लेखक परिचय
पांडेय बेचन शर्मा 'उग्र'

(सन् 1900-1967)
पांडेय बेचन शर्म 'उग्' का जन्म उत्र प्रेश के मि्जापुर जिले के चुनार नामक ग्राम में हुआ था। परिवार में अभावों के कारण उन्हें ्वस्थित शक्षा पाने का सुयोग नहीं मिला। मगर अपनी नैसगिक प्रतिभा और साधना से उन्होने अपने समय के अग्रणी गध शिल्पी के रूप में अपनी पहचान बनाई। अपने तेवर और शैली के कारण उग्र जी अपने समय के चर्चित लेखक रहे। अपने कवि मित्र निराला की तरह उन्हें भी पुरातनपथियों के कठोर विरोध का सामना करना पड़ा।
पत्रकारिता से उग्र जी का सक्रिय संबंध था। वे आज, विश्वमित्र, स्वदेश, वीणा, स्वराज्य और विक्रम के संपादक रहे, लेकिन मतवाला-मंडल के प्रमुख सदस्य के रूप में उनकी विशेष पहचान है।
उग्र जी ने शताधिक कहानियाँ लिखी हैं जो पंजाब की महारानी, रेशमी, पोली इमारत, चित्र-विचित्र, कंचन-सी काया, काल कोठरी, ऐसी होली खेलो लाल, कला का पुरस्कार आदि में संकलित हैं। चंद हसीनों के खतूत, बुधुआ की बेटी, दिल्ली का दलाल, मनुष्यानंद आदि अनेक यथार्थवादी उपन्यासों की रचना भी उन्होंने की। कहानी और उपन्यास के अतिरिक्त आत्मकथा, संस्मरण, रेखाचित्र आदि के क्षेत्ों में भी उनकी लेखनी गतिशील रही। उनकी आत्मकथा अपनी खबर साहित्य जगत में बहुच्ित है। उन्होंने महात्मा ईसा ( नाटक) और धुवधारण (खंडकाव्य) की भी रचना की है।
उग्र जी की कहानियों की भाषा सरल, अलंकृत और व्यावहारिक है, जिसमें उद्ू के व्यावहारिक शब्द भी अनायास ही आ जाते हैं। भावों को मूर्िमंत करने में इनकी भाषा अत्यधिक सजीव और सशक्त कही जा सकती है, जो पाठक
के मर्मस्थल पर सीधा प्रहार करती है। भावों के अनुरूप इनकी शैली भी व्यंगयपरक है। इनकी कहानियों में उसकी माँ, शाप, कला का पुरस्कार, जल्लाद और देशभक्त आदि विशेष प्रसिद्धव हैं।
उग्र जी प्रमचंदयुगीन कहानीकार हैं इसलए उस समय की मुख्य प्रवृत्ति - समाज सुधार इनकी कहानियों में भी मौजूद है। उसकी माँ कहानी देश की दुरवस्था से चितित युवा पीढ़ी के विद्रोह को नए रूप में प्रसतुत करती है। यह युवा पीढ़ी देश की दुरवस्था का ज़िम्मेदार शासन-तंत्र को मानती है तथा इस शासन-तंत्र को उखाड़ फेंकना चाहती है। दुष्ट, व्यक्त-नाशक राष्टर के सर्वनाश में अपना योगदान ही इस पीढ़ी का सपना है। यथार्थ के तूफ़ानों से बेपरवाह यह पीढ़ी जानती हैकि नष्ट हो जाना तो यहाँ का नियम है। जो संँवारा गया है, वह बिगड़ेगा ही। हमे दुर्बलता के डर से अपना काम नहीं रोकना चाहिए। कर्म के समय हमारी भुजाएँ दुबल नहीं, भगवान की सहस् भुजाओं की सखियाँ हैं।
नयी पीढ़ी का यह विद्रोही स्वर जहाँ राजसत्ता से विद्रोह की मशाल लिए खड़ा है, वहीं पूर्वती पीढ़ी का बुद्धजीवी समाज अपनी सुविधा के लिए राजसत्ता के तलवे चाटने को तैयार है। इन दोनों के बीच खड़ी है एक माँ, जो अपना बेटा चाहती है, अपना लाल और उसकी खुशहाली। समाज के दो सिरों के बीच खड़ी ममतामयी माँ लाख कोशिशों के बावजूद व्यवस्था की चक्की से अपने बेटे को बचा नहीं पाती। पूरी कथा में व्याप्त तत्कालीन जनमानस, स्वाधीनता आंदोलन तथा माँ की ममता का सजीव चित्रण पाठक को उद्वेलित करता है।
Chapter 7
उसकी माँ
दोपहर को जरा आराम करके उठा था। अपने पढ़ने-लिखने के कमरे में खड़ा-खड़ा बड़ी-बड़ी अलमारियों में सजे पुस्तकालय की ओर निहार रहा था। किसी महान लेखक की कोई कृति उनमें से निकालकर देखने की बात सोच रहा था। मगर, पुस्तकालय के एक सिरे से लेकर दूसरे तक मुझे महान ही महान नजर आए। कहीं गेटे, कहीं रूसो, कहीं मेज़नी, कहीं नीत्शे, कहीं शेक्सपीयर, कहीं टॉलस्टाय, कही हूगो, कहीं मोपासाँ, कहीं डिकेंस, स्पंसर, मैकाले, मिल्टन, मोलियर..उफ़! इधर से उधर तक एक-से-एक महान ही तो थे! आखिर मैं किसके साथ चंद मिनट मनबहलाव करूँ, यह निश्चय ही न हो सका, महानों के नाम ही पढ़ते-पढ़ते परेशान सा हो गया।
इतने में मोटर की पों-पों सुनाई पड़ी। खिड़की से झँका तो सुरमई रंग की कोई 'फिएट' गाड़ी दिखाई पड़ी। मैं सोचने लगा - शायद कोई मित्र पधारे हैं, अच्छा ही है। महानों से जान बची!
