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बिरजू महाराज से साक्षा्कारे
कथक की जब भी बात होती है तो हमरे मस्तष्क में एक नाम अवश्य आताहै—बिरजू महाराजा कथक की कला उन्हें विरासत में मिली थी, भारत ही नहीं बल्क विदेशो में भी बिरज महाराज का स्मरण उनकी मनमोहक प्र्तुतियों के लिए किया जाता है बिरज महाराज का जीवन शास्रीय संगीत के रागों के समान ही उतार-चढ़ाव भरा था अपने जीवन में प्रापत सफलताओं के लिए उन्होंने कठिन साधना की थी आइए, आज हम पदमविभूषण श्ी बिरजू महाराज से मिलें इनसे हमारा परिचय करवा रहे हैं आपके जैसे ही कुछ बच्चे।


बिरजू महाराज
सुना है कि आपका बचपन संघरों से भरा हुआ था। अपने बचपन के बारे में कुछ बताएँगे?
एक जमाना था जब हमलोग छोटे नवाब कहलाते थे हवेली के दरवाजे पर आठ-आठ सिपाहियों का पहरा होता था मेरे बाबूजी के देहांत के बाद आर्थिक परेशानियाँ बढ़ने लगीं। जिन डिब्बों में कभी तीन-चार लाख की कीमत के हार हुआ करते थे वे अब खाली पड़ थे जीवन में उतार-चढ़ाव
तो होता ही है सब समय का चक्र है संघरों के दौर में मेरी सबसे बड़ी सहयोगी मेरी माँ थीं कभी कर्ज लेते थे तो कभी पुरानी ज़री की साड़ियाँ जलाकर उनके सोने-चाँदी के तार बेचते थे और गुजारा करते थे नृत्य के का्क्रमों से भी कभी-कभी पैसा आ जाता था। दिन में खाना खाते थे तो रात को कई बार नहीं भी खाते थे अम्मा बार-बार यही कहा करती थीं, "खाने को भले ही चना मिले या कुछ भी न मिले पर अभ्यास जरूर करो।"
आपने कथक किससे सीखा?
मेर गुर थे मे पिता अच्छन महाराज और चाचा शंभू महाराज और लच्छ महाराजा घर में चूंकि कथक का माहौल था, अत: औपचारिक प्रशिक्षण शुरू होने से पहले ही मैं देख-देखकर कथक सीख गया था और नवाब के दरबार में नाचने भी लगा था। कथक की तालीम शुरू करते समय गुरु शिष्यों को गंडा (ताबीज) बाँधते हैं और शिष्य गुरुको भेंट देता है जब मेरी तालीम शुरू होने की बात आई तो बाबूजी ने कहा, "भेट मिलने पर ही गंडा बाँधूँगा" इस पर अम्मा ने मेरे दो कार्क्रमों की कमाई बाबूजी को भेंट के रूप में दे दी गंडा' गुरु और शिष्य के बीच पवित्रिश्ता होता है मैने अब इस रस्म
को उल्टा कर दिया है। कई वषं तक नृत्य सिखाने के बाद जब देखता हू कि शिष्य में सच्ची लग है तभी गंा बाँधता हूँ

तनुश्री बिरजू महाराज
क्या पढ़ाई या दूसरे कामों के साथ-साथ संगीत और नृत्य जारी रखना संभव है?

यह तो अपने साम्थ पर निभर करता ह। मेरी शिष्या शोभना नारायण आई.एएस. अफसर हैं और अच्छी नतकी भी मैं ृत्य के साथ-साथ बजाता और गाता भी हूं इसके अतिरिक्त नृत्य नाटिकाएँ और उनके लिए संगीत भी तैयार करता हू मैने जब नौकरी शुरूकी तो मेरे चाचा ने कहा, "तुम नौकरी में बँट जाओगे तु्हरे अंदर का नर्तक पूरी तरह पनप नहीं पाएगा" पर मैंने दृढ़ निश्चय किया था कि 'महाराज' बनना है तो उसके लिए मेहनत भी करनी होगी।
कथक की शुरुआत कब हुईं?
माणिक बिरजू महाराज

