10 तरुण के स्वप्न
नेताजी सुभाषचंद्र बोस ऐसेस्वाधी संपन् समाज और राष्ट क सपना देखत थे जिसमं व्यक्त सब दृष्टयो से मुकत हो और समाज तथा राष्ट् की सेवा में समान रूप से भागीदार बने वे अपने उदबोधनो में नारी मुक्त और सभी को शिकषा तथा समान अवसर मिलने की बात भी करते थे अपना यह स्वप् वे युवाओं को सौपना चाहते थे जिससे आदर्श समाज और आदर्श राष्ट का रूप साकार हो सके आइए, अब हम नेताजी के उस उदबोधन के विषय मेंजनते हैंजो उ्होने मदिनीु जिला युक-सम्मेलन में29 दिसंबर, 1929 को युवाओं को संबोधित करते हुएप्रगट किया था।
स्वप्न तो अनेकों ने देखा हमारे नेता स्वगीय देशबंधु चित्तरंजन दास ने भी एक स्वप् देखा था। वही स्वप्न उनकी शक्त का उत्स बना और उनके आनंद का निझेर रहा। उनके स्वप्न के
उत्तराधिकारी आज हम हैं इसलिए हमारा
भी अपना एक स्वप्न है, इसी स्वप्न की
प्रणा से हम उठते हैं बैठते हैं चलते हैं eput
फिरते हैं और लिखते हैं भाषण देते
है, काम-काज करते हैं वह स्वप्न
या आदर्श क्या है? हम चाहते
हैं, एक नया सव्वांगीण स्वाधीन
संपन्न समाज और उस पर एक
स्वाधीन राष्ट्ा उस समाज में व्यक्ति
सब दृष्टियों से मुक्त हो तथा समाज के
दबाव से वह मरे नहीं। उस समाज में जातिभेद का
स्थान नहीं हो, उस समाज में नारी मुक्त होकर समाज एवं
राष्ट्र के पुरुषों की तरह समान अधिकार का उपभोग करे
और समाज तथा राष्ट्र की सेवा में समान रूप से हिस्सा ले,
उस समाज में अर्थ की विषमता न हो, उस समाज में प्रत्येक
व्यक्त शिक्षा और उन्नति का समान सुअवसर पाए। जिस
समाज में श्रम और कर्म की पूरी मर्यादा होगी और आलसी
तथा अकर्मण्य के लिए कोई स्थान नहीं रेगा, वह राष्ट्र

किसी भी विजातीय प्रभाव से हर प्रकार से मुक्त रहेगा जो राष्ट
् हमारे स्वदेशी समाज के यंत्रके रूप में काम करेगा, सव्ोपरि वह समाज और राष्टर भारतवासियों का अभाव मिटाएगा या भारतवासी के आदर्श को सार्थिक बनाकर ही स्थर नहीं होगा, बल्क विशव-मानव के समक्ष आदर्श-समाज और आदर्श-राष्ट्र के रूप में गण्य होगा। मैं ऐसे समाज और ऐसे राष्ट् का ही स्वप्न देखता रहा हूँ। यह स्वप्न मेरे समक्ष नित्य एवं अखंड सत्य है इस सत्य की प्रतिष्ा के लिए सबकुछ किया जा सकता है, हर प्रकार का त्याग किया जा सकता है हर संकट को सहा जा सकता है और इस स्वप्न को सारथक बनाने के दौरान प्राण देना भी है तो "वह मरण है स्वर्ग समान'। हे मेरे तरुण भाइयो! तुम्हे देने लायक मेरे पास कुछ भी नहीं है है सिर्फ यही स्वप्न जो हमें असीम शक्त और अपार आनंद देता है, जो मेरेक्षद् जीवन को भी सार्थक बनाता है। यह स्वप्न मैं तुम्हे उपहारस्वरूप देता हू—स्वीकार करो।
लेखक से परिचय

