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इस पाठ का नाम पढ़कर आपके मन में कुछ गोल व्तुओं के नाम या चित्र उभे होगे, गोल गंद, गोल रोटी, गोल चंद्रमा आदि लेकिन यह पाठ एक विशेष प्रकार के गोल और उसे करने वाले के बर में ह। यह पाठ ए प्रिद्ध खिलाड़ी के संस्मरण का एक अंश ही आइए इसे पढ़े हैं और जनते हैं कि कौन थेवे प्रसिद्र खिलाड़ी!
खेल के मैदान में धक्का-मुक्की और नोंक-झोंक की घटनाएँ होती रहती हैं खेल में तो यह सब चलता ही है जिन दिनो हम खेला करते थे, उन दिनों भी यह सब चलता था। सन् 1933 की बात है। उन दिनोंमें मैंपंजाब रेजिमेंट की ओर से खेला करता था। एक दिन 'पंजाब रेजिमेंट' और 'सैंपर्स एंड माइनर्स टीम' के बीच मुकाबला हो रहा था। 'माइन् टीम' के खिला़ी मुझसे गेंद छीने की कोशिश करते, लेकिन उनकी हर कोशिश बेकार जाती इतने में एक खिलाड़ी ने गुस्से में आकर हॉकी स्टिक मेरे सिर प दे मागी मये मैदात मे बाह ले जागा गगा।
थो़ देर बा ैे पट्ठी बाँधकर फिर मैदन में आ पहुँचा। आते ही मैने उस खिलाड़ी की पीठ पर हाथ रखकर कहा, "तुम चिंता मत करो, इसका बदला मैं जरूर लूँगा" मेरे इतना कहते ही वह खिलाड़ी घबरा गया। अब हर समय मुझे ही देखता रहता कि मैकब उसके सिर पर हॉकी स्टिक मारने वाला हू मैने एक के बाद एक झटपट छह गोल कर दिए। खेल खत्म होने के बाद मैंने फिर उस खिलाड़ी की पीठ थपथपाई और कहा, दोस्त, खेल में इतना गुस्सा अच्छा नहीं मैने तो अपना बदला ले ही लिया है अगर तुम मुझे हाकी नहीं मारते तो शायद मैं तु्हें दो ही गोल से हराता।" वह खिलाड़ी सचमुच बड़ा श्मिदा हुआ। तो देखा आपने मेरा बदला लेने का ढंग? सच मानो, बुा काम करने वाला आदमी हर समय इस बात से डरता रहता है कि उसके साथ भी बुराई की जाएगी।
आज मैं जहाँ भी जाता हूं बच्चे व बूढे मुझे घेर लेते हैं और मुझसे मेरी सफलता का राज जानना चाहते हैं। मेरे पास सफलता का कोई गुरु-मंत्र तो है नहीं। हर किसी से यही कहता कि लगन, साधना और खेल भावना ही सफलता के सबसे बड़ मंत्र हैं। मेरा जन्म सन् 1904 में प्रयाग में एक साधारण परिवार में हुआ। बाद में हम झासी आकर बस गए। 16 साल की उ् मेंमैं 'फस्ट बराहमण रेजिमेंट' में एक साधारण सिपाही के रूप में भरती हो गया। मेरी रेजमेंट का हॉकी खेल में काफी नाम था। पर खेल में मेरी कोई दिलचस्पी नहीं थी उस समय हमारी रेजिमेंट के सूबेदार मेजर तिवारी थे वे बार-बार मुझे हाँकी खेलने के लिए कहते हमारी छावनी मे हॉँकी खेलने का कोई निश्चत समय नहीं था सैनिक जब चाहे मैदान में पहुँच जाते और अभ्यास शुरू कर देते। उस समय तक मं एक नौसिखिया खिलाड़ी था। जैसे-जैसे मेरे खेल में निखार आता गया, वैसे-वैसे मुझे तरक्की भी मिलती गई। सन् 1936 में बलिन ओलंपिक में मुझे कप्तान बनाया गया। उस समय मैं सेना में लांस नायक था। बलिन ओलंपिक में लोग मेरे हॉकी खेलने के ढेंग से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने मुझे 'हॉँकी का जादूगर' कहना शुरू कर दिया। इसका यह मतलब नहीं कि सारे गोल मैं ही करता था मेरी तो हमेशा यह कोशिश रहती कि मै गेंद को गोल के पास ल
े जाकर अपने किसी साथी खिलाड़ी को देदू ताकि उसे गोल करने का श्रे मिल जाए। अपनी इसी खेल भावना के कारण मैंने दुनिया के खेल प्रेमियों का दिल जीत लिया। बलिन ओलंपिक में हमें स्वर्ण पदक मिला। खेलते समय मैं हमेशा इस बात का ध्यान खता था कि हार या जीत मेरी नहीं, बल्क पूरे देश की है। —मेजर ध्यानचंद


