गूँगे - CBSE Class 11 Hindi Notes

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Chapter Study Guide & Summary

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Key Concepts & Syllabus Topics

Important Definitions & Terminology

गूँगे Overview
The central theme and foundational concept covered in Class 11 Hindi Chapter 4, emphasizing conceptual clarity, NCERT curriculum alignment, and exam readiness.
NCERT Curriculum Alignment
Structured study material adhering strictly to CBSE board guidelines, learning objectives, and standardized assessment criteria for Class 11.
Active Recall & Revision
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Quick Revision & Key Points

Full NCERT Chapter: गूँगे

लेखक परिचय

रांगेय राघव


(सन् 1923-1962)

रांगेय राघव का जन्म आगरा में हुआ था। उनका मूल नाम तिरुमल्लै नंबाकम वीर राघव आचार्य था, परंतु उन्होंने रागेय राघव नाम से साहित्य-रचना की है। उनके पूर्वज दक्षिण आरकाट से जयपुर-नरेश के निमंत्रण पर जयपुर आए थे, जो बाद में आगरा में बस गए। वहीं उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई। उन्होंने आगरा विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. और पीएच.डी. की उपाधि प्रापत की। 39 वर्ष की अल्पायु में ही उनकी मृत्यु हो गई।

रांगेय राघव ने साहित्य की विविध विधाओं में रचना की है जिनमें कहानी, उपन्यास, कविता और आलोचना मुख्य हैं उनके प्रमुख कहानी-संग्रह है — रामराज्य का वैभव, देवदासी, समुद्र के फेन, अधूरी मूरत, जीवन के दाने, अंगारे न बुझे, ऐयाश मुदं, इंसान पैदा हुआ। उनके उल्लेखनीय उपन्यास है - घरौदा, विषाद-मठ, मुदों का टीला, सीधा-सादा रास्ता, अँधेरे के जुगनू, बोलते खंडहर तथा कब तक पुकारूँ। सन् 1961 में राजस्थान साहित्य अकादमी ने उनकी साहित्य-सेवा के लिए उन्हें पुरस्कृत किया। उनकी रचनाओं का संग्रह दस खंडों में रांगेय राघव ग्रंथावली नाम से प्रकाशित हो चुका है।

रांगेय राघव ने 1936 से ही कहानियाँ लिखनी शुरू कर दी थीं। उन्होंने अस्सी से अधिक कहानियाँ लिखी हैं। अपने कथा-साहित्य में उन्होंने जीवन के विविध आयामों को रेखाकित किया है। उनकी कहानियों में समाज के शोषित-पीड़ित मानव जीवन के यथार्थ का बहुत ही मार्मिक चित्रण मिलता है। उनकी कहानिया शोषण से मुक्त का मार्ग भी दिखाती हैं। सरल और प्रवाहपूर्ण भाषा उनकी कहानियों की विशेषता है। पाठ्यपुस्तक में संकलित कहानी गूँगे में एक गूँगे किशोर के

माध्यम से शोषित मानव की असहायता का चित्रण किया गया है। कभी तो वह मूक भाव से सब अत्याचार सह लेता है और कभी विरोध में आक्रोश व्यक्त करता है।

लेखक ने दिव्यांगों के प्रति समाज में व्याप्त संवेदनहीनता को रेखांकित किया है। साथ ही यह बताने की कोशिश भी की है कि उन्हें सामान्य मनुष्य की तरह मानना और समझना चाहिए एवं उनके साथ संवेदनशील व्यवहार करना चाहिए, ताकि वे इस दुनिया में अलग-थलग न पड़ने पाएँ। कहानी के माध्यम से लेखक ने यह कहा है कि समाज के जो लोग संवेदनहीन है, वे भी गूँगे-बहरे हैं, क्योंकि अपने सामाजिक दायित्वों के प्रति वे सचेत नहीं हैं।

Chapter 4

गूंगे

'शकुंतला क्या नहीं जानती?' 'कौन? शकुंतला! कुछ नहीं जानती!

