
13]
पेड़ की बात
क्या आपनेकभी कोई बीज बोया है? बीज सेपेड़बने की कहान बहुत रोचक है कैसे अंकर फूता है पौधा नता है,धीरधी बढ़ता है और बड़ा पड़ बन जाता है आइए जानते है पेड़ की बात..
बहुत दिनों तक मिटी के नीचे बीज पड़े रहे। इसी तरह महीना-दर-महीना बीतता गया। सर्ियों के बाद वसंत आया उसके बाद वर्ष की शुरूुआत में दो-एक दिन पानी बरसा। अब और छिपे रहने की आवश्यकता नहीं थी! मानों बाहर से कोई शिशु को पुकार रहा हो, और सोए मत रहो, ऊपर उठ जाओ, सूरज की रोशनी देखो' आहिस्ता-आहिस्ता बीज का ढक्कन दरक गया, दो सुकोमल पत्तियों के बीच अंकुर बाहर निकला। अंकुर का एक अंश नीचे माटी में मज़बूती से गड़ गया और दूसरा अंश माटी भेदकर ऊपर की ओर उठा क्या तुमने अंकुर को उठते देखा है? जैसे कोई शिशु अपना न्हा-सा सिर उठाकर

क है, उसे तना कहते हैं सभी पेड़-पौधो में 'जड़ व तना' ये दो भाग मिलेंगे। यह एक आश्चर्य की बात है कि पेड़-पौधों को जिस तरह ही
रखो, जड़ नीचे की ओर जाएगी व तना ऊपर की ओर उठेगा। एक गमले में
पौधा था परीक्षण करने के लिए कुछ दिन गमले को औधा लटकाए रखा। पौधे का सिर नीचे की तरफ लटका रहा और जड़ ऊपर की
ओर रही। दो-एक दिन बाद क्या देखता हूँ कि जैसे पौधे को भी सब भेद मालूम हो गया हो उसकी सब पतियाँ और डालियाँ टेढ़ी होकर ऊपर की तरफ उठ आई तथा जड़ घूमकर नीचे की ओर लटक गईं तुमने कई बार सर्दियों में मूली काटकर बोई होगी। देखा होगा, पहले पते व फूल नीचे की ओर रहे कुछ दिन बाद देखोगे कि पत्े और
हम जिस तरह भोजन करते हैं पेड़-पौधे भी उसी तरह भोजन करते हैं हमारे दाँत हैं, कठोर चीज खा सकते हैं न्हें बच्चों के दाँत नहीं होते वे केवल दध पी सकते हैं पेड़-पौधों के भी दाँत नहीं होते, इसलिए वे केवल तरल द्व्य या वायु से भोजन ग्रहण करते हैं पेड़-पौधे जड़ के द्ारा माटी से रस-पान करते हैं चीनी में पानी डालने पर चीनी गल जाती है। माटी में पानी डालने पर उसके भीतर बहुत-से द्व्य गल जाते हैं। पेड़-पौधे वे ही तमाम द्व्य सोखते हैं जड़ों को पानी न मिलने पर पेड़ का भोजन बंद
हो जाता है, पेड़ मर जाता है।
सूक्षमद्ी से अत्यंत सूकष्म पदार्थ स्पष्ट रूप से देखे जा सकते हैं पड़ की डाल अथवा जड़ का इस यंत्रद्वारा परीक्षण करके देखा जा सकता है क पे़में हज़ारों-हज़ार नल हैं। इन्हीं सब नलों केद्ारा माटी से पेड़ के शरीर में रस का संचार होता है। इसके अलावा वृक्ष के पते हवा से आहार ग्रहण करते हैं। पत्तोंमें अनगिनत छोटे-छोटे मुह हते हैसुकष्मदशी के ज़रिए अनगिनत मुह पर अनगिनत हों देखे जा सकते हैं जब आहार करने की जरूरत न हो तब दोनों होंठ बंद हो जाते हैं जब हम श्वास-प्रश्वास ग्रहण करते हैं तब प्रशवास के साथ एक प्रकार की विषाक्त वायु बाहर निकलती है, उसे अंगारक' वायु कहतेहैं अगर यह जहरीली हवा पृथ्वी पर इकट्ठी होती
