आखिरी चट्टान तक - CBSE Class 9 Hindi Notes

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Chapter Study Guide & Summary

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Key Concepts & Syllabus Topics

Important Definitions & Terminology

आखिरी चट्टान तक Overview
The central theme and foundational concept covered in Class 9 Hindi Chapter 5, emphasizing conceptual clarity, NCERT curriculum alignment, and exam readiness.
NCERT Curriculum Alignment
Structured study material adhering strictly to CBSE board guidelines, learning objectives, and standardized assessment criteria for Class 9.
Active Recall & Revision
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Quick Revision & Key Points

Full NCERT Chapter: आखिरी चट्टान तक

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मोहन राकेश

हिंदी साहित्य के बहुमुखी रचनाकार मोहन राकेश का जन्म सन् 1925 को अमृतसर, पंजाब में हुआ था। उन्होंने कहानी, उपन्यास, नाटक, डायरी लेखन, यात्रा-वृत्तांत आदि अनेक विधाओं में साहित्य सृजन किया। उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं— आषाढ़ का एक दिन, लहरों के राजहंस, आधे-अधूरे (नाटक), अंधेरे बंद कमरे, अंतराल, न आने वाला कल (उपन्यास), क्वार्टर तथा अन्य कहानियाँ, नए बादल, वारिस तथा अन्य कहानियाँ (कहानी-संग्रह), मोहन राकेश की डायरी (डायरी लेखन), आखिरी चट्टान तक (यात्रा-वृत्तांत) इत्यादि। आषाढ़ का एक दिन नाटक के लिए उन्हें ‘संगीत नाटक अकादमी’ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। कुछ समय तक उन्होंने सारिका नामक हिंदी पत्रिका का संपादन भी किया। उनके लेखन में भावों की गहराई के साथ-साथ आधुनिक जीवन की जटिलताओं और मानवीय संवेदनाओं का सूक्ष्म अंकन मिलता है। सन् 1972 को 48 वर्ष की अल्पायु में उनका निधन हो गया।

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‘आखिरी चट्टान तक’ एक रोचक यात्रा-वृत्तांत है जिसमें लेखक ने कन्याकुमारी की अपनी यात्रा के अनुभवों को व्यक्त किया है। यात्रा-वृत्तांत में बंगाल की खाड़ी, हिंद महासागर और अरब सागर के मिलन-स्थल पर स्थित कन्याकुमारी के प्राकृतिक दृश्यों का वर्णन सजीव ढंग से किया गया है। कन्याकुमारी के समुद्री तट के जीवन से साक्षात्कार होने पर लेखक केवल वहाँ की भौगोलिक और सांस्कृतिक सुंदरता का ही वर्णन नहीं करता बल्कि अपने मन में उठने वाली भावनाओं, विस्मय, रोमांच, शांति और आत्मिक खोज को भी व्यक्त करता है। यात्रा-वृत्तांत की भाषा सहज, प्रवाहपूर्ण और चित्रात्मक है जो पाठक के मन में दृश्यों को ऐसे जीवंत कर देती है कि पाठक को लगता है कि वह भी लेखक के साथ ही यात्रा कर रहा है। प्रकृति की भव्यता और मानव-मन की गहन अनुभूतियों को यह यात्रा-वृत्तांत एक साथ उजागर करता है।

आखिरी चट्टान तक:

कन्याकुमारी। सुनहले सूर्योदय और सूर्यास्त की भूमि।

केप होटल के आगे बने बाथ टैंक के बाईं तरफ, समुद्र के अंदर से उभरी स्याह चट्टानों में से एक पर खड़ा होकर मैं देर तक भारत के स्थल-भाग की आखिरी चट्टान को देखता रहा। पृष्ठभूमि में कन्याकुमारी के मंदिर की लाल और सफेद लकीरें चमक रही थीं। अरब सागर, हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी— इन तीनों के संगम-स्थल-सी वह चट्टान, जिस पर कभी स्वामी विवेकानंद ने समाधि लगायी थी, हर तरफ से पानी की मार सहती हुई स्वयं भी समाधिस्थ-सी लग रही थी। हिंद महासागर की ऊँची-ऊँची लहरें मेरे आस-पास की स्याह चट्टानों से टकरा रही थीं। बलखाती लहरें रास्ते की नुकीली चट्टानों से कटती हुई आती थीं जिससे उनके ऊपर चूरा बूँदों की जालियाँ बन जाती थीं। मैं देख रहा था और अपनी पूरी चेतना से महसूस कर रहा था— शक्ति का विस्तार, विस्तार की शक्ति। तीनों तरफ से क्षितिज तक पानी-ही-पानी था, फिर भी सामने का क्षितिज, हिंद महासागर का, अपेक्षया अधिक दूर और अधिक गहरा जान पड़ता था। लगता था कि उस ओर दूसरा छोर है ही नहीं। तीनों ओर के क्षितिज को आँखों में समेटता मैं कुछ देर भूला रहा कि मैं मैं हूँ, एक जीवित व्यक्ति, दूर से आया यात्री, एक दर्शक। उस दृश्य के बीच में जैसे दृश्य का एक हिस्सा बनकर खड़ा रहा— बड़ी-बड़ी चट्टानों के बीच एक छोटी-सी चट्टान। जब अपना होश हुआ, तो देखा कि मेरी चट्टान भी तब तक बढ़ते पानी में काफी घिर गई है। मेरा पूरा शरीर सिहर गया। मैंने एक नजर फिर सामने के उमड़ते विस्तार पर डाली और पास की एक सुरक्षित चट्टान पर कूदकर दूसरी चट्टानों पर से होता हुआ किनारे पर पहुँच गया।

