लेखक परिचय
ओमप्रकाश वाल्मीकि
ओमप्रकाश वाल्मीकि का जन्म बरला, जिला ुजफरनगर, उत्तर प्रदेश में हुआ। उनका बचपन सामाजिक एवं आर्थिक कठनाइयों में बीता। पढ़ाई के दौरान उन्हें अनेक आर्थिक, सामाजिक और मानसिक कष्ट झेलने पड़े।

(सन् 1950-2013)
वाल्मीकि जी कुछ समय तक महाराष्ट में रहे। वहाँ वे दलित लेखकों के संपर्क में आए और उनकी प्रेरणा से डा. भीमराव अंबेडकर की रचनाओं का अध्ययन किया। इससे उनकी रचना-दृष्ट में बुनियादी परिवर्तन हुआ। वे देहरादून स्थत आप्टो इलैक्टॉनिक्स फ़ैक्टरी (ऑर्डिनेंस फ़रैक्टीज़, भारत सरकार) में एक अधिकारी के रूप में कार्यरत रहे। बाद में सेवानिवृत्त हो गए। सन् 2013 में अस्वस्थ हो गए और दिल्ली में ही उन्होंने अतिम साँस ली।
हिंदी में दलित साहित्य के विकास में ओमप्राश वाल्मीकि की मह्वपर्ण भूमिका है। उन्होने अपने लेखन में जातीय अपमान और उत्पीडन का जीवंत वर्णन किया है और भारतीय समाज के कई अनछुए पहलुओं को पाठक के समक्ष प्र्तुत किया है। वे मानते हैं कि दलित ही दलित की पीड़ा को बेहतर ढंग से समझ सकता है और वही उस अनुभव की प्रामाणिक अभिव्यक्ति कर सकता है। उन्हंने सृजनात्मक साहित्य के साथ-साथ आलोचनात्मक लेखन भी किया है। उनकी भाषा सहज, तथ्यपरक और आवेगमयी है। उसमे व्यंय का गहरा पुट भी दिखता है। नाटकों के अभिनय और निदेशन में भी उनकी रुच है। अपनी आत्मकथा जूठन के कारण उन्हें हिंदी साहित्य में पहचान और प्रतिष्ठा मिली। उन्हें सन् 1993 में डॉ. अबेडकर राषट्रीय पुरस्कार और सन् 1995 में परिवेश सम्मान से अलंकृत किया जा चुका है। जूठन के अंग्रेजी संस्करण को न्यू इंडिया बुक पुरस्कार, 2004 प्रदान किया गया।
उनकी प्मुख रचनाएँहै - सदियों का संताप, बस! बहुत हो चुका (कविता संग्रह); सलाम, घुसपैठिये (कहानी संग्र), दलित साहित्य का सौंदर्यशास्त्र तथा जूठन (आत्मकथा)|
पाठ्यपुस्तक में संकलित कहानी खानाबदोश में मजदूरी करके किसी तरह गुजर-बसर कर रहे मजदूर वर्ग के शोषण और यातना को चित्रित किया गया है। मजदूर वर्ग यदि ईमानदारी से मेहनत-मजदूरी करके इज्जत के साथ जीवन जीना चाहता है, तो सूबे सिंह जैसे समृद्र और ताकतवर लोग उन्हें जीने नहीं देते। कहानी इस बात की ओर भी संकेत करती है कि मजदूर वर्ग हमारे समाज की जातिवादी मानसकता से नहीं उबर पाया है। कहानी में वास्तविकता उत्पन्न करने में इसके स्थानीय संवाद सहायक बने हैं।
खानाबदोश
सुकिया के हाथ की पथी कच्ची ईंटें पकने के लिए भटे में लगाई जा रही थीं। भटे के गलियारे में झरोखेदार कच्ची ईटों की दीवार देखकर सुकिया आत्मिक सुख से भर गया था। देखते-ही-देखते हजारों ईटें भटे के गलियारे में समा गई थीं। ईंटों के बीच खाली जगह में पत्थर का कोयला, लकड़ी, बुरादा, गन्ने की बाली भर दिए गए थे। असगर ठेकेदार ने अपनी निगरानी में हर चीज तरतीब से लगवाई थी। आग लगाने से पहले भटा-मालिक मुखतार सिंह ने एक-एक चीज का मुआयना किया था। चौबीसों घंटे की ड्यूटी पर मजदूरों को लगाया गया था, जो मोरियों से भटे में कोयला, बुरादा आदि डाल रहे थे। भटे का सबसे खतरेवाला काम था मोरी पर काम करना। थोड़ी-सी असावधानी भी मौत का कारण बन सकती थी। भटे की चिमनी धुआँ उगलने लगी थी। यह धुआँ मीलों दूर से दिखाई पड़ जाता था।
हरे-भरे खेतों के बीच गहरे मटमैले रंग का यह भटुा एक धब्े जैसा दिखाई पड़ता था। मानो और सुकिया महीनाभर पहले ही इस भटे पर आए थे, दिहाड़ी मजदूर
बनकर। हफ़्तेभर का काम देखकर असगर ठेकेदार ने सुकिया से कहा था कि साँचा ले लो और ईंट पाथने का काम शुरू करो। हजार ईंट के रेट से अपनी मजदूरी लो।
भटे पर लगभग तीस मजदूर थे जो वहीं काम करते थे। भटा-मालिक मुखतार सिंह और असगर ठेकेदार साँझ होते ही शहर लौट जाते थे। शहर से दूर, दिनभर की गहमा-गहमी के बाद यह भटा अँधेरे की गोद में समा जाता था।