रहे तो तमाम जीव-जंतु कुछ ही दिनों ें उसका सेवन करके नष्ट हो सकते हैं जरा विधाता की करुणा का चमत्कार तो देखो, जो जीव-जंतुओं के लिए जहर है, पेड़-पौधे उसी का सेवन करके उसे पूर्णतया शुद् कर देते हैं पेड़ के पत्तोंपर
जब सूर्य का प्राश पड़ता है, तब पते सू्य-ऊर्जा के सहारे 'अंगारक' वायु से अंगार निःशेष कर डालते हैं। और यही अंगार वृक्ष के शरीर में प्रवेश करके उसका संवद्दन करते हैं। पेड़-पौधे प्रकाश चाहते हैं। प्रकाश न मिलने पर ये बच नहीं सकते। पेड़-पौधों की सवाधिक कोशिश यही रहती है कि किसी तरह उन्हें थोड़ा-सा प्रकाश मिल जाए। यदि खिड़की के पास गमले में पौधा रखो, तब देखोगे कि सारी पतियाँ व डालियाँ अंधकार से बचकर प्रकाश की ओर बढ़ रही है। वन-अरण्य में जाने पर पता लगेगा कि तमाम पेड़-पौधे इस होड़ में सचेष्ट हैं कि कौन जल्दी से सिर उठाकर पहले प्रकाश को झपट ले। बेल-लताएँ छाया में पड़ी रहने से, प्रकाश के अभाव में मर जाएँगी। इसलिए वे पेड़ों से लिपटती हुई, निरंतर ऊपर की ओर अग्रसर होती रहती हैं। अब तो समझ गए होंगे कि प्रकाश ही जीवन का मूलमंत्रहै। सूर्य-किरण का स्पर्श पाकर ही पेड़ पल्लवित होता है। पेड़-पौधों के रेशे-रेशे में सूरज की किरणे आबद्ध हैं ईधन को जलाने पर जो प्रकाश व ताप बाहर प्रकट होता है, वह सूर्य की ही ऊर्ा है। पेड़-पौधे व समस्त हरियाली प्रकाश हथियाने के जाल हैं पशु-डाँगर, पेड़-पौधे या हरियाली खाकर अपने प्रणों का निवाह करते हैं पेड़-पौधों में जो सूर्य का प्रकाश समाहित है वह इसी तरह जंतुओं के शरीर मेंप्रवेश करता है। अनाज व सब़्जी न खाने पर हम भी बच नहीं सकते हैं सोचकर देखा जाए तो हम भी प्रकाश की खुराक पाने
पर ही जीवित हैं।
कोई-कोई पे़ एक वर्ष के बाद ही मर जात हैं। सब पेड़ मरने से पहले संतान छोड़ जाने के लिए व्यग्रहै बीज ही उनकी संतान ह। बीज की सुरकषा व सार-सँभाल के लिए पेड़ फूल की पंखुड़ियों से घिरा एक छोटा-सा घर तैयार करता है फूलो से आच्छादित होने पर पेड़ कितना सुंदर दिखलाई पड़ता है जैसे फूल-फूल के बहाने वह स्वयं हंस रहा हो। फूल की तरह सुदर चीज और क्या है? ज़रा सोचो तो, पेड़-पौधे तो मटमैली माटी से आहार व विषाक्त वायु से अंगारक ग्रहण करते हैं फिर इस अपरूप उपादान से किस तरह ऐसे सुदर फूल खिलते हैं तुमने कथा तो सुनी होगी—स्पर्शमण की अर्थात पारस पत्थर की, जिसके स्पर्श से लोहा सोना हो जाता है। मेरे विचार से माँ की मता ही वह मणि है। संतान पर स्नेह न्योछावर होते ही फूल खिलखिला उठते है। ममता का स्प्श पाते ही मानो माटी व अंगार के फूल बन जाते हैं