कथक की परंपरा बहुत पुरानी है महाभारत' के आदिपर्व और 'रामायण' में इसकी चर्चा मिलती है पहले कथक रोचक और अनौपचारिक रूप से कथा कहने का ढंग होता था। तब यह मंदरों तक ही सीमित था। हमारे लखनऊ घराने के लोग मूलत: बनारस-इलाहाबाद के बीच हरिया गाँव के रहने वाले थे वहाँ 989 कथिकों के घर हुआ करते थे कथिकों का एक तालाब अभी भी है गाँव में एक बैरगिया नाला है, जिसके साथ यह कहानी जु़ी हुई है एक बार नौ कथिक नाले के पास से गुजर रहे थे कि तीन डाकू वहाँ आ पहुँचे। कुछ कथिक डर गए, कितु उन कथिकों की कला में इतना दम था कि डाकू सब कुछ भूलकर उन कथिकों के कथक में मग्न हो गए। तब से यह पद लोगों
में प्रचलत हो गया बैरगिया नाला जुलुम जोर, नौ कथिक नचावें तीन चोर जब तबला बोले धीन-धीन, तब एक-एक पर तीन-तीन।
लखनऊ घराने के बाद जयपुर घरने और फिर बनारस घराने का विकास हुआ। इसके अलावा रायगढ़ के महाराज चक्रधर की भी अपनी अलग शैली थी
क्या नृत्य सीखने के लिए संगीत जानना जरूरी होता है?
गाना, बजाना और नाचना— ये तीनों संगीत का हिस्सा हैं। संगीत में लय होती है उसका जान आवश्यक है। नृत्य में शरीर, ध्यान और तपस्या का साधन होता है। नृत्य करना एक तरह से अदृश्य शक्त को निमंत्रण देना है कृष्ण, मेरे अंदर समाओ और नाचो नृत्य ही नहीं, हमारी हर गतिविध में लय होती है। घसियारा घास को हाथ से पकड़ कर उस पर हंसिया मारता है और फिर घास हटाता है मारने और हटाने की इस लय मे जरा भी गड़बड़ी हुई नहीं कि उसका हाथ गया। लय हर काम में, नृत्य में, जीवन में संतुलन बनाए रखती है लय एक तरह का आवरण है, जो नृत्य को सुदरता प्रदान करती है। अगर नर्तक को सुर-ताल की समझ है तो वह जान पाएगा कि यह लहरा ठीक नहीं है इसके माध्यम से नृत्य अंगों में प्रवेश नहीं केगा
आपने कथक में कई नई चीजे भी जोड़ी है न?
कथक की पुरानी परंपरा को तो कायम रखा है हाँ, उसके प्रसतुतीकरण में बदलाव किए है। हमने गौर किया कि हमारे चाचा लोग और बाबूजी नाचते तो खूबसूरत थे ही, उनके खड़़ होने का अंदाज भी निराला होता था। हमने उन भाव-भंगिमाओं को भी कथक में शामिल कर लिया चाचा लोग और बाबूजी हमार लिए ब्रा, वष्णु,

महेश थे हमने तीनों की शक्षा को इकटा करके एक नया रूप तैयार किया। इसी प्रकार टैगोर, त्यागराज आदि कई आधुनिक कवियों की रचनाओं को लेकर भी कथक रचनाए तैयार कीं।
तनुश्री पर ये लोग तो अलग-अलग भाषाओं के कवि थे।
बिरजू महाराज भाषाएँ अलग-अलग होती हैं पर इंसान तो सब जगह एक-से होते हैं फ्रांस में एक दर्शक ने कहा, "मैं नहीं जानता कि यशोदा कौन है?" मैंने उन्हें बताया कि इस धरती पर सब माएँ यशोदा हैं और सब न्हे बच्चे कृष्ण। बच्चे की जिद, रोना, उठना, बैठना, सब जगह एक जैसा होता है धीरे-धीरे हमे अलग-अलग भाषा, संस्कार और तौर-तरीके मिलते हैं चाहे नृत्य हो या कुछ और, परंपरा एक वृक्ष के समान होती है, जो सबको एक जैसी छाया और आश्रय देती है उसके नीचे बैठने वाले अलग-अलग स्वभाव के होते हैं वृक्ष से लिए बीज को बोएँ तो समय आने पर ही एक और वकष फलेगा। वह नया वृक् कैसा होगा, यह इस बात पर नरभर करेगा कि उसे कैसी हवा, पानी और खाद मिला है। −
माणिक आपने जब सीखना शुरू किया था, तब से अब तक कथक की दुनिया में क्या-क्या बदलाव आए हैं?
बिरजू महाराज पहले मंच नहीं होते थे। फर् पर चाँदनी (बिछाने की बड़ी सफेद चादर) बिछी होती थी जिस पर कथक होता था और दर्शक चारों ओर बैठते थे शृगार के लिए चंदनलेप और होंठ रंगने के लिए पान होता था। पहले नर्तक कथा के दृश्यों का ऐसा विस्तृत वर्णन करते थे कि दर्शक के सामने पूरा दृश्य खिंच जाता थाकि कैसे गोपियों ने घड़ा उठाया, धीमी चाल से पनघट की ओर चली, पीछे सेकृष्ण चुपचाप आए, कंकड़ उठाया और देमारा। अब सिर्फ पनघट की गत देखो' कहकर बाकी दर्शक की कल्पना पर छोड़दिया जाता है
श्रेया आपने गाना, बजाना और नाचना कब शुरू किया?
बिरजू महााजबहुतुटन सेहीता ीटा रक दिया ा चाचा नका के n के हाथ में लय है" पाँच साल का होते-होते हारमोनियम पर लहरा बजाने लगा। सबको खुश करने के लिए फिल्मी गाने भी खूब गाता था। एक बार सबकी फरमाइश पर सुरया के एक गाने पर देर तक नाचा। बहनों ने बड़े शौक से बिंदी-चुनी से सजा दिया था तब तक चाचा आ गए बस डर के मारे तुरंत सब कुछ उतार फेका और छिप गया।
माणिक शास्त्रीय नृत्य और लोक नृत्य में क्या अंतर है?
बिरजू महाराज लोक नृत्य सामूहिक होता है। दिनभर की मेहनत के बाद लोग थकान दूर करने और मनोरंजन के लिए इकहा मिलकर नाचते हैं दूसरी ओर शासत्रीय नृत्य में एक नर्तक अकेला ही काफ़ी होता है। लोक नृत्य नाचने वालों के अपने मन बहलाव और संतुष्ट के लिए होता है जबकि शास्त्रीय नृत्य दर्शकों के लिए होता है। शुरू में कथावाचक भी लोक नर्तक हुआ करता था। धीरे-धीरे जब उसकी खास शैली व रूप निश्चत होता गया तो वह शास्त्रीय नृत्य हो गया।
श्रेया इस समय भारत में शास्त्रीय नृत्य की क्या स्थिति है?
बिरजू महाराज कुछ वर्ष पहले तक स्थिति दयनीय थी। अब इसकी लोकप्रियता बढ़ रही है पर शोर वाले संगीत-नृत्य का भी खूब प्रचलन है। मैं सबसे यही कहता हू वह संगीत सुनो-देखो लेकिन अपनी परंपरा की गहराई को भी समझो, अनुभव करो।
तनुश्री कर्नाटिक और हिन्दस्तानी शैली के संगीत की तरह क्या दक्षण और उत्तर के नृत्य में भी अंतर है?
बिरजू महाराज कथक, भरतनाट्यम, कुचिपुड़ी, कथकली, मोहिनीअटम, ओडिसी, मणिपुरी—ये शास्त्रीय नृत्य की प्रमुख शैलिया हैं संगीत और गाने के ढंग का अंतर तो है ही, इसके अतिरिक्त भी हर नृत्य की अपनी लय और