जब नौकर ने सलाम कर आनेवाले का का्ड दिया, तब मैं कुछ घबराया। उसपर शहर के पुलिस सुपरिटेंडेंट का नाम छपा था। ऐसे बेवक्त ये कैसे आए? पुलिस-पति भीतर आए। मैंने हाथ मिलाकर, चक्कर खानेवाली एक गद्दीदार कुरसी पर उन्हें आसन दिया। वे व्यापारिक मुसकराहट से लैस होकर बोले, "इस अचानक आगमन के लिए आप मुझे क्षमा करें"
"आजञा हो!" मैंने भी नम्रता से कहा। उन्होंने पाकेट से डायरी निकाली, डायरी से एक तसवीर। बोले, "देखिए इसे, ज़रा बताइए तो, आप पहचानते हैं इसको?" "हाँ, पहचानता तो हू" जरा सहमते हुए मैने बताया। "इसके बारे में मुझे आपसे कुछ पूछना है।" "पूछिए" "इसका नाम क्या है?" "लाल! मैं इसी नाम से बचपन ही से इसे पुकारता आ रहा हूँ। मगर, यह पुकारने का नाम है। एक नाम कोई और है, सो मुझे स्मरण नहीं।" "कहाँ रहता है यह?" सुपरिंेडेंटनेमेरी ओर देखकर पूछा। "मेरे बँगले के ठीक सामने एक दोमजिला, कच्चा-पक्का घर है, उसी में वह "बूढ़ी का नाम क्या है?" pud "जानकी।" "और कोई नहीं है क्या इसके परिवार में? दोनों का पालन-पोषण कौन करता है?" "सात-आठ वर्ष हुए, लाल के पिता का देहांत हो गया। अब उस परिवार में वह और उसकी माता ही बचे हैं उसका पिता जब तक जीवित रहा, बराबर मेरी जमींदारी का मुख्य मैनेजर रहा। उसका नाम रामनाथ था। वही मेरे पास कुछ हज्ार रुपए जमा कर गया था, जिससे अब तक उनका खर्चा चल रहा है। लड़का कालेज में पढ़ रहा है। जानकी को आशा है, वह साल-दो साल बाद कमाने और परिवार को सँभालने लगेगा। मगर क्षमा कीजिए, क्या मैं यह पूछ सकता हू कि आप उसके बारे में क्यों इतनी पूछताछ कर रहे हैं?" "यह तो मैं आपको नहीं बता सकता, मगर इतना आप समझ ले, यह सरकारी काम है। इसलिए आज मैंने आपको इतनी तकलीफ़ दी है।"
"अजी, इसमें तकलीफ़ की क्या बात है! हम तो सात पुश्त से सरकार के फ़रमाबरदार हैं। और कुछ आत्ा..."
"एक बात और..", पुलिस-पति नेगंभीरतापूर्वक धीर से कहा, "मैं मित्रता से आपसे निवेदन करता हूँ, आप इस परिवार से जरा सावधान और दूर रहें। फिलहाल इससे अधिक मुझे कुछ कहना नहीं"
"लाल की माँ!" एक दिन जानकी को बुलाकर मैने समझाया, "तुमहारा लाल आजकल क्या पाजीपन करता है? तुम उसे केवल प्यार ही करती हो न! हू भोगोगी!"
"क्या है, बाबू?" उसने कहा।
"लाल क्या करता है?"