पेड़ों पर मुस्कराते फूल देखकर हमें कितनी खुशी होती है! शायद पेड़ भी कम प्रफुल्लत नहीं होते! खुशी के मौके पर हम अपने परिजनों को निमंत्ित करते है। उसी प्रकार फूलों की बहार छाने पर पेड़-पौधे भी अपने बधु-बाधवों को बुलाते हैं स्ेहिसिक्त वाणी में पुकार सकते हैं "कहाँ हो मेरे बंधु, मेरे बाधव, आज मेरे घर आओ। यदि रास्ता भटक जाओ, कहीं घर पहचान नहीं सको, इसलिए रंग-बिरंे फूलों के निशान लगा रखे हैं ये ंगीन पंखुड़ियाँ दूर से देख सकोगे।" मधुमक्खी व तितली के साथ वृक्ष की चिरकाल से घनिष्ठता है। वे दल-बल सहित फूल देखने आती हैं कुछ पतंगे दिन के समय पक्षियों के डर से बाहर नहीं निकल सकते। पक्षी उन्हें देखते ही खा जाते हैं इसलिए रात का अँधेरा घिरने तक वे छिपे रहते हैं शाम होते ही उन्हेंबुलाने की खातिर फूल चारोंतरफ सुगंध-ही-सुगंध फैला देते हैं वृक्ष अपने फूलों में शहद का संचय करके रखते हैं। मधु-मक्खी व तितली बड़ चाव से मधुपान करती हैं मधु-मक्खी के आगमन से वृक्ष का भी उपकार होता है
तुम लोगों ने फू में पराग-कण देखे होंगे मधुमक्ियाँ एक फूल के पराग-कण दूसरे फूल पर ले जाती हैं पराग-कण के बिना बीज पक नहीं सकता। इस प्रकार फूल में बीज फलता है। अपने शरीर का रस पिलाकर वृक्ष बीजों का पोषण करता है। अब अपनी ज़िंदगी के लिए उसे मोह-माया का लोभ नहीं है। तिल-तिल कर संतान * की खातिर सब-कुछ लुटा देता है जो शरीर कुछ दिन पहले हरा-भरा था, अब वह बिल्कुल सूख गया है अपने ही शरीर का भार उठाने की शक्त ्षीण हो चली है। पहले हवा बयार करती हुई आगे बढ़ जाती थी। पते हवा के संग क्रीड़ा करते थे
छोटी-छोटी डालियाँ ताल-ताल पर नाच उठती थीं अब सूखा पेड़ हवा का आघात
सहन नहीं कर सकता। हवा का बस एक थपेड़ा लगते ही वह थर-थर काँपने लगता
है। एक-एक करके सभी डालियाँ टूट पड़ती हैं अंत में एक दिन अकस्मात पेड़ जड़
सहित भूमि पर गिर पड़ता है। इस तरह संतान के लिए अपना जीवन न्योछावर करके वृक्ष समाप्त हो जाता है। लेखक— जगदीशचंद्र बसु अनुवादक शंकर सेन
लेखक से परिचय
प्रसिद्ध वैज्ानिक जगदीशचंद्र बसु का बचपन प्रकृति का अवलोकन करते हए बीता पेड़पौों, जीव-जंतुओ से प्रेम करतेहुए उनकी शक्षाआरंभ हु वेजीववि्ञान, भौतिकी, वनस्पति विजान तथा विजान कथा लेखन में ूचि रखने वाले एक बहुविद व्यक्त थे उन्होने सिद्ध किया कि पौधों का एक निश्चत जीवनचक्र व एक प्रजनन प्रणाली होती है और वे अपने परिवेश के प्रति जागरूक होते हैं। इस प्रका वे यह स्थापित करने वाले विश्व के पहले व्यूक्त थे कि पौधे किसी भी अन्य जीव रूप के समान होते हैं विज्ञान जैसे विषय को भी चित्रा्मक साहित्यक स्वरूप प्रदान करने वाले जगदीशचंद् बसुने सर्प्रथम रडियो तरंगोंकेद्वा संचा स्थापत कर एक बड़ीवैजञानिक खोज की थी 'पेड़ की बात का बांग्ला से हिंदी में अनुवाद शंकर सेन ने किया है।

(1858–1937)
पाठ से
मेरी समझ से
(क) नीचे दिए गएप्र्नों का सटीक उत्तर कौन-सा है? उसके सामने ता (%) बनाइए (1) "जैसे पौधे को भी सब भेद मालूम हो गया हो" पौधे को कौन-सा भेद पता लग गया?
उसे उल्टा लटकाया गया है। उसे किसी ने सजा दी है। बच्चे को गमला रखना नहीं आया। प्रकाश ऊपर से आ रहा है।
(2) पेड़-पौधे जीव-जंतुओंके मित्रकैसे हैं?
