लेखक परिचय
भारतेंदु हरिश्चंद्र

(सन् 1850-1885)
भारतेंदु हरिश्चंद्र का जन्म काशी में हुआ था। उनका व्यक्त्व देश-प्रम और क्रांति-चेतना से समृद्ध था। किशोर वय में ही उन्होंने स्वदेश की दुदेशा का त्रासद अनुभव कर लिया था।
भारतेंदु हरिश्चंद्र पुनजागरण की चेतना के अप्रतिम नायक थे। बंगाल के प्रख्यात मनीषी और पुनजागरण के विशिष्ट नायक ईश्वरचंद्र विद्यासागर से उनका अंतरंग संबंध था। बंधन-मुक्ति की चेतना और आधुनिकता की रोशनी से हिंदी क्षेत्र को आलोकित करने के लिए उनका मानस व्याकुल रहता था। अपनी अभीप्सा को मूर्त करने के लिए उन्होंने समानधर्मा रचनाकारों को प्रेरित-प्रोत्साहित किया, तदीय समाज की स्थापना की, पत्र-पत्रिकाएँ प्रकाशित कीं, विविध विधाओं में साहित्य-रचना की। उन्होंने कविवचनसुधा नामक पत्रिका निकाली तथा हरिश्िंद्र मैगज़ीन का संपादन किया। बाद में यही हरश्चंद्र चंद्रिका नाम से प्रकाशित होने लगी।
स्री-शक्षा के लिए उन्ोने बाला बोधिनी पत्िका का प्रकाशन किया। उन्होंने बांला के नाटकों का अनुवाद भी किया, जिनमें धनंजय विजय, विद्ा सुंदर, पाखंड विडंबन, सत्य हरिश्चंद्र तथा मुद्वाराक्षस आदि प्रमुख हैं। उनके मौलिक नाटक है - वैदिकि हिंसा हिंसा न भवति, श्री चंद्रावली, भारत दु्दशा, अंधेर नगरी, नील देवी आदि।
भारतेंदु हरश्ंदर की धारणा के मुताबिक सन् 1873 में 'हिंदी नई चाल में ढली'। यह 'चाल' शिल्प और संवेदना की दृष्ट से सरवथा नवीन थी। खड़ी बोली गछ में हिंदी की यात्रा जातीय संवेदना से अनुप्राणित होकर शुरू हुई थी, जिसे भारतेंद हरिश्चं्र और उनके समकालीन रचनाकारों ने अपनी साधना से अपेक्षित गति दी।
हिंदी नाटक और निबंध की परंपरा भारतेद से शुरू होती है। भारतेंदु हरिश्चंद्र का प्रभाव उनके समकालीनों पर स्पष्ट
देखा जा सकता है। आधुनिक हिंदी गदछ के विकास में उनका उल्लेखनीय योगदान है। उन्होंने अपने समकालीन लेखकों का तो नेतृत्व किया ही, साथ ही परवर्ती लेखकों के लिए पथ-प्रदर्शक का कार्य भी किया। यहाँ पाठ्यपुस्तक के लिए उनका बलिया के ददरी मेले में दिया गया व्याख्यान चुना गया है।
भारतवर्ष की उन्नति कैसे हो सकती है? भारतेंदु का प्रसिद्ध भाषण है। इसमे एक ओर ब्रिटिश शासन की मनमानी पर व्यंगय है, तो दूसरी ओर अंग्ेज़ों के परिश्रमी स्वभाव के प्रति आदर भी है। भारतेंदु ने आलसीपन, समय के अपव्यय आदि कमियों को दूर करने की बात करते हुए भारतीय समाज की रूढ़ियों और गलत जीवन शैली पर भी प्रहार किया है। जनसंख्या-नियंत्रण, श्रम की महता, आत्मबल और त्याग-भावना को भारतेंदु ने उन्नति के लिए अनिवार्य माना है और अत्यंत प्रेरक ढंग से इसे व्यक्त किया है।
भारतवर्ष की उन्नति कैसे हो सकती है?