"मैं तो उसे कोई भी बुरा काम करते नहीं देखती"
"बिना किए ही तो सरकार किसी के पीछे पड़ती नहीं। हाँ, लाल की माँ! बड़ी धर्मातमा, विवेकी और न्यायी सरकार है यह। जरूर तुम्हारा लाल कुछ करता होगा।"
"माँ! माँ!" पुकारता हुआ उसी समय लाल भी आया – लंबा, सुडौल, सुदर तेजस्वी।
"माँ!" उसने मुझेनमस्कार कर जानकी से कहा, "तू यहाँ भाग आई है। चल तो! मेरे कई सहपाठी वहाँ खड़ हैं, उन्हें चटपट कुछ जलपान करा दे, फिर हम घूमने जाएँगे!" (C)
"अरे!" जानकी के चेहरे की झुरियाँ चमकने लगीं, काँपने लगीं, उसे देखकर, "तू आ गया लाल! चलती हू, भैया! पर, देख तो, ते चाचा क्या शिकायत कर रहे हैं? तू क्या पाजीपना करता है, बेटा?"
"क्या है, चाचा जी?" उसने सविनय, सुमधुर स्वर में मुझसे पूछा, "मैंने क्या अपराध किया है?"
"मै तुमसे नाराज हूं लाल!" मैने गंभीर स्वर में कहा। "क्यों, चाचा जी?"
"तुम बहुत बुरे होते जा रहे हो, जो सरकार के विरुद्ध षड्यंत्र करनेवाले के साथी हो। हाँ, तुम हो! देखो लाल की माँ, इसके चेहरे का रंग उड़ गया, यह सोचकर कि यह खबर मुझे कैसे मिली।"
सचमुच एक बार उसका खिला हुआ रंग ज़रा मुरझा गया, मेरी बातों से! पर तुरंत ही वह सँभला।
"आपने गलत सुना, चाचा जी। मै किसी षड़यंत्रमें नहीं। हाँ, मेरे विचार स्वतंत् अवश्य हैं, मैं जरूरत-बेज़रूरत जिस-तिस के आगे उबल अवश्य उठता हूं। देश की दुरवस्था पर उबल उठता हूँ, इस पशु-हृदय परतंत्रता पर।"
"तुम्हारी ही बात सहीं, तुम षड्यंत् में नहीं, विद्रोह में नहीं, पर यह बक-बक क्यों? इससे फ़रायदा? तुम्हारी इस बक-बक से न तो देश की दुदशा दूर होगी और न उसकी पराधीनता। तुम्हारा काम पढ़ना है, पढ़ो। इसके बाद कर्म करना होगा, परिवार और देश की मर्यादा बचानी होगी। तुम पहले अपने घर का उद्ार तो कर लो, तब सरकार के सुधार का विचार करना।"
उसने नम्ता से कहा, "चाचा जी, कषमा कीजिए। इस विषय में मैं आपसे विवाद नहीं करना चाहता।"
"चाहना होगा, विवाद करना होगा मैं केवल चाचा जी नहीं,तुम्हार बहुत कुछ हू तुमहें देखते ही मेरी आँखों के सामने रामनाथ नाचने लगते है, तुम्हारी बूढ़ी माँ घूमने लगती है। भला मैं तुमहे बेहाथ होने दे सकता हूँ! इस भरोसे मत रहना।" "इस पराधीनता के विवाद में, चाचा जी, मैं और आप दो भिन्न सिरों पर हैं। आप कृटृर राजभक्त, मैं कृटृर राजविद्रोही। आप पहली बात को उचित समझते है - कुछ कारणों से, मैं दूसरी को दूसरे कारणों से। आप अपना पद छोड़़ नहीं सकते - अपनी प्यारी कल्पनाओं के लिए, मैं अपना भी नहीं छोड़़ सकता। " "तुम्हारी कल्पनाएँ क्या हैं, सुनूं तो! जरा मैं भी जान लू कि अबके लड़के कालेज की गरदन तक पहुँचते-पहुँचते कैसे-कैसे हवाई किले उठाने के सपने देखने लगते हैं। जरा मैं भी तो सुनू, बेटा।"
"मेरी कल्पना यह है कि जो व्यक्त समाज या राष्ट के नाश पर जीता हो उसका सर्वनाश हो जाए!"
जानकी उठकर बाहर चली, "अरे! तू तो जमकर चाचा से जूझने लगा। वहाँ चार बच्चे बेचारे दरवाजे पर खड़ होंगे। लड़ तू मैं जाती हूँ" उसने मुझसे कहा, "समझ
ा दो बाबू, मैं तो आप ही कुछ नहीं समझती, फिर इसे क्या समझाऊँग!" उसने फिर लाल की ओर देखा, "चाचा जो कहें, मान जा, बेटा। यह तेरे भले ही की कहेंगे।" वह बेचारी कमर झुकाए, उस साठ बरस की वय में भी घूँघट सँभाले, चली गई। उस दिन उसने मेरी और लाल की बातों की गंभीरता नहीं समझी "मेरी कल्पना यह है कि..", उत्तेजित स्वर में लाल ने कहा, "ऐसे दुष्ट, व्यक्त-नाशक राष्टर के सर्वनाश में मेरा भी हाथ हो। "
"तुम्हारे हाथ दुबल हैं, उनसे जिनसे तुम पंजा लेने जा रहे हो, चर-मर हो उठेंगे नष्ट हो जाएँगे।"
"चाचा जी, नष्ट हो जाना तो यहाँ का नियम है। जो सँवारा गया है, वह बिगड़ंगा ही। हमें दु्लता के डर से अपना काम नहीं रोकना चाहिए। कर्म के समय हमारी भुजाएँ दुबल नहीं, भगवान की सहस्त भुजाओं की सखियाँ हैं"
"जो भी मुझसे हो सकेगा, करूँगा"
"पड्यंतर?"