एक कतार में बनी छोटी-छोटी झोंपड़ियों में टिमटिमाती ढिबरियाँ भी इस ऑअँधेरे से लड़ नहीं पाती थीं। दड़बेनुमा झोंपड़ियों में झुककर घुसना पड़ता था। झुके-झुके ही बाहर आना होता था। भटे का काम खत्म होते ही औरतें चूल्हा-चौका सँभाल लेती थीं। कहने भर के लिए चूल्हा-चौका था। ईटों को जोड़कर बनाए चूल्हे में जलती लकड़ियों की चिट-पिट जैसे मन में पसरी दुश्ंचताओं और तकलीफ़ों की प्रतिध्वनियाँ थीं जहाँ सब कुछ अनिश्चत था। मानो अभी तक इस भटे की जिंदगी से तालमेल नहीं बैठा पाई थी। बस, सुकिया की जिद के सामने वह कमजोर पड़ गई थी। साँझ होते ही सारा माहौल भाँय-भाँय करने लगता था। दिनभर के थके-हारे मजदूर अपने-अपने दड़बों मे घुस जाते थे। साँप-बिच्छू का डर लगा रहता था। जैसे समूचा जंगल झोंपड़ी के दरवाजे पर आकर खड़ा हो गया है। ऐसे माहौल में मानो का जी घबराने लगता था। लेकिन करे भी तो क्या, न जाने कितनी बार सुकिया से कहा था मानो ने, "अपने देस की सूखी रोटी भी परदेस के पकवानों से अच्छी होती है।"
सुकिया के मन में एक बात बैठ गई थी। नर्क की जंदगी से निकलना है तो कुछ छोड़ना भी पड़ेगा। मानो की हर बात का एक ही जवाब था उसके पास बड़े-बूढ़ कहा करे हैं कि "आदमी की औकात घर से बाहर कदम रखणें पे ही पता चले है। घर में तो चूहा भी सूरमा बणा रह। काँधे पर यो लंबा लटु धरके चलणं वाले चौधरी सहर (शहर) में सरकारी अफ़सरों के आगे सीध्धे खड़ न हो सके हैं। बुड़ी बकरियों की तरह मिमियाएँ है. और गाँव में किसी गरीब कू आदमी भी न समझे है..
सुकिया की इन बातों से मानो कमजोर पड़ जाती थी। इसीलिए गाँव-देहात छोड़कर वे दोनों एक दिन असगर ठेकेदार के साथ इस भहे पर आ गए थे। पहले ही महीने में सुकिया ने कुछ रुपये बचा लिए थे। कई-कई बार गिनकर तसल्ली कर ली थी। धोती की गाँठ में बाँधकर अंटी में खोंस लिए थे। रुपए देखकर मानो भी खुश हो गई थी। उसे लगने लगा था कि वह अपनी जिंदगी के ढरे को बदल लेगा।
सुकिया और मानो की जिंदगी एक निश्चत ढरें पर चलने लगी थी। दोनों मिलकर पहले तगारी बनाते, फिर मानो तैयार मिटी लाकर देती। इस काम में उनके साथ एक तीसरा मजदूर भी आ गया था। नाम था जसदेव। छोटी उम्र का लड़का था। असगर ठेकेदार ने उसे भी उनके साथ काम पर लगा दिया था। इससे काम में गति आ गई थी। मानो भी अब फुतीं से साँचे में ईटें डालने लगी थी, जिससे उनकी दिहाड़ी बढ़ गई थी।
उस रोज मालिक मुखतार सिंह की जगह उनका बेटा सूबेसिंह भटे पर आया था। मालिक कुछ दिनों के लिए कहीं बाहर चले गए थे। उनकी गैरहाजिरी में सूबेसंह का रौब-दाब भटे का माहौल ही बदल देता था। इन दिनों में असगर ठेकेदार भीगी बिल्ली बन जाता था। दफ़्तर के बाहर एक अदली की डयूटी लग जाती थी, जो कुसी पर उकड़ बैठकर दिनभर बीड़ी पीता था, आने-जानेवालों पर निगरानी रखता था। उसकी इजॉजत के बगौर कोई अंदर नहीं जा सकता था। एक रोज सूबेसिंह की नजर किसनी पर पड़ गई। तीन महीने पहले ही किसः और महेश भटहे पर आए थे। पाँच-छ: महीने पहले ही दोनों की शादी हुई थी। सूबेसिह ने उसे दफ्तर की सेवा-टहल का काम दे दिया था। शुरू-शुरू में किसी का ध्यान इस ओर नहीं गया था। लेकिन जब रोज ही गारे-मिट्टी का काम छोड़कर वह दफ़्तर में ही रहने लगी तो मजदूरों में फुसफुसाहटें शुरू हो गई थीं। तीसरे दिन सुबह जब मजदूर काम शुरू करने के लिए झोप़यों से बाहर निकल रहे थे, किसनी हैंडपंप के नीचे खुले में बैठकर साबुन से रगड़-रगड़कर नहा रही थी। भटे पर साबुन किसी के पास नहीं था। साबुन और उससे उठते झाग पर सबकी नजर पड़ गई थी। लेकिन बोला कोई कुछ भी नहीं था। सभी की आँखों में शंकाओं के गहरे काले बादल घिर आए थे कानाफूसी हलके-हलके शुरू हो गई थी। महेश गुमसुम-सा अलग-अलग रहने लगा था। साँवले रंग की भरे-पूरे जिस्म की किसनी का व्यवहार महेश के लिए दु:खदाई हो रहा था। वह दिन-भर दफ़्तर में घुसी रहती थी। उसकी खिलखिलाहटें दफ्तर से बाहर तक सुनाई पड़ने लगी थीं। महेश ने उसे समझाने की कोशिश की थी। लेकिन वह जिस राह पर चल पड़ी थी वहाँ से लौटना मुश्किल था