पच्चीमी क्षितिज में सूर्य धीरे-धीरे नीचे जा रहा था। मैं सूर्यास्त की दिशा में चलने लगा। दूर पच्चीमी तट-रेखा के एक मोड़ पर पीली रेत का एक ऊँचा टीला नजर आ रहा था। सोचा उस टीले पर जाकर सूर्यास्त देखूँगा।

यात्रियों की कितनी ही टोलियाँ उस दिशा में जा रही थीं। हम लोग टीले पर पहुँच गए। यह वह ‘सैंड हिल’ थी जिसकी चर्चा मैं वहाँ पहुँचने के बाद से ही सुन रहा था। सैंड हिल पर बहुत से लोग थे। आठ-दस नवयुवतियाँ, छह-सात नवयुवक और दो-तीन गाँधी टोपियों वाले व्यक्ति। वे शायद सूर्यास्त देख रहे थे। गवर्नमेंट गेस्ट हाउस के बैंरे उन्हें सूर्यास्त के समय की कॉफी पिला रहे थे। उन लोगों के वहाँ होने से सैंड हिल बहुत रंगीन हो उठी थी। कन्याकुमारी

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का सूर्यास्त देखने के लिए उन्होंने विशेष रुचि के साथ सुंदर रंगों का रेशम पहना था। हवा समुद्र की तरह उस रेशम में भी लहरें पैदा कर रही थी। कुछ युवतियाँ वहाँ आकर थकी-सी एक तरफ बैठ गईं— उस पूरे कैनवस में एक तरफ छिटके हुए कुछ बिंदुओं की तरह। उनसे कुछ दूर पर एक रंगहीन बिंदु, मैं, ज्यादा देर अपनी जगह स्थिर नहीं रह सका। सैंड हिल से सामने का पूरा विस्तार तो दिखाई दे रहा था, पर अरब सागर की तरफ एक और ऊँचा टीला था जो उधर के विस्तार को ओट में लिए था। सूर्यास्त पूरे विस्तार की पृष्ठभूमि में देखा जा सके, इसके लिए मैं कुछ देर सैंड हिल पर रुका रहकर आगे उस टीले की तरफ चल दिया। पर रेत पर अपने अकेले कदमों को घसीटता वहाँ पहुँचा, तो देखा कि उससे आगे उससे भी ऊँचा एक और टीला है। जल्दी-जल्दी चलते हुए मैंने एक के बाद एक कई टीले पार किए। टाँगें थक रही थीं पर मन थकने को तैयार नहीं था। हर अगले टीले पर पहुँचने पर लगता कि शायद अब एक ही टीला और है, उस पर पहुँचकर पच्चीसवी क्षितिज का खुला विस्तार अवश्य नजर आएगा। और सचमुच एक टीले पर पहुँचकर वह खुला विस्तार सामने फैला दिखाई दे गया— वहाँ से दूर तक एक रेत की लंबी ढलान थी, जैसे वह टीले से समुद्र में उतरने का रास्ता हो। सूर्य तब पानी से थोड़ा ही ऊपर था। अपने प्रयत्न की सार्थकता से संतुष्ट होकर मैं टीले पर बैठ गया— ऐसे जैसे वह टीला संसार की सबसे ऊँची चोटी हो, और मैंने, सिर्फ मैंने, उस चोटी को पहली बार सर किया हो।

पीछे दाईं तरफ दूर-दूर हटकर उगे नारियलों के झुरमुट नजर आ रहे थे। गूँजती हुई तेज हवा से उनकी टहनियाँ ऊपर को उठ रही थीं। पच्चीसवी तट के साथ-साथ सूखी पहाड़ियों की एक शृंखला दूर तक चली गई थी जो सामने फैली रेत के कारण बहुत रूखी, बीहड़ और वीरान

img-0.jpeg https://commons.wikimedia.org/wiki/File:Vivekananda_Kosh_Memorial_ar_Sunnae.PM Author : Infocenter

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आखिरी चट्टान तक 87

लग रही थी। सूर्य पानी की सतह के पास पहुँच गया था। सुनहली किरणों ने पीली रेत को एक नया-सा रंग दे दिया था। उस रंग में रेत इस तरह चमक रही थी जैसे अभी-अभी उसका निर्माण करके उसे वहाँ उड़िला गया हो। मैंने उस रेत पर दूर तक बने अपने पैरों के निशानों को देखा। लगा जैसे रेत पहली बार उन निशानों से टूटा हो। इससे मन में एक सिहरन भी हुई, हल्की उदासी भी घिर आई।

सूर्य का गोला पानी की सतह से छू गया। पानी पर दूर तक सोना-ही-सोना ढुल आया। पर वह रंग इतनी जल्दी-जल्दी बदल रहा था कि किसी भी एक क्षण के लिए उसे एक नाम दे सकना असंभव था। सूर्य का गोला जैसे एक बेबसी में पानी के लावे में डूबता जा रहा था। धीरे-धीरे वह पूरा डूब गया और कुछ क्षण पहले जहाँ सोना बह रहा था, वहाँ अब लहू बहता नजर आने लगा। कुछ और क्षण बीतने पर वह लहू भी धीरे-धीरे बैजनी और बैजनी से काला पड़ गया। मैंने फिर एक बार मुड़कर दाईं तरफ पीछे देख लिया। नारियलों की टहनियाँ उसी तरह हवा में ऊपर उठी थीं। हवा उसी तरह गूँज रही थी, पर पूरे दूष्यपट पर स्याही फैल गई थी। एक-दूसरे से दूर खड़े झुरमुट, स्याह पड़कर, जैसे लगातार सिर धुन रहे थे और हाथ-पैर पटक रहे थे। मैं अपनी जगह से उठ खड़ा हुआ और अपनी मुट्ठियाँ भींचता-खोलता कभी उस तरफ और कभी समुद्र की तरफ देखता रहा।