"जरूरत पड़ी तो जरूर."
"बेटा, तु्हारा माथा न जाने कौन सी किताब पढ़ते-पढ़ते बिगड़ रहा है। सावधान!"
मेरी धर्मपत्नी और लाल की माँ एक दिन बैठी हुई बातें कर रही थीं कि मै पहुँच गया। कुछ पूछने के लिए कई दिनों से मैं उसकी तलाश में था। "क्यों लाल की माँ, लाल के साथ किसके लड़के आते हैं तु्हारे घर में?" "मै क्या जानू, बाब!" उसने सरलता से कहा, "मगर वे सभी मेरे लाल ही की तरह मुझे प्यारे दिखते हैं सब लापरवाह! वे इतना हँसते, गाते और हो-हल्ला मचाते है कि मैं मुगध हो जाती हूँ"
मैने एक ठंडी सास ली, "हू, ठीक कहती हो। वे बातें कैसी करते हैं, कुछ समझ पाती हो?"
"बाबू, वे लाल की बैठक में बैठते हैं। कभी-कभी जब मैं उन्हें कुछ खिलाने-पिलाने जाती हूं तब वे बड़ प्रम से मुझे'माँ' कहते हैं मेरी छाती फूल उठती है..मानो वे मेरे ही बच्चे हैं"
"हू.", मैने फिर साँस ली।
"एक लड़का उनमें बहुत ही हँसोड़ है। खूब तगड़ा और बली दिखता है। लाल कहता था, वह डंडा लड़ने में, दौड़ने में, घूसेबाजी में, खाने में, छेड़खानी करने और हो-हो, हा-हा कर हँसने में समूचे कालेज में फ़स्ट है। उसी लड़के ने एक दिन, जब मैं उन्हें हलवा परोस रही थी, मेरे मुह की ओर देखकर कहा, 'माँ! तू तो ठीक भारत माता-सी लगती है। तू बूढ़ी, वह बूढ़ी। उसका उजला हिमालय है, तेरे केश। हाँ, नक्शे से साबित करता हू.तू भारत माता है। सिर तेरा हिमालय..माथे की दोनों गहरी बड़ी रेखाएँ गंगा और यमुना, यह नाक विध्याचल, ठोढ़ी कन्याकुमारी तथा छोटी बड़ी झुरियाँ-रेखाएँ भिन्न-भिन्न पहाड़ और नदियाँ हैं। ज़रा पास आ मेरे! तेरे केशों को पीछे से आगे बाएँ कंधे पर लहरा दू, वह ब्मा बन जाएगा। बिना उसके भारत माता का शृंगार शुद्ध न होगा'"
जानकी उस लड़के की बातें सोच गद्गद हो उठी, "बाबू, ऐसा ढीठ लड़का! सारे बच्चे हँसते रहे और उसने मुझे पकड़, मेरे बालों को बाहर कर अपना बर्मा तैयार कर लिया!"
उसकी सरलता मेरी आँखो में आँसू बनकर छा गई। मैने पूछा, "लाल की माँ, और भी वे कुछ बातें करते हैं? लड़ने की, झगड़ने की, गोला, गोली या बंदूक की?"