भटे की जिंदगी भी अजीब थी। गाँव-बस्ती का माहौल बन रहा था। झोपड़ी के बाहर जलते चूल्हे और पकते खाने की महक से भटे की नीरस जिंदगी में कुछ देर के लिए ही सही, ताजगी का अहसास होता था। ज्यादातर लोग रोटी के साथ गुड़ या फिर लाल मिर्च की चटनी ही खाते थे। दाल-सब्जी तो कभी-कभार ही बनती थी। शाम होते ही हैंडपंप पर भीड़ लग जाती थी। जिस्म पर चिपकी मिटी को जितना उतारने की कोशिश करते, वह और उतना ही भीतर उतर जाती थी। नस-नस में कच्ची मि्टी की महक बस गई थी। इस महक से अलग भटे का कोई अस्त्व नहीं था। किसनी और सूबेसिंह की कहानी अब काफ़ी आगे बढ़ गई थी। सूबेसिंह के अ्दली ने महेश को नशे की लत डाल दी थी। नशा करके महेश झोंपड़ी में पड़ा रहता था। किसनी के पास एक ट्ांजिस्टर भी आ गया था। सुबह-शाम भटहे की खामोशी में ट्राजिस्टर की आवाज गूँजने लगी थी। ट्राजिस्टर वह इतने जोर से बजाती थी कि भटे का वातावरण फ़िल्मी गानों की आवाज से गमक उठता था। शांत माहौल में संगीत-लहरियों ने खनक पैदा कर/ दी थी।
कड़ी मेहनत और दिन-रात भटे में जलती आग के बाद जब भटा खुलता था तो मजदूर से लेकर मालिक तक की बेचैन साँसों को राहत मिलती थी। भटे से पकी ईटों को बाहर निकालने का काम शुरू हो गया था। लाल-लाल पक्की ईटों को देखकर सुकिया और मानो की खुशी की इंतहा नहीं थी। खासकर मानो तो ईंटों को उलट-पुलटकर देख रही थी। खुद के हाथ की पथी ईटों का रंग ही बदल गया था। उस दिन ईटों को देखते-देखते ही मानो के मन में बिजली की तरह एक खयाल कौधा था। इस खयाल के आते ही उसके भीतर जैसे एक साथ कई-कई भटे जल
रहे थे। उसने सुकिया से पूछा था, "एक घर में कितनी ईटे लग जाती हैं?" "बहुत..कई हजार..लोहा, सीमेंट, लक़ी, रेत अलग से" उसके मन में खयाल
उभरा था। उसे त्काल कोई आधार नहीं मिल पा रहा था। वह बेचैन हो उठी थी। उसे खामोश देखकर सुकिया ने कहा, "चलो, काम शुरू करना है। जसदेव बाट
देख रहा होगा। " सुकिया के पीछे-पीछे अनमनी ही चल दी थी मानो, लेकिन उसके
दिलो-दिमाग पर ईटों का लाल संग कुछ ऐसे छा गया था कि वह उसी में उलझकर रह गई थी।
झींगुरों की झिन-झिन और बीच-बीच में सियारों की आवाजे रात के सन्नाटे में स्याहपन घोल रही थीं थके-हारे मजदूर नींद की गहरी खाइयों में लुढ़क गए थे। मानो के खयालों में अभी भी लाल-लाल ईटें घूम रही थीं। इन ईटों से बना हुआ एक छोटा-सा घर उसके जेहन में बस गया था। यह खयाल जिस शिदत से पुख्ता हुआ था, नींद उतनी ही दूर चली गई थी। दूर किसी बस्ती से हलके-हलके छनकर आती मुगं की बाँग, रात के आखिरी
पहर के अहसास के साथ ही मानो की पलकें नींद से भारी होने लगी थीं। सुबह के ज़रूरी कामों से निबटकर जब सुकिया ने झोंपड़ी में झका तो वह
हैरान रह गया था। इतनी देर तक मानो कभी नहीं सोती। वह परेशान हो गया था।
गहरी नींद में सोई मानो का माथा उसने छूकर देखा, माथा ठंडा था। उसने राहत की साँस ली। मानो को जगाया, "इतना दिन चढ़ गया है..उठने का मन नहीं है?" मानो अनमनी-सी उठी। कुछ देर यूं ही चुपचाप बैठी रही। मानो का इस तरह
बैठना सुकिया को अखरने लगा था, "आज क्या बात है?..जी तो ठीक है?" मानो अपने खयालों में गुम थी। मन की बात बाहर आने के लिए छटपटा रही थी। उसने सुकिया की ओर देखते हुए पूछा, "क्यों जी..क्या हम इन पक्की ईटं पर घर नहीं बणा सके हैं?"