आज बड़े ही आनंद का दिन है कि इस छोटे-से नगर बलिया में हम इतने मनुप्यों को बड़े उत्साह से एक स्थान पर देखते हैं। इस अभागे आलसी देश में जो कुछ हो जाए वही बहुत कुछ है। बनारस ऐसे-ऐसे ब़ नगरों में जब कुछ नहीं होता तो यह हम क्यों न कहेंगे कि बलिया में जो कुछ हमने देखा, वह बहुत ही प्रशंसा के योग्य है। इस उत्साह का मूल कारण जो हमने खोजा, तो प्रगट हो गया कि इस देश के भाग्य से आजकल यहाँ सारा समाज ही ऐसा एकत्र है। जहाँ रॉबर्ट साहब बहादुर जैसे कलेक्टर हों, वहाँ क्यं न ऐसा समाज हो। जिस देश और काल में ईश्वर ने अकबर को उत्पन्न किया था, उसी में अबुल फज़ल, बीरबल, टोडरमल को भी उत्पन्न किया। यहाँ राँब्ट साहब अकबर है, तो मुंशी चतुभुज सहाय, मुंशी बिहारीलाल साहब आदि अबुल फजल और टोडरमल हैं। हमारे हिंदुस्तानी लोग तो रेल की गाड़ी हैं। यद्यप फस्ट क्लास, सेकेंड क्लास आदि गाड़ी बहुत अच्छी-अच्छी और बड़े-बड़ महसूल की इस ट्रेन में लगी हैं पर बिना इंजिन ये सब नहीं चल सकतीं, वैसे ही हिंदस्तानी लोगों को कोई चलानेवाला हो, तो ये क्या नहीं कर सकते। इनसे इतना कह दीजिए, "'का चुप साधि रहा बलवाना'" फिर देखिए कि हनुमान जी को अपना बल कैसे याद आ जाता है। सो बल कौन याद दिलावे या हिंदस्तानी राजे-महाराजे या नवाब रईस या हाकिमा। राजे-महाराजों को अपनी पूजा, भोजन, झूठी गप से छुटी नहीं। हाकिमों को
कुछ तो सरकारी काम घेरे रहता है, कुछ बॉल, घुड़दौड़, थिएटर, अखबार में समय गया। कुछ समय बचा भी तो उनको क्या गरज है कि हम गरीब गंदे काले आदमियों से मिलकर अपना अनमोल समय खोवैं। बस वही मसल हुई - "तुम्हें गैरों से कब फुरसत हम अपने गम से कब खाली। चलो, बस हो चुका मिलना न हम खाली न तुम खाली।" तीन मेंढक एक के ऊपर एक बैठे थे। ऊपरवाले ने कहा 'जौक शौक', बीचवाला बोला, 'गुम सुम', सबके नीचेवाला पुकारा 'गए हम'। सो हिंुस्तान की माथषाा मता सी तणा गनी भै मा बमा।
पहले भी जब आर्य लोग हिदुस्तान में आकर बसे थे, राजा और ब्राहणों ही के जिम्मे यह काम था कि देश में नाना प्रकार की विद्या और नीति फैलावैं और अब भी ये लोग चाहैं तो हिंदुस्तान प्रतिदिन कौन कहै, प्रतिछिन बढै। पर इन्हीं लोगों को सारे संसार के निकम्मेपन ने घेर रक्खा है। "बौद्ारो मत्सरग्स्ता अभव: स्मरदूषिता:।" हम नहीं समझते कि इनको लाज भी क्यों नहीं आती कि उस समय में जब इनके पुरुषों के पास कोई भी सामान नहीं था तब उन लोगों ने जंगल में पते और मिट्टी की कुटियों में बैठकर बाँस की नलियों से जो तारा ग्रह आदि वेध करके उनकी गति लिखी है, वह ऐसी ठीक है कि सोलह लाख रुूपये के लागत की विलायत में जो दूरबीनें बनी हैं उनसे उन ग्रहों को वेध करने में भी वही गति ठीक आती है और जब आज इस काल में हम लोगों को अंग्रेजी विद्या की ओर जगत की उन्नत की कृपा से लाखों पुस्तकें और हजारों यंत्र तैयार हैं। तब हम लोग निरी चुंगी की कतवार फेकने की गाड़ी बन रहे हैं। यह समय ऐसा है कि उन्नति की मानो घुड़दौड़ हो रही है। अमेरिकन, अंग्रेज फ़रांसीस