टॉर्च बेचनेवाले - CBSE Class 11 Hindi Notes

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Chapter Study Guide & Summary

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Key Concepts & Syllabus Topics

Important Definitions & Terminology

टॉर्च बेचनेवाले Overview
The central theme and foundational concept covered in Class 11 Hindi Chapter 3, emphasizing conceptual clarity, NCERT curriculum alignment, and exam readiness.
NCERT Curriculum Alignment
Structured study material adhering strictly to CBSE board guidelines, learning objectives, and standardized assessment criteria for Class 11.
Active Recall & Revision
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Quick Revision & Key Points

Full NCERT Chapter: टॉर्च बेचनेवाले

लेखक परिचय

हरिशंकर परसाई


(सन् 1922-1995)

हरिशंकर परसाई का जन्म जमानी गाँव, जिला होशंगाबाद, मध्य प्रदेश में हुआ था। उन्होने नागपुर विश्वविद्यालय से हिंदी में एम.ए. किया। कुछ वर्षो तक अध्यापन कार्य करने के पश्चात सन् 1947 से वे स्वतंत्र लेखन में जुट गए। उन्होंने जबलपुर से वसुधा नामक साहित्यिक पत्रिका निकाली।

परसाई ने व्यंय विधा को साहित्यिक प्रतिष्ठा प्रदान की। उनके व्यंय-लेखों की उल्लेखनीय विशेषता यह है कि वे समाज में आई विसंगतियों, विडंबनाओं पर करारी चोट करते हुए चितन और कर्म की प्रेरणा देते हैं। उनके व्यंग्य गुदगुदाते हुए पाठक को झकझोर देने में सक्षम हैं।

भाषा-प्रयोग में परसाई को असाधारण कुशलता प्राप्त है। वे प्राय: बोलचाल के शब्दों का प्रयोग सतर्कता से करते हैं। कौन सा शब्द कब और कैसा प्रभाव पैदा करेगा इसे वे बखूबी जानते थे।

परसाई ने दो दर्जन से अधिक पुस्तकों की रचना की है, जिनमें विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं - हसते हैं रोते हैं, जैसे उनके दिन फिरे (कहानी-संग्रह); रानी नागफनी की कहानी, तट की खोज (उपन्यास); तब की बात और थी, भूत के पाँव पीछे, बेईमानी की परत, पगडांडियों का ज़माना, सदाचार की तावीज़, शिकायत मुझे भी है, और अंत में (निबंध-संग्रह); वैण्णव की फिसलन, तिरछी रेखाएँ ठिठुरता हुआ गणतंत्र, विकलांग श्रब्धा का दौर (व्यंय-लेख संग्रह)| उनका समग्र साहित्य परसाई रचनावली के रूप में छह भागों में प्रकाशित है।

यहाँ संकलित रचना टार्च बेचनेवाले में टॉर्च के प्रतीक के माध्यम से परसाई ने आस्थाओं के बाज़ारीकरण और धार्मिक पाखंड पर प्रहार किया है।

Chapter 3

टार्च बेचनेवाले

वह पहले चौराहों पर बिजली के टार्च बेचा करता था। बीच में कुछ दिन वह नहीं दिखा। कल फिर दिखा। मगर इस बार उसने दाढ़ी बढ़ा ली थी और लंबा कुरता पहन रखा था।

मैने पूछा, "कहाँ रहे? और यह दाढ़ी क्यों बढ़ा रखी है?"

उसने जवाब दिया, "बाहर गया था।"

दाढ़ीवाले सवाल का उसने जवाब यह दिया कि दाढ़ी पर हाथ फेरने लगा। मैने कहा, "आज तुम टार्च नहीं बेच रहे हो?"

उसने कहा, "वह काम बंद कर दिया। अब तो आत्मा के भीतर टार्च जल उठा है। ये 'सूरजछाप' टार्च अब व्यर्थ मालूम होते हैं" मैने कहा, "तुम शायद संन्यास ले रहे हो। जिसकी आत्मा में प्रकाश फैल जाता है, वह इसी तरह हरामखोरी पर उतर आता है। किससे दीक्षा ले आए?" मेरी बात से उसे पीड़ा हुई। उसने कहा, "ऐसे कठोर वचन मत बोलिए। आत्मा सबकी एक है। मेरी आत्मा को चोट पहुँचाकर आप अपनी ही आत्मा को घायल कर रहे हैं"

मैने कहा, "यह सब तो ठीक है। मगर यह बताओ कि तुम एकाएक ऐसे कैसे हो गए? क्या बीवी ने तुम्हें त्याग दिया? क्या उधार मिलना बंद हो गया? क्य

ा साहूकारों ने ज्यादा तंग करना शुरू कर दिया? क्या चोरी के मामले में फँस गए हो? आखिर बाहर का टार्च भीतर आत्मा में कैसे घुस गया?"