मानो की बात सुनकर सुकिया आश्चर्य से उसे ताकने लगा। कल की बात वह भूल चुका था। सुकिया ने गहरे अवसाद से भरकर कहा, "पक्की ईटों का घर दो-चार रुूपए में ना बणता है..इते ढेर-से नोट लगे हैं घर बणाने में। गाँठ में नहीं है पैसा, चले हाथी खरीदने। "
"महीनेभर में जो हमने इती ईटें बणा दी हैंक्या अपणे लिए हम ईटें ना बणा सके हैं।" मानो ने मासूमियत से कहा।
"यह भटा मालिक का है। हम ईटें उनके लिए बणाते है। हम तो मजदूर हैं इन ईटें पर अपणा कोई हक ना है।" सुकिया ने अपने मन में उठते दबाव को महसूस किया।
"इन इईंटों पर म्हारा कोई भी हक ना हैक्यू..", मानो ने ताजुब भरी कड़वाहट से कहा। उसके अंदर बवंडर मचल रहा था। कुछ देर की खामोशी के बाद मानो बोली, "हर महीने कुछ और बचत करें..ज्यादा ईटें बनाए.तब?. तब भी अपणा घर नहीं बणा सकते?" अपने भीतर कुलबुलाते सवालों को बाहर लाना चाहती थी मानो।
"इतनी मजदूरी मिलती कहाँ है? पूरे महीने हाड़-गोडड़़ तोड़़ के भी कितने रुपए बचे! कुल अस्सी। एक साल में एक हज़ार ईटों के दाम अगर हमने बचा भी लिए तो घर बणाने लायक रुूपया जोड़ते-जोड़ते उम्र निकल जागी। फेर भी घर ना बण पावेगा।" सुकिया ने दुखी मन से कहा।
"अगर हम रात-दिन काम करें तो भी नहीं?" मानो ने उत्साह में भरकर कहा। "बावली हो गई है क्या?.चल उठ..चल, काम पे जाणा है। टेम ज्यादा हो रहा है। ठेकेदार आता ही होगा। आज पूरब की टाँग काटनी है लगार के लिए।" सुकिया मानो के सवालों से घबरा गया था। उठकर बाहर जाने लगा। "कुछ भी करो..तुम चाहो तो मैं रात-दिन काम करूगी..मुझे एक पक्की ईटों का घर चाहिए। अपने गाँव में..लाल-सुख ईंटों का घर।" मानो के भीतर मन में हज्ञार-हज्ञार वसंत खिल उठे थे।0
सुकिया और मानो को एक लक्षय मिल गया था। पक्की ईटों का घर बनाना है..अपने ही हाथ की पकी ईटों से। सुबह होते ही काम पर लग जाते हैं और शाम को भी अँधेरा होने तक जुटे रहते हैं। ठेकेदार असगर से लेकर मालिक तक उनके काम से खुश थे। सूबेसिंह किसनी को शहर भी लेकर जाने लगा था। किसनी के रंग-ढंग में बदलाव आ गया था। अब वह भटे पर गारे-मिटी का काम नहीं करती थी। महेश रोज रात में नशा करके मन की भड़ास निकालता था। दिन में भी अपनी झोंपड़ी में पड़ा रहता था या इधर-उधर बैठा रहता था। किसनी कई-कई दिनों तक शहर से लौटती नहीं थी। जब लौटती — थकी, निढाल और मुरझाई हुई। कपड़ों-लत्तों की अब कमी नहीं थी।
उस रोज सूबेसिंह ने भटे पर आते ही असगर ठेकेदार से कहा था, "मानो को दफ़्तर में बुलाओ, आज किसनी की तबीयत ठीक नहीं है।" असगर ठेकेदार ने रोकना चाहा था, "छोटे बाबू मानो को..."