उड़ीसा (अब ओ़शा रज्य के कटक नग में जनमे सुभाषचंद्रबोस कोपरादेश नेताजी' के नाम से जानता है। भारत के स्वतंत्रता संग्राम में उनका उद्ेशय स्पष्ट था भारत को अंग्ेजी शासन से मुकत कराना। ्रिटिश शासन के विरुद् संघर्षकते हु उन्ेंकई बार जेल भी जाना पड़ा स्वतंत्रा की लड़ाई मेंउनकी दूरदर्शिता का पता तब चलता है जब उन्होने 'आजाद हिंद फौज का नेतृतव संभाला सन 1857 में ारतीय सैनिको नेस्वतंत्त प्रा्त के लिए जिस तरह एकजुट होकर युद्ध किया, उसके बाद सुभाषचंद् बोस ही ऐसे महान सेनानी हुए जि्होंने आजाद हिंद फौज' के माध्यम से एकजुट होकर अंग्रजों को चुनौती दी न्होने सैनिकों को "दिल्ली चलो' और 'जय हिंद का नारा दिया सुभाषचंद् बोस ने भारत को ्वत्रता दिलानेके लिए क्रांति का ऐसा बिगुल बजाया क पूा देश 'जय हिंद के नारो से गूज उठा उन्होने "तुम मुझे खून दो मैंतुमहे आजादी दूगा' जैसा प्रक नारा भी दिया सुभाषचंद्र बोस ने एक स्वाधीनराष्ट और आत्मनिभर समाज का सपना देखा। उनके जीवन के विषय में जानना भारतीय स्वतंत्ता आंदोलन के इतिहास को जानना है द इंडियन स्ट्गल उनकी च्ित पुस्तक है प्रकाशन विभाग, भारत सरकार ने नेताजी सुभाषचंद् बोस का वाड्मय (संपूर्ण लेखन) प्रकाशित किय है इस प्रकाशन में उनके उपलब्ध सभी कायों, पत्ों टिप्पणियों, भाषणों आदि को सम्मिलित किया गया है
पाठ से
आइए, अब हम इस पाठ पर विस्तार से चर्चा करे। आगे दी गई गतिविधियाँ इस कार् में आपकी सहायता करेगी।
मेरी समझ से
(क) निन्नलिखित प्रशनो के उपयु्त उत्तर के सम्मुख तारा (*) बनाइए कुछ परशनं के एक से अधिक उतर भी हो सकते हैं
(1) "उनके स्वप्न के उतराधिकारी आज हम हैं'" इस कथन मे रेखांकित शब्द 'हम' किसके लिए प्रयुक्त हुआ है?
0 सुभाषचंद्रबोस के लिए देश के तरुण वर्ग के लिए चित्तरंजन दास के लिए (2) स्वाधीन राष्ट्रका स्व्न साकार होगा?

• आर्थिक असमानता से स्त्री-पुरुष के भिन्न अधिकारों से श्रम और कर्म की मर्यादा से 0 जातिभेद से

(3) "उनके स्वप् के उत्तराधिकारी आज हम है'" "
उत्तराधिकारी' होने से क्या अभिप्रय है?
0 हमें उनके स्प्ों को संजोकर रखना है हमें भी उनकी तरह स्वप्न देखने का अधिकार है उनके स्वप्नों को पूरा करने के लिए हमें ही कर्म करना है • उनके स्वप्नों पर चर्चा करने का दायित्व हमारा ही है (4) जब प्रत्येक व्यक्त को शिक्षा और उन्नति का समान अवसर प्रापत होगा तब
• राष्ट्र की श्रम-शक्त बढ़ेगी तरुणों का साहस बढ़ेगा • राष्ट्रस्वाधीन बनेगा राष्ट्र स्वप्दशी होगा
(ख) हो सकता है कि आपके समूह के साथियों ने अलग-अलग उत्तर चुने हों अपने मित्रों के साथ चर्चा कीजिए कि आपने ये उत्तरही क्यों चने?