हमारे जैसे ही साँस लेते हैं।
हमारे जैसे ही भोजन ग्रहण करते हैं। हवा को शुद करके सहायता करते हैं। धरती पर हमारे साथ ही जन्मे हैं
(ख) अब अपने मित्ों के साथ चर्चा कीजिए और कारण बताइए कि आपने ये उत्तर ही क्यों चुनें? (C)
पंक्तियों पर चर्चा
पाठ में से चुनकर कुछ पंक्तियाँ नीचे दी गई हं इन्हे ध्यान से पढिए और इन पर विचार कीजिए। आपको इनका क्या अर्थ समझ में आया? अपने विचार अपने समूह में साझा कीजिए और अपनी लेखन पुस्तिकामें लिखिए।
(क) पेड़-पौों ेरेशेशेमें सूरज की किरणें आबद् हैं इधन को जलाने पर जो प्रकाश व ताप बाहर प्रकट होता है, वह सूर्य की ही ऊर्जा है"
(ख) "मधुमक्खी व तितली के साथ वृक्ष की चिरकाल से घनिष्ठता है। वे दल-बल सहित फूल देखने आती हैं"
मिलकर करें मिलान
पाठ में से चुनकर कुछ वाक्यांश नीचे दिए गए हैं। अपने समूह में इन पर चर्चा कीजिए और इन्हें इनके सही अर्थ या संदर्भ से मिलाइए। इसके लिए आप शब्दकोश, इंटरनेट या अपने शिक्षकों की सहायता ले सकते हैं।
| वाक्यांश | अर्थ या संदर्भ | |
| 1. | बीज का ढक्कन दरक गया 1. | मटमैली माटी और विषाक्त वायु से सुदर-सुदर फूलोंमें परिवि्तितहोते हैं |
| 2. | उसे 'अंगारक' वायु कहते हैं | जीवन के लिए सू्य का प्रकाश 2. आधारशक्त या महत्वपूर्ण है |
| 3. | प्े सूर्य ऊर्जा के सहारे 3. 'अंगारक' वायु से अंगार निःशेष कर डालते हैं | अपनी संपन्नता और भावी पीढ़ी की उत्पत्त से प्रसन्न-संतुष्ट। |
| 4. | प्रकाश ही जीवन का मूलमंत्र है | साँस छोड़ने पर निकलने वाली वायु-कार्बन डाईआक्साइड। |
| 5. | जैसे फूल-फूल के बहाने वह स्वयं हँस रहा हो | सूर्य के प्रकाश से पत्ते विषाक्त वायु के प्रभाव को नष्ट कर देते हैं |
| 6. | उपादान से किस इस अपरूप तरह ऐसे सुंदर फूल खिलते हैं | बीज के दोनों दलों में दरार आ 6. गई या फट गए। |
सोच-विचार के लिए
पाठ को एक बार फिर से पढिए, पता लगाइए और लिखिए
(क) बीज के अंकुरित होने में किस-किस का सहयोग मिलता है? (ख) पौधे अपना भोजन कैसे प्रापत करते हैं?
लेख की रचना
इस लेख में एक के बाद एक विचार को लेखक ने सुसंगत रूप से प्र्तुत किया है। गमले को औधा लटकाना या मूली काटकर बोना जैसे उदाहरण देकर बात कहना इस लेख का एक तरीका है। अपने तथ्य को वास्तविकता या व्यावहारिकता से जोड़ना भी इस लेख की विशेषता है।
(क) जैसे लेखक ने पे़ की बात' कही है वैसे ही अपने आस-पास की चीज़े देखिए और किसी एक चीज़ पर लेख लिखिए, जैसे—गेहू की बाता।
(ख) उसे कक्षा में सबके साथ साझा कीजिए
अनुमान या कल्पना से
अपने समूह में मिलकर चर्चा कीजिए।
(क) "इस तरह संतान के लिए अपना जीवन न्योछावर करके वृक्ष समाप्त हो जाता है" वक्ष
प्रवाह चार्ट
बीज से बीज तक की यात्ा का ओरेख पूरा कीज़िए

म
ि्टी के किसी भी पात्रे मिट्ीभरकर उसमे राजमा या चने के 4-5 बीज बो दीजिए।
हल्का-सा पानी छिड़क दीजिए।
3-4 दिन तक थोड़ा-थोड़ा पानी डालिए।
1 अब इसमें आए परिवर्तन लेखन पुस्तकामें लिखिए।
(संकेत— एक दिन में पौधे की लंबाई कितनी बढ़ती है, कितने पते निकले प्रकाश की तरफ़ पौधे मुड़े या नहीं आदि।)
शब्दों के रूप
नीचे दिए गए चित्र को देखिए
यहा मिद्ीसे जु़े कुछ शब्द नीचे दिए गए हैं जो उसकी वशेषता बता रहे है अब आपेड़, सदी, ूर्य जैसे शब्दों की विशेषता बताने वाले शब्द बॉक्स बनाकर लिखिए