भाव-भंगिमा है कथक की भाव-भंगिमा दैनिक जीवन से ली गई होती है और भरतनाट्यम में मूर्तिकला से। भरतनाट्यम में दोनों भावों का इकदा प्रयोग होता है और कथक में बारी-बारी से। ओडिसी और मणिपुरी में कोमलता है, कथकली में ओज है। कथक में दोनों हैं। कथक में गर्दन को हल्के से हिलाया जाता है, चिराग की लौ के समान। इसी प्रकार उगलियाँ भी बहत धीरे-से हिलाई जाती खाली तो होता ही नहीं हूं नींद में भी हाथ चलता रहता है मशीनों में मन खूब लगता है। अगर मैं नर्तक न होता तो शायद इंजीनियर होता। कोई भी मशीन या यंत्र खोलकर उसके कल-पुर्ज देखने की जिज्ञासा होती है। तुम्हे जानकर हैरानी होगी कि मैं अपने ब्रीफकेस में हरदम पेचकस और दसरे छोटे-मोटे औजार रखता हूँ कभी अपना पंखा-फ्रिज ठीक किया तो कभी और मशीनें। बेटी-दामाद चित्रकार है, उन्हे देख-देखकर पेंटिंग बनाने का भी शौक हो गया है प्राय: रात बारह बजे के बाद चित्र बनाने बैठता हूँ जब नींद से आँखे बंद होने लगती है तो ब्रश एक तरफ रख देता हूँ और सो

जाता हूं पिछले दो वरो में लगभग सत्तर चित्र बनाए हैं त्रा अगर कोई बच्चा गाना, बजाना या नृत्य सीखना चाहे पर घर के लोग न चाहते हों तो ऐसेमे क्या करना चाहिए?
बिरजू महाराज
आजकल के माँ-बाप से मेरी विनती है कि यदि बच्चे की रुचि है तो उसे लय के साथ खेलने दें जैसे अन्य खेल हैं वैसे ही यह भी एक खेल है जिसमें बहुत-कुछ सीखने को मिलता है। इस खेल की दुनिया में संतुलन, समय का अंदाजा व सदुपयोग बच्चे के बौद्धिक विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।

तनुश्री बिरजू महाराज
क्या आपके परिवा में लड़कियोंनेकथक नहीं सीखा?
मेरी बहनों को कथक नहीं सिखाया गया पर मैने अपनी बेटियों को खूब सिखाया। लड़कियों के पास शिक्षा या कोई-न-कोई हुनर अवश्य होना चाहिए ताकि वे आत्मनिभिर हो सकें हुनर ऐसा खज़ाना है, जिसे कोई नहीं छीन सकता और वक्त पड़ने पर काम आता है बच्चो, तुम लोग संगीत सीखते हो? यदि नहीं तो जरूर सीखो। मन की शांति के लिए यह बहुत जरूरी है। लय हमें अनुशासन सिखाती है, संतुलन सिखाती है। नाचने, गाने और बजाने वाले एक-दूसरे के साथ तालमेल बैठाकर एक नई रचना करते हैं सुर और लय से हमें एक-दूसरे का सहयोगी बनकर अपने लक्ष्य की ओर बढ़ने की प्रेरणा मिलती है।
पाठ से
आइए, अब हम बिरजू महाराज से पूछे गए प्र्नों और उनसे मिले उत्तरों को थोड़ा और निकटता से समझ लेते हैं।
मेरी समझ से
(क) नीचे दिए गएप्रशनों का सबसे सही उत्तर कौन-स है? उनके सामने ता () बनाइए। कुछ प्र्नों के एक से अधिक उत्तर भी हो सकते हैं
(1) बिरजू महाराज ने गंडा बॉँधने की परंपरा मे परिवर्तन क्यों किया होगा?
• वे गुरु के प्रति शिष्य के निष्ठा भाव को परखना चाहते थे • वे नृत्य शिक्षण के लिए इस परंपरा को महत्वपर्ण नहीं मानते थे • वे नृत्य के प्रति शिष्य के लगन व समर्पण भाव को जाँचना चाहते थे • वे शिष्य की भेंट देने की सामरथ्य को परखना चाहते थे