"अरे, बाबू" उसने मुसकराकर कहा, "वे सभी बातें करते हैं। उनकी बातों का कोई मतलब थोड़े ही होता है। सब जवान हैं, लापरवाह हैं। जो मुँह में आता है, बकते हैं। कभी-कभी तो पागलों-सी बातें करते है। महीनाभर पहले एक दिन लड़के बहुत
उतेजित थे। न जाने कहाँ, लड़कों को सरकार पकड़ रही है। मालूम नहीं, पकड़ती भी है या वे यों ही गप हाकते थे। मगर उस दिन वे यही बक रहे थे, 'पुलिसवाले केवल संदेह पर भले आदमियों के बच्चों को त्रास देते हैं, मारते हैं, सताते हैं। यह अत्याचारी पुलिस की नीचता है। ऐसी नीच शासन-प्रणाली को स्वीकार करना अपने धर्म को, कर्म को, आत्मा को, परमात्मा को भुलाना है। धीरे-धीरे घुलाना-मिटाना है।' एक ने उत्तेजित भाव से कहा, 'अजी, ये परदेसी कौन लगते है हमारे, जो बरबस राजभक्त बनाए रखने के लिए हमारी छाती पर तोप का मुँह लगाए अड़ और खड़ हैं। उफ्! इस देश के लोगों के हिये की आँखे मुद गई हैं (तभी तो इतने जुल्मों पर भी आदमी आदमी से डरता है। ये लोग शरीर की रक्षा के लिए अपनी-अपनी आत्मा की चिता सँवारते फिरते है। नाश हो इस परतंत्रवाद का!' दूसरे ने कहा, 'लोग जान न पा सकें, इसलिए इस सरकार ने हमारे पढ़ने-लिखने के साधनों को अज्ञान से भर रखा है। लोग वीर और स्वाधीन न हो सकें, इसलिए अपमानजनक और मनुष्यताहीन नीत-मद्दक कानून गढे हैं। गरीबों को चूसकर, सेना के नाम पर पले हुए पशुओं को शराब से, कबाब से, मोटा-ताजा रखती है यह सरकार। धीरे-धीरे जोंक की तरह हमारे ध्म, प्राण और धन चूसती चली जा रही है यह शासन-प्रणाली!'
'ऐसे ही अंट-संट ये बातूनी बका करते हैं, बाबू। जभी चार छोकरे जुटे, तभी यही चर्चां। लाल के साथियों का मिज़ाज भी उसी-सा अल्हड़-बिल्हड़ मुझे मालूम पड़ता है। ये लड़के ज्यों-ज्यों पढ़ते) जा रहे हैं त्यों-त्यों बक-बक में बढ़ते जा रहे हैं" "यह बुरा है, लाल की माँ!" मैंने गहरी साँस ली।
जमींदारी के कुछ ज़रूरी काम से चार-पाँच दिनों के लिए बाहर गया था। लौटने प
बँगले में घुसने के पूर्व लाल के दरवाजे पर नजर पड़ी तो वहाँ एक भयानक
सन्नाटा-सा नज़र आया - जैसे घर उदास हो, रोता हो। भीतर आने पर मेरी धर्मपती मेरे सामने उदास मुख खड़ी हो गई। "तुमने सुना?"
"नहीं तो, कौन सी बात?"
"लाल की माँ पर भयानक विपत्त टूट पड़ी है।"
मैं कुछ-कुछ समझ गया, फिर भी विस्तृत विवरण जानने को उत्तुक हो उठा, "क्या हुआ? जरा साफ़्-साफ़ बताओ।"
"वही हुआ जिसका तुमहें भय था। कल पुलिस की एक पलटन ने लाल का
घर घेर लिया था। बारह घटे तक तलाशी हुई। लाल, उसके बारह-पंद्रह साथी, सभी
पकड़ लिए गए हैं। सबके घरों से भयानक-भयानक चीजे निकली है।" "लाल के यहाँ?"
"उसके यहाँ भी दो पिस्तौल, बहुत से कारतूस और पत्र पाए गए हैं सुना है, उन पर हत्या, षड्यंत्र, सरकारी राज्य उलटने की चेष्टा आदि अपराध लगाए गए है"
"हू," मैने ठंडी सास ली "मैं तो महीनों सेचिल्ला रहा था कि वह लौडा धोखा देगा। अब यह बूढी बेचारी मरी। वह कहाँ है? तलाशी के बाद तुम्हारे पास आई थी?"