पा
ठ से आगे
मेरे प्रिय
नीचे दी गई तालिका से प्त्येक के लिए अपनी पसंद के तीन-तीन नाम लिखिए
| फूलC | पक्षी | वृक्षट | पुस्तक | खेल |
आज की पहेली
इस शब्द सीढ़ में पाठ में आए शब्दहैं उ्हेंपूरा कीजिए और पाठ े रेखांकित कीजिए

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जगदीशचंद्र बसु
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आओ बच्चो तुमहें दिखाएँ झॉकी हिंुस्तान की
वंदे मातरम्ा वंदे मातरम्। उत्तर में रखवाली करता पर्वतराज विराट है दक्षण में चरणों को धोता सागर का सप्राट है जमुना जी के तट को देखो गंगा का ये घाट है बाट-बाट में हाट-हाट में यहाँ निराला ठाठ है देखो, ये तस्वीरें अपने गौरखव की अभिमान की इस मिटी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की आओ बच्ो तुमहें दिखाएँ डॉकी हिंुस्तान की इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की
वंदे मातरम् वंदे मातरम्! ये है अपना राजपूताना नाज इसे तलवारों पे
इसने सारा जीवन काटा बरछी तीर कटारो पे
ये प्रताप का वतन पला है आज़ादी के नारों े
कूद पड़ी थी यहाँ हज़ारों पदिमनियाँ अंगारों प
बोल रही है कण-कण सेकुबनी राजस्थान की
इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की वंदे मातरम्। वंदे मातरम्।
देखो, मुल्क मराठों क ये यहाँ शिवाजी डोला था मुगलों की ताकत को जिसने तलवारोंपे तोला था हर पर्वत पे आग जली थी हर पत्थर एक शोला था बोली हर-हर महादेव की बच्चा-बच्चा बोला था शेर शिवाजी ने रखी थी लाज हमारी शान की इस मिटटी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की
वंदे मातरम्। वंदे मातर् जलियँवाला बाग ये देखो, यहीं चली थी गोलियाँ ये मत पूछो किसने खेली यहाँ खून की होलियाँ एक तरफ बंदरे दन-दन एक तरफ थी टोलियाँ मरनेवाले बोल रहे थेइंकलाब की बोलियाँ यहाँ लगा दी बहनों ने भी बाजी अपनी जान की इस मिट्टी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की
वंदे मातरम्ा वंदे मातरम्ा
ये देखो बंगाल यहाँ का हर चप्पा हरियाला है
यहाँ का बच्चा-बच्चा अपने देश पे मरनेवाला है
ढाला है इसको बिजली ने भूचालों ने पाला है
मुी में तू्रान बधा है और प्राणमें ज्चाला है
जन्मभूम है यही हमरे वीर सुभाष महान की
इस मिट्ी से तिलक करो ये धरती है बलिदान की वंदे मातरम्। वंदे मातरम्!
यहाँ आपके लिए एक छोटा-सा शब्दकोश दिया गया है इस शब्दकोश में वे शब्द हैं जो विभिन्न पाठों में आए हैं और आपके लिए नए हो सकते हैं किसी-किसी शब्द के कई अर्थ भी हो सकते हैं पाठ के संदर्भ से जोड़कर आप यह अनुमान स्वयं लगाएँ कि कौन-सा अर्थ पाठ के लिए अधिक उपयुक्त है। कहीं-कहीं शब्दोंके अनेक समानाथी भी दिए गए हैं इससे आप प्रसंग के अनुसार अनुकूल शब्द का चयन करना सीख सकेंगे। यह शब्दकोश आपको शब्दों के न केवल सही अर्थ जानने में मदद करेगा अपितु शब्दों की सही वर्तनी भी सिखाएगा
शब्द का अर्थ देने से पहले मूल शब्द के बाद कोष्क में एक संकेताक्षर दिया गया है। इन संकेतों से हमें शब्दों की भाषा और व्याकरण संबंधी जानकारी मिलती है यहाँ जो संकेताक्षर अथवा संक्षिप्त रूप प्रयु्त हुए हैं वे इस प्रकार हैं
