीं जाने देते। और यहाँ शाम को साहब लोग खेलते हैं। बड़ेबड़ आदमी खेलते हैं, मूँछोें-दाढ़ीवाले। और मेमें भी खेलती हैं, सच! हमारी अम्माँ को वह दे दो, क्या नाम है, बैट, तो उसे पकड़ ही न सकें। घुमाते ही लुढ़क जाएँ।
महमूद ने कहा - हमारी अम्मीजान का तो हाथ काँपने लगे, अल्ला कसम। मोहसिन बोला — चलो, मनों आटा पीस डालती हैं। ज़रा-सा बैट पकड़ लेंगी, तो हाथ कॉपने लगेंगे? सैकड़ों घड़ पानी रोज निकालती हैं। पाँच घड़े तो तेरी भैंस पी जाती है। किसी मेम को एक घड़ा पानी भरना पड़े तो आँखों तले अँधेरा आ जाए। महमूद - लेकिन दौड़तीं तो नहीं, उछल-कूद तो नहीं सकतीं। मोहसिन - हाँ, उछल-कूद नहीं सकतीं, लेकिन उस दिन मेरी गाय खुल गई थी और चौधरी के खेत में जा पड़ी थी, तो अम्माँ इतना तेज दौड़ीं कि मैं उन्हें न पा सका, सच।
आगे चले। हलवाइयों की दूकानें शुरू हुई। आज खूब सजी हुई थीं। इतनी मिठाइयाँ कौन खाता है? देखो न, एक-एक दूकान पर मनों होंगी। सुना है, रात को जिन्नात आकर खरीद ले जाते हैं। अब्बा कहते थे कि आधी रात को एक आदमी हर दूकान पर जाता है और जितना माल बचा होता है, वह तुलवा लेता है और सचमुच के रुपये देता है, बिलकल ऐसे ही रूपये।
हामिद को यकीन न आया - ऐसे रुूपये जिन्नात को कहाँ से मिल जाएँगे? मोहसिन ने कहा - जिन्नात को रुूपये की क्या कमी? जिस खजाने में चाहें चले जाएँ। लोहे के दरवाज़े तक उन्हें नहीं रोक सकते जनाब, आप है किस फेर में! हीरे जवाहरात तक उनके पास रहते हैं। जिससे खुश हो गए उसे टोकरों जवाहरात दे दिए। अभी यहीं बैठेहैं, पाँच मिनट में कलकत्ता पहुँच जाएँ।
हामिद ने फिर पूछा - जिन्नात बहुत बड़े-बड़े होते होगे? मोहसिन - एक-एक आसमान के बराबर होता है जी। जमीन पर खड़ा हो जाए तो उसका सिर आसमान से जा लगे, मगर चाहे तो एक लोटे में घुस जाए। हामिद - लोग उन्हे कैसे खुश करते होंगे। कोई मुझे वह मंतर बता दे तो एक जिन्न को खुश कर लू।
मोहसिन - अब यह तो मैं नहीं जानता, लेकिन चौधरी साहब के काबू में बहत से जिन्नात हैं कोई चीज चोरी जाए, चौधरी साहब उसका पता लगा देगे और चोर का नाम भी बता देगे। जुमराती का बछवा उस दिन खो गया था। तीन दिन हैरान हुए, कहीं न मिला। तब झक मारकर चौधरी के पास गए। चौधरी ने तुरंत बता दिया, मवेशीखाने में है और वहीं मिला। जिन्नात आकर उन्हें सारे जहान की खबरें दे जाते हैं अब उसकी समझ में आ गया कि चौधरी के पास क्यों इतना धन है, और क्यो उनका इतना सम्मान है।
आगे चले। यह पुलिस लाइन है। यहीं सब कानिसटिबिल कवायद करते हैं।
रैटन! फ़ाय फो! रात को बेचारे घूम-घूमकर पहरा देते हैं, नहीं चोरियाँ हो जाएँ। मोहसिन ने प्रतिवाद किया - यह कानिसटिबिल पहरा देते हैं! तभी तुम बहुत
जानते हो। अजी हजरत, यही चोरी कराते हैं। शहर के जितने चोर-डाकू हैं, सब
इनसे मिले रहते हैं। रात को ये लोग चोरों से तो कहते है, चोरी करो और आप दूसरे
मुहल्ले में जाकर 'जागते रहो! जागते रहो!' पुकारते हैं। जभी इन लोगों के पास इतने
रूपये आते हैं। मेरे मामूं एक थाने में कानिसटिबिल हैं। बीस रुपया महीना पाते हैं;
लेकिन पचास रूपये घर भेजते हैं। अल्ला कसम! मैने एक बार पूछा था कि मामू,
आप इतने रुपये कहाँ से पाते हैं? हँसकर कहने लगे - बेटा, अल्लाह देता है। फिर
आप ही बोले- हम लोग चाहें तो एक दिन में लाखों मार लाएँ। हम तो इतना ही
लेते हैं, जिसमें अपनी बदनामी न हो और नौकरी न चली जाए। हामिद ने पूछा - यह लोग चोरी करवाते हैं, तो कोई इन्हें पकड़ता नहीं? मोहसिन उसकी नादानी पर दया दिखाकर बोला - अरे पागल, इन्हें कौन
पकड़ेगा? पकड़ने वाले तो यह लोग खुद हैं; लेकिन अल्लाह इन्हें सजा भी खूब देता
है। हरम का माल हराम में जाता है। थो़े ही दिन हुए मामू के घर में आग लग गई।
सारी लेई पूजी जल गई। एक बरतन तक न बचा। कई दिन पेड़ के नीचे सोए, अल्ला कसम, पेड़ के नीचे! फर न जाने कहाँ से एक सौ कर्ज लाए तो बरतन-भँ़े आए। हामिद - एक सौ तो पचास से ज़्यादा होते हैं?