'क्यों साहब? क्या नहीं जानती? ऐसा क्या काम है जो वह नहीं कर सकती?'

'वह उस गूँगे को नहीं बुला सकती।' 'अच्छा, बुला दिया तो?' 'बुला दिया?'

बालिका ने एक बार कहनेवाली की ओर देष से देखा और चिल्ला उठी, दूदे! गूगे ने नहीं सुना। तमाम स्त्ियाँ खिलखिलाकर हँस पड़ीं। बालिका ने मुँह छिपा लिया। जन्म से वज्र बहरा होने के कारण वह गूँगा है। उसने अपने कानों पर हाथ रखकर इशारा किया। सब लोगों को उसमें दिलचस्पी पैदा हो गई, जैसे तोते को राम-राम कहते सुनकर उसके प्रति हृदय में एक आनंद-मिश्रित कुतूहल उत्पन्न हो जाता है। चमेली ने अंगुलियों से इंगित किया - फिर?

मुह के आगे इशारा करके गूगे ने बताया - भाग गई। कौन? फिर समझ में आया। जब छोटा ही था, तब 'माँ' जो घूँघट काढ़ती थी, छोड़ गई, क्योंकि 'बाप', अथात् बड़ी-बड़ी मूछें, मर गया था। और फिर उसे पाला है - किसने? यह तो समझ में नहीं आया, पर वे लोग मारते बहुत हैं।

करुणा ने सबको घेर लिया। वह बोलने की कितनी जबर्दस्त कोशिश करता है। लेकिन नतीजा कुछ नहीं, केवल कर्कश काय-काय का ढेर! अस्फुट ध्वनियों का वमन, जैसे आदिम मानव अभी भाषा बनाने में जी-जान से लड़ रहा हो। चमेली ने पहली बार अनुभव किया कि यदि गले में काकल तनिक ठीक नहीं हो तो मनुष्य क्या से क्या हो जाता है। कैसी यातना है कि वह अपने हृदय को उगल देना चाहता है, कितु उगल नहीं पाता।

सुशीला ने आगे बढ़कर इशारा किया - 'मुह खोलो!' और गूगे ने मुँह खोल दिया - लेकिन उसमें कुछ दिखाई नहीं दिया। पूछा - 'गले में कौआ है?' गूँगा समझ गया। इशारे से ही बता दिया - 'किसी ने बचपन में गला साफ़ करने की कोशिश में काट दिया' और वह ऐसे बोलता है जैसे घायल पशु कराह उठता है, शिकायत करता है, जैसे कुत्ता चिल्ला रहा हो और कभी-कभी उसके स्वर में ज्वालामुखी के विस्फोट की-सी भयानकता थपेड़ मार उठती है। वह जानता है कि वह सुन नहीं सकता। और बता-बताकर मुसकराता है। वह जानता है कि उसकी बोली को कोई नहीं समझता फिर भी बोलता है।

सुशीला ने कहा - इशारे गजब के करता है। अकल बहुत तेज है। पूछा — 'खाता क्या है, कहाँ से मिलता है?'

वह कहानी ऐसीहै, जिसे सुनकर सब स्तब् बैे हैं हलवाई के यहाँ रा-भर लु बनाए हैं, कड़ाही माँजी है, नौकरी की है, कपड़े धोए हैं, सबके इशारे हैं लेकन – गूँगे का स्वर चीत्कार में परिणत हो गया। सीने पर हाथ मारकर इशारा किया – 'हाथ फैलाकर कभी नहीं माँगा, भीख नहीं लेता', भुजाओं पर हाथ रखकर इशारा किया – 'मेहनत का खाता हूँ' और पेट बजाकर दिखाया 'इसके लिए, इसके लिए..