उसने कहा, "आपके सब अंदाज गलत है। ऐसा कुछ नहीं हुआ। एक घटना हो गई है, जिसने जीवन बदल दिया। उसे मैं गुपत रखना चाहता हूं पर क्योंकि मैं आज ही यहाँ से दूर जा रहा हू, इसलिए आपको सारा किस्सा सुना देता हू" उसने बयान शुरू किया -

पाँच साल पहले की बात है। मैं अपने एक दोस्त के साथ हताश एक जगह बैठा था। हमारे सामने आसमान को छूता हुआ एक सवाल खड़ा था। वह सवाल था – 'पैसा कैसे पैदा करे?' हम दोनों ने उस सवाल की एक-एक टाँग पकड़ी और उसे हटाने की कोशिश करने लगे। हमें पसीना आ गया, पर सवाल हिला भी नहीं। दोस्त ने कहा – "यार, इस सवाल के पाँव जमीन में गहरे गड़ हैं। यह उखड़ेगा नहीं। इसे टाल जाएँ।"

हमने दूसरी तरफ्र मुँह कर लिया। पर वह सवाल फिर हमारे सामने आकर खड़ा हो गया। तब मै कहा "यार, यह सवाल टलेगा नहीं चलो, इसे हल ही कर दें। पैसा पैदा करने के लिए कुछ काम-धधा करें हम इसी वक्त अलग-अलग दिशाओं में अपनी-अपनी किस्मत आज़माने निकल पड़ें। पाँच साल बाद ठीक इसी तारीख को इसी वक्त हम यहाँ मिलें" दोस्त ने कहा — "यार, साथ ही क्यों न चलें?"

मैने कहा - "नहीं किस्मत आजमानेवालों की जितनी पुरानी कथाएँ मैंने पढ़ी है, सबमे वे अलग-अलग दिशा में जाे हैं। साथ जाने में किस्मतों के टकराकर टूटने का डर रहता है।"

तो साहब, हम अलग-अलग चल पड़ा। मैने टार्च बेचने का धधा शुरू कर दिया। चौराहे पर या मैदान में लोगों को इकटा कर लेता और बहुत नाटकीय ढंग से कहता – "आजकल सब जगह अँधेरा छाया रहता है। रते बेहद काली होती हैं। अपना ही हाथ नहीं सूझता। आदमी को रास्ता नहीं दिखता। वह भटक जाता है। उसके पाँव काँटों से बिंध जाते हैं, वह गिरता है और उसके घुटने लहूलुहान हो जाते हैं उसके आसपास भयानक अँधेरा है। शेर और चीते चारों

तर् घूम रहे है, साँप जमीन पर रेंग रहे हैं। अँधेरा सबको निगल रहा है। अँधेरा घर में भी है। आदमी रात को पेशाब करने उठता है और साँप पर उसका पाँव पड़ जाता है। साँप उसे डँस लेता है और वह मर जाता है।" आपने तो देखा ही है साहब, कि लोग मेरी बातें सुनकर कैसे डर जाते थे। भर-दोपहर में वे अँधेरे के डर से कॉँपने लगते थे आदमी को डराना कितना आसान है! लोग डर जाते, तब मैं कहता – "भाइयों, यह सही है कि अँधेरा है, मगर प्रकाश भी है। वही प्रकाश मैं आपको देने आया हूं। हमारी 'सूरज छाप' टार्च में वह प्रकाश है, जो अंधकार को दूर भगा देता है। इसी वक्त 'सूरज छाप' टार्च खरीदो और अँधेरे को दूर करो। जिन भाइयों को चाहिए, हाथ ऊँचा करें।"

साहब, मेरे टार्च बिक जाते और मैं मजे में जिदगी गुजारने लगा। वायदे के मुताबिक ठीक पाँच साल बाद मैं उस जगह पहुँचा, जहाँ मुझे दोस्त से मिलना था। वहाँ दिन-भर मैने उसकी राह देखी, वह नहीं आया। क्या हुआ? क्या वह भूल गया? या अब वह इस असार संसार में ही नहीं है?