भारतीय हॉकी टीम ने 1936 के बलिन ओलंपिक में जीत दर्ज की।
लेखक से परिचय
यदि कोई खिलाड़ी अपनी आत्मकथा का नाम 'गोल' रखे, तो इस नाम को पढ़कर इतना तो तुरंत समझ में आ जाता है कि उसे खेल से कितना प्यार रहा होगा। ज हाँ, वे अमर खिला़ी हैं'हॉकी के जादूगर' कहे जाने वाले मेजर ध्यानचंद। इतने महान कि भारत उनके जन्मदिन को 'राष्ट्रीय खेल दिवस' के रूप में मनाता है, जिससे लाखों भारतवासी उनके जीवन से प्रणा ले सके। इतने महान खिलाड़ी कि भारत का सवोच्च खेल पुरस्कार 'खेल रत्न' उनके नाम पर दिया जाता है।

(1905–1979)
पाठ से
मेरी समझ से
(क) नीचे दिए गएप्रनों का सटीक उत्तर कौन-सा है? उसके सामने तारा (*) बनाइए (1) "दोस्त, खेल मे इतना गुस्सा अच्छा नहीं मैने तो अपना बदला ले ही लिया है अगर तुम मुझे हाकी नहीं मारते तो शायद मैं तु्हें दो ही गोल से हराता" मेजर ध्यानचंद की इस बात से उनके बारे मे क्या पता चलता है?
वे अत्यंत ्रोधी थे वे अच्छे ढंग से बदला लेते थे उन्हें हॉकी से मारने पर वे अधिक गोल करते थे। वे जानते थे कि खेल को सही भावना से खेलना चाहिए (2) लोगो ने मेज ध्यानचंद को 'हॉकी का जादूग' कहना क्यो शुरूकर दिया?
उनके हाॉकी खेलने के विशेष कौशल के कारण उनकी हाकी स्टिक की अनोखी विशेषताओं के कारण हाकी के लिए उनके विशेष लगाव के कारण उनकी खेल भावना के कारण
(ख) अब अपने मित्ोंके साथ च्चा ीजिए कि आपने े उत्र ही क्यों चने?
मिलकर करें मिलान
पाठ में से चुनकर कुछ शब्द नीचे दिए गए हैं अपने समूह में इन पर च्चा कीजिए और इ्हे इनके सही अथो या संदभों से मिलाइए। इसके लिए आप शब्दकोश, इंटरनेट या अपने शक्षकों की सहायता ले सकते हैं।
| शब्द | अर्थ या संदर्भ |
| लांस नायक 1. | 1स्वतंत्रता से पहले सूबेदार भारतीय सैन्य अधिकारियों का दूसरा सबसे बड़ा पद था। |
| 2. बर्लिन ओलंपिक | 2. भारतीय सेना का एक पद (ैंक) है। |
| पंजाब रेजिमेंट 3. | 3. सैनिकों के रहने का कषेत्रा। |
| सेंपर्स एंड 4. | वर्ष 1936 में जर्मनी के ब्लिन शहर में |
| माइन्स टीम | आयोजित ओलंपिक खेल प्रतियोगिता, जिसमें 49 देशों ने भाग लिया था। |
| 5. सूबेदार | 5. स्वतंत्रता से पहले अंग्रेजों की भारतीय सेना का एक दल। |
| 6. छावनी | अंग्रेज़ों के समय का एक हाकी दला |
पंक्तियों पर चर्चा
पाठ में से चुनकर कुछ पंक्तियाँ नीचे दी गई है न्हे ध्यान से पढिए और इन पर विचार कीजिए आपको इनका क्या अर्थ समझ में आया? अपने विचार कक्ा में अपने समूह में साझा कीजिए और अपनी लेखन पुस्तिका में लिखिए।
(क) "बुरा काम करने वाला आदमी हर समय इस बात से डरता रहता है कि उसके साथ भी बुराई की जाएगी।"
(ख) "मेरी तो हमेशा यह कोशिश रहती कि मै गेंद को गोल के पास ले जाकर अपने किसी साथी खिलाड़ी को दे दूं ताकि उसे गोल करने का श्रेय मिल जाए। अपनी इसी खेल भावना के कारण मैने दुनिया के खेल प्रेमियों का दिल जीत लिया।"
सोच-विचार के लिए
संस्मरण को एक बार फिर से पढिए और निम्नलिखित के बारे में पता लगाकर अपनी लेखन पुस्तिका में लिखिए—
(क) ध्यानचंद की सफलता का क्या रहस्य था? (ख) किन बातों से ऐसा लगता है कि ध्यानचंद स्वयं से पहले दूसरों को रखते थे?