अनाथाश्रम के बच्चों को देखकर चमेली रोती थी। आज भी उसकी आँखों में पानी आ गया। यह सदा से ही कोमल है। सुशीला से बोली - 'इसे नौकर भी तो नहीं रखा जा सकता।'

पर गूँगा उस समय समझ रहा था। वह दूध ले आता है। कच्चा मँगाना हो, तो थन काढ़ने का इशारा कीजिए; औँटा हुआ मँगवाना हो, तो हलवाई जैसे एक बर्तन

से दूध दूसरे बर्तन में उठाकर डालता है, वैसी बात कहिए। साग मँगवाना हो, तो गोल-गोल कीजिए या लंबी उँगली दिखाकर समझाइए, और भी.. और भी.

और चमेली ने इशारा किया - 'हमारे यहाँ रहेगा?'

गूँगे ने स्वीकार तो किया, कितु हाथ से इशारा किया - 'क्या देगी? खाना?' 'हाँ, कुछ पैसे' - चमेली ने सिर हिलाया। चार उँगलियाँ दिखा दीं। गूंगे ने सीने पर हाथ मारकर जैसे कहा - तैयार हैं। चार रुूपये।

सुशीला ने कहा - 'पछताओगी। भला यह क्या काम करेगा?'

'मुझे तो दया आती है बेचारे पर', चमेली ने उत्तर दिया - 'न ही, बच्चों की तबीयत बहलेगी।'

घर पर बुआ मारती थी, फूफा मारता था, क्योंकि उन्होंने उसे पाला था। वे चाहते थे कि बाजार में पल्लेदारी करे, बारह-चौदह आने कमाकर लाए और उन्हें दे दे, बदले में वे उसके सामने बाजरे और चने की रोटियाँ डाल दें। अब गूँगा घर भी नहीं जाता। यहीं काम करता है। बच्चे चिढ़ाते हैं कभी नाराज नहीं होता। चमेली के पति सीधे-सादे आदमी हैं। पल जाएगा बेचारा, किंतु वे जानते हैं कि मनुष्य की करूणा की भावना उसके भीतर गूगेपन की प्रतिच्छाया है, वह बहुत कुछ करना चाहता है, कितु कर नहीं) पाता। इस तरह दिन बीत रहे हैं।

किंतु कोई उत्तर नहीं आया, उठकर ढूँढा - 'कुछ पता नहीं लगा।' बसंता ने कहा 'मुझे तो कुछ नहीं मालूम।'

'भाग गया होगा', पति का उदासीन स्वर सुनाई दिया। सचमुच वह भाग गया था। कुछ भी समझ में नहीं आया। चुपचाप जाकर खाना पकाने लगी। क्यों भाग गया? नाली का कीड़ा! 'एक छत उठाकर सिर पर रख दी' फिर भी मन नहीं भरा। दुनिया हँसती है, हमारे घर को अब अजायबघर का नाम मिल गया है..किसलिए. जब बच्चे और वह भी खाकर उठ गए तो चमेली बची रोटियाँ कटोरदान में रखकर उठने लगी। एकाएक द्वार पर कोई छाया हिल उठी। वह गूँगा था। हाथ से इशारा किया – 'भूखा हूँ'

'काम तो करता नहीं, भिखारी।' फेंक दी उसकी ओर रोटियाँ। रोष से पीठ मोड़कर खड़ी हो गई। कितु गूगा खड़ा रहा। रोटियाँ छुई तक नहीं। देर तक दोनों चुप रहे। फिर न जाने क्यों, गूंगे ने रोटियाँ उठा लीं और खाने लगा। चमेली ने गिलासों में दूध भर दिया। देखा, गूँगा खा चुका है। उठी और हाथ में चिमटा लेकर 'कहाँ गया था?' चमेली ने कठोर स्वर से पूछा।