अचानक खयाल आया कि मुझे वहाँ से लौटकर भी जाना है। इस खयाल से ही शरीर में कैंपकैपी भर गई। दूर सैंड हिल की तरफ देखा। वहाँ स्याही में डूबे कुछ धुंधले रंग हिलते नजर आ रहे थे। मैंने रंगों को पहचानने की कोशिश की, पर उतनी दूर से आकृतियों को अलग-अलग कर सकना संभव नहीं था। मेरे और उन रंगों के बीच स्याह पड़ती रेत के कितने ही टीले थे। मन में डर समाने लगा कि क्या अँधेरा होने से पहले मैं उन सब टीलों को पार करके जा सकूँगा? कुछ कदम उस तरफ बढ़ा भी पर लगा कि नहीं! उस रास्ते से जाऊँगा, तो शायद रेत में ही भटकता रह जाऊँगा। इसलिए सोचा बेहतर है नीचे समुद्र तट पर उतर जाऊँ— तट का रास्ता निश्चित रूप से केप होटल के सामने तक ले जाएगा। निर्णय तुरंत करना था, इसलिए बिना और सोचे मैं रेत पर बैठकर नीचे तट की तरफ फिसल गया। पर तट पर पहुँचकर फिर कुछ क्षण बढ़ते अँधेरे की बात भूला रहा। कारण था तट की रेत। यूँ पहले भी समुद्र-तट पर कई-कई रंगों की रेत देखी थी— सुरमई, खाकी, पीली और लाल। मगर जैसे रंग उस रेत में थे, वैसे मैंने पहले कभी कहीं की रेत में नहीं देखे थे। कितने ही अनाम रंग थे वे। एक-एक इंच पर एक-दूसरे से अलग... और एक-एक रंग कई-कई रंगों की झलक लिए हुए। काली घटा और घनी लाल आँधी को मिलाकर रेत के आकार में ढाल देने से रंगों के जितनी तरह के अलग-अलग सम्मिश्रण पाए जा सकते थे, वे सब वहाँ थे— और उनके अतिरिक्त भी बहुत-से

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रंग थे। मैंने कई अलग-अलग रंगों की रेत को हाथ में लेकर देखा और मसलकर नीचे गिर जाने दिया। जिन रंगों को हाथों से नहीं छू सका, उन्हें पैरों से मसल दिया। मन था कि किसी तरह हर रंग की थोड़ी-थोड़ी रेत अपने पास रख लूँ। पर उसका कोई उपाय नहीं था। यह सोचकर कि फिर किसी दिन आकर उस रेत को बटोरूँगा, मैं उदास मन से वहाँ से आगे चल दिया। समुद्र में पानी बढ़ रहा था। तट की चौड़ाई धीरे-धीरे कम होती जा रही थी। एक लहर मेरे पैरों को भिगो गई, तो सहसा मुझे खतरे का एहसास हुआ। मैं जल्दी-जल्दी चलने लगा। तट का सिर्फ तीन-तीन चार-चार फुट हिस्सा पानी से बाहर था। लग रहा था कि जल्दी ही पानी उसे भी अपने अंदर समा लेगा। एक बार सोचा कि खड़ी रेत से होकर फिर ऊपर चला जाऊँ। पर वह स्याह पड़ती रेत इस तरह दीवार की तरह उठी थी कि उस रास्ते ऊपर जाने की कोशिश करना ही बेकार था। मेरे मन में खतरा बढ़ गया। मैं दौड़ने लगा। दो-एक और लहरें पैरों के नीचे तक आकर लौट गईं। मैंने जूता उतारकर हाथ में ले लिया। एक ऊँची लहर से बचकर इस तरह दौड़ा जैसे सचमुच वह मुझे अपनी लपेट में लेने आ रही हो। सामने एक ऊँची चट्टान थी। वक्त पर अपने को संभालने की कोशिश की, फिर भी उससे टकरा गया। बाँहों पर हल्की खरोंच आ गई, पर ज्यादा चोट नहीं लगी। चट्टान पानी के अंदर तक चली गई थी— उसे बचाकर आगे जाने के लिए पानी में उतरना आवश्यक था। पर उस समय पानी की तरफ पाँव बढ़ाने का मेरा साहस नहीं हुआ। मैं चट्टान की नोकों पर पैर रखता किसी तरह उसके ऊपर पहुँच गया। सोचा नीचे खड़े रहने की अपेक्षा वह अधिक सुरक्षित होगा। पर ऊपर पहुँचकर लगा जैसे मेरे साथ एक मजाक किया गया हो। चट्टान के उस तरफ तट का खुला फैलाव था— लगभग सौ फुट का। कितने ही लोग वहाँ टहल रहे थे। ऊपर सड़क पर जाने के लिए वहाँ से रास्ता भी बना था। मन से डर निकल जाने से मुझे अपने आप काफी हल्का लगा और मैं चट्टान से नीचे कूद गया।

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रात केप होटल का लॉन। अँधेरे में हिंद महासागर को काटती कुछ स्याह लकीरें— एक पौधे की टहनियाँ। नीचे सड़क पर टार्च जलाता-बुझाता एक आदमी। दक्षिण-पूर्व के ध्वितिज में एक जहाज की मद्धिम-सी रोशनी।