मैं उसे दूँढ़ने निकल पड़ा।

एक शाम जब मैं एक शहर की सड़क पर चला जा रहा था, मैने देखा कि पास के मैदान में खूब रोशनी है और एक तऱफ़ मंच सजा है। लाउडस्पीकर लगे है। मैदान में हजारों नर-नारी श्द्ा से झुके बैठे है। मंच पर सुंदर रेशमी वस्तरों से सजे एक भव्य पुरुष बैठे हैं। वे खूब पुष्ट हैं, सँवारी हुई लंबी दाढ़ी है और पीठ पर लहराते लंबे केश हैं।

मैं भीड़ के एक कोने में जाकर बैठ गया।

भव्य पुरुष फ़िल्मों के संत लग रहे थे। उन्होने गुरुगंभीर वाणी मे प्रवचन शुरू किया। वे इस तरह बोल रहे थे जैसे आकाश के किसी कोने से कोई रहस्यमय संदेश उनके कान में सुनाई पड़ रहा है जिसे वे भाषण दे रहे हैं। वे कह रहे थे - "मैं आज मनुष्य को एक घने अंधकार में देख रहा हूँ। उसके भीतर कुछ बुझ गया है। यह युग ही अंधकारमय है। यह सर्वग्रही अंधकार संपर्ण विश्व को अपने उदर में छिपाए है। आज मनुष्य इस अंधकार से घबरा उठा है। वह

पथभरष्ट हो गया है। आज आत्मा में भी अंधकार है। अंतर की आँखें ज्योतिहीन हो गई है। वे उसे भेद नहीं पातीं। मानव-आत्मा अंधकार में घुटत है। मैं देख रहा हू, मनुष्य की आत्मा भय और पीड़ा से त्र्त है।"

इसी तरह वे बोलते गए और लोग स्तब्ध सुनते गए।

मुझे हँसी छूट रही थी। एक-दो बार दबाते-दबाते भी हँसी फूट गई और पास के श्रोताओं ने मुझे डाटा।

भव्य पुरुष प्रवचन के अंत पर पहुँचते हुए कहने लगे – "भाइयों और बहनों, डरो मत। जहाँ अंधकार है, वहीं प्रकाश है। अंधकार में प्रकाश की किरण है, जैसे प्रकाश में अंधकार की किचित कालिमा है। प्रकाश भी है। प्रकाश बाहर नहीं है, उसे अंतर में खोजो। अंतर में बुझी उस ज्योति को जगाओ। मैं तुम सबका उस ज्योति को जगाने के लिए आहान करता हूँ। मैं तुम्हारे भीतर वही शाश्वत ज्योति को जगाना चाहता हूँ। हमारे 'साधना मंदर' में आकर उस ज्योति को अपने भीतर जगाओ।" साहब, अब तो मैं खिलखिलाकर हँस पड़ा। पास के लोगों ने मुझे धक्का देकर भगा दिया। मैं मंच के पास जाकर खड़ा हो गया।

भव्य पुरूष मंच से उतरकर कार पर चढ़ रहे थे। मैंने उन्हे ध्यान से पास से देखा। उनकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी, इसलिए मैं थोड़ा झिझका। पर मेरी तो दाढ़ी नहीं थी। मैं तो उसी मौलिक रूप में था। उन्होंने मुझे पहचान लिया। बोले - "अरे तुम!" मै पहचानकर बोलने ही वाला था कि उन्होंने मुझे हाथ पकड़कर कार में बिठा लिया। मैं फिर कुछ बोलने लगा तो उन्होंने कहा – "बँगले तक कोई बातचीत नहीं होगी। बटीं नानचर्ना दोगी।"

मुझे याद आ गया कि वहाँ ड्राइवर है।

बँगले पर पहुँचकर मैने उसका ठाठ देखा। उस वैभव को देखकर मैं थोडा झका, पर तुरंत ही मैने अपने उस दोस्त से खुलकर बातें शुरू कर दीं। मैने कहा – "यार, तू तो बिलकुल बदल गया।"

उसने गंभीरता से कहा - "परिवर्तन जीवन का अनंत क्रम है।"

मैने कहा - "साले, फिलासफ़ी मत बघार यह बता कि तूने इतनी दौलत कैसे कमा ली पाँच सालों में?"

उसने पूछा - "तुम इन सालों में क्या करते रहे?"

मैने कहा - "मैं तो घूम-धघूमकर टार्च बेचता रहा। सच बता, क्ा तू भी टार्च का व्यापारी है?"

उसने कहा – "तुझे क्या ऐसा ही लगता है? क्यों लगता है?" मैने उसे बताया कि जो बाते मैं कहता हू; वही तू कह रहा था मैं सीधे ढंग से कहता हूँ, तू उन्हीं बातों को रहस्यमय ढंग से कहता है। अँधेरे का डर दिखाकर लोगों को टार्च बेचता हू। तू भी अभी लोगों को अँधेरे का डर दिखा रहा था, तू भी ज़रूर टार्च बेचता है।

उसने कहा — "तुम मुझे नहीं जानते, मैं टार्च क्यों बेचूगा! मैं साधु, दर्शनि और संत कहलाता हूँ"