'कहाँ पचास, कहाँ एक सौ। पचास एक थैली भर होता है। सौ तो दो थैलियों में भी न आए।'
अब बस्ती घनी होने लगी। ईदगाह जानेवालों की टोलियाँ नजर आने लगीं। एक से एक भड़कीले वस्त् पहने हुए। कोई इक्के-ताँगे पर सवार, कोई मोटर पर, सभी इत्र में बसे, सभी के दिलों में उमंग। ग्रमीणों का यह छोटा-सा दल, अपनी विपन्नता से बेखबर, संतोष और धै्य में मगन चला जा रहा था। बच्चों के लिए नगर की सभी चीज़ें अनोखी थीं। जिस चीज की ओर ताकते, ताकते ही रह जाते और पीछे से बराबर हान की आवाज होने पर भी न चेतते। हामिद तो मोटर के नीचे जाते-जाते बचा। सहसा ईदगाह नजर आया। ऊपर इमली के घने वृक्षों की छाया है। नीचे पक्का फ़र्श है, जिस पर जाजिम बिछा हुआ है। और रोजेदारों की पंक्तियाँ एक के पीछे एक न जाने कहाँ तक चली गई हैं, पक्की जगत के नीचे तक, जहाँ जाजिम भी नहीं है। नए आनेवाले आकर पीछे की कतार में खड़े हो जाते हैं। आगे जगह नहीं है। यहाँ कोई धन और पद नहीं देखता। इस्लाम की निगाह में सब बराबर हैं। इन ग्रामीणों ने भी वजू किया और पिछ्ली पंक्त में खड़े हो गए। कितना सुंदर संचालन है, कितनी सुंदर व्यवस्था! लाखों सिर एक साथ सिजदे में झुक जाते हैं, फिर सब-के-सब एक साथ खड़े हो जाते हैं, एक साथ झुकते है, और एक साथ घुटनो के बल बैठ जाते हैं। कई बार यही क्िया होती है, जैसे बिजली की लाखों बत्याँ एक साथ प्रदीप्त हों और एक साथ बुझ जाएँ और यही क्रम चलता रहे। कितना अपूर्व दृश्य था, जिसकी सामूहिक क्रियाएँ, विस्तार और अनंतता हृदय को श्रद्ा, गर्व और आत्मानंद से भर देती थीं, मानो श्रतृत्व का एक सूत्र इन समस्त आत्माओं को एक लड़ी में पिरोए हुए है।
नमाज खत्म हो गई है। लोग आपस में गले मिल रहे हैं। तब मिठाई और खिलौने की दूकानों पर धावा होता है। ग्रामीणों का यह दल इस विषय में बालकों से कम उत्साही नहीं है। यह देखो, हिंडोला है। एक पैसा देकर चढ़ जाओ। कभी आसमान पर जाते हुए मालूम होंगे, कभी जमीन पर गिरते हुए। यह च्ी है, लकड़ी के हाथी, घोड़े, ऊँट छड़ों से लटके हुए है। एक पैसा देकर बैठ जाओ और पच्चीस चक्करों का मजा लो। महमूद और मोहसिन और नूरे और सम्मी इन घोड़ों और ऊटों पर बैठते हैं। हामिद दूर खड़ा है। तीन ही पैसे तो उसके पास हैं। अपने कोष का एक तिहाई जरा-सा चक्कर खाने के लिए नहीं दे सकता।