सूर्योदय। हम आठ आदमी ‘विवेकानंद चट्टान’ पर बैठे थे। चट्टान तट से सौ-सवा-सौ गज आगे समुद्र के बीच जाकर है— वहाँ, जहाँ बंगाल की खाड़ी की भौगोलिक सीमा समाप्त होती है। मेरे अलावा कन्याकुमारी के तीन नवयुवक थे जिनमें से एक प्रेजुएट था। चार मल्लाह थे जो एक छोटी-सी मछुआ नाव में हमें वहाँ लाए थे। नाव क्या थी, रबड़ पेड़ के तीन तनों को साथ-साथ जोड़ लिया गया था, बस। नीचे की नुकीली चट्टानों और ऊपर की ऊँची-ऊँची लहरों से बचाते हुए मल्लाह नाव को उस तरफ ला रहे थे, तो मैंने आसमान की तरफ देखते हुए उतनी देर अपनी चेतना को स्थगित रखने की चेष्टा की थी, अपने अंदर के डर को दिखावटी उदासीनता से ढक रखना चाहा था। पर जब चट्टान पर पहुँच गए, तो डर मेरी टांगों में उतर गया क्योंकि वहाँ बैठे हुए भी वे हल्के-हल्के काँप रही थीं।

प्रेजुएट नवयुवक मुझे बता रहा था कि कन्याकुमारी की आठ हजार की आबादी में कम-से-कम चार-पाँच सौ शिक्षित नवयुवक ऐसे हैं जो बेकार हैं। उनमें से सौ के लगभग प्रेजुएट हैं। उनका मुख्य धंधा है नौकरियों के लिए अर्जियाँ देना और बैठकर आपस में बहस करना। वह खुद वहाँ फोटो-एल्बम बेचता था। दूसरे नवयुवक भी उसी तरह के छोटे-मोटे काम करते थे। “हम लोग सीपियों का गूदा खाते हैं और दार्शनिक सिद्धांतों पर बहस करते हैं”, वह कह रहा था। “इस चट्टान से इतनी प्रेरणा तो हमें मिलती ही है।” मुझे दिखाने के लिए उसने वहीं से एक सीपी लेकर उसे तोड़ा और उसका गूदा मुँह में डाल लिया।

पानी और आकाश में तरह-तरह के रंग झिलमिलाकर, छोटे-छोटे द्वीपों की तरह समुद्र में बिखरी स्याह चट्टानों की ओट से सूर्य उदित हो रहा था। घाट पर बहुत-से लोग उगते सूर्य को अर्ध्य देने के लिए एकत्रित थे। घाट से थोड़ा हटकर गवर्नमेंट गेस्ट हाउस के बैंरे सरकारी मेहमानों को सूर्योदय के समय की कॉफी पिला रहे थे। दो स्थानीय नवयुवतियाँ उन्हें अपनी टोकरियों से शंख और मालाएँ दिखला रही थीं। वे लोग दोनों काम साथ-साथ कर रहे थे— मालाओं का मोल-तोल और अपने बाइनाक्यूलर्ज से

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सूर्य-दर्शन। मेरा साथी अब मुहल्ले-मुहल्ले के हिसाब से मुझे बेकारी के आँकड़े बता रहा था। बहुत-से कड़ल-काक हमारे आस-पास तैर रहे थे— वहाँ की बेकारी की समस्या और सूर्योदय की विशेषता, इन दोनों से बे-लागा।

कन्याकुमारी के मंदिर में पूजा की घंटियाँ बज रही थीं। भक्तों की एक मंडली अंदर जाने से पहले मंदिर की दीवार के पास रुककर उसे प्रणाम कर रही थी। सरकारी मेहमान गेस्ट-हाउस की तरफ लौट रहे थे। हमारी नाव और किनारे के बीच हल्की धूप में कई एक नावों के पाल और कड़ल-काकों के पंख एक-से चमक रहे थे। मैं अब भी आँखों से बीच की दूरी नाप रहा था और मन में बसों का टाइम-टेबल दोहरा रहा था। तीसरी बस नौ चालीस पर, चौथी...।

अभ्यास

एचना से संवाद

मेरे उत्तर मेरे तर्क

निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं?

  1. लेखक ने सूर्यास्त का मनोहारी दृश्य कहाँ से देखा? (क) विवेकानंद चट्टान से (ख) अरब सागर की ओर के ऊँचे टीले से (ग) पच्चीमी क्षितिज से (घ) सैंड हिल से

  2. “मैं कुछ देर भूला रहा कि मैं मैं ही हूँ!” यह कथन लेखक की किस मनःस्थिति को दर्शाता है? (क) मौन हो जाना (ख) विस्मित हो जाना (ग) भ्रमित हो जाना (घ) आशांकित होना

  3. “मैंने, सिर्फ मैंने उस चोटी को पहली बार सर किया हो।” इस कथन में कौन-सा भाव व्यक्त होता है? (क) करुणा (ख) विनम्रता

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(ग) आत्मीयता (घ) संतुष्टि

  1. “शक्ति का विस्तार, विस्तार की शक्ति” वाक्य में वर्णन है— (क) बलखाती लहरों का (ख) सागर की व्यापकता का (ग) सूर्यास्त के दृश्य का (घ) पच्चीमी क्षितिज का

  2. लेखक की कन्याकुमारी की यात्रा का वर्णन पढ़कर कहा जा सकता है कि— (क) यह कन्याकुमारी के मौसम को प्रमुखता से वर्णित करता है। (ख) यह यात्रा को जीवंत अनुभूतियों से जोड़ता है। (ग) यह केवल यात्रा के रोमांच पर केंद्रित है। (घ) इसमें कन्याकुमारी का काल्पनिक वर्णन मिलता है।