आदि तुरकी ताजी सब सरपट दौड़े जाते हैं सबके जी में यही है कि पाला हमीं पहले छू लें। उस समय हिंदू काठियावाड़ी खाली खड़े-खड़ टाप से मिटी खोदते हैं। इनको, औरों को जाने दीजिए, जापानी टृओं को हाँफते हुए दौड़ते देखकर भी लाज नहीं आती। यह समय ऐसा है कि जो पीछे रह जाएगा, फिर कोटि उपाय किए भी आगे न बढ़ सकैगा। इस लूट में, इस बरसात में भी जिसके सिर पर कमबख्ती का छाता और आँखों में मूख्खता की पटटी बँधी रहे उन पर ईश्वर का कोप ही कहना चाहिए।
मुझको मेरे मित्ों ने कहा था कि तुम इस विषय पर आज कुछ कहो कि हिंदुस्तान की कैसे उन्नति हो सकती है। भला इस विषय पर मैं और क्या कहू भागवत' में एक श्लोक है - "नृदेहमाधं सुलभं सुदु्लभं प्लवं सुकल्पं गुरु कर्णधारं। मया5नुकूलेन नभ: स्वतेरितुं पुमान् भवाब्धं न तरेत् स आत्महा।" भगवान कहते हैं कि पहले तो मनु्य जनम ही बड़ा दुल्भ है, सो मिला और उस पर गुरु की कृपा और मेरी अनुकूलता। इतना सामान पाकर भी जो मनु्य इस संसार-सागर के पार न जाए, उसको आत्महत्यारा कहना चाहिए। वही दशा इस समय हिंदुस्तान की है। अंग्ेज़ों के राज्य में सब प्रकार का सामान पाकर, अवसर पाकर भी हम लोग जो इस समय पर उन्नति न करें तो हमारा केवल अभाग्य और परमेश्वर का कोप ही है। सास के अनुमोदन से एकांत रात में सूने रंगमहल में जाकर भी बहुत दिन से जिस प्रान से प्यार परदेसी पिति से मिलकर छाती उंडी करने की इच्छा थी, उसका लाज से मुँह भी न देखे और बोले भी न, तो उसका अभाग्य ही है। वह तो कल फिर परदेस चला जाएगा। वैसे ही अंग्रेजों के राज्य में भी जो हम कूए के मेंढक, काठ के उल्लू, पिंजड़ के गंगाराम ही रहैं तो हमारी कमबखत कमबख्ती फिर कमबख्ती है। बहुत लोग यह कहैंगे कि हमको पेट के धंधे के मारे छुटी ही नहीं रहती बाबा, हम क्या उन्नति करैं? तुम्हारा पेट भरा है तुमको दून की सूझती है। यह कहना उनकी बहुत भूल है। इंलैंड का पेट भी कभी यों ही खाली था। उसने एक हाथ से अपना पेट भरा, दूसरे हाथ से उन्नति की राह के कॉँटों को साफ़ किया। क्या इंगलैंड में किसान, खेतवाले, गाड़ीवान, मजदूर, कोचवान आदि नहीं हैं? किसी देश में भी सभी पेट भरे हुए नहीं होते। किंतु वे लोग जहाँ खेत जोते-बोते हैं वहीं उसके साथ यह भी सोचते है कि ऐसी और कौन नई कल या मसाला बनावैं, जिसमें इस खेती में आगे से दूना अन्न उपजै। विलायत में गाड़ी के कोचवान भी अखबार पढ़ते हैं। जब मालिक उतरकर किसी दोस्त के यहाँ गया उसी समय कोचवान ने गदी के नीचे से अखबार निकाला। यहाँ उतनी देर कोचवान हुक्का पिएगा या गप्प करेगा। सो गप्प भी निकम्मी। वहाँ के लोग गप्प ही में देश के प्रबंध छाँटते हैं सिद्ात यह कि वहाँ के लोगों का यह सिद्छांत है कि एक छिन भी व्र्थ न जाए।