संस्मरण की रचना
"उन दिनों मे मैं पंजाब रेजिमेंट की ओर से खेला करता था"
इस वाक्य को पढ़कर ऐसा लगता है मानो लेखक आपसे यानी पाठक से अपनी यादों को साझा कर रहा है ध्यान देंगे तो इस पाठ में ऐसी और भी अनेक विशेष बातें आपको दिखाई देंगी। इस पाठ को एक बार फिर से पढिए।
(क) अपने-अपने समह मे िलकर इस संस्मरण की विशेषताओं की सूची बनाए। (ख) अपने समूह की सूची को कक्षामे सबके साथ साझा कीजिए।
शब्दों के जोड़़, विभिन्न प्रकार के
(क) "जैसे-जैसे मेर खेल में निखार आता गया, वैसे-वैसे मुझे तरक्की भी मिलती गईं" इस वाक्य में जैसे-जैसे' और 'वैसे-वैसे' शब्दों के जोड़़ हैं जनमें एक ही शब्द दो बार उपयोग में लाया गया है। ऐसे जोड़ों को 'शब्द-युम्म' कहते हैं शब्द-युम्म में दो शब्दों के बीच में छोटी-सीरेखा लगाई जाती है जिसे योजक चिह्न कहते हैं योजक यानी जोड़ने वाला।
आप भी ऐसे पाँच शब्द-यम्म लिखिए।
) "खेल के मैदान में धक्का-मुक्की और नोंक-झोंक की घटनाएँ होती रहती हैं" इस वाक्य में भी आपको दो शब्द-युम दिखाई दे रहे हैं, लेकिन इन शब्द-यम्मों के दोनों शब्द भि्न-भिन्न हैं एक जैसे नहीं हैं आप भी ऐसे पाँच शब्द-युम लिखिए जिनमें दोनों (ग) "हार या जीत मेरी नहीं, बल्क पर देश की है" "आज मैं जहाँ भी जाता हू बच्चे व बढे मुझे घेर लेतेहैं"
इन वाक्योंमें जिन शब्दों के नीचेरेखा खिंची है, उन्हे ध्यान से पढिए। हम इन शब्दों को योजक की सहायता से भी लिख सकते है, जैसे—हार-जीत, बच्चे-बूढ़े आदि आप नीचे दिए गए शब्दों को योजक की सहायता से लिखिए—
अच्छा या बुरा उत्तर और दक्षिण छोटा या बड़ा गुरु और शिष्य अमीर और गरीब अमृत या विष
बात पर बल देना
"मैने तो अपना बदला ले ही लिया है" "मैने तो अपना बदला ले लिया है"
इन दोनों वाक्यो मेंक्या अंतर है?ध्यान दीजिए और बताइए। सही पहचाना! दूसरे वाक्य में एक शब्द कम है। उस एक शब्द के न होने से वाक्य के अर्थ में भी थो़ा अंतर आ गया है हम अपनी बात पर बल देने के लिए कुछ विशेष शब्दों का प्रयोग करतेहैं जैसे— ही', भी', तो' आदि। पाठ में से इन शब्दों वाले वाक्यों को चुनकर लिखिए। ध्यान दीजिए कि यदि उन वाक्यों े ये शब्द न होते तो उनके अर्थ पर इसका क्या प्रभाव पड़ता।
पाठ से आगे
आपकी बात
(क) ध्यानचंदके स्थान पर आप होते तो क्या आप बदला लेते? यद हाँ, तो बताइए कि आप बदला किस प्रकार लेते?
(ख) आपको कौन-से खेल और कौन-से खिलाड़ी सबसे अधिक अच्छे लगते हैं? क्यों?