अं.- अंग्रेज़ी अ.- अव्यय (अ.)- अरबी अ.क्र.- अकर्मक क्रिया पु. पुलिंग फा.- फारसी वि.विशेषण सं.- संस्कृत स.क्रि.- सकर्मक क्रिया सर्व.- सर्वनाम स्त्री. स्त्रीलिंग
शब्दार्थ
अ
अंुर पु.सं.]-कली, नोंक, रोआँ, जल, सिर, विकास आदि के सूचक चिह
अंगारक [प.स.का्बन, छोटा, अंगारा
अकस्मात [अ.सं.]- अचानक, संयोगवश, सहसा, बिना कारण
अचंभित [वि.] चकित, विस्मित
अधर [वि.सं.]– होंठ, नीचा, अंतरक्ष, पाताल
अधीर [विसं] धै्यरहित, उतावला, आकुल, दृढ़तारहित
अनगिनत [वि.] बेहिसाब, अगणित
अनुमति [स्रीस. -कोई काम करने, जाने-आने आदि के लिए किसी से ली गई स्वीकृति
अपरूप विसं. कुरू, रदा, अपर्व
अप्रेटिस [पु.अं.]-काम सीखन के लिए काम करने वाला व्यक्ति
अभिलाषा [स्त्ी.सं.] इच्छा, चाह, लोभ
अमराई [स्री]- आम का बाग, उद्यान
अमावस [सत्री.] कृष्ण पक्ष की अंतिम रात्रि अमावस्या
अर-मस्तक [पु.सं.-शत्रु का माथा
अपण [पु.सं देना, दान कना, ेट कना, वापस कना
असबाब [पु.(अ)]–आवश्यक सामग्री चीज़, व्त, मुसाफिर के साथ का सामान
असुर [पु.सं.] _दैत्य, दानव, खल, बादल
अस्तबल [पु.(अ.)– अश्वशाला, तबेला
आ
आगमन [पु.सं.]-लौटना, आना, प्राप्ति, उत्पत्ति आघात [पु.सं.] चोट, प्रहार, धक्का, घाव आच्छादित [वि.सं.]-ढक हुआ, छिपा हुआ आत्मबल [प.]- आत्मा का बल, मन का बल आबद्ध [वि.सं.]–बँधा हुआ, बाधित, जक़ा हुआ, नि्मित आहिस्ता [अ.फा.]-धीरे-से, धीमी आवाज़ से
उ
उदारता [स्त्री.सं.]- दानशीलता, उदार स्वभाव उपादान [पु.सं.]- ग्रहण, स्वीकार, वह द्व्य जिससे कोईवस्तु बने, प्रयोग
क
कंटोप [प.]-वह टोपी जिससे कान ढके रहें
कपाल [पुस.]-खोपड़ी मस्तक, घड़ का टुड़ा, ढक्कन
करवाल [पुसं.-तलवार, खड्ग, नाखून
कसौटीसी-पख, जच, एक कापजि पर सोना घिसक पखा जाता ह
क्रीडा[स्र.सं]-खेल-कूद, किलोल, ास्य-विनोद
क्ष
क्ीण [पु.सं.- दु्बल, दुबला-पतला, ्ति्र्त, घटा हुआ
ख
खरहरा [पु.]-कंघी करना, लोहे की कई दंतपंक्तयों वाली चौकोर कंघी जिससे घोड़़ के बदन की गर्द साफ़ की जाती है
घ
घटा [स्रीस.]-जल भरे बादलों क समूह, मेघमाला घहर [अ.क्र.]- पसरना, गरजना, गर्जन घृणा [स्त्रीसं.]- नफरत, घिन
च
चित्त [पु.सं.]- मन, अंत:करण की चिंतना
चिरायु [वि.सं.]-दीघयु, बहुत दिन जीने वाला, चिजीवी
चोगा [पु.फा.]-लंा, ढीला-ढाला अँगरखा जिसका आगे का भाग खुला होता है, गाउन
छटा [स्त्री.सं.]शोभा, छवि, झलक, बिजली
छद्म [पु.सं.]– छल-कपट, बदला हुआ भेष
छहर [स्त्री.]- बिखरना, बिखरने की क्रिया
छीको [प.-स्सी, तार आदिसेबनी झोली जैसी चीज़जिसे छत आदिसे लटकाकर उस पर खाने-पीने की चीज़े रखते हैं सिकहर, छीका
ज
जन्मदात्री [त्री] माता, माँ, जननी
जलज [वि.]- कमल, जल में उत्पन्न
जलधर [पु.सं.]–बादल, मेघ
जौहरी [पु.(अ.)-जवाहरात का रोजगार करने वाला, रत्न-व्यवसायी, पारखी
तरुणाई [स्त्ी.]- युवावस्था, जवानी तरुवर [प.सं.]–वृक्ष, पेड़
ताड़ [पु.]– एक लंबा वक्ष जिसमें शाखाएँ ही हती सिर्फ सिरे प पतियाँ होती हैं
तिमिर [पु.स.-अंधकार, आँख का एक रोग, अधेरा
तुच्छातुच्छ [वि.सं.- एकदम गया-गुजरा, अत्यंत निकृष्ट
तुर प.(अ.)-टोपी आदि मेंलगी हुई कलगी, अनोखा
द
दरक [स्त्ी.- दरकने की क्रिया, दरार, चीर
दीवान [पु.फा.]-प्धानमंत्ी रा या बादशाह क बैठक याथानेका मुंशी जिसके जिमे लिखापढ़ी का काम होता है