सब चखियों से उतरते हैं अब खिलौने लेंे। इधर दूकानों की कतार लगी हुई है। तरह-तरह के खिलौने हैं - सिपाही और गुजरिया, राजा और वकील, भिश्ती और धोबिन और साधु। वाह! कितने सुदर खिलौने हैं। अब बोला ही चाहते हैं। महमूद सिपाही लेता है, खाकी वर्दी और लाल पगड़ीवाला, कंधे पर बंदूक रखे हुए; मालूम होता है अभी कवायद किए चला आ रहा है। मोहसिन को भिश्ती पसंद आया। कमर झुकी हुई है, ऊुपर मशक रखे हुए है। मशक का मुँह एक हाथ से पकड़ हुए है। कितना प्रसन् है। शायद कोई गीत गा रहा है। बस, मशक से पानी उड़ेला ही चाहता है। नूरे को वकील से प्रेम है। कैसी विद्ता है उसके मुख पर! काला चोगा, नीचे सफ़ेद अचकन, अचकन के सामने की जेब में घड़ी, सुनहरी जंजीर, एक हाथ में कानून का पोथा लिए हुए। मालूम होता है, अभी किसी अदालत से जिरह या बहस किए चले आ रहे हैं। यह सब दो-दो पैसे के खिलौने हैं। हामिद के पास कुल तीन पैसे हैं, इतने महँगे खिलौने वह कैसे ले? खिलौना कहीं हाथ से छूट पड़, तो चूर-चूर हो जाए, जरा पानी पड़ तो सारा रंग धुल जाए, ऐसे खिलौने लेकर वह क्या करेगा, किस काम के?
मोहसिन कहता है - मेरा भिश्ती रोज पानी दे जाएगा, साँझ-सबेरे।
महमूद - और मेरा सिपाही घर का पहरा देगा। कोई चोर आएगा, तो फ़्ौरन बंदूक फ्ैर कर देगा।
नूरे - और मेरा वकील खूब मुकदमा लड़गा। सम्मी - और मेरी धोबिन रोज कपड़े धोएगी।
हामिद खिलौनों की निंदा करता है - मि्टी ही के तो है, गिरे तो चकनाचूर हो जाएँ; लेकिन ललचाई हुई आँखों से खिलौनों को देख रहा है। और चाहता हैकि जरा देर के लिए उन्हें हाथ में ले सकता। उसके हाथ अनायास ही लपकते हैं; लेकिन लड़के इतने त्यागी नहीं होते हैं, विशेषकर जब अभी नया शौक है। हामिद ललचाता रह जाता है।
खिलौने के बाद मिठाइयाँ आती हैं। किसी ने रेवडियाँ ली हैं, किसी ने गुलाब-जामुन, किसी ने सोहन हलवा। मजे से खा रहे हैं। हामिद बिरादरी से पृथक है। अभागे के पास तीन पैसे हैं। क्यों नहीं कुछ लेकर खाता? ललचाई आँखों से सबकी ओर देखता है।
मोहसिन कहता है - हामिद, रेवड़ी ले जा, कितनी खुशबूदार है! हामिद को संदेह हुआ, यह केवल कूर विनोद है, मोहसिन इतना उदार नहीं है; लेकिन यह जानकर भी वह उसके पास जाता है। मोहसिन दोने से एक रेवड़ी निकालकर हामिद की ओर बढ़ाता है। हामिद हाथ फैलाता है। मोहसिन रेवड़ी अपने मुँह में रख लेता है। महमूद, नरे और सम्मी खूब तालियाँ बजा-बजाकर हँसते हैं। हामिद खिसिया जाता है।
मोहसिन - अच्छा, अबकी जरूर देंगे हामिद, अल्ला कसम, ले जा। हामिद - रखे रहो। क्या मेरे पास पैसे नहीं हैं? सम्मी - तीन ही पैसे तो हैं तीन पैसे में क्या-क्या लोगे? महमूद हमसे गुलाब-जामुन ले जाव हामिद। मोहसिन बदमाश है। हामिद - मिठाई कौन बड़ी नेमत है। किताब में इसकी कितनी बुराइयाँ लिखी हैं मोहसिन - लेकिन दिल में कह रहे होंगे कि मिले तो खा लें। अपने पैसे क्यो नहीं निकालते?