समाचार-पत्र से
(क) क्या आप समाचार-पत्रपढ़े है? समाचार-पतरोंे ्रतिदन खेलके समाचारों का एक पृष्ठ प्रकाशित होता है अपने घर यापुस्तकालय से पिछले सप्ताह के समाचार पत्रो को देखिए अपनी पसंद का एक खेल-समाचार अपनी लेखन पुस्तका में लिखिए।
(ख) मान लीजिए कि आप एक खेल-संवाददाता हैंऔर किसी खेल का आँखों देखा प्रसारण कर रहे हैं अपने समूह के साथ मिलकर कक्ा में उस खेल का आँखो देखा हाल प्स्तुत कीजिए (संकेत—इस कार् में आप आकाशवाणी या दुरदर्शन पर प्रसारित होने वाले खेल-प्रसारणों की कमेंटरी की शैली का उपयोग कर सकते है। बारी-बारी से प्रत्येक समूह कक्ा में सामने डेस्क या कुर्सियों पर बैठ जाएगा और पाँच मिनट के लिए किसी खेल के सजीव प्रसारण की कमेटरी का अभिनय करेगा।)
डायरी का प्रारंभ
कुछ लोग प्रतिदिन थोड़ी-थोड़ी बातें किसी स्थान पर लिख लेते हैं जो वे सोचते हैं, या जो उनके साथ उस दिन हुआ या जो उन्होंने देखा, उसे ईमानदारी से लिख लेते हैं या टाइप कर लेते हैं। इसे डायरी लिखना कहते हैं।
क्या आप भी अपने मन की बातों और विचारों को लिखना चाहते हैं? यदि हाँ, तो आज से ही प्रारंभ कर दीजिए—
आप जहाँ लिखेंगे, वह माध्यम चुन लीजिए। आप किसी लेखन-पुस्तका में या ऑनलाइन मंचों पर लिख सकते हैं
! आप प्रतिदिन, कुछ दनोंमें एक बार या जब कुछ लिखने का मन करे तब लिख सकते हैं शब्दों या वाक्यों की कोई सीमा नहींहै चाहे दो वाक्य हों या दो पृषछठा आप जो मन में आए उसे उचित और शालीन शब्दो में लिख सकते हैं।
आज की पहेली
यहाँ एक रोचक पहेली दी गई है। इसमें आपको तीन खिला़ी दिखाई दे रहे हैं। आपको पता लगाना है कि कौन-से खिलाड़ी द्वारा गोल किया जाएगा—

झरोखे से
आपने हाकी के बार में बहुत-कुछ बात की होगी। अब हम हॉकी जैसे ही अनोखे खेल के बारे मेंपढ़ंगे जिसे आप जैसे लाखों बच्चे अपने गली-मुहल्लों में खेलते हैं इस खेल का नाम है डाॉडी या गोथा।
डाॉडी या गोथा
यह भील-भिलाला बच्चों का खेल है 'डाडी' और 'गोथा' शब्द का अर्थ एक ही है खेलने की हाथ-लकड़ी। देखा जाए तो यह खेल काफी-कुछ हमारे राषटीय खेल हाकी जैसा है। अंतर बस इतना है कि हॉकी में गोल करने के लिए गोलपोस्ट होते हैं जबकि इस खेल में ऐसा कोई निधारण नहीं है। दूसरा अंतर यह है कि भील-भिलाला बच्चों की यह गेंद, हाकी की अपेक्षा एकदम साधारण होती है। यह बाँस की बनी होती है।
खेल सामग्री
- बॉस के गु्े की गंद जिसे "दुईइत' कहते हैं।
- गोथा' यानी अंग्रेजी के L अक्षर की तरह नीचे े मुड़ी हुई बाँस की डंडियाँ।
- राख से खेल के मैदा में सीमांकन करना और घे के भीतर एक छोटा वृत बनाना।
कैसे खेलें

.वैसे तो इसे चाहे जितने खिलाड़ी खेल सकते हैं मगर दोनों दलों में कम से कम दो-दो खिलाड़ी हों।
2. टॉस करना। टॉस जीतने वाला दल खेल प्रारंभ करेगा।
3. गेंद को छोटे घेरे या वत्त में रखना। हमला करने वाले दल के
खिलाड़ी खेल परभ होत ह बॉल को पीटते हु बचाव दल के दायर में दूर तक
ले जाना चाहते हैं
4. दोनों दलो के एक-एक खिलाड़ी अपनी-अपनी तरफ की डी में खड़े रहते हैं वे प्रयास करते हैं किगंद रेखा पार न करे।