दूब [स्री] एक परा की घास, दूर्ा
देवाणी [सत्री]- देवताओं की वाणी, आकाशवाणी
द्व्य [प.सं.]- तरल पदार्, किसी पदार्थ का तरल रूपांतर
ध
धरा [स्त्री.सं.] पृथ्वी, धरती
धावा [पु.]-किसी को जीतने, लूटने आदि के लिए बहुत से लोगों का एक साथ दौड़ पड़ना, हमला
धष्टतापूर्ण[स्त्ी.सं.]- ढिठाई के साथ, उदंडतायुक्त, निदयता के साथ
न
नद [पु.सं.]-बड़ी नदी, सरता
नाई [अ.]- तरह, भाँति
निदान [प.स.] अं में, आखिर, आदि कारण, रोग का कारण, रोग का निर्य
निरापद (विसं.-निविध, ुरक्षित, आपत्तिसेरहति
निभीक [वि.सं.] जो किसी से भय न खाए, निडर, निरापद
निषंग प.सं.]- तरकश, तूणीर, तलवार
नेकनामी (स्रीफा-सुख्याति सु्रसिदधि सु्रत
नौसिखिया [वि]-अनुभवहीन, जिसने हाल मे ही सीखा हो
न्योछावर [सत्री]- समपर्ण करना, त्यागना
प
पठायो [स.क्रि]भेजना
पतियायो [स.क्रि]- विश्वास करना, बात मानना
पराग-कण [पुस.]-फूल के भीतर की धूल, पुपज
पात्र [प.स.]-किरदार, अभिनेता, बरतन
पावस [पु. -वर्ष्ऋतु, ानसून, समुद्रकी ओर से आनेवाली वरषा-सूचक हवा
पुतली स्त्ी. -आँख के बीच का काला भाग जिसके मध्य मे रूप ग्रहण करने वाली इद्िय होती है
पुनीत [वि.स.- पवित्र किया हुआ, शुद्
पुलकी [वि.सं.]- रोमांचयुक्त, आनंदित
पेचीदा [वि.फा.]- कठिन, उलझन वाला पैठना [अ.क्र.- गहर मे जा, प्रवेश करना lished
प्रफुल्लत [वि.]- खिलाहुआ, अति प्रसन, प्रमुदि
प्राणवत्ा [स्त्र.सं.]- प्राणवान, जीवित होने के भाव
ब
बज्र-मय [वि.सं.] कठोर, ग्र, भीषण ep
ब़न [पु.वि-उच्च, सामर्शाली
बदतर [वि.फा]- अधिक बुरा, ज्यादा खराब
बरबस [अ.]-अकारण, बलपूर्वक व्र्थ
बहियन सत्री-बाह, भुजा, बाज
बहुतायत स्त्री.] अधिकता, ब़ती, विशेषता
बाधव [पु.सं.]निकट-सबंधी, भाई-बंधु, स्वजन
बाग [स्त्री.]-लगाम, रस्सी
बावरी स्त्ी. चौड़ा कुआ जिसमें नचे जाने के लिए सीढियाँ बन हों, जलाशय, बावली
बिहसि [अ.क्र.] मंद-मंद मसकराना, खिलना
भटक्यो [अ.क्रि.] भटकना, इधर-उधर फिरना शरांति [स्त्र.सं.] श्रम, संदेह, चक्कर, अस्थिरता
म
मंदामि [स्रीसं.]-पाचन शक्त का दुर्बल हो जाना, हाजमे का बिगड़ जाना
मद [सत्री(अ.)खाता, लेखा, उन्माद, अहंकार
मधुबन (मधुवन) [पु.]- फूलों का बगीचा, बाग
मुदाए [सत्ीस.-मुख,हाथ, गदन आदि की कोई विशेष भावसूचक स्थिति, मु चेषटा नाम की मोहें
मुल्क [पु.(अ.)-देश, राज्, परदेश
मोहना [स.क्र]-लुभाना, लना
र
रईस [पु.(अ.)]-उच्च वर्ग का आदमी, धनी, अमीर, शिष्ट
रकबा [पु.]–्षे्रफल, घिरी हुई ज़मीन, घेरा, अहाता रण [पु.सं.]– युद्ध, संग्राम, लड़ाई, गति blisr
रियासत [स्त्री.(अ.)]- राज, शासन, अमीरी
रेजीमेंट [्त्ी. अं.]-सेना का एक स्थायी विभाग, कनल के अधीन और कई टुकड़ियों मे
रोमावलि [स्त्री.सं.]- रोमों की पंक्त, रोयाँ
ल
लघु [वि.स.]-छोटा, निर्बल, फु्तीला, हल्का, कम लट्ू होना [पु.] मोहित होना, मुरध होना हरन होना लौस्ी-जचाला, दीपशिखा, चाह, आशा, कामना
व
वकालतनामा [पु.(अ.)]-किसी मुकदें में वकील होने का प्रमाण-पत्र वह लेख जिसके जरिए किसी वकील को किसी मुकदमे की पैरवी का अधिकार दिया जाए
वसुधरा [स्त्र.सं.-पृश्वी, देश
वाधयंत्र [प.सं.]-बाजा, बजाने का यंत्
विकराल [वि.सं.]- भीषण, भयंकर
विगिलित [विस.- पिघला हुआ, बहा हुआ, बिखरा हुआ, गरा हुआ, सूखा हुआ शिथिल