(2) "'जीवन में उतार चढ़ाव तो होता ही है" बिरज महाराज के जीवन में किस तरह के उतार-चढ़ाव आए?
• पिता के देहांत के बाद आर्थिक अभावों का सामना करना पड़ा 0 कोई भी संस्था नृत्य प्र्तुतियों के लिए आमंत्रित नहीं करती थी 0 किसी समय विशेष में घर में सुख-समृद्र थी। 0 नृत्य के औपचारिक प्रशिक्षण के अवसर बहुत ही सीमित हो गए थे (3) बिरजू महाराज के अनुसार बच्चों को लय के साथ खेलने की अनुशंसा क्यों की जानी चाहिए?
(ख) अब अपने मित्रों के साथ च्चा कीजिए और कारण बताइए कि आपने ये उत्तर ही क्यों चुनें?
संगीत, नृत्य, नाटक और सभी कलाएँ बच्चों में मानवीय मूल्यों का विकास नहीं करती हैं। • कला संबंधी विषयों से जु़ाव बच्चों के बौद्धिक विकास के लिए बहुत महत्वपूर्ण है • कला भी एक खेल है, जिसमें बहुत कुछ सीखने को मिलता है। • वर्तमान समय में कला भी एक सफल माध्यम नहीं है।

मिलकर करें मिलान
पाठ में से चुनकर कुछ शब्द एवं शब्द समूह नीचे दिए गएहैं अपने समूह में इन पर च्चा कीजिए और इ्हें इनके सही संदरभों या अवधारणाओं से मिलाइए। इसके लिए आप शब्दकोश, इंटरनेट या अपने शिक्षकों की सहायता ले सकते हैं।
| शब्द | संदर्भ या अवधारणा |
| 1. कर्नाटक संगीत शैली | 2. भारतीय शास्त्रीय संगीत की एक शैली, जो मुख्य रूप से दक्षिण भारत के राज्यों में प्रचलित है। इसमें स्वर शैली की प्रधानता होती है। जल तरंगम, वीणा, मृदंग, मंडोलिन वाद्ययंत्रों से संगत दी जाती है। |
| 2. घराना | 4. हिंदुस्तानी संगीत में कलाकारों का एक समुदाय या कुटुंब, जो संगीत व नृत्य की विशिष्ट शैली साझा करते हैं। संगीत या नृत्य की परंपरा, जिसमें सिद्धांत और शैली पीढ़ी-दर-पीढ़ी प्रशिक्षण के द्वारा आगे बढ़ती है। |
| 3. शास्त्रीय संगीत | 1. भारत की प्राचीन गायन-वादन, गीत-नृत्य, अभिनय परंपरा का अभिन्न अंग है। इसमें शब्दों की अपेक्षा सुरों का महत्व होता है। इसमें नियमों की प्रधानता होती है। |
| 4. हिंदुस्तानी संगीत शैली | 6. भारतीय शास्त्रीय संगीत की एक शैली, जो मुख्य रूप से उत्तर भारत के राज्यों में प्रचलित है। तबला, सारंगी, सितार, संतूर वाद्ययंत्रों से संगत दी जाती है। इसके प्रमुख रागों की संख्या छह है। |
| 5. कर्णछेदन | 3. हिंदू धर्म के 16 संस्कारों में एक है, यह कान में सोने या चाँदी का तार पहनाने से संबंधित है। |
| 6. लोक नृत्य | 5. किसी क्षेत्र विशेष में लोक द्वारा किए जाने वाले पारंपरिक नृत्य। लोक नृत्य, क्षेत्र विशेष की संस्कृति एवं रीति-रिवाजों को दर्शाते हैं। ये विशेष रूप से फसल कटाई, उत्सवों आदि के अवसर पर किए जाते हैं। |