5. खिलाड़ी डाडीयागोथा के दोनों ओर से खेल सकते हैं जबकि ऐसी सुविधा हाकी के खेल में नहीं है।
6. बाकी सारा खेल हाॉकी के खेल के समान होता है प्रशन उठता है कि इस खेल में गोलपोस्ट नहीं होते यानी गोल करने का मामला नहीं बनता, तो हार-जीत का निणय कैसे किया जाता है? उत्तर यह है कि जो दल गेद को अधिक से अधिक बार विरोधी के पाले में ढकेलता है, वही बलवान है और इसलिए विजयी भी
- खेल के दो विशेष नियम हैं पहला,गंद को शरीर के किसी भी अंग से न छूना, न रोकना। दूसरा, गेंद को हवाई शॉँट न मारना और न उसे हवा में शॉट खेलकर साथी खिलाड़ी को पास देना। बाकी लकड़ी से आप गेंद को रोक सकते हैं या हिट कर सकते हैं। आगे जैसा कि बता चुके हैं, जो दल बीच की रेखा को पार करके विरोधी दल के ्षत्रमें अधिक से अधिक दबाव या प्रवेश बनाए रखता है, वह विजयी होता है। विशेष-— यह खेल होली का त्योहार आने के कुछ दिन पहले से खेला जाता है। अंत में जिस दिन होलिका जलाई जात है, उस दिन ये दुइत और गोथे (गंद और डंडे) आग में डाल दिए जाते हैं।
साझी समझ
(क) आपने इस खेल के नियम पढ़कर अच्छी तरह समझ लिए हैं अब अपने मित्ों के साथ मिलकर 'डॉाडी' या गोथा' खेल खेलिए।
(ख) आप भी 'डॉडी' या 'गोथा' जैसे अनेक स्वदेशी खेल अपने मित्रो के साथ मिलकर अपने विद्यालय, घर या मोहल्ले में खेलते होंगे। अब आप ऐसे ही किसी एक खेल के नियम इस प्रकार से लिखिए कि उन्हे पढ़कर कोई भी बच्चा उस खेल को समझ सके और खेल सके
खोजबीन के लिए
नीचे ध्यानचंद जी के विषय मे कुछ सामग्री दी गई है जैसे— फिल्ें साक्षात्कार आदि, इन्हें पुस्तक में दिए गए क्यू.आर.कोड की सहायता से पढ़, देखें व समझे।
हॉकी के जादूग - मेजर ध्यानचंद - ्रक गाथाएँ
हॉकी के जादूगर- मेजर ध्यानचंद
ओलंपिक
• मेजर ध्यानचंद से साक्षात्कार
पढ़ने के लिए
एक दौड़ ऐसी भी
कई साल पहले ओलंपिक खेलों के दौरान एक विशेष दौड़ होने जा रही थी। सौ मीटर की इस
दौड़ में एक आश्चर्यजनक घटना हुई नौ प्रतिभागी आरभिक रेखा पर तैयार खड़े थे। उन सभी को
कोई-न-कोई शारीरिक विकलांगता थी। सीटी बजी, सभी दौड़ पड़ी। बहुत तीत्र तो नहीं, पर उनमें जीतने की होड़ अवश्य तेज़ थी।
सभी जीतने की उत्सुकता के साथ आगे बढ़। सभी, बस एक छोटे से लड़के को छोड़कर। तभी
छोटा लड़का ठोकर खाकर लड़खड़ाया, गिरा और रो पड़ा। उसकी पुकार सुनकर बाकी प्रतिभागी दौड़ना छोड़ देखने लगे कि क्या हुआ? फिर, एक-एक
करके वे सब उस बच्चे की सहायता के लिए उसके पास आने लगे। सब के सब लौट आए उसे
दोबारा खड़ा किया। उसके आँसू पोंछे, धूल साफ़ की। वह छोटा लड़का एक ऐसी बीमारी से
ग्रस्त था, जिसमें शरीर के अंगों की बढ़त धीमी होती है और उनमें तालमेल की कमी भी रहती है। फिर तो सोरे बच्चोंने एक-दूसरे का हाथ पकड़ा और साथ मिलकर दौड़ लगाई और सब के
सब अंतिम रेखा तक एक साथ पहुँच गए। दर्शक मंत्रमुगध होकर देखते रहे, इस प्रश्न के साथ कि
सब के सब एक साथ यह दौड़ जीते हैं इनमें से किसी एक को स्र्ण पदक कैसे दिया जा सकता
है? निणायकों ने सबको स्वर्ण पदक देकर समस्या का बढ़िया हल ढूढ़ निकाला। उस दिन मित्रता
का अनोखा दृश्य देख दर्शकों की तालियाँ थमने का नाम नहीं ले रही थीं।