बात पूरी होने से पहले ही सूबेसिंह ने उसे फटकार दिया था, "तुमसे जो कहा गया है, वही करो। राय देने की कोशश मत करो। तुम इस भटे पर मुंशी हो। मुंशी ही रहो, मालिक बनने की कोशिश करोगे तो अंजाम बुरा होगा।"
असगर ठेकेदार की घिघ्घी बँध गई थी। वह चुपचाप मानो को बुलाने चल दिया था। असगर ठेकेदार ने आवाज देकर कहा था, "मानो, छोटे बाबू बुला रहे हैं दफ्तर मं" मानो ने सुकिया की ओर देखा। उसकी आँखों में भय से उत्पन्न कातरता थी। सुकिया भी इस बुलावे पर हड़बड़ा गया था। वह जानता था। मछली को फँसाने के लिए जाल फेंका जा रहा है। गुस्से और आक्रोश से नसें खिंचने लगी थीं। जसदेव ने भी सुकिया की मन:स्थिति को भाँप लिया था। वह फुती से उठा। हाथ-पाँव पर लगी गीली मि्टी छुड़ते हुए बोला, "तुम यहीं ठहरो.मै देखता हूँ। चलो चा।" असगर के पीछे-पीछे चल दिया।
असगर ठेकेदार जानता था कि सूबेसिंह शैतान है। लेकिन चुप रहना उसकी मजबूरी बन गई थी। जिंदगी का खास हिस्सा उसने भटे पर गुजारा था। भटईे से अलग उसका कोई वजूद ही नहीं था।
असगर ठेकेदार के साथ जसदेव को आता देखकर सूबेसिंह बिफर पड़ा था। "तुझे किसने बुलाया है?"
"जी..जो भी काम हो बताइए.ैं कर दूगा..." जसदेव ने विम्रता से कहा। "क्यों? तू उसका खसम है.या उसकी (..पर चरबी चढ़ गई है)।" सूबेसिंह ने अपशब्दों का इस्तेमाल किया।
"बाबू जी..आप किस तरह बोल रहे है." जसदेव के बात पूरी करने से पहले ही एक झन्नाटेदार थप्पड़ उसके गाल पर पड़ा।
"'जानता नहं.टे की आग में झोंक दूगा..किसी को पता भी नहीं चलेगा। हडियाँ तक नहीं मिलेंगी राख से.. समझा। " सूबेसिंह ने उसे धकिया दिया। जसदेव गिर पड़ा था।
जब तक वह सँभल पाता। लात-घूसो से सूबेसिंह ने उसे अधमरा कर दिया था। चीख-पुकार सुनकर मजदूर उनकी ओर दौड़ पड़ थे। मजदूरों को एक साथ आता देखकर सूबेसिंह जीप में बैठ गया था। देखते-ही-देखते जीप शहर की ओर दौड़ गई थी। असगर ठेकेदार दफ़्तर में जा घुसा था।
सुकिया और मानो जसदेव को उठाकर झोंपड़ी में ले गए थे। वह दर्द से कराह रहा था। मानो ने उसकी चोटों पर हल्दी लगा दी थी। सुकिया गुस्से में काँप रहा था। मानो के अवचेतन में असंख्य अँधेरे नाच रहे थे। वह किसनी नहीं बनना चाहती थी। इज्ज़त की जिंदगी जीने की अदम्य लालसा उसमें भरी हुई थी। उसे एक घर चाहिए था - पक्की ईटों का, जहाँ वह अपनी गृहस्थी और परिवार के सपने देखती थी। समूचा दिन अदृश्य भय और दहशत में बीता था। जसदेव को हलका बुखार हो गया था। वह अपनी झोंपड़ी में पड़ा था। सुकिया उसके पास बैठा था। आज की घटना से मजदूर डर गए थे। उन्हें लग रहा था कि सूबेसिंह किसी भी वक्त लौटकर आ सकता है। शाम होते ही भटे पर सन्नाटा छा गया था। सब अपने-अपने खोल में सिमट गए थे। बूढ़ा बिलसिया जो अकसर बाहर पेड़ के नीचे देर रात तक बैठा रहता था, आज शाम होते ही अपनी झोंपड़ी में जाकर लेट गया था। उसके खाँसने की आवाज भी आज कुछ धीमी हो गई थी। किसनी की झोंपड़ी से ट्राजिस्टर की आवाज भी नहीं आ रहीं थी।
बीच-बीच में हैंडपंप की खंच-खंच ध्वन इस खामोशी में विछ्न डाल रही थी। पंप जसदेव की झोंपड़ी के ठीक सामने था। सभी को पानी के लिए इस पंप पर आना पड़ता था।
भटे पर दवा-दारू का कोई इंतजाम नहीं था। कटने-फटने पर घाव पर मिटी लगा देना था। कपड़ा जलाकर राख भर देना ही दवाई की जगह काम आते थे। मानो ने अधूरे मन से चूल्हा जलाया था। रोटियाँ सेंककर सुकिया के सामने रख दी थी। सुकिया ने भी अनिच्छा से एक रोटी हलक के नीचे उतारी थी। उसकी भूख जैसे अचानक मर गई थी। मानो को लेकर उसकी चिंता बढ़ गई थी। उसने निश्चय कर लिया था वह मानो को किसनी नहीं बनने देगा।