विज्ञपन [पुसं.- निवेदन, समाचार-पत्ों आद में प्रचा
विषाक्त [वि.सं.]- विष मिश्रित
वीरगति [वस-यु्ष्रमं य द्करतेहए मयु
व्य् [विस.]-व्याकुल, परेशान, घबराया हुआ, व्यस्त
श
शर्मिदा [वि.फा.] लज्जित, लजाया हुआ
शस्य-श्यामला [वि.सं.]- नई घास, फसल, अन्न, धान श्रेष्ठ
शराप [प. सं.]-अमुक का बुर हो ऐसी बुरी भावना व्यक्त करना, शाप, भत्मना
श्वास-प्र्वास [पु.सं.]- सास लेना और निकालना
स
संचय [पु.सं.] एकत्र करना, जोड़, बड़ी राशि, ढेर, संध
सचेष्ट [विसं.]चेष्टाशील, चेष्ट करने वाला
सनद [स्री.(अ.)]- वह जिस पर पीठ टेकी जाए प्रमाण-पत्र, अनुमति-पत्
सवेरा [पु.]- प्रात:काल, सुबह, सूर्योदय काल, सबेरा
समाँ [प.]- समय, ऋतु, बहार
समृद्ध [वि.सं.]-संप्न, सशक्त, धनी, उन्नतिशील
सरवर [पु.फा.]– सरोवर, ताल, तालाब, झील
सरित [स्त्र.सं.] नदी, सरिता, धारावाहिक
साक्षात्कार [सं.पु.]- प्रत्क्ष भेंट, मुलाकात, शान, अनुभूृति
साधना [स्त्र.सं.] अभ्यास करना, आराधना, उपासना, इका करना
सिंधु [प.सं.] समुद्र सागर, एक प्रसिद्ध नदी, दान
सिक्त [वि.सं.]– सींचा हुआ, भींगा हुआ, गीला
सुयश [पु.सं.] सुदर यश, सुकीर्ति
सुरम्य [वि.सं.]- अत रमणीय, मनोहर
सूक्म पदार् [वि.सं.]-बहुत बारीक तत्व, वसत
सूक्षमद्शी [वि.सं.]बहुत बारीक देखने वाला यं्र, अणु रूप देखने वाला यंत्र
स्हे [पु.सं.- प्रें, कोमलता, तेल, दयालुता
ह
हतप्रभ [वि.सं.]- जिसकी कांति क्षीण हो गई हो हय-टाप [स्त्र.सं. -घोड़़ के पाँव के पृथ्वीप पड़ने से उठी आवाज
पहेलियों के उत्तर
संख्या
- मातृभूमि शब्दजाल अलगोजा, बीन, बाँसुरी, सींगी, शहनाई, नादस्वरम, भंकोरा, शंख आज की हिमालय, गंगा, भारत, कलियाँ पवन पहेली
- पहली बूँद शब्द पहेली नगाड़ा, नयन, जलधर, दूब, अश्रु, अंबर
- रहीम के दोहे आज की चना, माचिस पहेली
- मेरी माँ आज की मंगलमयी, प्रत्येक, ग्यारह, धार्मिक, महान, पहेली स्वाधीन,दुखभरी, साधारण, छोटी, बड़ा, खूब, मनोहर
- जलाते चलो पहेली
- सत्रिया और बिहू नृत्य मूली, नारियल, होंठ, चींटी
- चेतक की वीरता आज की जलज, पतंग, अंधेरा, गुलाबजामुन, मानचित् पहेली
- हिद महासागर में छोटा-आज की मेरा भारत मेरा गौरव सा हिंुस्तान पहेली
- पेड़ की बात to आज की रात, तमाम, ममता, ताप, पल्लव, वसंत, पहेली तना, नाम, मज़बूत, तरल, लटक, कम
ब्रेल भारती' हिंदी वर्ण व गिनती
| अ | आ :: | इ :: | ई :: | उ :: | ॐ •0 | ऋ 00:0 | ए :: | ऐ : | ओ :: |
| :: : | :: : | :: : | :: : | °0 :: | :: : | : •• 0 :: | :: 0 | :0 : | :: : |
| औ :: | . : | : :: | |||||||
| :: : | :: | :: | |||||||
| ख | ग | घ | ड | च | छ | ज | झञ | ज | |
| क :: | : | :: | :: | :: | :: :: | :: | :: | :: | :: |
| :: :: | :: :: | :: 00 | :: : | :: :: | 80 | :: :: | • 0 | :: :: | : |
| ट | ठ | ड | ट | ण | त | थ | द | ध | न |
| : | :: | •: | •: | • | : | • | : | : | : |
| :: •• | :: : | :: : | •: •• | : •• | •• :o | :: 0 • | :: | :: | :: |
| प :: | फ :: | ब :: | भ :: | म :: | य • • | र •0 | ल | व :: | श :: |
| :: :: | :: 0 | :: 0 | :: 0 | :: : | : | •• •0 | : • • | :: • • | :: : |
| प •• | स • | ह :: | क्ष •• | त्र : 0 | ज 0 :o | ||||
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