महमूद - हम समझते है, इसकी चालाकी। जब हमारे सारे पैसे खर्च हो जाएँगे, तो हमें ललचा-ललचाकर खाएगा।
मिठाइयों के बाद कुछ दूकानें लोहे की चीज़ों की, कुछ गिलट और कुछ नकली गहनों की। लड़कों के लिए यहाँ कोई आकर्षण न था। वे सब आगे बढ़ जाते हैं हामिद लोहे की दूकान पर रुक जाता है। कई चिमटे रखे हुए थे। उसे खयाल आया, दादी के पास चिमटा नहीं है। तवे से रोटियाँ उतारती हैं, तो हाथ जल जाता है; अगर वह चिमटा ले जाकर दादी को दे दे, तो वह कितनी प्रसन्न होंगी! फिर उनकी उँगलियाँ कभी न जलेंगी। घर में एक काम की चीज हो जाएगी। खिलौने से क्या फ़ायदा। व्यर् में पैसे खराब होते है। ज़रा देर ही तो खुशी होती है। फिर तो खिलौने को कोई आँख उठाकर नहींदेखता। या तो घर पहुँचते-पहुँचते टूट-फूटकर बराबर हो जाएँगे। चिमटा कितने काम की चीज है। रोटियाँ तवे से उतार लो, चूल्हे में सेंक लो। कोई आग माँगने आए तो चटपट चूल्हे से आग निकालकर उसे दे दो। अम्माँ बेचारी को कहाँ फुरसत है कि बाज़ार आएँ और इतने पैसे ही कहाँ मिलते हैं। रोज हाथ जला लेती हैं। हामिद के साथी आगे बढ़ गए हैं। सबील पर सब-के-सब शरबत पी रहे हैं। देखो, सब कितने लालची हैं! इतनी मिठाइयाँ लीं, मुझे किसी ने एक भी न दी। उस पर कहते हैं मेरे साथ खेलो। मेरा यह काम करो। अब अगर किसी ने कोई काम करने को कहा, तो पूछूँगा। खाएँ मिठाइयाँ, आप मुँह सड़ेगा, फोड़़े फुंसियाँ निकलेंगी, आप ही जबान चटोरी हो जाएगी। तब घर से पैसे चुराएँगे और मार खाएँगे। किताब में झूठी बातें थोड़े ही लिखी है। मेरी जबान क्यों खराब होगी। अम्माँ चिमटा देखते ही दौड़कर मेरे हाथ से ले लेंगी और कहेंगी - मेरा बच्चा अम्माँ के लिए चिमटा लाया है। हज़ारों दुआएँ देंगी। फिर पड़ोस की औरतों को दिखाएँगी। सारे गाँव में चर्चा होने लगेगी, हामिद चिमटा लाया है। कितना अच्छा लड़का है। इन लोगों के खिलौनों पर कौन इन्हें दुआएँ देगा? बड़ों की दुआएँ सीधे अल्लाह के दरबार में पहुँचती हैं और तुरंत सुनी जाती हैं। मेरे पास पैसे नहीं है। तभी तो मोहसन और महमूद यों मिज़्ाज दिखाते है। मैं भी इनसे मिज़्ाज दिखाऊँगा। खेलें खिलौने और
खाएँ मिठाइयाँ। मैं नहीं खेलता खिलौने, किसी का मिज़ाज क्यों सहूँ। मैं गरीब सही, किसी से कुछ माँगने तो नहीं जाता। आखिर अब्बाजान कभी-न-कभी आएँगे। अम्माँ भी आएँगी ही। फिर इन लोगों से पूछूगा, कितने खिलौने लोगे? एक-एक को टोकरियों खिलौने दूं और दिखा दू कि दोस्तों के साथ इस तरह सलूक किया जाता है। यह नहीं कि एक पैसे की रेवड़ियाँ लीं तो चिढ़ा-चिढ़ाकर खाने लगे। सब-के-सब हँसेंगे कि हामिद ने चिमटा लिया है। हँसे! मेरी बला से! उसने दूकानदार से पूछा - यह चिमटा कितने का है?