उसके बदले यहाँ के लोगों में जितना निकम्मापन हो उतना ही वह बड़ा अमीर समझा जाता है। आलस यहाँ इतनी बढ़ गई कि मलूकदास ने दोहा ही बना डाला — "अजगर करै न चाकरी, पंछी करे न काम। दास मलूका कह गए, सबके दाता राम। " चारों ओर आँख उठाकर देखिए तो बिना काम करनेवालों की ही चारों ओर बढ़ती है। रोजगार कहीं कुछ भी नहीं है, अमीरों की मुसाहबी, दल्लाली या अमीरों के नौजवान लड़कों को खराब करना या किसी की जमा मार लेना, इनके सिवा बतलाइए और कौन रोजगार है। जिससे कुछ रूपया मिलै। चारों ओर दरिद्रता की आग लगी हुई है। किसी ने बहुत ठीक कहा है कि दरिद्र कुटुंबी इस तरह अपनी इज्ज़त को बचाता फिरता है, जैसे लाजवंती कुल की बहू फटे कप़ों में अपने अंग को छिपाए जाती है। वही दशा हिंदुस्तान की है।
मदुमशुमारी की रिपोर्ट देखने से स्पष्ट होता है कि मनुष्य दिन-दिन यहाँ बढ़ते जाते हैं और रुपया दिन-दिन कमती होता जाता है। तो अब बिना ऐसा उपाय किए काम नहीं चलैगा कि रूपया भी बढ़ और वह रुपया बिना बुद् बढ़ न बढ़गा भाइयो, राजा-महाराजों का मुँह मत देखो, मत यह आशा रक्खो कि पंडित जी कथा में कोई ऐसा उपाय भी बतलावैंगे कि देश का रुपया और बुद्द ब़। तुम आप ही कमर कसो, आलस छोड़ो कब तक अपने को जंगली हूस मू्ख बोदे डरपोकने पुकरवाओगे। दौड़ो, इस घोड़दौड़ में जो पीछे पड़ तो फिर कहीं ठिकाना नहीं है। "फिर कब राम जनकपुर ऐहैं" अबकी जो पीछे पड़े तो फिर रसातल ही पहुँचोगे। जब पृथ्वीराज को कैद करके गोरे ले गए तो शहाबुदीन के भाई गियासुद्वीन से किसी ने कहा कि वह शब्दभेदी बाण बहुत अच्छा मारता है। एक दिन सभा नियत हुई और सात लोहे के तावे बाण से फोड़ने को रखे गए। पृथ्वीराज को लोगों ने पहले ही से अंधा कर दिया था। संकेत यह हुआ कि जब गियासुद्वीन 'हू' करे तब वह तावों पर बाण मारे। चंद कव भी उसके साथ कैदी था। यह सामान देखकर उसने यह दोहा पढ़ा। "अबकी चढ़ी कमान, को जानै फिर कब चढ़। जिन चुक्के चौहान, इक्के मारय इक्क सर।" उसका संकेत समझकर जब गियासुद्वीन ने 'हू' किया तो पृथ्वीराज ने उसी को बाण मार दिया। वही बात अब है। अबकी चढ़ी, इस समय
में सरकार का राज्य पाकर और उन्नति का इतना सामान पाकर भी तुम लोग अपने को न सुधारो तो तुम्हीं रहो और वह सुधारना भी ऐसा होना चाहिए कि सब बात में उन्नति हो। धर्म में, घर के काम में, बाहर के काम में, रोजगार में, शिष्टाचार में चाल-चलन में, शरीर के बल में, मन के बल में, समाज में, बालक में, युवा में, वृद्ध में, सत्री में, पुरूष में, अमीर में, गरीब में, भारतवर्ष की सब अवस्था, सब जाति सब देश में उन्नति करो। सब ऐसी बातों को छोड़ो जो तुम्हारे इस पथ के कंटक हों, चाहे तुम्हैं लोग निक्मा कहैं या नंगा कहैं कृस्तान कहं या श्रष्ट कहैं। तुम केवल अपने देश की दीनदशा को देखो और उनकी बात मत सुनो।
अपमानं पुरस्कृत्य मानं कृत्वा तु पृष्ठतः। स्वकार्य साधयेत्धीमान् कार्यध्वंसो हि मूर्खता।