मिलकर करें मिलान
नीचे स्तंभ 1 में पाठ मे से चुनकर कुछ पंक्तयाँ दी गई हैं और स्तंभ 2 में उन पंक्तियों से संबधित भाव-विचार दिए गए हैं। स्तंभ 1 में दी गई पंक्तियों का स्तंभ 2 में दिए गए भाव-विचार से सही मिलान कीजिए।
| क्रम | स्तंभ 1 | स्तंभ २ |
| 1. | "इसी स्वप्न की प्रणा से हम उठते हैं बैठते हैं, चलते हैं, फिरते हैं और लिखते हैं भाषण देते हैं, काम-काज करते हैं" | समाज में सभी व्यक्तयों को सभी तरह की स्वतंत्रता 1. हो और उस पर किसी तरह का बंधन या सामाजिक दबाव न हो। |
| 2. | ""जो राष्ट् हमारे स्वदेशी समाज के यंत्र के रूप में काम करेगा, सवोॉपर वह समाज और राष्ट्र भारतवासियों का अभाव मिटाएगा।" | 2. हमारी समूची दिनचर्या और आचार-विचार इसी लक्ष्य (स्वप्न) की प्राप्ति पर केद्रित हैं |
| 3. | "उस समाज में व्यक्त सब दृष्टियो से मुक्त हो तथा समाज के दबाव से वह मरे नहीं" | 3. जिस देश की योजनाएँ हमारे अपने समाज को ध्यान में रखकर बनाई जाएँंगी, उस देश में किसी भी प्रकार का अभाव नहीं होगा। |
पंक्तियों पर चर्चा
पाठ से चुनकर कुछ पंक्तयाँ नीचे दी गई हैं इन्हे ध्यानपूर्वक पढिए और इन पर विचार कीजिए। आपको इनका क्या अर्थ समझ में आया? अपने विचार अपनी कक्षा में साझा कीजिए
(क) "उस समाज में अर्थ की विषमता न हो"
(ख) "वही स्वप्न उनकी शक्त का उत्स बना और उनके आनंद का निझर रहा"
(ग) "उस समाज में व्यक्त सब दृष्टयों से मुक्त हो"
सोच-विचार के लिए
अब आप इस पाठ को पुन: पढिए और निम्नलिखित के विषय में पता लगाकर लिखिए (क) नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने किस प्रकार के राष्ट नि्माण का स्वप्न देखा था? (ख) नेताजी सुभाषचंद्रबोस ने किस ल्य की प्ाप्ति को अपने जीवन की सार्थकता के रूप में देखा? (ग) "आलसी तथा अकर्मण्य के लिए कोई स्थान नहीं रहेगा" सुभाषचंद्र बोस ने ऐसा क्यों कहा होगा? (घ) नेताजी सुभाषचंद्रबोस केलक्षयों याध्येय को पूर करनेके लिए आज की युवा पीढ़ीक्या-क्या कर सकती है?
अनुमान और कल्पना से
(क) "उस समाज में व्यक्त सब दृषटयों े मु्त हो', सुभाषचंद् बोसने किन-किन दृष्टियो से मुक्त की बात की होगी?
(ख) "उस समाज में नारी मुक्त होकर समाज एवं राष्टके पुरूषों की तरह समान अधिकार का उपभोग करे", सुभाषचंद्र बोस को अपने भाषण में नारी के लिए समान अधिकारों की बात क्यों कहनी पड़ी?
(ग) आपके विचार से हमरे समाज में और कौन-कौन से लोग हैं जिन्हें विशेष अधिकार दिए जाने की आवश्यकता है?
(घ) सुभाषचंद्रबोस देश के समस्त युवा वर्ग को संबोधित करते हुए कहते हैं—"हे मेर तरुण भाइयो!" उनका संबोधन केवल 'भाइयो' शब्द तक ही क्यों सीमित रहा होगा?
(ड) "यह स्वपन मैं ुम्हे उपहारस्वरूप देता हू—स्वीकार करो" सुभाषचं्र बोस के इस आह्वान पर श्रोताओं (युवा वर्ग) की क्या प्रतिक्रिया रही होगी?
(क) आपनेनेताजी सुभाषचंद्र बोस के भाषण का एक अंश पढ़ा है, इसे 'तरुण के स्वप्' शीर्षक दिया गया है। अपने समूह में चर्ा करके लिखिए कि यह शीर्षक क्यों दिया गया होगा?
(ख) यदि आपको भाषण के इस अंश को कोई अन्य नाम देना हो तो क्या नाम देंगे? आपने यह नाम क्यों सोचा? यह भी लिखिए।
(ग) सुभाषचंद्र बोस ने अपने समय की स्थितियों या समस्याओं को अपने संबोधन में स्थान दिया है। यदि आपको अपनी कक्षा को संबोधित करने का अवसर मिले तो आप किन-किन विषयों को अपने उद्बोधन में सम्मलित करेंगे और उसका क्या शीर्षक रखेंगे?