मेरी समझ मेरे विचार

नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए—

  1. यात्रियों का समूह सूर्यास्त का दृश्य देखने के लिए सैंड हिल की ओर बढ़ता जा रहा था लेकिन लेखक सैंड हिल पर पहुँचकर कुछ देर रुकने के बाद दूसरे टीले की ओर बढ़ने लगा। उसके ऐसा करने के पीछे मूल कारण क्या था?
  2. लेखक ने कन्याकुमारी के स्थानीय लोगों के विषय में क्या-क्या बताया?
  3. “अपने प्रयत्न की सार्थकता से संतुष्ट होकर मैं टीले पर बैठ गया” इस पंक्ति में ‘प्रयत्न की सार्थकता’ से क्या अभिप्राय है?
  4. यात्रा-वृत्तांत में आए उन दृश्यों के विषय में लिखिए जिनका अनुभव लेखक के लिए बिल्कुल नया था।
  5. यात्रा-वृत्तांत से ऐसे दो अंश चुनकर लिखिए जिससे लेखक की मानसिक दृढ़ता और हार न मानने की प्रवृत्ति का पता चलता है।

विद्या से संवाद

यात्रा का वृत्तांत

मोहन राकेश का ‘आखिरी चट्टान तक’ यात्रा-वृत्तांत केवल स्थान-चित्रण नहीं है बल्कि इसमें प्रकृति का सजीव रूपांकन, मानव-जीवन और समाज की झलक तथा आत्मानुभूति का गहरा समन्वय मिलता है।

92 गंगा

नीचे यात्रा-वृत्तांत के प्रमुख तत्वों/विशेषताओं को कुछ प्रमुख बिंदुओं के माध्यम से दर्शाया गया है। इन्हें पढ़कर यात्रा-वृत्तांत की रचना-प्रक्रिया को समझने का प्रयास कीजिए। अपनी किसी यात्रा को इन बिंदुओं के माध्यम से समझाइए।

  1. दृश्य-वर्णन
  • समुद्र, चट्टानें
  • लहरों का चित्रण
  • रंग, आकाश, रेत का जीवंत चित्रण
  1. आत्मानुभूति व भावनाएँ
  • विस्मय, रोमांच, भय, आत्म-संवेदना
  • अपने अस्तित्व का बोध
  • प्रकृति से संवाद
  1. सांस्कृतिक परिप्रेक्ष्य
  • विवेकानंद चट्टान
  • स्थानीय लोग, नवयुवक, शिक्षा
  • धार्मिक परंपराएँ (मंदिर, अच्य्य)
  1. जीवन-दर्शन
  • शक्ति का विस्तार, विस्तार की शक्ति
  • आत्म-चेतना
  • क्षणभंगुरता व उदासी
  1. शैलीगत विशेषताएँ
  • सजीव, प्रवाहपूर्ण भाषा
  • दृश्यात्मकता
  • रूपक, उपमा, प्रतीक
  • रंगों का भावात्मक प्रयोग
  1. रोमांच व संघर्ष
  • लहरों से संघर्ष
  • अँधेरे में भटकने का भय
  • सुरक्षित लौटने की चिंता

विषयों से संवाद

यात्रा और खोज

संसार में बहुत से लोगों ने लंबी-लंबी यात्राएँ की हैं और अपनी यात्रा से अर्जित ज्ञान और अनुभव से समाज को समृद्ध किया है। पुस्तकालय एवं शिक्षक की सहायता से कुछ महत्वपूर्ण यात्रा-वृत्तांत और उनके लेखकों के विषय में जानकारी एकत्रित कीजिए और लिखिए। आपकी सहायता के लिए एक संकेत नीचे दिया गया है।

यात्रा-वृत्तांत स्थान रचनाकार
किन्नर देश में हिमाचल प्रदेश में स्थित किन्नौर राहुल सांकृत्यायन

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मेरे देश की धरती

कन्याकुमारी भारत के तमिलनाडु राज्य में स्थित एक तटीय शहर है जिसके प्राकृतिक सौंदर्य का चित्रण पाठ में हुआ है।

  1. भारत के समुद्री तट पर स्थित अन्य राज्यों के नाम तथा उनकी अवस्थिति को भारत के मानचित्र पर चिह्नित कीजिए।
  2. यात्रा करना सभी को अच्छा लगता है। आपके मन में भी कुछ जगहों को देखने की इच्छा अवश्य हुई होगी। अपनी पसंद की उन जगहों की सूची नीचे दिए गए शीर्षकों के अनुसार बनाइए।
पर्यटन स्थल राज्य जहाँ वह स्थित है पर्वतीय/समुद्री/ मैदानी/अन्य क्षेत्र जलवायु घूमने का अनुकूल समय
  1. कन्याकुमारी की भौगोलिक स्थिति, परिवेश, महत्वपूर्ण पर्यटन स्थल एवं जन-जीवन का वर्णन करते हुए बताइए कि वहाँ की स्थिति आपके राज्य अथवा शहर/गाँव से किस प्रकार भिन्न है?
  2. इस यात्रा-वृत्तांत में कन्याकुमारी में स्थित चट्टान को आखिरी चट्टान कहा गया है। पुस्तकालय या अन्य स्रोतों तथा समाज विज्ञान के अपने शिक्षक से बातचीत करके पता लगाइए कि वर्तमान समय में भारत का अंतिम छोर (दक्षिणतम बिंदु) किसे माना जाता है। उस स्थान के विषय में लिखिए।
  3. इंटरनेट या अन्य किन्हीं माध्यमों से पता लगाइए कि आखिरी चट्टान में वर्णित कन्याकुमारी के विवेकानंद स्मारक चट्टान के स्वरूप में किस प्रकार का विस्तार हुआ है?

