घनानंद - CBSE Class 12 Hindi Notes

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Chapter Study Guide & Summary

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Key Concepts & Syllabus Topics

Important Definitions & Terminology

घनानंद Overview
The central theme and foundational concept covered in Class 12 Hindi Chapter 9, emphasizing conceptual clarity, NCERT curriculum alignment, and exam readiness.
NCERT Curriculum Alignment
Structured study material adhering strictly to CBSE board guidelines, learning objectives, and standardized assessment criteria for Class 12.
Active Recall & Revision
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Quick Revision & Key Points

Full NCERT Chapter: घनानंद

घनानंद

(सन् 1673-1760)

रीतिकाल के रीतिमुक्त या स्वच्छंद काव्यधारा के प्रतिनिधि कवि घनानंद दिल्ली के बादशाह मुहम्मद शाह के मीर मुंशी थे। कहते हैं कि सुजान नाम की एक सत्री से उनका अटूट प्रेम था। उसी के परम के कारण घनानंद बादशाह के दरबार में बे-अदबी कर बैठे, जिससे नाराज होकर बादशाह ने उन्हे दरबार से निकाल दिया। साथ ही घनानंद को सुजान की बेवकफाई ने भी निराश और दुखी किया। वे वृंदावन चले गए और निंबार्क संप्दाय में दीक्षित होकर भक्त के रूप में जीवन-निवाह करने लगे। परंतु वे सुजान को भूल नहीं पाए और अपनी रचनाओं में सुजान के नाम का प्रतीकात्मक प्रयोग करते हुए काव्य-रचना करते रहे।

घनानंद मूलत: परम की पीड़ा के कवि हैं। वियोग वर्णन में उनका मन अधिक रमा है। उनकी रचनाओं में ्रेम का अत्यंत गंभीर, निर्मल, आवेगमय, और व्याकुल कर देने वाला उदात रूप व्यक्त हुआ है, इसीलिए घनानंद को साक्षात रसमूति कहा गया है।

घनानंद के काव्य में भाव की जैसी गहराई है, वैसी ही कला की बारीकी भी। उनकी कविता में लाक्षणिकता, वक्रोक्त, वागविद्धता के साथ अलंकारों का कुशल प्रयोग भी मिलता है। उनकी काव्य-कला में सहजता के साथ वचन-वक्रता का अद्भुत मेल है।

घनानंद की भाषा परिष्कृत और साहित्यक ब्रजभाषा है। उसमे कोमलता और मधुरता का चरम विकास दिखाई देता है। भाषा की व्यंजकता बढ़ाने में वे अत्यंत कुशल थे। वस्तुत: वे ब्रजभाषा प्रवीण ही नहीं सर्जनात्मक काव्यभाषा के प्णेता भी थे। घनानंद की रचनाओं में सुजान सागर, विरह लीला, कृपाकंड निबंध, रसकेल वल्ली आदि प्रमुख हैं।

प्रसतुत पुस्तक में कवि घनानंद के दो कवित्त दिए जा रहे हैं कवित में कवि ने अपनीप्रेमिका सुजान के दर्शन की अभिलाषा प्रकट करते हुए कहा है कि सुजान के दर्शन के लिए ही ये प्राण अब तक अटके हुए हैं।

कवित्त

(1)

बहुत दिनों को अवधि आसपास परे,
खरे अरबरन भरे हैं उठि जान को।

कहि कहि आनन छबीलो मनभावन को,
गहि गहि राखत हैं दे दे सम्मान को।

झूठी बतियान की पत्यानि ते उदास है के,
अब न घिरत हम आनन निदान को।

अधर लगे हैं आनि करि के पान पान,
चाहत चलन ये सैंसो तो सुजान को।

(2)

आनाकानी ऐसी निहारियो करोगे कोइली?
कबहुँ मौन चितवत दसा लौं न बीत डोलिहैं?

मौन हौं, सों पहिले कितेक पल मारिहैं जु,
कुरकुरी मुकुटा कुलान आप बोलिहौं।

जान चरमोर में मोहि तुम्हें पेच पड़े,
जानिये ठीक कौन से मलिन को मोलिहौं।

रहे दिए रहो कहाँ तो बहुरायो को?
कबहुँ तो मोरें पुकार जाग बोलिहौं।

प्रश्न-अभ्यास

  1. कवि ने 'चाहत चलन ये संदेसो ले सुजान को' क्यों कहा है?

  2. कव मौन होकर प्रेमिका के कौन से प्रण पालन को देखना चाहता है?

  3. कवि ने किस प्रकार की पुकार से 'कान खोल है' की बात कही है?

4.घनानंद की रचनाओं की भाषिक विशेषताओं को अपने शब्दो में लिखिए।

  1. निम्मनलिखित पंक्तियों में प्रयुक्त अलंकारों की पहचान कीजिए।

(क) कह कहि आवन छबीले मनभावन को, गहि गहि राखति ही दैं दैं सनमान को।
(ख) कूक भरी मूकता बुलाय आप बोल है।
(ग) अब न घिरत घन आनंद निदान को।

निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए-

(क) बहुत दिनान को अवधि आसपास परे / खरे अरबरन भरे हैं उठ जान को (ख) मौन हू सौ देखिहौं कितेक पन पालिहौ जू/ कूकभरी मूकता बुलाय आप बोलिहै।

संदर्भ सहित व्याख्या कीजिए-

(क) झूठ बतियानि की पत्यान तें उदास है, कै.. चाहत चलन ये संेसो लै सुजान को। (ख) जान घनआनंद यों मोहिं तुम्है पैज परी ..कबहूँ तौ मेरियै पुकार कान खोल है।

योग्यता-विस्तार

निम्मलिखित कवियों के तीन-तीन कवित्त एकत्रत कर याद कीजिए- तुलसीदास, रसखान, पद्माकर, सेनापति 2. पठित अंश में से अनुप्रास अलंकार की पहचान कर एक सूची तैयार कीजिए।

शब्दार्थ और टिप्पणी

शब्द अर्थ
पत्यानि विश्वास करना
आनाकानी टालने की क्रिया
आसरी किसी की ओर झुकना या आश्रित होना
कुरकुरी कुछ अनुपम
पेच चक्कर
बहुरायो कई लोगों को, कानों से न सुनने को
घनानंद - CBSE Class 12 Hindi Notes