कोई उत्तर नहीं मिला। अपराधी की भाँति सिर झुक गया। सड़ से एक चिमटा उसकी पीठ पर जड़ दिया। कितु गूगा रोया नहीं। वह अपने अपराध को जानता था। चमेली की आँखों से जमीन पर आँसू टपक गया। तब गूंगा भी रो दिया। और फिर यह भी होने लगा कि गूँगा जब चाहे भाग जाता, फिर लौट आता। उसे जगह-जगह नौकरी करके भाग जाने की आदत पड़ गई थी और चमेली सोचती कि उसने उस दिन भीख ली थी या ममता की ठोकर को निस्संकोच स्वीकार कर लिया था।

बसंता ने कसकर गूगे को चपत जड़ दी। गूगे का हाथ उठा और न जाने क्यों अपने-आप रुक गया। उसकी आँखों में पानी भर आया और वह रोने लगा। उसका रुदन इतना कर्कश था कि चमेली को चूल्हा छोड़कर आना पड़ा। गूँगा उसे देखकर इशारों से कुछ समझाने लगा। देर तक चमेली उससे पूछती रही। उसकी समझ में इतना ही आया कि खेलते-खेलते बसंता ने उसे मार दिया था। बसंता ने कहा - 'अम्मा! यह मुझे मारना चाहता था।'

'क्यों रे?' चमेली ने गूगे की ओर देखकर कहा। वह इस समय भी नहीं भूली थी कि गूगा कुछ सुन नहीं सकता। लेकिन गूगा भाव-भंगिमा से समझ गया। उसने चमेली का हाथ पकड़ लिया। एक क्षण को चमेली को लगा, जैसे उसी के पुत्र ने आज उसका हाथ पकड़ लिया था। एकाएक घृणा से उसने हाथ छुड़ा लिया। पत्र के प्रति मंगल-कामना ने उसे ऐसा करने को मजबूर कर दिया। कहीं उसका भी बेटा गूँगा होता तो वह भी ऐसे ही दुख उठाता! वह कुछ भी नहीं सोच सकी। एक बार फिर गूँगे के प्रति हृदय में ममता भर आई। वह लौटकर

चूल्हे पर जा बैठी, जिसमें अंदर आग थी, लेकिन उसी आग से वह सब पक रहा था जिससे सबसे भयानक आग बुझती है - पेट की आग, जिसके कारण आदमी गुलाम हो जाता है। उसे अनुभव हुआ कि गूंगे में बसंता से कहीं अधिक शारीरिक बल था। कभी भी गूँगे की भाँति शक्त से बसंता ने उसका हाथ नहीं पकड़ा था। लेकिन फिर भी गूँगे ने अपना उठा हाथ बसंता पर नहीं चलाया। रोटी जल रही थी। झट से पलट दी। वह पक रही थी, इसी से बसंता बसंता है..गूँगा गूँगा है..

चमेली को विस्मय हुआ। गूगा शायद यह समझता है कि बसंता मालिक का बेटा है, उस पर वह हाथ नहीं लगा सकता। मन-ही-मन थोड़ा विक्षोभ भी हुआ, किंतु पुत्र की ममता ने इस विषय पर चादर डाल दी और फिर याद आया कि उसने उसका हाथ पकड़ा था। शायद इसीलिए कि उसे बसंता को दंड देना ही चाहिए, यह उसको अधिकार है.।

किंतु वह तब समझ नहीं सकी, और उसने सुना कि गूगा कभी-कभी कराह उठता था। चमेली उठकर बाहर गई। कुछ सोचकर रसोई में लौट आई और रात की बासी रोटी लेकर निकली।

कान के न जाने किस पद्द में कोई चेतना है कि गूंगा उसकी आवाज को कभी अनसुना नहीं कर सकता, वह आया। उसकी आँखों में पानी भरा था। जैसे उनमें एक शिकायत थी, पक्षपात के प्रति तिरस्कार था। चमेली को लगा कि लड़का बहुत तेज है। बरबस ही उसके होंठों पर मुस्कान छा गई। कहा - 'ले खा ले।' - और हाथ बढ़ा दिया।