पंक्तियों पर चर्चा
साक्षात्कार में से चुनकर कुछ वाक्य नीचे दिए गए हैं इ्हे ध्यान से पढिए और इन पर विचार कीजिए। आपको इनका क्या अर्थ समझ में आया? अपने विचार लिखिए।
• "तुम नौकरी में बँट जाओगे। तुम्होरे अंदर का नर्तक पूरी तरह पनप नहीं पाएग • "लय हम नर्तकों के लिए देवता है।"
• "नृत्य में शरीर, ध्यान और तपस्या का साधन होता है।"
• "कथक में गर्दन को हल्के से हिलाया जाता है, चिराग की लौ के समान।"
सोच-विचार के लिए
साक्षात्कार को एक बार पुन पढिए और निन्नलिखित प्र्नोंके उत्तर लिखिए (क) बिरजू महाराज नृत्य का औपचारिक प्रशिक्षण आरंभ होने से पहले ही कथक कैसे सीख गए थे? (ख) नृत्य सीखने के लिए संगीत की समझ होना क्यों अनिवार्य है? (ग) नृत्य के अतिरिक्त बिरजू महाराज को और किन-किन कायों में रचि थी? (घ) बिरजू महाराज ने बच्चों की शिक्षा और रुचियों के बारे में अभिभावकों से क्या कहा है?
2पाठ मे े उन प्रसंगों की पहचानकर उन पर चर्चा कीजिए, जिनसे पता चलता हैकि
(क) बिरजू महाराज बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे।
(ख) बिरजू महाराज को नृत्य की ऊँचाइयों तक पहुँचने में उनकी माँ का बहुत योगदान रहा।
(ग) बिरजू महाराज महिलाओं के लिए समानता के पक्षधर थे।
शब्दों की बात
(क) पाठ में आए हुए कुछ शब्द नीचे दिए गए है, इ्हे ध्यान से पढिए आजीविका, सीमित प्रिक्षण, ुंदरता, आधुनिक, पारपरिक, भारतीय, सामहिक, शास्रय
आपने इन शब्दों पर ध्यान दिया होगा कि मूल शब्द के आगे या पीछे कोई शब्दांश जोड़कर नया शब्द बना है। इससे शब्द के अर्थमें परिवर्तन आ गया है। शब्द के आगे जड़ने वाले शब्दांश उपसर्ग कहलाते हैं जैसे कि
अदृश्य - अ + दृश्य आवरण - आ + वरण प्रशिक्षण - प्र + शिक्षण यहाँ पर अ', आ', प्र उपसर्ग हैं

शब्द के पीछे जुडने वाले शब्दांश प्रत्य कहलात हैं और मूल शब्द के अर्थमें नवीनता, परिवर्तन या विशेष प्रभाव उत्पन्न करते हैं जैसे कि
सीमित - सीमा + इत सुदरता - सुंदर + ता भारतीय - भारत + इय सामूहिक - समूह + इक यहा पर इत', 'ता', ईय' , और 'इक प्रतय हैं

(ख) नीचे दो तबले हैं एक में कुछ शब्दांश (उपसर्ग व प्रत्य) हैं दूसरे तबले में मूल शब् है। इनकी सहायता से नए शब्द बनाइए—


() इस पाठमें से उपसर्ग वप्त्य की सहायता से बने कुछ और शब्द छाॉटकर उनसे वाक्य बनाइए।
शब्दों का प्रभाव
पाठ में आए नीचे दिए गए वाक्य पढ़िए
- "कुछ कथिक डर गए किंतु उन कथिकों की कला में इतना दम था कि डाकू सब कुछ भूलकर उन कथिकों के कथक मे मग्न हो गए।" इस वाक्य में रेखांकित शब्द 'इतना' हटाकर वाक्य पढ़िए और पहचानिए कि क्या परिवर्तन आया है?
पाठ में आए हुए वाक्यो में से ऐसे ही कुछ और शब्द दूढ़कर उन्हे रेखांकित कीजिए जिनके प्रयोग से वाक्य में विशेष प्रभाव उत्पन्न होता है?

पाठ से आगे
कला का संसार
(क) बिरजू महाराज—"कथक की पुरानी परंपरा को तो कायम रखा है। हाँ उसके प्र्तुतीकरण में बदलाव किए हैं" इस कथन को ध्यानमें खते हुए लिखिए कि कथक की प्र्तुतियोंमें किस प्रकार के परिवर्तन आएहैं?
(ख) ललोकनृत्य और शास्त्रय नृत्यमें क्या अंतर है? लिखिए। (इस प्रशन के उत्तर के लिए आप अपने सहपाठियों, अभिभावको, शिक्षकों, पुस्तकालय या इंटरनेट की सहायता भी ले सकते हैं)
(ग) "बैरेगिया नाला जुलुम जोर, नोौ कथिक नचावें तीन चोर। जब तबला बोले धीन-धीन, तब एक-एक पर तीन-तीन।"
इस पाठ में हरिया गाँव में गाए जाने वाले उप्युक्त पद का उल्लेख है आप अपने ्षे्र में गाए जाने वाले किसी लोकगीत को कक्ा में प्र्तुत कीजिए

साक्षात्कार की रचना
प्रस्तुत पाठ की विधा 'साक्षात्कार' है। सामान्यत: इसे बातचीत या भेटवाता का पर्याय मान लिया जाता है, लेकिन यह भेटवाता से इस संर्भमें भिन है कि इसका एक निित उेय औचा होत हयह सक्ाकारकिसी नाठमे प्रेश लेनकेलिए ोने वाले सक्षा्काबिल्ुल िहै पर्त सक्ाकार एक प्रकारसत का इसा ककीन। उनके कामकाज, उपलब्धयों, रचि-अरुचि, विचारों आदि को पाठकों के सामने लाना है। किसी भी प्रकार के साक्षातकार के लिए पर्ाप्त तैयारी, संवेदनशीलता और धेर्य की आवश्यकता होती है साक्षात्कार की सफलता इस बात पर निरभर करती हैकि साक्षात्कारदाता के संर् में कितना शोध किया गया है और प्रन किस प्रार के बनाए गए हैं
प्र्तुत 'साक्षातकार' के आधार पर बताइए (क) साक्षात्कार से पहले क्या-क्या तैयारियाँ की गई होंगी? (ख) आप इस साक्षात्कार में और क्या-क्या प्रश्न जोड़ना चाहेंगे?