जो लोग अपने को देश हितैषी लगाते हों, वह अपने सुख को होम करके, अपने धन और मान का बलिदान करके कमर कस के उठो। देखादेखी थोड़े दिन में सब हो जाएगा। अपनी खराबियों के मूल कारणों को खोजो। कोई धर्म की आड़़ में, कोई देश की चाल की आड़ में, कोई सुख की आड़ में छपे हैं। उन चोरों को वहाँ-वहाँ से पकड़-पकड़कर लाओ। उनको बाँध-बाँधकर कैद करो। हम इससे बढ़कर क्या कहे कि जैसे तुम्हारे घर में कोई पुरुष व्यभिचार करने आवै तो जिस क्रोध से उसको पकड़कर मारोगे और जहाँ तक तुम्हारे में शक्त होगी उसका सत्यानाश करोगे। उसी तरह इस समय जो-जो बातें तुम्हरे उन्नत-पथ में काँटा हों, उनकी जड़ खोदकर फेंक दो। कुछ मत डरो। जब तक सौ-दो सौ मनुष्य बदनाम न होंगे, जात से बाहर न निकाले जाएँगे, दरिद्र न हो जाएँगे, कैद न होंगे, वरंच जान से न मारे जाएँगे तब तक कोई देश भी न सधरैेगा।
अब यह प्रश्न होगा कि भाई, हम तो जानते ही नहीं कि उन्नति और सुधरना किस चिड़िया का नाम है। किसको अच्छा समझैं? क्या लें, क्या छोड़ं? तो कुछ बातै जो इस शीऽ्रता में मेरे ध्यान में आती हैं, उनको मैं कहता हूं, सुनो — सब उन्नतियों का मूल धर्म है। इससे सबके पहले धर्म की ही उन्नति करनी उचित है। देखो, अगरेज़ों की धर्मनीति और राजनीति परस्पर मिली है, इससे उनकी
दिन-दिन कैसी उन्नति है। उनको जाने दो, अपने ही यहाँ देखो! तुमहारे यहाँ धर्म की आड़ में नाना प्रकार की नीति, समाज-गठन, वै्यक आदि भरे हुए हैं। दो-एक मिसाल सुनो। यही तुम्हारा बलिया का मेला और यहाँ स्नान क्यों बनाया गया है? जिसमें जो लोग कभी आपस में नहीं मिलते, दस-दस, पाँच-पाँच कोस से वे लोग साल में एक जगह एकत्र होकर आपस में मिलें। एक-दूसरे का दुःख-सुख जानैं। गृहस्थी के काम की वह चीजें जो गाँव में नहीं मिलती, यहाँ से ले जाएँ। एकादशी का ब्रत क्यों रखा है? जिसमें महीने में दो-एक उपवास से शरीर शुद् हो जाए। गंगा जी नहाने जाते हो तो पहिले पानी सिर पर चढ़ाकर तब पैर डालने का विधान क्यों है? जिसमें तलुए से गरमी सिर में चढ़कर विकार न उत्पन्न करे। दीवाली इसी हेतु है कि इसी बहाने साल-भर में एक बेर तो सफाई हो जाए। होली इसी हेतु है कि बसंत की बिगड़ी हवा स्थान-स्थान पर अगन बलने से स्वच्छ हो जाए। यही तिहवार ही तुम्हारी मानो म्युनिसिपालिटी हैं। ऐसे ही सब पर्व, सब ती्थ त्रत आदि में कोई हिकमत है। उन लोगों ने धर्मनीति और समाजनीति को दूध-पानी की भाँति मिला दिया है। खराबी जो बीच में भई है वह यह है कि उन लोगों ने ये धर्म क्यों मानने लिखे थे, इसका लोगों ने मतलब नहीं समझा और इन बातों को वास्तविक धर्म मान लिया। भाइयो, वास्तविक ध्म तो केवल परमेश्वर के चरण कमल का भजन है। ये सब तो समाज धर्म हैं जो देशकाल के अनुसार शोधे और बदले जा सकते हैं दूसरी खराबी यह हुई कि उन्हीं महात्मा बुद्धमान ऋृषियों के वंश के लोगों ने अपने बाप-दादों का मतलब न समझकर बहुत से नए-नए धर्म बनाकर शासत्रो में धर दिए। बस सभी तिथ-ब्रत और सभी स्थान तीर्थ हो गए। सो इन बातों को अब एक बेर आँख खोलकर देख और समझ लीजिए कि फलानी बात उन बुद्धमान ऋृषियों ने क्यों बनाई और उनमें देश और काल के जो अनुकूल और उपकारी हों, उनको ग्रहण कीजिए। बहुत सी बातं जो समाज-विरुद्ध मानी हैं, किंतु धर्मशास्तरो में जिनका विधान है, उनको चलाइए। जैसे जहाज का सफ़र, विधवा-विवाह आदि। लड़कों को छोटेपन ही में ब्याह करके उनका बल, वीर्य, आयुष् सब मत घटाइए। आप उनके माँ-बाप है या उनके शचुहै? वीर्य उनके शरीर में पुष्ट होने दीजिए, विदया कुछ पढ़ लेने दीजिए; नोन, तेल, लकड़ी की फ़िक्र करने की बुद्ध