(संकेत – तिरुवल्लुवर की प्रतिमा इत्यादि)

हस्तशिल्प कौशल

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“दो स्थानीय नवयुवतियाँ उन्हें अपनी टोकरियों से शंख-मालाएँ दिखला रही थीं।”

उपर्युक्त पंक्ति में स्थानीय युवतियों द्वारा यात्रियों को दिखाए जाने वाली शंख-मालाओं का उल्लेख है। यह भारतीय हस्तकला उद्योग के एक पारंपरिक रूप को दर्शाता है, जहाँ स्थानीय कारीगर घरेलू स्तर पर उत्पाद बनाते और बेचते हैं। शिक्षक की सहायता से हस्तकला और कुटीर उद्योग के विषय में जानकारी एकत्रित कीजिए।

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  1. किसी भी स्थानीय शिल्पकार से बात करके निम्नलिखित बिंदुओं पर जानकारी संगृहीत कीजिए। यह कार्य दो-दो के जोड़े में कीजिए—
  • शिल्प का नाम
  • यह कार्य कब से कर रहे हैं?
  • इसका प्रशिक्षण कहाँ से लिया?
  • शिल्प निर्माण में घर की महिलाओं की साझेदारी
  • प्रयुक्त सामग्री, तकनीक, लागत और विपणन
  • औपचारिक संस्थागत प्रशिक्षण

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  1. डिजिटल खरीददारी और ई-वाणिज्य कुटीर उद्योग को बढ़ावा देने में किस प्रकार उपयोगी है?
  2. हस्तशिल्प कला को बढ़ावा देने के लिए सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों की जानकारी इकट्ठा कीजिए और अपनी कक्षा में उस पर चर्चा कीजिए।

मिलकर चलें

आपकी कक्षा में कुछ विशेष आवश्यकता वाले साथी भी होंगे जिन्हें अपने दैनिक जीवन में अनेक तरह की समस्याओं से जूझना पड़ता होगा।

  1. ऐसे साथियों को अगर किसी यात्रा पर जाना हो तो उनके समक्ष किस प्रकार की चुनौतियाँ आ सकती हैं?
  2. उनकी विशिष्ट आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर कुछ ऐसे सुझाव दीजिए जो उनकी यात्रा को सहज बनाने में उपयोगी हों।
  3. अपने द्वारा दिए गए सुझावों पर विद्यालय के विशेष शिक्षा शिक्षक के साथ चर्चा कीजिए और समझिए कि आपके द्वारा सुझाए गए उपाय कितने प्रभावी हैं तथा उनमें और क्या बदलाव किए जा सकते हैं?
  4. प्राप्त सुझावों के विषय में कक्षा के विशेष आवश्यकता वाले साथियों से भी चर्चा कीजिए और उनकी राय जानने का प्रयास कीजिए।

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प्रकृति की ओर

क्या आपने कभी सूर्योदय और सूर्यास्त के समय का दृश्य देखा है? अगर नहीं तो एक दिन सुबह जल्दी उठकर उगते सूरज की लालिमा को देखिए और अस्त होते सूर्य के साथ शाम का भी आनंद लीजिए। अब इन दोनों दृश्यों की तुलना करते हुए अपने अनुभव का वर्णन कीजिए।

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अनुभव की साझेदारी

विधा से संवाद के अंतर्गत आपने दिए गए बिंदुओं के माध्यम से यात्रा-वृत्तांत के प्रमुख तत्वों के विषय में जाना और समझा। इन तत्वों को ध्यान में रखकर आप भी अपने घूमे हुए किसी प्रिय स्थान के अनुभवों पर एक यात्रा-संस्मरण लिखिए।

चर्चा-परिचर्चा

  • ‘यात्राएँ हमें समृद्ध करती हैं’ विषय पर कक्षा में एक परिचर्चा आयोजित कीजिए।
  • “एक लहर मेरे पैरों को भिगो गई तो सहसा मुझे खतरे का एहसास हुआ।”

यात्रा के दौरान कई बार ऐसी अप्रत्याशित चुनौतियाँ सामने आ जाती हैं। ऐसी किसी स्थिति का सामना करने के लिए व्यक्ति में किन गुणों का होना आवश्यक है? अपने सहपाठियों के साथ मिलकर इस विषय पर चर्चा कीजिए।

  • यदि आपके पास भी कोई ऐसा अनुभव हो तो उसे अपने सहपाठियों के साथ साझा कीजिए।

भाषा से संवाद

व्याकरण की बात

क्रिया-विशेषण की पहचान और रेखांकन

“समुद्र में पानी बढ़ रहा था। तट की चौड़ाई धीरे-धीरे कम होती जा रही थी।”

उपर्युक्त वाक्य में रेखांकित पद ‘धीरे-धीरे’ कम होना क्रिया की विशेषता बता रहा है। यहाँ कम होने की क्रिया धीमी गति से हो रही है।

जिस प्रकार संज्ञा या सर्वनाम की विशेषता बताने वाले शब्द ‘विशेषण’ कहलाते हैं, उसी प्रकार क्रिया की विशेषता बताने वाले शब्द ‘क्रिया-विशेषण’ कहलाते हैं। इस वाक्य में ‘धीरे-धीरे’ पद व्याकरणिक दृष्टि से क्रिया-विशेषण है।

नीचे दिए गए वाक्यों को ध्यानपूर्वक पढ़कर उनमें क्रिया-विशेषण पदों की पहचान कीजिए तथा दिए गए उदाहरण के अनुसार लिखिए।