(ग) यह साक्षात्कार एक सुप्रसिद्ध कलाकार का है। यदि आपको किसी सब्जी वि्रेता, रिक्शा चालक, घरेलू सहायक या सहायिका का साक्षात्कार लेना हो तो आपके प्रशन किस प्रकार के होंगे?
सृजन
आपके विद्यालय में कथक नृत्य का आयोजन होने जा रहा है
(क) आप दर्शकों को कथक नृत्यकला के बारे मे क्या-क्या बताएंगे? लिखिए।
(ख) इस कार्यक्रम की सूचना दे के लिए एक विज्ञापन तैयार कीजिए।
(ग) यदि इस नृत्य कार्यक्रम में कोई दृष्टिबाधित दर्शक है और वह नृत्य का आनंद लेना चाहे तो इसके लिए विद्ालय की ओर से क्या व्यवस्था की जानी चाहिए?
आज की पहेली
"अगर नरत्तक को सुर-ताल की समझ है तो वह जान पाएगा कि यह लहरा ठीक नहीं है, इसके माध्यम से नृत्य अंगोंमें प्रवेश नहीं करेगा" संगीत में लय को प्रदर्शित करने के लिए ताल का सहारा लिया जाता है किसी भी गीत की पंक्तियोंमें लगने वाले समय को मात्राओं द्वार ठीक उसी प्रकार मापा जाता है, जैसे दैनिक जीवन मे व्यतीत हो रहे समय को हम सेकेड के द्ारा मापते है। ताल कई मातरा समूहों का संयुक्त रूप होता है। संगीत के समय को मापने की सबसे छोटी इकाई मात्रा है और ताल कई मात्राओं का संयुक्त रूप है जिस तरह घंटे में मिनट और मिनट में सेड होते हैं उसी तरह ताल में मातरा होती है। आज हम आपके लिए ताल से जड़ी एक अनोखी पहेली लाए हैं।
एक विद्याथीं ने अपनी डायरी में अपने विद्यालय के किसी एक दिन का उल्लेख किया है उस उल्लेख में संगीत की कुछ तालों के नाम आए हैं आप उन तालोंके नाम दूढिए
कल हमरे विद्यालय में संगीत और नृत्य सभा का आयोजन हुआ था उसमें एक-दो नहीं बल्क चार कलाकार आए थे उन कलाकारों में एक का नाम रूपक और दूसरे का नाम लक्मी था। शेष दो कलाकारों के नाम पता नहीं चल पाए। वे दोनों जब अपनी प्रस्तुति के लिए मंच पर आए तो दर्शकों से पूछने लगे— "तिलवाड़ा, दादरा या झमरा?" दर्शक बोले— "तीनों में से कोई नहीं हमें दीपचंदी और कहरवा पसंद है।" दर्शकों की यह बात सुनते ही कलाकारों ने अपनी प्र्तुति प्रारंभ कर दी।
अब नीचे दी गई शब्द पहेली में स संगीत की उन तालों के नाम ढूढ़कर लिखिए
| ती | झञ | रू | ल | भ | ति |
| न | च | प | क्षमी | क | ल |
| म | ल | क | ह | र | वा |
| ल | इ | झ | म | र | ड़ा |
| दी | प | चं | दी | दा | त |
| ड | च | क | 2 | द | ढ |
| ए | म | ल | घ | रा | क |
झरोखे से
नृत्य की छटाए
बिरज महाराज ने भारत के विभिन् राज्यों के शासत्रीय नृत्यों का उल्लेख किया है। आइए, इनके बार में अपनी समझ बढ़ाते हैं
भरतनाट्यम
भरतमुनि तथा नाट्यम शब्द से मिलकर बना ह। विद्वान 'भरत शब्द को
राग ताल, भाव से भी जोड़त हैं इस नृ्य वि्या की
मेंमदिर नतकोंकी एकलन्यप्ति सादि से ह।
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कथकली दक्षिण भारत के एक राज्य के मंदरोंमें रामायण तथा महाभारत की कहानियाँप्त कनेवाल दोलोक नाटयपरएँ रामानामतथा कणानाइ्म कथकली के उद्भव का ोत है यहसगत नत्य और नाटकका अद्ुत संयोजन ै सुप्रसिद् मलयाली कविवीएन. मेनकेद्रा रा मुंद के ंक्षणमेंइसका प्रचार-प्रार हुआा यहनतय रूष ंडली दा कया जाता ही इसकी विषस्त महाकावयो ्काअ कथकब्रजभूम की रासलीला से उत्पन, कथक एक परपरागत नृत्य विदा है कथक का नाम कथिक