मानो भी गुमसुम अपने आपसे ही लड़ रही थी। बार-बार उसे लग रहा था कि वह सुरक्षत नहीं है। एक सवाल उसे खाए जा रहा था- क्या औरत होने की यही सजञा है। वह जानती थी कि सुकिया ऐसा-वैसा कुछ नहीं होने देगा। वह महेश की तरह नहीं है। भले ही यह भटा छोड़ना पड़े। भटा छोड़ने के खयाल से ही वह सिहर उठी। नहीं..भटा नहीं छोड़ना है। उसने अपने आपको आश्वस्त किया, अभी तो पक्की ईंटों का घर बनाना है।
मानो रोटियाँ लेकर बाहर जाने लगी तो सुकिया ने टोका, "कहाँ जा रही है?" "जसदेव भूखा-प्यासा पड़ा है। उसे रोटी देणे जा रही हू।" मानो ने सहज भाव से कहा।
बामन तेरे हाथ की रोट्टी खावेगा..अक्ल मारी गई तेरी,' सुकिया ने उसे रोकना चाहा।
"क्यों मेरे हाथ की रोटी में जहर लगा है?" मानो ने सवाल किया। पल-भर रुककर बोली, "बामन नहीं भहा मजदूर है वह.म्हारे जैसा।" चारों तरफ़ सन्नाटा था। जसदेव की झोंपड़ी में ढिबरी जल रही थी। मानो ने झोंपड़ी का दरवाजा ठेला "जी कैसा है?" भीतर जाते हुए मानो ने पूछा। जसदेव ने उठने की कोशिश की। उसके मुँह से द्द की आह निकली।
"कमबखत कीड़े पड़के मरेगा। हाथ-पाँव टूट-टूटकर गिरंगे.आदमी नहीं जंगली जिनावर है।" मानो ने सूबेसिंह को कोसते हुए कहा। जसदेव चुपचाप उसे देख रहा था।
"यह ले.रोटी खा ले। सुबे से भूखा है। दो कौर पेट में जाएँगे तो ताकत तो आवेगी बदन में" मानो ने रोटी और गुड़ उसके आगे रख दिया था। जसदेव कुछ अनमना-सा हो गया था। भूख तो उसे लगी थी। लेकिन मन के भीतर कहीं हिचक थी। घर-परिवार से बाहर निकले ज्यादा समय नहीं हुआ था। खुद वह कुछ भी बना नहीं पाया था। शरीर का पोर-पोर टूट रहा था। "भूख नहीं है।" जसदेव ने बहाना किया। "भूख नहींहै या कोई और बात है." मानो ने जैसे उसे सगे हथों पकड़ लिया था।
"और क्या बात हो सकती है?.." जसदेव ने सवाल किया। "तुम्हारे भइया कह रहे थे कि तुम बामन हो..इसीलिए मेरे हाथ की रोटी नहीं खाओगे। अगर यो बात है तो मैं जोर ना डालूँगी..थारी मजी..औरत हूँ..पास में कोई भूखा हो..तो रोटी का कौर गले से नीचे नहीं उतरता है..फिर तुम तो दिन-रात साथ काम करते हो.., मेरी खातिर पिटे..फिर यह बामन म्हारे बीच कहाँ से आ गया..?" मानो रुआसी हो गई थी। उसका गला रुँध गया था। रोटी लेकर वापस लौटने के लिए मुड़ी। जसदेव में साहस नहीं था उसे रोक लेने के लिए। उनके बीच जुड़े तमाम सूत्र जैसे अचानक बिखर गए थे। अपनी झोंड़ी में आकर चुपचाप लेट गई थी मानो। बिना कुछ खाए। दिन-भर की घटनाएँ उसके दिमाग में खलबली मचा रही थीं। जसदेव भूखा है, यह अहसास उसे परेशान कर रहा था। जसदेव को लेकर उसके मन में हलचल थी। उसे लग रहा था- जैसे जसदेव का साथ उन्हें ताकत दे रहा है। ऐसी ताकत जो सूबेसंह से लड़ने में हौसला दे सकती है। दो से तीन होने का सुख मानो महसूस करने लगी थी। सुकिया भी चुपचाप लेटा हुआ था। उसकी भी नींद उड़ चुकी थी। उसकी समझ में नहीं आ रहा था, क्या करे, इन्हींहालात में गाँव छोड़ा था। वे ही फिर सामने खड़े थे आखिर जाएँ तो कहाँ? सूबेसिंह से पार पाना आसान नहीं था। सुनसान जगह है कभी भी हमला कर सकता है। या फिर मानो को..विचार आते ही वह काँप गया था। उसने करवट बदली। मानो जाग रही थी। उसे अपनी ओर खींचकर सीने से चिपटा लिया था।
जसदेव ने भी पूरी रात जागकर काटी थी। सूबेसिंह का गुस्सैल चेहरा बार-बार सामने आकर दहशत पैदा कर रहा था। उसे लगने लगा था कि जैसे वह अचानक किसी षड्यंत्र में फँस गया है। उसे यह अंदाजा नहीं था कि सूबेसंह मारपीट करेगा। ऐसी कल्पना भी उसे नहीं थी। वह डर गया था। उसने तय कर लिया था, कि चाहे जो हो, वह इस पचड़े में नहीं पड़गा।
सुबह होते ही वह असगर ठेकेदार से मिला था। असगर ही उसे शहर से अपने साथ लाया था। जसदेव ने असगर ठेकेदार से अपने मन की बात कही। ठेकेदार ने उसे समझाते