वाक्य

(क) बल खाती लहरे रास्ते की नुकीली चट्टानों से कटती हुई आती थीं।

(ख) यात्रियों की कितनी ही टोलियाँ उस दिशा में जा रही थीं।

(ग) मैं देर तक भारत के स्थल-भाग की आखिरी चट्टान को देखता रहा।

उदाहरण—
वाक्य क्रिया-विशेषण क्रिया, जिसकी विशेषता बताई जा रही है
मैं जल्दी-जल्दी चलने लगा। जल्दी-जल्दी ‘चलने लगा’ क्रिया की विशेषता

96 गंगा

आओ नए वाक्य बनाएँ

पाठ से चुनकर कुछ वाक्य नीचे तालिका में दिए गए हैं। इन वाक्यों में रेखांकित शब्दों का अर्थ बताते हुए उनसे नए वाक्य बनाइए।

वाक्य
तीनों तरफ से क्षितिज तक पानी-पानी था।
पीछे दाईं तरफ दूर-दूर हटकर नारियलों के झरमुट नजर आ रहे थे।
दूर तक एक रेत की लंबी ढलान थी।
पच्चीमी तट के साथ-साथ सूखी पहाड़ियों की एक शृंखला दूर तक चली गई थी।
सामने फैली रेत के कारण बहुत रूखी, बीहड़ और वीरान लग रही थी।

1. भतिविधियाँ

  1. कल्पना कीजिए कि आप अपने परिवार के साथ कहीं घूमने गए हैं। वहाँ आपकी भेंट एक ऐसे यात्री से होती है जिसे आपकी सहायता की आवश्यकता है लेकिन आप दोनों एक-दूसरे की भाषा से अपरिचित हैं। ऐसे में उस अनजान यात्री की सहायता आप कैसे करेंगे?
  2. पधारो म्हारे देश अपने क्षेत्र के महत्वपूर्ण पर्यटन स्थलों की एक सूची बनाइए और उनकी विशेषताओं को ध्यान में रखकर एक विवरणिका (ब्रॉशर) तैयार कीजिए।

भाषा संगम

“ऊँची-ऊँची लहरों से बचाते हुए मल्लाह नाव को ला रहे थे”

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‘नाव’ शब्द के लिए संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित कुछ भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त शब्दों की सूची आगे दी गई है।

आखिरी चट्टान तक 97

नाव (हिंदी); नौ, नौका (संस्कृत); बेड़ी (पंजाबी); किश्ती, नाव (उर्दू); नाव (कश्मीरी); बेड़ी, किश्ती (सिंधी); होड़ी, नाव (मराठी); नाव, होड़ी (गुजराती); बहड़ी (कोंकणी); नाउ, नौका, डुड़ा (नेपाली); नाओ, नौका (बांग्ला); नाओ (असमिया); हि (मणिपुरी); नौका, नाआ (ओड़िआ); पडव, नाव (तेलुगू); ओडम् (तमिल); तोणि (मलयालम); दोणि (कन्नड़)।

  • इनके अतिरिक्त यदि आप ‘नाव’ शब्द को किसी और भाषा में भी जानते हैं तो उस भाषा में भी लिखिए।
  • उपर्युक्त वाक्य को अपनी मातृभाषा में भी लिखिए।

https://shabd.education.gov.in/lexicon.jsp

अरोखे से

आपने ‘आखिरी चट्टान तक’ रचना पढ़ी जो दक्षिण भारत की यात्रा पर आधारित है। आइए, अब पढ़ते हैं हिंदी के प्रसिद्ध रचनाकार निर्मल वर्मा का कुंभ मेले पर आधारित यात्रा-वृत्तांत का एक अंश—

प्रयाग : 1976

मुंह अँधेरे सीटी सुनाई देती है— घनी नींद में सुराख बनाती हुई। एक क्षण पता नहीं चलता, मैं कहाँ हूँ, किस जगह हूँ, कौन-सा समय है? आँखें खुलती हैं, तो देस-सा अँधेरा गटगट पीने लगती हैं, जैसे मुंह की प्यास आँखें बुझा रही हैं। याद आता है मेरे नीचे मेरा स्लीपिंग बैग है, मेरी यात्राओं और यातनाओं को ढोता हुआ। मैं जाग गया हूँ— लेकिन मेरी समूची देह गरमाई के घेरे में सो रही है।

कुछ देर बाद आँखें अँधेरे में टोहती हुई एक एक चीज पर ठहर जाती हैं— किताब, तिपाई, लालटेन, फूस का अधखुला दरवाजा, हवा में सरसराती छत। बाहर एक फुसफुसाता हुआ शोर है— रेगती हुई आवाज़ों का रेला— जैसे हजारों पैर रेत को थपथपाते हुए चल रहे हैं। मैं हड़बड़ाकर अपना स्लीपिंग बैग समेटता हूँ। हाथों में रेत, मिट्टी, फूस के पत्तों को ठेलता हुआ दरवाजा खोलता हूँ, तो ठिठका-सा रह जाता।

चाँद दिखाई देता है। पूर्णिमा का पूरा चाँद, इलाहाबाद के किले पर ऊँघता हुआ। पिछली रात उसे गंगा के भीतर देखा था— एक सफेद परछाई, एक झिलमिला-सा स्वन्न— अब समूची रात की यात्रा में थका हुआ वह किले के माथे पर चिपका था, एक गोल, सफेद, मुरझाई बिंदी जिसे सिर्फ एक अँगुली से पोंछा जा सकता था।

“आप जाग गए?”