से लिया गया है, जिसे कथावाचक भी कहते हैं ये कथिक महाकाव्यों के पदों व छंदों को संगीत तथा भाव-भगिमाओं के साथ प्रसतुत करते थे कथक की महत्वपूर्ण विशेषता विभि्न घरानों का विकास है जुगलबंदी
कथक प्र्ति का मुख्य आकर्षण है, जिसमें तलावादक तथा नर्तक के बीच प्रतिस्पध्ात्मक खेल होता है।


कनटक संगीत की संगतदी जातीहै कचिपड़ीयका समातगम प्रसतुति के पश्चात होता है।
मणिपुरी नृ्य पौराणिक आख्यनों के अनुसार मणिपुरी नृत्य का सोत भारत के एक उत्तर-पूवी रा्य मणिपुर की घाटियों ें स्थानीय य के प्रमुख त्योहार 'लाई जाता है। इसमें ेहे की अभिव्यक्त केस्थान पर हाथ के हाव-भाव व पैरों की गति मह्वपूर्ण होती है।


भरतनाट्यम से मिलती-जुलती हो इस नत्य रूप का मुख्य आकर्षण है ्रिंगमुद्राअरथात शरीर का तीन मोड़ड वाला रूपा नृत्य के दौरान शरीर का निचला हिस्सा काफी सीमा तक स्थर रहता है और धड़ लय-ताल के साथ गति करता है। मोहिनीअटम भारत के आठ शासत्रीय नृत्यो मेंसे एक मोहिनीअडटिम का उद्भव केल राजय मेहुआ मोहिनी्म कीविशेषता मावदार कोमल भाव वाले आंगिक अभिनय हैं इस नृ्य के अंत्ंत अभिनय पर बल दिया जाता है। इस नृतय शैीतीमें मु की अभिव्यक्ति और हस्तमु्रओं को सवाधिक महतव पारंपरिक रूप से मोहिनीअृमकेवल स्त्योंद्वा ही किया जाता है, जबकि कथकली केवल पुरुषो द्रा किया जाता है।

अभी आपने शास्त्ीय नृत्यों को निकटता से जाना समझा पाँच-पाच विदयार्ियोंके समू मे भारत के लोक नृत्यों की सूची बनाइए और उनकी विशिष्टताओं का पता लगाइए।
नीचे दिए गए भारत के मानचत्रमें ाज्यानुसा शास्त्ीय एवं लोक नृत्य दर्ाईए नीचे दी गई इंटरनेट कड़ियों की सहायता से आप भारतीय नृत्य, संगीत और बिरजू महाराज के बारे में जान-समझ सकते हैं—

ोत—https://surveyofindia.gov.in/webroot/UserFiles/files/1_16-state%20boundary.pdf
• भारतीय शास्त्रीय संगीत में नृत्य संगत https://www.youtube.com/watch? $\underline { { \underline { { \mathbf { \Pi } } } } }$ W1ZXCUgi848 • कथक परिचय भाग 7 https://www.youtube.com/watch?v=Dprj69iAM24
• पंडित बिरजू महाराज
https://www.youtube.com/watch? $\imath { = }$ 0r3M8D2eAGg&list=PLqtVCj5ilH6BnMc4hIRzV yJ_wtPgky9B
पढ़ने के लिए
नृत्यांगना सुधा चंद्रन