"जानकी मेरे पास कहाँ आई! बुलवाने पर भी कल नकार गई। नौकर से कहलाया, ' परंठे बना रही हूँ, हलवा, तरकारी अभी बनाना है, नहीं तो, वे बिल्हड़ बच्चे हवालात में मुरझा नजाएँगे। जेलवाले और उत्साही बच्चों की दुश्मन यह सरकार उन्हें भूखों मार डालेगी। मगर मेरे जीते-जी यह नहीं होने का'" "वह पागल है, भोगेगी," मैं दुख से टूटकर चारपाई पर गिर पड़ा मुझे लाल
के कर्मं पर घोर खेद हुआ।
इसके बाद प्राय: एक वर्ष तक वह मुकदमा चला। कोई भी अदालत के कागज उलटकर देख सकता है, सी.आई.डी. ने और उनके प्रुख सरकारी वकील ने उन लड़कों पर बड़े-बड़े दोषारोपण किए। उन्होंने चारों ओर गुप्त समितियाँ कायम की थीं, खर्च और प्रचार के लिए डाके डाले थे, सरकारी अधिकारियों के यहाँ रात में छापा मारकर शस्त्र एकत्र किए थे उन्होंने न जाने किस पुलिस के दारोगा को मारा था और न जाने कहाँ, न जाने किस पुलिस सुपरिंटेडेंट को। ये सभी बाते सरकार की ओर से प्रमाणित की गई।
उधर उन लड़कों की पीठ पर कौन था? प्राय: कोई नहीं। सरकार के डर के मारे पहले तो कोई वकील ही उन्हें नहीं मिल रहा था, फिर एक बेचारा मिला भी, तो 'नहीं' का भाई। हाँ, उनकी पैरवी में सबसे अधिक परेशान वह बूढ़ी रहा करती। वह लोटा, थाली, जेवर आदि बेच-बेचकर सुबह-शाम उन बच्चों को भोजन पहुँचाती। फिर वकीलों के यहाँ जाकर दाँत निपोरती, गिड़गिड़ाती, कहती, "सब झूठ है। न जाने कहाँ से पुलिसवालों ने ऐसी-ऐसी चीज़ें हमारे घरों से पैदा कर दी हैं। वे लड़के केवल बातूनी हैं। हाँ, मैं भगवान का चरण छूकर कह सकती हू, तुम जेल में जाकर देख आओ, वकील बाबू। भला, फूल-से बच्चे हत्या कर सकते हैं?" उसका तन सूखकर काँटा हो गया, कमर झुककर धनुष-सी हो गई, आँखें निस्तेज, मगर उन बच्चों के लिए दौड़ना, हाय-हाय करना उसने बंद न किया। कभी-कभी सरकारी नौकर, पुलिस या वा्डन झुझलाकर उसे झिड़क देते, धकिया देते।
उसको अंत तक यह विश्वास रहा कि यह सब पुलिस की चालबाजी है। अदालत में जब दूध का दूध और पानी का पानी किया जाएगा, तब वे बच्चे जरूर बेदाग छूट जाएँगे। वे फिर उसके घर में लाल के साथ आएँे। उसे 'माँ' कहकर पुकरेंगे। (C)
मगर उस दिन उसकी कमर टूट गई, जिस दिन ऊँची अदालत ने भी लाल को, उस बंगड़ लठैत को तथा दो और लड़कों को फाँसी और दस को दस वर्ष से सात वर्ष तक की कड़ी सजाएँ सुना दीं।
"माँ!" वह मुसकराया, "अरे, हमें तो हलवा खिला-खिलाकर तूने गधे-सा तगड़ा कर दिया है, ऐसा कि फॉसी की रस्सी टूट जाए और हम अमर के अमर बने रहें, मगर तू स्वयं सूखकर कॉटा हो गई है। क्यों पगली, तेरे लिए घर में खाना नहीं है क्या?"
"माँ!" उसके लाल ने कहा, "तू भी जल्द वहीं आना जहाँ हम लोग जा रहे हैं। यहाँ से थोड़ी ही देर का रास्ता है, माँ! एक सास मे पहुचेगी। वहीं हम स्वतंत्रता से मिलेंगे। तेरी गोद में खेलेंगे। तुझे कंधे पर उठाकर इधर से उधर दौड़ते फरेंगे।
समझती है? वहाँ बड़ा आनंद है।" "आएगी न, माँ?" बंगड ने पूछा। "आएगी न, माँ?" लाल ने पूछा। "आएगी न, माँ?" फाँसी-दंड प्रापत दो दूसरे लड़कों ने भी पूछा। और वह टुकुर-टुकुर उनका मुह ताकती रही - "तुम कहाँ जाओगे पगलो?"
जब से लाल और उसके साथी पकड़े गए, तब से शहर या मुहल्ले का कोई भी आदमी लाल की माँ से मिलने से डरता था उसे रास्ते में देखकर जाने-पहचाने बगलें झकने लगते। मेरा स्वयं अपार प्रम था उस बेचारी बूढी पर, मगर मैं भी बराबर दूर ही रहा। कौन अपनी गदरन मुसीबत में डालता, विद्रोही की माँ से संबंध रखकर?