काम का नहीं है जी! 'बिकाऊ है कि नहीं?' 'ठीक-ठीक पाँच पैसे लगेंगे, लेना हो लो, नहीं चलते बनो।' हामिद ने कलेजा मजबूत करके कहा - तीन पैसे लोगे? यह कहता हुआ वह आगे बढ़ गया कि दूकानदार की घुड़कियाँ न सुने। लेकिन दूकानदार ने घुड़कियाँ नहीं दीं। बुलाकर चिमटा दे दिया। हामिद ने उसे इस तरह कंधे पर रखा, मानो बंदूक है और शान से अकड़ता हुआ संगियों के पास आया। जरा सुनें, सब-के-सब क्या-क्या आलोचनाएँ करते हैं। मोहसिन ने हँसकर कहा - यह चिमटा क्यों लाया पगले; इसे क्या करेगा? हामिद ने चिमटे को ज़मीन पर पटककर कहा - ज़रा अपना भिश्ती जमीन पर गिरा दो। सारी पसलियाँ चूर-चूर हो जाएँ बचा की। महमूद बोला - तो यह चिमटा कोई खिलौना है?
हामिद - खिलौना क्यों नहीं है? अभी कंधे पर रखा, बंदूक हो गई। हाथ में ले लिया, फकीरों का चिमटा हो गया, चाहू तो इससे मजीरे का काम ले सकता हू। एक चिमटा जमा दू, तो तुम लोगों के सारे खिलौनों की जान निकल जाए। तुम्हारे खिलौने कितना ही ज़ोर लगाएँ, मेरे चिमटे का बाल भी बॉका नहीं कर सकते। मेरा बहादुर शेर है - चिमटा।
सम्मी ने खँंजरी ली थी। प्रभावित होकर बोला - मेरी खॉँजरी से बदलोगे? दो आने की है।
हामिद ने खँजरी की ओर उपेक्षा से देखा - मेरा चिमटा चाहे तो तुमहारे खॉंजरी का पेट फाड़ डाले। बस एक चमड़ की झल्ली लगा दी, ढब-ढब बोलने लगी। जरा-सा पानी लग जाए तो खतम हो जाए। मेरा बहादुर चिमटा आग में, पानी में, ऑधी में, तूफ़ान में बराबर डटा खड़ा रहेगा।
चिमटे ने सभी को मोहित कर लिया, लेकिन अब पैसे किसके पास धरे हैं। फिर मेले से दूर निकल आए हैं, नौ कब के बज गए, धूप तेज हो रही है। घर पहुँचने की जल्दी हो रही है। बाप से जिद भी करें, तो चिमटा नहीं मिल सकता। हामिद है बड़ा चालाक। इसीलिए बदमाश ने अपने पैसे बचा रखे थे। अब बालकों के दो दल हो गए हैं। मोहसन, महमूद, सम्मी और नूरे एक तरफ़ हैं, हामिद अकेला दूसरी तरफ़। शास्त्ारथ हो रहा है। सम्मी तो विधमी हो गया। दूसरे पक्ष से जा मिला; लेकिन मोहसिन, महमूद और नूरे भी, हामिद से एक-एक, दो-दो साल बड़े होने पर भी हामिद के आघातों से आतंकित हो उठे हैं। उसके पास न्याय का बल है और नीति की शक्त। एक ओर मिटी है, दूसरी ओर लोहा, जो इस वक्त अपने को फ़ौलाद कह रहा है। वह अजेय है, घातक है। अगर कोई शेर आ जाए, तो मियाँ भिश्ती के छक्के छूट जाएँ, मियाँ सिपाही मिट्टी की बंदूक छोड़कर भागें, वकील साहब की नानी मर जाए, चोगे में मुह छिपाकर जमीन पर लेट जाएँ मगर यह चिमटा, यह बहादुर, यह रुस्तमे-हिंद लपककर शेर की गरदन पर सवार हो जाएगा और उसकी आँखें निकाल लेगा।
मोहसिन ने एड़ी-चोटी का जोर लगाकर कहा - अच्छा, पानी तो नहीं भर सकता। हामिद ने चिमटे को सीधा खड़ा करके कहा - भिश्ती को एक डाँट बताएगा तो दौड़ा हुआ पानी लाकर उसके द्ार पर छिड़कने लगेगा। मोहसिन परास्त हो गया; पर महमूद ने कुमुक पहुचाई — अगर बचा पकड़ जाएँ
हामिद ने मुँह चिढ़ाकर कहा - यह बेचारे हम बहादुर रस्तमे-हिंद को पकड़ंगे अच्छा लाओ, अभी जरा कुशती हो जाए। इसकी सूरत देखकर दूर से भागंगे। पकड़ंग क्या बेचारे!