गूँगा इस स्वर की, इस सबकी उपेक्षा नहीं कर सकता। वह हँस पड़ा। अगर उसका रोना एक अजीब ददनाक आवाज थी तो यह हँसना और कुछ नहीं - एक अचानक गुराहट-सी चमेली के कानों में बज उठी। उस अमानवीय स्वर को सुनकर वह भीतर-ही-भीतर काँप उठी। यह उसने क्या किया था? उसने एक पशु पाला था। जिसके हृदय में मनुष्यों की-सी वेदना थी।

घृणा से विक्षब्ध होकर चमेली ने कहा - 'क्यों रे, तूने चोरी की है?' गूँगा चुप हो गया। उसने अपना सिर झुका लिया। चमेली एक बार क्रोध से कॉँप उठी, देर तक उसकी ओर घूरती रही। सोचा - मारने से यह ठीक नहीं हो सकता। अपराध को स्वीकार करा दंड न देना ही शायद कुछ असर करे और फिर कौन मेरा अपना है। रहना हो तो ठीक से रहे, नहीं तो फिर जाकर सड़क पर कुत्तों की तरह जूठन पर जिंदगी बिताए, दर-दर अपमानित और लांछित.।

आगे बढ़कर गूँगे का हाथ पकड़ लिया और द्ार की ओर इशारा करके दिखाया- निकल जा। गूंगा जैसे समझा नहीं। ब़ी-बड़ी आँखों को फाड़ देखता (रहा कुछ कहने को शायद एक बार होंठ खुले भी, कितु कोई स्वर नहीं निकला। चमेली वैसे ही कठोर बनी रही। अब के मुँह से भी साथ-साथ कहा - 'जाओ, निकल जाओ। ढंग से काम नहीं करना है तो तुम्हारा यहाँ कोई काम नहीं। नौकर की तरह रहना है रहो, नहीं तो बाहर जाओ। यहाँ तुम्हारे नखरे कोई नहीं उठा सकता। किसी को भी इतनी फुरसत नहीं है। समझे?'

और फिर चमेली आवेश में आकर चिल्ला उठी - 'मक्कार, बदमाश! पहले कहता था, भीख नहीं माँगता, और सबसे भीख माँगता है। रोज-रोज भाग जाता है, पते चाटने की आदत पड़ गई है। कुते की दुम क्या कभी सीधी होगी? नहीं। नहीं रखना है हमें, जा, तू इसी वक्त निकल जा...

किंतु वह क्षोभ, वह क्रोध, सब उसके सामने निषफ्फल हो गए; जैसे मंदिर की मूर्ति कोई उत्तर नहीं देती, वैसे ही उसने भी कुछ नहीं कहा। केवल इतना समझ सका कि मालकिन नाराज है और निकल जाने को कह रही हैं। इसी पर उसे अचरज और अविश्वास हो रहा है।

चमेली अपने-आप लज्जित हो गई। कैसी मूखा है वह! बहरे से जाने क्या-क्या कह रही थी? वही क्या कुछ सुनता है?

हाथ पकड़कर जोर से एक झटका दिया और उसे दरवाजे के बाहर धकेलकर निकाल दिया। गूंगा धीरे-धीरे चला गया। चमेली देखती रही। करीब घटेभर बाद शकुंतला और बसंता – दोनों चिल्ला उठे, 'अम्मा! अम्मा!'