मैने कहा - "तुम कुछ भी कहलाओ, बेचते तुम टार्च हो। तुम्हारे और मेरे प्रवचन एक जैसे हैं। चाहे कोई दार्शनिक बने, संत बने या साधु बने, अगर वह लोगों को अँधेरे का डर दिखाता है, तो जरूर अपनी कंपनी का टार्च बेचना चाहता है। तुम जैसे लोगों के लिए हमेशा ही अंधकार छाया रहता है। बताओ, तु्हारे जैसे किसी आदमी ने हज़ारों में कभी भी यह कहा है कि आज दुनिया में प्रकाश फैला है? कभी नहीं कहा। क्यों? इसलिए कि उन्हें अपनी कंपनी का टार्च बेचना है। मैं खुद भर-दोपहर में लोगों से कहता हूं कि अंधकार छाया है। बता किस कंपनी का टार्च बेचता है?" X

मेरी बातों ने उसे ठिकाने पर ला दिया था। उसने सहज ढंग से कहा - "तेरी बात ठीक ही है। मेरी कंपनी नयी नहीं है, सनातन है"

मैने पूछा - "कहाँ है तेरी दुकान? नमूने के लिए एकाध टार्च तो दिखा।'सूरज छाप' टार्च से बहुत ज्यादा बिक्री है उसकी।"

उसने कहा - "उस टा्च की कोई दुकान बाजार मे नहीं है। वह बहुत सक्ष्म
है। मगर कीमत उसकी बहुत मिल जाती है। तू एक-दो दिन रह, तो मंतुझे सब
समझा देता हूँ" "तो साहब मैं दो दिन उसके पास रहा। तीसरे दिन 'सूरज छाप' टार्च की पेटी
को नदी में फेककर नया काम शुरू कर दिया।" वह अपनी दाढ़ी पर हाथ फेरने लगा। बोला – "बस, एक महीने की देर और है।" मैने पूछा "तो अब कौन-सा धंधा करोगे?" उसने कहा — "धधा वही करूँगा, यानी टा्च बेचूगा। बस कंपनी बदल रहा हूँ"

प्रश्न-अभ्यास

  1. लेखक ने टार्च बेचनेवाली कंपनी का नाम 'सूरज छाप' ही क्यों रखा?

  2. पाँच साल बाद दोनों दोस्तों की मुलाकात किन परिस्थितियों में और कहाँ होती है?

  3. पहला दोस्त मंच पर किस रूप में था और वह किस अँधेरे को दूर करने के लिए टार्च बेच रहा था?

  4. भवय पुरुष ने कहा- 'जहाँ अंधकार है वहीं प्रकाश है' इसका क्या तातपर्य है?

  5. भीतर के अँधेरे की टार्च बेचने और 'सूरज छाप' टार्च बेचने के धधे में क्या फूर्क है? पाठ के आधार पर बताइए।

  6. 'सवाल के पाँव जमीन में गहरे ग़ हैं। यह उख़ंगा नहीं' इस कथन में मुन्य की किस प्रवृत्ति की ओर संकेत है और क्यों?

  7. 'वयं्य विधा में भाषा सबसे धारदार है।' परसाई जी की इस रचना को आधार बनाकर इस कथन के पक्ष में अपने विचार प्रकट कीजिए।

  8. आशय स्पष्ट कीजिए-

(क) क्या पैसा कमाने के लिए मनु्य कुछ भी कर सकता है?

(ख) प्रकाश बाहर नहीं है, उसे अंतर में खोजो। अंतर में बुझी उस ज्योति को जगाओ।
(ग) धधा वही करूँगा, यानी टार्च बेचूँगा। बस कंपनी बदल रहा हूँ।

. लेखक ने 'सूरज छाप' टार्च की पेटी को नदी में क्यो फेंक दिया? क्या आप भी वही करते?

  1. टार्च बेचने वाले किस प्रकार की स्कल का प्रयोग करते हैं? क्या इसका 'स्कल इंडिया' प्रोग्राम से कोई संबंध है?

योग्यता-विस्तार

1'पैसा कमाने की लिप्सा ने आध्यात्मिकता को भी एक व्यापार बना दिया है।' इस विषय पर कक्षा में परिचर्चा कीजिए। 3. एन.सी.ई.आर.टी. द्वारा हरिशंकर परसाई पर बनाई गई फ़िल्म देखिए।

शब्दार्थ और टिप्पणी

गुरु गंभीर वाणी विचारों से पुष्ट वाणी
सर्वग्राही सबको ग्रहण करनेवाला, सबको समाहित करनेवाला
स्तब्ध हैरान
आहान पुकारना, बुलाना
शाश्वत चिरंतन, हमेशा रहनेवाली
सनातन सदैव रहनेवाला

टॉर्च बेचनेवाले - CBSE Class 11 Hindi Notes