हुए कहा था, "अपने काम से काम रखो। क्यों इनके चक्कर में पड़ते हो।" जसदेव के बदले हुए व्यवहार को मानो ने ताड़ लिया था। लेकिन उसने कोई प्रतिक्रिया जाहिर नहीं की थी। वह सहजता से अपने काम में लगी थी। वह जानती थी कि उनके बीच एक फ़ासला आ गया है। लेकिन वह चुप थी। सूबेसिंह को भी लगने लगा था कि मानो को फुसलाना आसान नहीं है। उसकी तमाम कोशिश निर्थिक साबित हुई थी। इसीलिए वह मानो और सुकिया को परेशान करने पर उतर आया था। उसने असगर ठेकेदार से भी कह दिया था कि उससे पूछे बगौर उन्हें मजदूरी का भुगतान न करे, न कोई रियायत ही बरते उनके साथा। मानो से कुछ छुपा नहीं था। सूबेसिंह की हरकतों पर उसकी नज़र थी। उसने अपने आप में निश्चय कर लिया था कि वह उसका मुकाबला करेगी। उठते-बैठते उसके मन में एक ही खयाल था। पक्की ईंटों का घर बनवाना है। लेकन सूबेसंह
सुकिया और मानो दिन-रत काम में जुटे थे। फिर भी हर महीने वे ज्यादा कुछ बचा नहीं पा रहे थे। पिछले दिनों उन्होंने दुगुनी ईटें पाथी थीं। उनके उत्साह में कोई कमी नहीं थी। एक ही उद्ेश्य था- पक्की ईटों का घर बनाना है। इसीलिए सूबेसिंह की ज्यादतियों को वे सहन कर रहे थे लेकिन एक तड़प थी दोनों में, जो उन्हे सँभाले हुए थी।
सूबेसिंह नित नए बहाने ढूढ़ लेता था, उन्हें तंग करने के, एक शीत युद्ध जारी था उनके बीच, सुकिया से ईंट पाथने का साँचा वापस ले लिया गया था। उसे भटे की मोरी का काम दे दिया था। मोरी का काम खतरनाक था। मानो डर गई थी। लेकिन सुकिया ने उसे हिम्मत बधाई थी, "काम से क्यूं डरना.."
सुकिया का साँचा जसदेव को दे दिया गया था। साँचा मिलते ही जसदेव के रंग बदल गए थे। वह मानो पर हुकुम चलाने लगा था। मानो चुपचाप काम में लगी रहती थी।
"कल तड़के ईंट पाथनी है। ईटें हटाकर जगह बना दे।" जसदेव आदेश देकर अपनी झोंपड़ी की ओर चला गया था। मानो ने पाथी ईटों को दीवार की शक्ल मे लगा दिया था। कच्ची ईटों को सुखाने के लिए दो, खड़ी दो आड़ी ईटें रखकर जालीदार दीवार बना दी थी। ईंट पाथने की जगह खाली करके ही मानो लौटकर झोंपड़ी में गई थी।
हैंडपंप पर भीड़ थी। सभी मजदूर काम खत्म करके हाथ-मुह धोने के लिए आ गए थे।
सुबह होने से पहले ही मानो उठ गई थी। उसे काम पर जाने की जल्दी थी।
चारों तरफ्र अँधेरा था। सुबह होने का वह इंतजार करना नहीं चाहती थी। उसने
जल्दी-जल्दी सुबह के काम निबटाए और ईंट पाथने के लिए निकल पड़ी थी।
सूरज निकलने में अभी देर थी। जसदेव से पहले ही वह काम पर पहुँच जाती थी। इक्का-दुक्का मजदूर ही इधर-उधर दिखाई पड़ रहे थे। वह तेज कदमों से ईंट
पाथने की जगह पर पहुँच गई थी। वहाँ का दृश्य देखकर अवाक रह गई थी। सारी
इटें टूटी-फूटी पड़ी थीं। जैसे किसी ने उन्हें बेददी से रौंद डाला था। ईटों की दयनीय
अवस्था देखकर उसकी चीख निकल गई थी। वह दहाड़़ं मार-मारकर रोने लगी थी।
आवाज सुनकर मजदूर इकदटा हो गए थे
जितने मुँह उतनी बातें सब अपनी-अपनी अटकलें लगा रहे थे। रात में आधी-तूफ़ान भी नहीं आया था। न ही किसी जंगली जानवर का ही यह काम हो
सकता है। कई लोगों का कहना था, किसी ने जान-बूझकर ईटें तोड़ी हैं मानो का हृदय फटा जा रहा था। टूटी-फूटी ईंटों को देखकर वह बौरा गई थी। जैसे किसी ने उसके पक्की ईंटों के मकान को ही धराशाई कर दिया था। जसदेव काफ़ी देर बाद आया था। वह निरपेक्ष भाव से चुपचाप खड़ा था। जैसे
इन टूटी-फूटी ईटों से उसका कुछ लेना-देना ही न हो। सुकिया भी हो-हल्ला सुनकर मोरी का काम छोड़कर आया था। ईटों की हालत
देखकर उसका भी दिल बैठने लगा था। उसकी जैसे हिम्मत टूट गई थी। वह