मोहसिन को एक नई चोट सूझ गई तु्हारे चमटे का मुह रोज आग में जलेगा।
उसने समझा था कि हामिद लाजवाब हो जाएगा; लेकिन यह बात न हुई हामिद ने तुरंत जवाब दिया - आग में बहादुर ही कूदते हैं जनाब, तुम्हारे यह वकील, सिपाही और भिशती लेडियों की तरह घर में घुस जाएँगे। आग में कूदना वह काम है, जो यह रुस्तमे-हिंद ही कर सकता है।
इस तक्क ने सम्मी और नरे को भी सजीव कर दिया। कितने ठिकाने की बात कही है पट़े ने। चिमटा बावर्चीखाने में पड़ा रहने के सिवा और क्या कर सकता है? हामिद को कोई फड़कता हुआ जवाब न सूझा तो उसने धाँधली शुरू की - मेरा चिमटा बाबर्चीखाने में नहीं रहेगा। वकील साहब कुसी पर बैठेंगे, तो जाकर उन्हे जमीन पर पटक देगा और उनका कानून उनके पेट में डाल देगा बात कुछ बनी नहीं। खासी गाल-गलौज थी; लेकिन कानून को पेट में डालने वाली बात छा गई। ऐसी छा गई कि तीनों सूरमा मुँह ताकते रह गए, मानो कोई धेलचा
कनकौआ किसी गंडेवाले कनकौए को काट गया हो। कानून मुह से बाहर निकलने वाली चीज है। उसको पेट के अंदर डाल दिया जाना, बेतुकी-सी बात होने पर भी कुछ नयापन रखती है। हामिद ने मैदान मार लिया। उसका चिमटा रुस्तमे-हिंद है। अब इसमे मोहसिन, महमूद, नरे, सम्मी किसी को भी आपत्ि नहीं हो सकती। विजेता को हारने वालों से जो सत्कार मिलना स्वाभाविक है, वह हामिद को भी मिला। औरों ने तीन-तीन, चार-चार आने पैसे खर्च किए, पर कोई काम की चीज़ न ले सके। हामिद ने तीन पैसे में रंग जमा लिया। सच ही तो है, खिलौनों का क्या भरोसा? टूट-फूट जाएँगे। हामिद का चिमटा तो बना रहेगा बरसों!
संधि की शर्तं तय होने लगीं मोहसन ने कहा - जरा अपना चिमटा दो हम भी देखें। तुम हमारा भिश्ती लेकर देखो।
महमूद और नूरे ने भी अपने-अपने खिलौने पेश किए।
हामिद को इन शतों के मानने में कोई आपति न थी। चिमटा बारी-बारी से सबके हाथ में गया; और उनके खिलौने बारी-बारी से हामिद के हाथ में आए। कितने खूबसूरत खिलौने हैं।
हामिद ने हारने वालों के आँसू पोंछे मैं तु्हें चिढ़ा रहा था, सच! यह चिमटा भला इन खिलौनों की क्या बराबरी करेगा; मालूम होता है, अब बोले, अब बोले। लेकिन मोहसिन की पार्टी को इस दिलासे से संतोष नहीं होता। चिमटे का सिक्का खूब बैठ गया है। चिपका हुआ टिकट अब पानी से नहीं छूट रहा है। मोहसिन - लेकिन इन खिलौनों के लिए कोई हमें दुआ तो न देगा? महमूद - दुआ को लिए फिरते हो। उलटे मार न पड़े। अम्माँ जरूर कहेंगी कि मेले में यही मिट्टी के खिलौने तुमहें मिले?
हामिद को स्वीकार करना पड़ा कि खिलौनों को देखकर किसी की माँ इतनी खुश न होगी, जितनी दादी चिमटे को देखकर होंगी। तीन पैसों ही में तो उसे सब कुछ करना था और उन पैसों के इस उपयोग पर पछतावे की बिलकुल जरूरत न थी। फिर अब तो चिमटा रुस्तमे-हिंद है और सभी खिलौनों का बादशाह!