उस दिन ब्यालू करने के बाद कुछ देर के लिए पुस्तकालय वाले कमरे में गया, किसी महान लेखक की कोई महान कृति ्षणभर देखने के लालच से। मैंने मेज़िनी की एक जिल्द निकालकर उसे खोला पहले ही पन्ने पर पेंसिल की लिखावट देखकर चौंका। ध्यान देने पर पता चला, वे लाल के हस्तक्षर थे। मुझे याद पड़ गई तीन वर्ष पूर्व उस पुस्तक को मुझसे माँगकर उस लड़के ने पढ़ा था। एक बार मेरे मन में बड़ा मोह उत्पन्न हुआ उस लड़के के लिए। उसके पिता रामनाथ की दिव्य और स्वगीय तसवीर मेरी आँखों के आगे नाच गई। लाल की माँ पर उसके सिद्ांतों, विचारों या आचरणों के कारण जो वज्रपात हुआ था, उसकी एक ठेस मुझे भी, उसके हस्तक्षर को देखते ही लगी। मेरे मुँह से एक गंभीर, लाचार, दुर्बल साँस निकलकर रह गई।
पर, दूसरे ही क्षण पुलिस सुपरिंटेडेंट का ध्यान आया। उसकी भूरी, डरावनी, अमानवी आँखें मेरी 'आप सुखी तो जग सुखी' आँखों में वैसे ही चमक गई, जैस
े ऊजड़ गाँव के सिवान में कभी-कभी भुतही चिनगारी चमक जाया करती है। उसके रूखे फ़ौलादी हाथ, जिनमें लाल की तसवीर थी, मानो मेरी गरदन चापने लगे। मैं मेज पर से रबर (इरेजर) उठाकर उस पुस्तक पर से उसका नाम उधेड़ने लगा। उसी समय मेरी पतलनी के साथ लाल की माँ वहाँ आई। उसके हाथ में एक पत्र था।
"अरे!" मैं अपने को रोक न सका, "लाल की माँ! तुम तो बिलकुल पीली पड़ गई हो। तुम इस तरह मेरी ओर निहारती हो, मानो कुछ देखती ही नहीं हो। यह हाथ में क्या है?"
उसने चुपचाप पत्र मेरे हाथ में दे दिया। मैने देखा, उसपर जेल की मुहर थी। सजा सुनाने के बाद वह वहीं भेज दिया गया था, यह मुझे मालूम था। मैं पत्र निकालकर पढ़ने लगा। वह उसकी अंतिम चि्ठी थी। मैने कलेजा रूखाकर उसे जोर से पढ़ दिया
"माँ!
जिस दिन तुम्हें यह पत्र मिलेगा, उसके सवेरे मैं बाल अरुण के किरण-रथ पर चढ़कर उस ओर चला जाऊँगा। मैं चाहता तो अंत समय तुमसे मिल सकता था, मगर इससे क्या फ़ायदा! मुझे विश्वास है, तुम मेरी जन्म-जन्मांतर की जननी ही रहोगी। मैं तुमसे दूर कहाँ जा सकता हूँ!
माँ! जब तक पवन साँस लेता है, सूर्य चमकता है, समुद्र लहराता है, तब तक कौन मुझे तुम्हारी करुणामयी गोद से दूर खींच सकता है? दिवाकर थमा रहेगा, अरुण रथ लिए खड़ा रहेगा! मैं, बँगड़-वह, यह सभी तेरे इंतज़ार में रहेंगे।
तेरा लाल"
काँपते हाथ से पढ़ने के बाद पत्र को मैने उस भयानक लिफ़फ़े में भर दिया। मेरी पत्नी की विकलता हिचकियों पर चढ़कर कमरे को करुणा से कँपाने लगी। मगर, वह जानकी ज्यों-की-त्यों, लकड़ी पर झुकी, पूरी खुली और भावहीन आँखों से मेरी ओर देखती रही, मानो वह उस कमरे में थी ही नहीं।
कषणभर बाद हाथ बढ़ाकर मौन भाषा में उसने पत् माँगा। और फिर, बिना कुछ कहे कमरे के फाटक के बाहर हो गई, डुगुर-डुगुर लाठी टेकती हुई। इसके बाद शून्य-सा होकर मैं धम से कुरसी पर गिर पड़ा। माथा चक्कर खाने लगा। उस पाजी लड़के के लिए नहीं, इस सरकार की क्रूरता के लिए भी नहीं, उस बेचारी भोली, बूढ़ी जानकी - लाल की माँ के लिए। आह! वह कैसी स्तब्ध थी। उतनी स्तब्धता किसी दिन प्रकृति को मिलती तो आँधी आ जाती। समुद्र पाता तो बौखला उठता।
जब एक का घंटा बजा, मैं ज़रा सगबगाया। ऐसा मालूम पड़ने लगा मानो हरारत पैदा हो गई है..माथे में, छाती में, रग-रग में। पतली ने आकर कहा, "बैठे ही रहोगे! सोओगे नहीं?" मैने इशारे से उन्हें जाने का कहा।
फिर मेजिनी की जिल्द पर नज़र गई। उसके ऊपर पड़े रबर पर भी। फिर अपने
सुखों की, जमींदारी की, धनिक जीवन की और उस पुलिस-अधिकारी की निदेय,
नीरस, निस्सार आँखों की स्मृति कलेजे में कंपन भर गई। फिर रबर उठाकर मैने
उस पाजी का पेंसिल-खचित नाम पुस्तक की छाती पर से मिटा डालना चाहा। "माँ ..........!!!