98 गंगा

सच्चे महाराज का चौकीदार मुझे देखकर कुछ हैरान-सा हो जाता है। दरअसल जब से मैं आया हूँ, वह मुझ पर हैरान है। वह उन्नीस-बीस वर्ष का युवक, जो शायद बचपन में ही आश्रम में बस गया था। मैं जहाँ कहीं भी होता हूँ, वह अपनी फैली फटी-फटी आँखों से मुझे निहारता है— मैं क्या हूँ, यह वह नहीं समझ पाता, न मैं तीर्थयात्री लगता हूँ, न कल्पवासी— मैं उसे आधा हिप्पी, आधा जिप्सी- सा दिखाई देता हूँगा— जो अपने पाप-पुण्यों को एक डफल बैग में समेटकर कुंभ मेले में भटकता है।

“आप भी संगम जाएँगे?”

उसने संदेह से मेरी ओर देखा।

“हाँ, इसीलिए आया हूँ” मैंने कहा। “यह सीटी कौन बजा रहा है?”

“पुलिस” उसने कहा। “यात्रियों को रास्ता दिखाना पड़ता है— बेचारे अंधेरे में भटक जाते हैं।” दबी ठिठुरती आवाज़ें, भजन की कुछ पंक्तियाँ ठंडी रेत और भूरी चाँदनी पर उठती हैं, किसी बूढ़े स्नानार्थी का काँपता स्वर हवा में बहुत दूर तक रिरियाता रहता है। मैं पंप को ढूँढ़ता हुआ आश्रम का चक्कर लगाता हूँ। लगता है सब सो रहे हैं। हवा में खाली झोपड़ों के दरवाजे सरसराते हैं, खुलते हैं, बंद हो जाते हैं। सब कुटियों से अलग सच्चे महाराज की यज्ञशाला दिखाई देती है— पीले फूल के मंडप, एक छत पर दूसरी छत— जैसे कोई जापानी पैगोड़ा चाँदनी में चमक रहा हो।

कुंभ मेले के वृत्तांत का यह अंश आपको रोचक लगा? अब इस यात्रा-वृत्तांत को इंटरनेट, पुस्तकालय से ढूँढ़कर पूरा पढ़िए।

खोजबीन

  • इस यात्रा-वृत्तांत में उल्लिखित ‘आखिरी चट्टान’ को ‘विवेकानंद चट्टान’ के नाम से भी जाना जाता है। युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत के रूप में विवेकानंद के जन्मदिवस 12 जनवरी को भारत में ‘राष्ट्रीय युवा दिवस’ तथा ‘राष्ट्रीय युवा सप्ताह’ के रूप में मनाया जाता है। राष्ट्रीय युवा सप्ताह के एक हिस्से के रूप में भारत सरकार द्वारा प्रत्येक वर्ष ‘राष्ट्रीय युवा महोत्सव’ का आयोजन किया जाता है। विवेकानंद के जीवन, लेखन और सामाजिक कार्यों के विषय में पुस्तकालय और इंटरनेट से खोजकर पढ़िए और कक्षा में चर्चा कीजिए। कुछ लिंक नीचे दिए गए हैं।

स्वामी विवेकानंद— युवाओं के लिए सच्चे आदर्श और मार्गदर्शक https://haryanarajbhavan.gov.in/hi/publication/

स्वामी विवेकानंद— आध्यात्मिक वैज्ञानिक : प्रेस सूचना ब्यूरो, भारत सरकार https://www.pib.gov.in

आखिरी चट्टान तक 99

शब्द-संपदा

स्याह/सियाह — काला, श्याम
चट्टान — शिला
समाधिस्थ/समाधि — समाधि में स्थित, मनोयोग, तपस्या
चेतना — बुद्धि-विवेक से काम लेना, सावधान होना, होश में आना
क्षितिज — वह स्थान जहाँ धरती और आकाश मिलते हुए दिखाई देते हैं, दृष्टि-सीमा
सिहरन — कंपन, सिहरने की क्रिया
पृष्ठभूमि — पहले की बातें, पीछे की भूमि या पीछे का दृश्य
झुरमुट — समूह, मंडली, पास-पास उगे पेड़ या झाड़ जिनकी डालियाँ मिलकर कुंज-सा बना रही हों
बीहड़ — ऊबड़-खाबड़, विकट, विभक्त
मद्दिम/मद्दम — मध्यम, कम अच्छा, मंदा
महुआ/महुवा — एक प्रसिद्ध पेड़ जिसके फूल, फल खाने और लकड़ी ईंधन तथा इमारती काम में आती है
सीपियाँ/सीपी/सीप — शंख, घोंघे आदि की जाति का एक जलचर प्राणी जिसका शरीर किश्तीनुमा दोहरे खोल के भीतर छिपा होता है और जिसके समुद्र में पाए जाने वाले प्रकार के अंदर मोती पैदा होता है, कड़ा खोल जिसके बटन आदि बनाते हैं
दार्शनिक — दर्शनशास्त्र का जानकार, तत्ववेत्ता
ओट — आड़, रोक, शरण, परदे के लिए बनाई गई दीवार
अध्य्य — पूजनीय, पूजा में देने योग्य वस्तु, एक प्रकार का मधु
कड़ल-काक — पक्षियों की एक प्रजाति
बाइनाक्यूलर्ज/बाइनाक्यूलर — दूरबीन, द्विनेत्री
सैंड हिल — बालू का टीला
सुरमई — हल्का नीला, सुरमे के रंग का
सिर धुनना — शोक, पश्चाताप आदि के वेग से सिर पीटना, मातम करना, पछताना
बे-लाग — खरा, दो टूक (बात)
आखिरी चट्टान तक - CBSE Class 9 Hindi Notes