रास्ते में महमूद को भूख लगी। उसके बाप ने केले खाने को दिए। महमूद ने केवल हामिद को साझी बनाया। उसके अन्य मित्र मुँह ताकते रह गए। यह उस चिमटे का प्रसाद था।
ग्यारह बजे गाँव में हलचल मच गई। मेले वाले आ गए। मोहसिन की छोटी बहन ने दौड़कर भिश्ती उसके हाथ से छीन लिया और मारे खुशी के जो उछली, तो मियाँ भिश्ती नीचे आ रहे और सुरलोक सिधारे। इस पर भाई-बहन में मार-पीट हुई। दोनों खूब रोए। उसकी अम्माँ यह शोर सुनकर बिगड़ी और दोनों को ऊपर से दो-दो चॉटे और लगाए।
मियाँ नूरे के वकील का अंत उनके प्रतिष्ठानुकूल इससे ज्यादा गौरवमय हुआ वकील जमीन पर या ताक पर तो नहीं बैठ सकता। उसकी मर्यादा का विचार तो करना ही होगा। दीवार में दो खूटियाँ गाड़ी गई। उन पर लकड़ी का एक पटरा रखा गया। पटरे पर कागज का कालीन बिछाया गया। वकील साहब राजा भोज की भाँत सिंहासन पर बिराजे। नूरे ने उन्हें पंखा झलना शुरू किया। अदालतों में खस की टृियाँ और बिजली के पंखे रहते हैं क्या यहाँ मामूली पंखा भी न हो! कानून की गरमी दिमाग पर चढ़ जाएगी कि नहीं। बाँस का पंखा आया और नूरे हवा करने लगे। मालूम नहीं, पंखे की हवा से, या पंखे की चोट से वकील साहब स्वर्गलोक से मृत्युलोक में आ रहे और उनका माटी का चोला माटी में मिल गया। फिर बड़ ज़ोर-शोर से मातम हुआ और वकील साहब की अस्थ घूर पर डाल दी गई। अब रहा महमूद का सिपाही। उसे चटपट गाँव का पहरा देने का चार्ज मिल गया; लेकिन पुलिस का सिपाही कोई साधारण व्यक्त तो नहीं, जो अपने पैरों चले। वह पालकी पर चलेगा। एक टोकरी आई, उसमें कुछ लाल रंग के फटेपुराने चिथड़े बिछाए गए; जिसमें सिपाही साहब आराम से लेटे। नूरे ने यह टोकरी उठाई और अपने द्ार का चक्कर लगाने लगे। उनके दोनों छोटे भाई सिपाही की तरफ़ से 'छोनेवाले, जागते लहो' पुकारते चलते है। मगर रात तो अँधेरी होनी चाहिए; महमूद
को ठोकर लग जाती है। टोकरी उसके हाथ से छूटकर गिर पड़ती है और मियाँ सिपाही अपनी बंदूक लिए जमीन पर आ जाते हैं और उनकी एक टाँग में विकार आ जाता है। महमूद को आज जात हुआ कि वह अच्छा डॉक्टर है। उसको ऐसा मरहम मिल गया है जिससे वह टूटी टाँग को आनन-फानन जोड़ सकता है। केवल गूलर का दूध चाहिए। गूलर का दूध आता है। टाँग जोड़ दी जाती है लेकिन सिपाही को ज्यों ही खड़ा किया जाता है, टाँग जवाब दे देती है। शल्यक्िया असफल हुई, तब उसकी दूसरी टाँग भी तोड़ दी जाती है। अब कम-से-कम एक जगह आराम से बैठ तो सकता है। एक टाँग से तो न चल सकता था; न बैठ सकता था। अब वह सिपाही संन्यासी हो गया है। अपनी जगह पर बैठा-बैठा पहरा देता है। कभी-कभी देवता भी बन जाता है। उसके सिर का झालरदार साफ़ा खुरच दिया गया है। अब उसका जितना रूपांतर चाहो, कर सकते हो। कभी-कभी तो उससे बाट का काम भी लिया जाता है।
अब मियाँ हामिद का हाल सुनिए। अमीना उसकी आवाज सुनते ही दौड़ी और उसे गोद में उठाकर प्यार करने लगी। सहसा उसके हाथ में चिमटा देखकर वह चौंकी। ' यह चिमटा कहाँ था?'
'मैने मोल लिया है।) 'कै पैसे में?' 'तीन पैसे दिए।'
अमीना ने छाती पीट ली। यह कैसा बेसमझ लड़का है कि दोपहर हुआ, कुछ खाया न पिया। लाया क्या, चिमटा! सारे मेले में तुझे और कोई चीज न मिली, जो यह लोहे का चिमटा उठा लाया?