भाषा की बात
(क) सुभाषचंद्र बोस ने अपने भाषण में संख्या, संगठन या भाव आदि का बोध कराने वाले शब्दों के साथ उनकी विशेषता अथवा गुण बताने वाले शब्दोंका प्रयोग किया है उनके भाषण से विशेषता अथवा गुण बताने वाले शब् दढूढ़कर दिए गए शब्द समूह को पूरा कीजिए

(ख) सुभाषचंद्र बोस ने तो उपर्यु्त विशेषताओं के साथ इन शब्दों को रखा है। आप किन विशेषताओं के साथ इन उपर्युक्त शब्दों को रखना चाहेंगे और क्यों? लिखिए।
विपरीतार्थक शब्द और उनके प्रयोग
(क) "और उस पर एक स्वाधीन राष्ट इस वाक्यांश मे रेखांकित शब्द स्वाधीन' का विपरीत अर्थ देने वाला शब्द है 'पराधीन। इसी प्रकार के कुछ विपरीतार्थक शब्द आगे दिए गए हैं, लेकिन वे आमने-सामने नहीं हैं रखाएँ खींचकर विपरीतार्थक शब्दों के सही जोड़ बनाइए
| क्रम | स्तंभ 1 | स्तंभ 2 |
| 1. | स्वीकार | कर्मण्य/कर्मठ |
| 2. | सार्थक | विपन्न |
| 3. | विषमता | अस्वीकार |
| 4. | क्ुद्र | जीवन |
| 5. | संपन्न | निर्थक |
| 6. | अकर्मण्य | समानता |
| 7. | मरण | विशाल/वृहत /विराट/महान |

(ख) अब स्तंभ 1 और स्तंभ 2 के सभी शब्दं से दिए गए उदाहरण के अनुसार वाक्य बनाकर लिखिए, जैसे "समाज की उन्नति अकर्मण्य नहीं अपितु कर्मण्य व्यक्तियों पर निर्भर है'"
पाठ से आगे
आपकी बात
(क) आपने सुभाषचंद्र बोस के स्वप्न के बारे में जाना। आप अपने विद्यालय, राज्य और देश के बारे में कैसे स्वप्न देखते हैं? लिखिए।
(ख) हमें बड़े संघषों के बाद स्वतंत्रा मिली है। अपनी इस स्वतंत्रा को बनाए रखने के लिए हम अपने स्तर पर क्या-क्या कर सकते हैं? लिखिए।

मिलान कीजिए
(क) नीचे स्तंभ 1 में स्वतंत्रता सेनानियों से संबंधित कुछ तथ्य दिए गए हैं और स्तंभ 2 में स्वतंत्रता सेनानियों के नाम दिए गए है। तथ्यों का स्वतंत्रता सेनानियों के नाम से रेखा खींचकर सही मिलान कीजिए। इसके लिए आप अपने शिक्षकों, अभिभावकों और पुस्तकालय तथा इंटरनेट की सहायता ले सकते हैं।
| क्रम | स्तंभ 1 | स्तंभ २ |
| 1. | 8 अप्रैल, 1929 को 'सेंट्ल असेंबली में बम फेकने वाले क्रांतिकारी, 'शहीद-ए-आज़म' के नाम से जाने जाते हैं। | 1. सरदार वल्लभभाई पटेल . महात्मा गाँधी e |
| 2. | 'स्वराज पा्टी' के संस्थापकों में से एक, सुभाषचंद्र बोस के राजनीतिक गुरु कहे जाते हैं। | |
| 3. | जेल में क्रांतिकारियों के साथ राजबंदियों के समान व्यवहार न होने के कारण क्रांतिकारियों ने 13 जुलाई 1929 से भूख हड़ताल शुरू कर दी। अनशन के तिरसठवें | |
| 4. | दिन जेल में इनका देहांत हो गया। इनके जन्मदिवस पर 'अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस' मनाया जाता है। | ४.चित्तरंजन दास |
| 5. | यूनिटी' कहा जाता है। | 5. जतिन दास |
| 6. | 1921 में असहयोग आंदोलन में गिरफ्तार होने पर न्यायाधीश ने इनसे पिता का नाम पूछा तो इन्होने कहा— "मेरा नाम आजाद है, पिता का नाम स्वतंत्रता और पता कारावास है" | ६. भगत सिंह |
(ख) इनमें से एक स्वतंत्ता सेनानी का नाम 'तरुण केस्वप्न पाठ े भी आया है उसे पहचान कर लिखिए
सर्वागीण स्वाधीन संपन्न समाज के लिए प्रयास
नेताजी सुभाषचंद् बोस और अन्य स्वतंत्रता सेनानियों ने स्वाधीन संपन्न समाज की स्थापना के लिए अपने समय में अनेक प्रयास किए। स्वतंत्रता प्राप्त के पश्चात इस दिशा में क्या-क्या उल्लेखनीय प्रयत्न किए गए हैं? अपनी सामाजिक अध्ययन की पाठ्यपुस्तक, अपने अनुभवों एवं पुस्तकालय की सहायता से लिखिए।
स्त्री सशक्तीकरण
(क) सुभाषचंद्रबस ने स्त्योंके लिए समान अधिकार की बात क है अपने अनुभवों के आधार पर बताइए कि उन्हें कौन-कौन से विशेषाधिकार राज्य की ओर से दिए गए हैं?