सीख लेने दीजिए - तब उनका पैर काठ में डालिए। कुलीन-प्रथा, बहु-विवाह आदि को दूर कीजिए। लड़कियों को भी पढ़ाइए, किंतु उस चाल से नहीं जैसे आजकल पढ़ाई जाती हैं जिससे उपकार के बदले बुराई होती है। ऐसी चाल से उनको शिक्षा दीजिए कि वह अपना देश और कुलधर्म सीखें, पति की भक्त करैं और लड़कों को सहज में शिक्षा दें। वैष्णव, शाक्त इत्यादि नाना प्रकार के मत के लोग आपस का वैर छोड़ दें। यह समय इन झगड़ों का नहीं। हिंदू, जैन, मुसलमान सब आपस में मिलिए। जाति में कोई चाहे ऊँचा हो चाहे नीचा हो, सबका आदर कीजिए, जो जिस योग्य हो उसको वैसा मानिए। छोटी जाति के लोगों को तिरस्कार करके उनका जी मत तोड़िए। सब लोग आपस में मिलिए।
मुसलमान भाइयों को भी उचित है कि इस हिंदुस्तान में बसकर वे लोग हिंुओं को नीचा समझना छोड़ दें। ठीक भाइयों की भाँत हंुओं से बरताव करें। ऐसी बात, जो हिंदुओं का जी दुखानेवाली हों, न करें। घर में आग लगै, तब जिठानी - घौरानी को आपस का डाह छोड़कर एक साथ वह आग बुझानी चाहिए। जो बात हिंदुओं को नहीं मयस्सर हैं, वह धर्म के प्रभाव से मुसलमानों को सहज प्ाप्त हैं। उनमें जाति नहीं, खाने-पीने में चौका-चूल्हा नहीं, विलायत जाने में रोक-टोक नहीं। फिर भी बड़ ही सोच की बात है, मुसलमानों ने अभी तक अपनी दशा कुछ नहीं सुधारी। अभी तक बहुतों को यही जान है कि दिल्ली, लखनऊ की बादशाहत कायम है। यारो! वे दिन गए। अब आलस, हठधमी यह सब छो़ो। चलो, हिंदुओं के साथ तुम भी दौड़ो, एक-एक दो होंगे। पुरानी बातैं दूर करो। मीरहसन की 'मसनवी' और 'इंदरसभा' पढ़ाकर छोटेपन ही से लड़कों को सत्यानाश मत करो। होश सम्हाला नहीं कि पट्टी पार ली, चुस्त कपड़ा पहना और गजल गुनगुनाए। "शौक तिफ्ली से मुझे गुल की जो दीदार का था। न किया हमने गुलिस्ताँ का सबक याद कभी"। भला सोचो कि इस हालत में बड़ होने पर वे लड़के क्यों न बिगड़ंगे। अपने लड़कों को ऐसी किताबैं छूने भी मत दो। अच्छी-से-अच्छी उनको तालीम दो। पिनशिन और वज्जीफा या नौकरी का भरोसा छोड़ो। लड़कों को रोजगार सिखलाओ। विलायत भेज
ो। छोटेपन से मिहनत करने की आदत दिलाओ। सौ-सौ महलों के लाड़-प्यार दुनिया से बेखबर रहने की राह मत दिखलाओ।
भाई हिंुओ! तुम भी मत-मतांतर का आग्रह छोड़ो। आपस में प्रम बढ़ाओ। इस महामंत्र का जाप करो। जो हिंदुस्तान में रहे, चाहे किसी रंग, किसी जाति का क्यों न हो, वह हिंदू। हिंदू की सहायता करो। बंगाली, मराठा, पंजाबी, मदरासी, वैदिक, जैन, ब्रह्ो, मुसलमान सब एक का हाथ एक पकड़ो। कारीगरी जिसमें तुम्हारे यहाँ बढ़, तुम्हारा रूपया तुम्हरे ही देश में रहे वह करो। देखो, जैसे हजार धारा होकर गंगा समुदर में मिली हैं, वैसे ही तुम्हारी लक्ष्मी हजार तरह से इंगलैंड, फरांसीस, जर्मनी, अमेरिका को जाती हैं दीआसलाई ऐसी तुच्छ वस्तु भी वहीं से आती