हामिद ने अपराधी-भाव से कहा - तुम्हारी उँगलियाँ तवे से जल जाती थीं; इसलिए मैने उसे लिया।
बुढ़िया का क्रोध तुरंत स्नेह में बदल गया, और स्नेह भी वह नहीं, जो प्रगल्भ होता है और अपनी सारी कसक शब्दों में बिखेर देता है। यह मूक स्नेह था, खूब ठोस, रस और स्वाद से भरा हुआ। बच्चे में कितना त्याग, कितना सद्भाव और
कितना विवेक है! दूसरों को खिलौने लेते और मिठाई खाते देखकर इसका मन कितना ललचाया होगा? इतना जब्त इससे हुआ कैसे? वहाँ भी इसे अपनी बुढ़िया दादी की याद बनी रही। अमीना का मन गद्गद हो गया। और अब एक बड़ी विचित्र बात हुई। हामिद के इस चिमटे से भी विचित्र। बच्चे हामिद ने बूढ़े हामिद का पार्ट खेला था। बुढ़िया अमीना बालिका अमीना बन गई। वह रोने लगी। दामन फैलाकर हामिद को दुआएँ देती जाती थी और आँसू की बड़ी-बड़ी बूँदं गिराती जाती थी। हामिद इसका रहस्य क्या समझता!
- 'ईदगाह' कहानी के उन प्रसंगों का उल्लेख कीजिए जिनसे ईंद के अवसर पर ग्रामीण परिवेश का उल्लास प्रकट होता है।
2.'उसके अंदर प्रकाश है, बाहर आशा। विपत्त अपना सारा दलबल लेकर आए, हामिद की आनंद भरी चितवन उसका विध्वंस कर देगी।' - इस कथन से लेखक का क्या आशय है? 0
.'उन्हे क्या खबर कि चौधरी आज आँखें बदल लें, तो यह सारी ईद मुहर्म हो जाए।'– इस कथन का आशय स्पष्ट कीजिए।
. 'मानो शरातृत्व का एक सूत्र इन समस्त आत्माओं को एक लड़ी में पिरोए हुए है।' इस कथन के संदर्ष में स्पष्ट कीजिए कि 'धर्म तोड़ता नहीं जोड़ता है।'
5निम्मलिखित ग्यांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए–
(क) कई बार यही क्रिया होती ै. 'आ्माओं को एक लड़ी में पिरोए हुए है। (ख) बुढिया का क्रोध 'स्वाद से भरा हुआ।
6 हामिद ने चिमटे की उपयोगिता को सिद्ध करते हुए क्या-क्या तर्क दिए?
- गाँव से शहर जानेवाले रास्ते के मध्य पड़नेवाले स्थलों का ऐसा वर्णन लेखक ने किया है मानो आँखों के सामने चित्र उपस्थित हो रहा हो। अपने घर और विद्यालय के मध्य पड़नेवाले स्थानों का अपने शब्दों में वर्णन कीजिए।
. 'बच्चे हामिद ने बूढ़ हामिद का पार्ट खेला था। बुढ़िया अमीना बालिका अमीना बन गई।' इस कथन में 'बूढ़े हामिद' और 'बालिका अमीना' से लेखक का क्या आशय है? स्पष्ट कीजिए।
'दामन फैलाकर हामिद को दुआएँ देती जाती थी और आँसू की बड़ी-बड़ी बूँदं गिराती जाती थी। हामिद इसका रहस्य क्या समझता!' - लेखक के अनुसार हामिद अमीना की दुआओं और आँसुओं के रहस्य को क्यों नहीं समझ पाया? कहानी के आधार पर स्पष्ट कीजिए।
हामिद की जगह आप होते तो क्या करते?
योग्यता-विस्तार
प्रेमचंद की कहानियों का संग्रह 'मानसरोवर' नाम से आठ भागों में प्रकाशित है। अपने पुस्तकालय से लेकर उसे पढिए।
2. इस कहानी में लोक प्रचलित मुहावरों की भरमार है, जैसे - नानी मरना, छक्के छूटना आदि। इसमें आए मुहावरों की एक सूची तैयार कीजिए।
शब्दार्थ और टिप्पणी
बला कष्ट, आपत्त, बहुत कष्ट देनेवाली वस्तु
बदहवास घबराना, होश-हवास ठीक न होना
निगोड़ी अभागी, निराश्रय, जिसका कोई न हो
चितवन किसी की ओर देखने का ढंग, दृष्ट, कटाक्ष
वज नमाज से पहले यथाविधि हाथ-पाँव और मुँह धोना
सिजदा माथा टेकना, खुदा के आगे सिर झुकाना ishe
हिंडोला झूला, पालना
मशक भेड़ या बकरी की खाल को सीकर बनाया हुआ थैला जिससे भिश्ती पानी ढोते हैं
अचकन लंबा कलीदार अँगरखा जिसमें पहले गरेबाँ से कमर-पट्टी तक अर्धचंद्राकार बंद लगते थे और अब सीधे बटन
नेमत बहुत बढिया टकते हैं re
जब्त सहन करना
दामन पल्लू, ऑँचल