मुझे सुनाई पड़ा। ऐसा लगा, गोया लाल की माँ कराह रही है। मैं रबर हाथ में लिए, दहलते दिल से, खिड़की की ओर बढ़ा। लाल के घर की ओर कान लगाने पर सुनाई न पड़ा। मैं सोचने लगा, भ्रम होगा। वह अगर कराहती होती तो एकाध आवाज और अवश्य सुनाई पड़ती। वह कराहनेवाली औरत है भी नहीं। रामनाथ के मरने पर भी उस तरह नहीं घिघियाई जैसे साधारण स्रयाँ ऐसे अवसरों पर तड़पा करती हैं मैं पुन: सोचने लगा। वह उस नालायक के लिए क्या नहीं करती थी! खिलौने की तरह, आराध्य की तरह, उसे दुलराती और सँवारती फिरती थी। पर आह रे छोकरे! "माँ IIII
फिर वही आवाज। जरूर जानकी रो रही है। ज़रूर वही विकल, व्यथित, विवश बिलख रही है। हाय री माँ! अभागिनी वैसे ही पुकार रही है जैसे वह पाजी गाकर, मचलकर, स्वर को खींचकर उसे पुकारता था।
अँधेरा धूमिल हुआ, फीका पड़ा, मिट चला। उषा पीली हुई, लाल हुई। रवि रथ लेकर वहाँ क्षितिज से उस छोर पर आकर पवित्र मन से खड़ा हो गया। मुझे लाल के पत्र की याद आ गई।
"माँ.............!!!…."
मानो लाल पुकार रहा था, मानो जानकी प्रतिध्वन की तरह उसी पुकार को गा रही थी। मेरी छाती धक-धक करने लगी। मैंने नौकर को पुकारकर कहा, "देखो तो, लाल की माँ क्या कर रही है?"
जब वह लौटकर आया, तब मैं एक बार पुन: मेज और मेजिनी के सामने खड़ा था। हाथ में रबर लिए उसी उदेश्य से। उसने घबराए स्वर से कहा, "हुजूर, उनकी तो अजीब हालत है। घर में ताला पड़ा है और वे दरवाजे पर पाँव पसारे, हाथ में कोई चिटी लिए, मुह खोल, मरी बैठी हैं हाँ सरकार, विश्वास मानिए, वे मर गई हैं। साँस बंद है, आँखें खुलीं."
प्रश्न-अभ्यास
क्या लाल का व्यवहार सरकार के विरु्ध षड्यंत्रकारी था?
पूरी कहानी में जानकी न तो शासन-तंत्र के समर्थन में है न विरोध में, किंतु लेखक ने उसे केंद्र में ही नहीं रखा बल्क कहानी का शीर्षक बना दिया। क्यों?
चाचा जानकी तथा लाल के प्रति सहानुभूति तो रखता है किंतु वह डरता है। यह डर किस प्रकार का है और क्यों है?
4.इस कहानी में दो तरह की मानसिकताओं का संघर्ष है, एक का प्रतिनिधित्व लाल करता है और दूसरे का उसका चाचा। आपकी नजर में कौन सही है? तरकसंगत उतर दीजिए।
उन लड़कों ने कैसे सिद् किया कि जानकी सिर्फ माँ नहीं भारतमाता है? कहानी के आधार पर उसका चरित्र-चित्रण कीजिए।
वि्ोही की माँ से संबंध रखकर कौन अपनी गरदन मुसीबत में डालता? इस कथन के आधार पर उस शासन-तंत्र और समाज-व्यवस्था पर प्रकाश डालिए।
चाचा ने लाल का पेंसिल-खचित नाम पुस्तक की छाती पर से क्यों मिटा डालना चाहा?
भारत माता की छव या धारणा आपके मन में किस प्रकार की है?
जानकी जैसी भारत माता हमारे बीच बनी रहे, इसके लिए 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' के संदर्भ में विचार कीजिए।
1 निम्नलिखित का आशय स्पष्ट कीजिए –
(क) पुलिसवाले केवलधीरे-धीरे घुलाना-मिटाना है।
(ख) चाचा जी, नष्ट हो जाना. सहस्र भुजाओं की सखियाँ हैं।
योगयता-विस्तार
- पुलिस के साथ दोस्ती की जानी चाहिए या नहीं? अपनी राय लिखिए।
- लाल और उसके साथियों से आपको क्या प्रेरणा मिलती है?
- 'उसकी माँ' के आधार पर अपनी माँ के बारे में एक कहानी लिखिए।
शब्दार्थ और टिप्पणी
पुश्त
फ़रमाबरदार आज्ञाकारी, सेवक
दुरवस्था पाजीपन ot to बदमाशी बुरी हालत
हसोड़ हसमुख प्रवृत्ति का
नीति-मर्दक कानून नीति को मिटाने वाला, नष्ट करने वाला कानून
बंगड़ शरारती
ब्यालू रात का भोजन
बाल अरुण सुबह-सुबह का सूर्य, (लालिमायुक्त)