'क्या है?' चमेली ने ऊपर ही से पूछा। 'गूँगा', बसंा ने कहा। कितु कहने के पहले ही नीचे उतरकर देखा — गूँगा खून से भीग रहा था। उसका सिर फट गया था। वह सड़क के लड़कों से पिटकर आया था, क्योंकि गूँगा होने के नाते वह उनसे दबना नहीं चाहता था। दरवाज़े की दहलीज पर सिर रखकर वह कुते की तरह चिल्ला रहा था। और चमेली चुपचाप देखती रही, देखती रही कि इस मूक अवसाद में युगों का हाहाकार भरकर गूज रहा है। और ये गूंग.. अनेक-अनेक हो संसार में भिन्न-भिन्न रूपों में छा गए है - जो कहना चाहते हैं, पर कह नहीं पाते। जिनके हृदय की प्रतिहिंसा न्याय और अन्याय को परखकर भी अत्याचार को चुनौती नहीं दे सकती, क्योंकि बोलने के लिए स्वर होकर भी स्वर में अर्थ नहीं है.. क्योकि वे असमर्थ हैं। और चमेली सोचती है, आज दिन ऐसा कौन है जो गूँगा नहीं है। किसका हृदय समाज, राष्टर, ध्म और व्यक्त के प्रति विद्वेष से, घृणा से नहीं छटपटाता, किंतु फिर भी कृत्रिम सुख की छलना अपने जालों में उसे नहीं फास देती - क्योंकि वह स्नेह चाहता है, समानता चाहता है!

प्रश्न-अभ्यास

  1. गूगे ने अपने स्वाभिमानी होने का परिचिय किस प्रकार दिया?

  2. 'मनुष्य की करुणा की भावना उसके भीतर गूगेपन की प्रतिच्छाया है।' कहानी के इस कथन को वर्तमान सामाजिक परिवेश के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए।

  3. 'नाली का कीड़ा!'एक छत उठाकर सिर पर रख दी' फिर भी मन नहीं भरा।' - चमेली का यह कथन किस संदर् में कहा गया है और इसके माध्यम से उसके किन मनोभावों का पता चलता है?

  4. यदि बसंता गूँगा होता तो आपकी दृष्ट में चमेली का व्यवहार उसके प्रति कैसा होता?

  5. 'उसकी आँखों में पानी भरा था जैसे उनमें एक शिकायत थी, पक्षपात के प्रति तिरस्कार था।' क्यों?

  6. 'गूँगा दया या सहानुभूति नहीं अधिकार चाहता था' - सिद्र कीजिए।

  7. 'गूँगे' कहानी पढ़कर आपके मन में कौन से भाव उत्पन् होते हैं और क्यों?

  8. कहानी का शीर्षक 'गूगे' है, जबक कहानी में एक ही गूँगा पात्रहै। इसके माध्यम से लेखक ने समाज की किस प्रवृत्ति की ओर संकेत किया है?

. यदि 'स्कल इंडिया' जैसा कोई कार्क्रम होता तो क्या गूंग को दया या सहानभूत का पात्र बनना पड़ता?

.निम्मलिखित गधयांशों की संदर्ष सहित व्याख्या कीजिए -

(क) करुणा ने सबको 'जी जान से लड़ रहा हो।
(ख) वह लौटकर चूल्हे पर आदमी गुलाम हो जाता है।
(ग) और फिर कौन
(घ) और ये गूंग"

. निम्मलिखित पंक्तियों का आशय स्पष्ट कीजिए (क) कैसी यातना है कि वह अपने हदय को उगल देना चाहता है, कितु उगल नहीं पाता।
(ख) जैसे मंदर की मूति कोई उत्तर नहीं देती, वैसे ही उसने भी कुछ नहीं कहा।

योग्यता-विस्तार

  1. समाज में दिव्यांगों के लिए होने वाले प्रयासों में आप कैसे सहयोग कर सकते हैं? २. दिव्यांगों की समस्या पर आधारित 'स्पर्श', 'कोशिश' तथा 'इकबाल' फ़िल्में देखिए और समीक्षा कीजिए।

शब्दार्थ और टिप्पणी

वत्र बहरा जिसे बिलकुल सुनाई न देता हो
अस्फुट अस्पष्ट
ध्वनियों का वमन आवाज निकालने की कोशिश में ध्वनियों को जैसे-तैसे उगल देना
विक्वब्ध अशांत
कांकल गले के भीतर की घाँटी
पल्लेदारी पीठ पर अनाज या सामान इत्यादि ढोने का कार्य

गूँगे - CBSE Class 11 Hindi Notes