जीवन के किसीभी के्मेंशिरत पहुंनेकेलिद न्ाशकति है, जि्होंन शारीरिक अक्षमता के बावजू संघर्ष
किया है और लक्ष्य प्रापत किया है ऐसा ही एक नाम है—सुधाचंद्न पैर खराब होनेके
सुधा चंद्र की माता श्रीमती थंगम एवं पिता शरी के. डी चं्रन की हार्िक इच्छा थी कि उनकी पुतरीराष्ट्री ख्याति की नृत्यांगना बने। इसीलिए चंद्न दपति ने सुधा को पाचवरष कीअ्यायमें ही ुंबईके प्रसिद्धनृत्य विदधालय कला-सदन' मे प्रेश दिलवाया पहलेपहल तो नृत्य विद्यालय के शिक्षकों ने इतनी छोटी उग्र की बच्ची के दाखिले मे हिचिकिचाहट महसूस की, कितु सुधा की प्रतिभा देखकर सुप्रिद्धनृ्य शिकष श्री केएस. रामास्वामी भागवतार ने उसे शिष्ा के रूपमें स्वीकार कर लिया और सुधा उनसे नियमित प्रशिक्षणप्ापत करने लगी जल्दही सुधा केनृत्य काय्क्रम विद्यालय के आयोजनोंमें ोने गे नृत्य के साथ-साथ, अध्यन मं भी सुधा ने अपनी प्रतिभा दिखाई लेकिन सुधा के स्वप्ों की इंद्रधनुषी दुनिया में एकाएक 2 मई, 1981 को अँधेरा छा गया।
2मई को तिरूचरापल्ल से मद्ास (चेन्नई) जाते समय उनकी बस दुरघटनाग्र्त हो गई इस दुर्घटना में सुधा के बाएँ पाँव की एड़ी टूट गई और दायाँ पाव बुरी तरह जख्मी हो गया प्लास्टर लगने पर बायाँ पाव तो ठीक हो गया, कितु दायें पर में गंग्ी (एक प्रकार का कैंसर) हो गया ऐसे में डॉक्टरों के पास सुधा का दाया पैर काट दे के अलावा और कोई ास्ता नहीं था अंततः दर्घटना के एक महीने बाद सुधा का दायाँ पैर घुटने के सा़ सात इंच नीचे से काट दिया गया एक पैर का कट जाना संभवतः किसी भी नृत्यंगना के जीवन का अंत ही होता। सुधा के साथ भी यही हुआा सुधा नेलकड़ी के गुटके के पँव और बैसाखियों के सहरे चलना शुरू कर दिया और मुबई आकर वह पुनः अपनी पढ़ाई में जुट गई
इसी बीच सुधा नेमै्सेसेपुरस्का विजेता ुप्सिद् कृत्रिम ंग विशेषज डॉ. पी.सी. सेठीके बार में सुना। वह जयपुर गई और डा. सेठी से मिली डा. सेठी ने सुधा को आशवस्त किया कि वह दुबारा सामान्य ढंग से चल सकेगी। इस पर सुधा ने पूछा- "क्या मैं नाच सकूंगी?" डॉ. सेठी ने कहा-"क्योंनहीं प्रयास करो तो सब कुछ संभव है।" डा. सेठी ने सुधा के लिए एक विशेष प्रकार
का पैर बनाया, जो अल्यूमिनियम का था और इसमें ऐसी व्यवस्था थी कि वह पैर को आसानी से घुमा सकती थी सुधा एक नए विशवास के साथमुंई लौटी और उसने नृ्य का अभ्यास शुरू करना चाहा, किंतु इस प्रयास में कटे हुए पैर से खून निकलने लगा। कोई भी सामान्य व्यक्त इस तरह की घटना के बाद दुबारा नाचने की हिम्मत कतई नहीं करता, किंतु सुधा साधारण मि्री की नहीं बनी थी जल्दी ही उसने अपनी निराशा पर काबू प्ापत किया और अपने ृत्य प्रशिक्षक को साथ लेकर डा. सेठी से पनः मिली।
डाॉ. सेठी ने सुधा के नृत्य प्रशिकषक से ृत्य हेतु पाँों की विभिन्नमुद्राओं को गंभीरतासे देखा-परखा और एक नया पैर बनवाया, जो नृत्य की विशेष जरूतों को ध्यान में खकर बनाया गया था पैर लगाते समय डा. सेठीने सुधा से कहा-"मैं जो कुछ कर सकता थ मैने कर दिया, अब तुम्हारी बारी है।" सुधा ने पुनः नृत्य का अभ्यास प्रभ किया शुरूुआत बहुत अच्छी नहीं रही कटे हुए पाँव के ढूठ से खून रिसने लगा, कंतु सुधा ने कड़ा अभ्यास जारी रखा। कठिन अभ्यास से सुधा जल्द ही सामान्य नृत्य मुद्ाओं को प्रर्शित करनेमें सफल हो गई। 28 जनवरी, 1984 को मुंबई के 'साउथ इंडिया वेलफेयर सोसायटी' के हाल में एक अन्य नृत्यांगना प्रीति के साथ सुधा नेदुबारा नृत् के सार्वजनिक प्र्शन का आमंत्र स्वीकार कर लिया यह दिन सुधा की जिदंगी का संभवतः सबसे कठिन दिन था, उस दिन से भी ज्यादा जबकि उसका पाँव काट दिया गया था। सुधा का यह प्र्शन बेहद सफल रहा चहेतों ने उसे देखते-देखते पलकों पर उठा लिया और वह रातों-रात एक ऐतिहासिक महत्व की व्यक्तत्व हो गई
उसकी अद्भुत जीवन-यात्र से प्रभावित होकर तेलुगु के फिल्मकार ने उसकी जिंदगी को आधार बनाकर एक कहानी लिखवाई और 'मयूरी नाम से तेलु मे एक फिल्म बनाई अपने पात्र को सुधा नेस्वयं परदे पर जीवंत कर दिया। फिल्म को अद्भुत सफलता मिली और इस फिल्म में अभिनय के लिए सुधा को भारत के 33वे रा्टीय फिल्म समारोह में विशेष पुरसकार प्रदान किया गया मयूरी' की सफलता को देखे हुए इसके निमाता ने यह फि्म हिंी में भी 'नाचे मयूरी ना सेप्र्शित की और सुधाने परे भारत को अपनी प्रतिभा का मुरीदकर दिया आज सुधा एक नृत्यांगना ही नहीं फिल्म कलाकार भी है। सुधा को उसके असामान्य साहस और श्रेष्ठ उपलब्धियों के लिए कई पुरस्कार भी प्रात हो चुके हैं
—रामाज्ञा तिवारी