है। जरा अपने ही को देखो तुम जिस मारकीन की धोती पहने हो वह अमेरिका की बिनी है। जिस लंकिलाट का तुम्हारा अंगा है वह इंगलैंड का है। फरांसीस की बनी कंघी से तुम सिर झारते हो और जर्मनी की बनी चरबी की बत्ती तुमहरे सामने बल रही है। यह तो वही मसल हुई कि एक बेफ़िकरे मँगनी का कपड़ा पहिनकर किसी महफिल में गए। कपड़े को पहिचानकर एक ने कहा, 'अजी यह अंगा तो फलाने का है।' दूसरा बोला, 'अजी टोपी भी फलाने की है।' तो उन्होंने हँसकर जवाब दिया कि 'घर की तो मूछे ही मूछैं हैं' हाय अफ़सोस, तुम ऐसे हो गए कि अपने निज के काम की वस्तु भी नहीं बना सकते। भाइयो, अब तो नींद से चौंको, अपने देश की सब प्रकार उन्नति करो। जिसमें तुम्हारी भलाई हो वैसी ही किताब पढ़ो, वैसे ही खेल खेलो, वैसी ही बातचीत करो। परदेशी वस्तु और परदेशी भाषा का भरोसा मत रखो। अपने देश में अपनी भाषा में उन्नति करो
प्रश्न-अभ्यास
पाठ के आधार पर स्पष्ट कीजिए कि 'इस अभागे आलसी देश में जो कुछ हो जाए वही बहुत कुछ है' क्यों कहा गया है?
'जहॉँ रॉब्ट साहब बहादुर जैसे कलेक्टर हों, वहाँ क्यों न ऐसा समाज हो' वाक्य में लेखक ने किस प्रकार के समाज की कल्पना की है?
जिस प्रकार ट्ेन बिना इंजिन के नहीं चल सकती ठीक उसी प्रकार 'हिंदुस्तानी लोगों को कोई चलानेवाला हो' से लेखक ने अपने देश की खराबियों के मूल कारण खोजने के लिए क्यों कहा है?
देश की सब प्रकार से उन्नति हो, इसके लिए लेखक ने जो उपाय बताए उनमें से किन्हीं चार का उदाहरण सहित उल्लेख कीजिए।
लेखक जनता से मत-मतांतर छोड़कर आपसी प्रेम बढ़ाने का आग्रह क्यों करता है?
आज देश की आरथिक स्थिति के संदर्भ में नीचे दिए गए वाक्य का आशय स्पष्ट कीजिए- 'जैसे हजार धारा होकर गंा समुद में मिली है, वैसे ही तुम्हारी लक्षमी हजार तरह से इं्लैंड, फरांसीस, जर्मनी, अमेरिका को जाती हैं'
आपके विचार से देश की उन्नति किस प्रकार संभव है? कोई चार उदारहण तर्क सहित दीजिए।
भाषण की किन्हीं चार विशेषताओं का उल्लेख कीजिए। उदाहरण देकर सिद्ध कीजिए कि पाठ 'भारतवर्ष की उन्नत कैसे हो सकती है?' एक भाषण है।
'अपने देश में अपनी भाषा में उन्नति करो' से लेखक का क्या तात्परय है? वर्तमान संदर्भं में इसकी प्रासंगिता पर अपने विचार प्र्तुत कीजिए।
.निम्मलिखित ग्यांशों की व्याख्या कीजिए
(क) सास के अनुमोदन से*. फिर परदेस चला जाएगा। (ख) दरिद्र कुटुंबी इस तरह 'वही दशा हिंदुस्तान की है। (ग) वास्तविक धर्म तो…. .शोधे और बदले जा सकते हैं।
योग्यता-विस्तार
- देश की उन्नति के लिए भारतेंदु ने जो आहान किया है उसे विस्तार से लिखिए।
2 पाठ में आए बोलचाल के शब्दों की सूची बनाइए और उनके अर्थ लिखिए।
3 भारतेंदु उदू में किस उपनाम से कविताएँ लिखते थे? उनकी कुछ उदू कविताएँ ढूँढ़कर लिखिए।
4पृथ्वीराज चौहान की कथा अपने शब्दोंमें लिखिए।
शब्दार्थ और टिप्पणी
महसूल कर, टैक्स चुंगी की कतवार - म्युनिसिपालिटी का कचरा रंगमहल भोग-विलास का स्थान कमबख्ती अभागापन मद्वुमशुमारी जनगणना तिफ्ली बचपन से संबधित