फटी-फटी आँखों से ईंटों को देख रहा था। सुकिया को देखते ही मानो और जोर-जोर से रोने लगी थी। सुकिया ने मानो की आँखों से बहते तेज अँधड़ों को देखा और उनकी किरकिराहट अपने अंत्मन में महसूस की। सपनों के टूट जाने की आवाज उसके कानों को फाड़ रही थी।
असगर ठेकेदार ने साफ़ कह दिया था। टूटी-फूटी ईंटें हमारे किस काम की? इनकी मजदूरी हम नहीं देंगे। असगर ठेकेदार ने उनकी रही-सही उम्मीदों पर भी पानी फेर दिया था। मानो ने सुकिया की ओर डबडबाई आँखों से देखा। सुकिया के चेहरे पर तूफ़ान में घर टूट जाने की पीड़ा छलछला आई थी। उसे लगने लगा था, जैसे तमाम लोग उसके खिलाफ हैं। तरह-तरह की बाधाएँ उसके सामने खड़ी की जा रही हैं। वहाँ रुकना उसके लिए कठिन हो गया था।
उसने मानो का हाथ पकड़ा, "चल! ये लोग म्हारा घर ना बणने देंगे।" पक्की ईटों के मकान का सपना उनकी पकड़ से फिसलकर और दूर चला गया था। भटे से उठते काले धुएँ ने आकाश तले एक काली चादर फैला दी थी। सब कुछ छोड़कर मानो और सुकिया चल पड़े थे। एक खानाबदोश की तरह, जिन्हें एक घर चाहिए था, रहने के लिए। पीछे छूट गए थे कुछ बेतरतीब पल, पसीने के अक्स जो कभी इतिहास नहीं बन सकेंगे। खानाबदोश जिंदगी का एक पड़ाव था यह भटा। सुकिया के पीछे-पीछे चल पड़ने से पहले मानो ने जसदेव की ओर देखा था। मानो को यकीन था, जसदेव उनका साथ देगा। लेकिन जसदेव को चुप देखकर उसका विश्वास टुकड़े-टुकड़ हो गया था। मानो के सीने में एक टीस उभरी थी। सर्द साँस में बदलकर मानो को छलनी कर गई थी। उसके होंठ फड़फड़ाए थे कुछ कहने के लिए लेकिन शब्द घुटकर रह गए थे। सपनों के काँच उसकी आँख में किरकिरा रहे थे वह भारी मन से सुकिया के पीछे-पीछे चल पड़ी थी, अगले पड़ाव की तलाश में, एक दिशाहीन यात्रा पर।
प्रश्न-अभ्यास
जसदेव की पिटाई के बाद मजदूरों का समूचा दिन कैसा बीता?
मानो अभी तक भटे की जंदगी से तालमेल क्यों नहीं बैठा पाई थी?
असगर ठेकेदार के साथ जसदेव को आता देखकर सूबे सिंह क्यों बिफर पड़ा और जसदेव को मारने का क्या कारण था?
जसदेव ने मानो के हाथ का खाना क्यों नहीं खाया?
लोगों को क्यों लग रहा था कि किसी ने जानबूझकर मानो की ईटें गिराकर रौंदा है?
मानो को क्यों लग रहा था कि किसी ने उसकी पक्की ईटों के मकान को ही धराशाई कर दिया है?
'चल! ये लोग म्हारा घर ना बणने देगे।' सुकिया के इस कथन के आधार पर कहानी की मूल संवेदना स्पष्ट कीजिए।
'खानाबदोश' कहानी में आज के समाज की किन समस्याओं को रेखांकित किया गया है? इन समस्याओं के प्रति कहानीकार के दृष्टिकोण को स्पष्ट कीजिए।
. सुकिया ने जिन समस्याओं के कारण गाँव छोड़ा वही समस्या शहर में भट्ठे पर उसे झेलनी पड़ी - मूलतः वह समस्या क्या थी?
- 'स्कल इंडिया' जैसा कार्क्रम होता तो क्या तब भी सुकिया और मानो को खानाबदोश जीवन व्यतित करना पड़ता?
निम्नलिखित पंक्तयों का आशय स्पष्ट कीजिए –
(क) अपने देस की सूखी रोटी भी परदेस के पकवानों से अच्छी होती है।
(ख) इते ढेर से नोट लगे हैं घर बणाने में। गाँठ में नहीं है पैसा, चले हाथी खरीदने।
(ग) उसे एक घर चाहिए था - पक्की ईंटों का, जहाँ वह अपनी गृहस्थी और परिवार के सपने देखती थी।
योग्यता-विस्तार
- अपने आसपास के क्षत्र में जाकर ईंटों के भटे को देखिए तथा ईटे बनाने एवं उन्हें पकाने की प्क्रिया का वर्णन अपने शब्दं में कीजिए।
- भट्ा-मजदूरों की सामाजिक एवं आरथिक स्थिति पर एक रिपोर्ट तैयार कीजिए।
- जाति प्रथा पर एक निबंध लिखिए।
शब्दार्थ और टिप्पणी
पाथना साँचे की सहायता से या यों ही हाथों से थोप-पीटकर ईट या उपला तैयार करना
मुआयना निरीक्षण
दड़बा मुगी इत्यादि को रखने के लिए बनाया गया छोटा घर
अंटी गाँठ, कमर के ऊपर धोती की लपेट जिसका इस्तेमाल रुूपये-पैसे रखने के लिए होता है
शिद्त से तीत्रता से lish
अंजाम परिणाम