(ख) सुभाषचंद्र बोस ने 'आजाद हिंद फौज' का नेतृत्व किया था उसमे एक टुकड़ी स्त्रयों की भी थी। उस टुकड़ी का नाम पता लगाकर लिखिए। उस टुकड़ी की भूमिका क्या थी? यह भी बताइए।
आपके प्रिय स्वतंत्रता सेनानी
आप किस स्वतंत्रता सेनानी के कायं व विचारों सेप्भावित हैं? कारण सहित लिखिए और अभिनय (रोल प्ले) करते हुए उनके विचारों को ककषा मे प्र्तुत कीजिए।
'तुम मुझे खून दो, मै तु्हें आजादी दूंगा।"
ब्रिटिश शासन के विरुद् संघ्ष में 194४ में सुभाषचंद्र बोस ने तुम मुझे खून दो मैंतुमहे आजादी दूंगा' नारे के माध्यम से आहवान किया था स्वाधीनता संग्राम के दौरान और भी बहुत से नोरे दिए गए ये नारे स्वतंत्रता सेनानियों के अदम्य साहस, निर्भीकता और देश-्रम को दशात हैं
नीचे स्तंभ 1 में कुछ नारे दिए गए हैं नारों के सामने लिखिए कि यह किसके द्ारा दिया गया? आप पुस्तकालय या इंटरनेट की सहायता भी ले सकते है।
| नारा | स्वतंत्रता सेनानी |
| स्वराज्य मेरा जन्मसिद्र अधिकार है। | |
| करो या मरो | |
| मैं आजाद हूँँ, आजाद रहूँगा और आजाद हीमरूंगा | |
| इंकलाब जिंदाबाद, साग्राज्यवाद मुदाबाद | |
| पूर्ण स्वराज |
परियोजना कार्य
आप सभी राज्यं के स्वतंत्रता सेनानियों के विषय में पढ़कर उनमें से 10 महिला एवं 10 पुरुष स्वतंत्रता सेनानियों के चि्रों का संग्रह करके एक संग्रहिका तैयार कीजिए। चित्रों के नीचे उनके विशेष योगदान के बारे में एक-दो वाक्य भी लिखिए। अपनी संग्रहिका तैयार करते समय ध्यान रखिए कि आप किसी भी राज्य से एक से अधिक व्यक्त न चुने।
झरोखे से
आपने जो पाठ पढ़ा है उसमें सुभाषचंद्र बोस तरुणों से अपने सपनों की बात करते है अब आप नेताजी सुभाषचंद्र बोस द्वारा लिखित पत् पढ़िए जिसमे उन्होने गृह एवं कुटीर उद्योग पर अपने विचार व्यक्त किए हैं
गृहउद्योग के विषय मे नेताजी का एक पत्र
मुझेजहाँ तक याद है (मै मात्रएक बार पालिटेकनीक' में गया था), पालिटेकनीक के सभी कामों मं एकमात् बेंत का काम अथवा मिट्टी के खिलौने बनाने का काम हमें गृह-उद्योग के रूप में चलाना होगा। अब यद अंत में मिटी के खिलौने बनाने का काम चलाने का प्रस्ताव हो तो कोई भी कुछ दनो में ही यह काम सीख सकता है। खर्च कुछ भी नहीं लगेगा और हम जब गृह-उद्योगप्रारंभ करेंगेतब मातरंगों के लिए कुछ नकद रुपये खर्च होंगे इसके अलावा बहुत कम खर्च होगा।
एक बात मेरे मनमें बार-बार उठती रहती हैपहले भी शायद इस विषय में मैने लिखा हैसीप के बटन तैयार करना। बंगाल के बहुत-से गाँवो में यह काम घर-घर में हो रहा है। गरीब गृहस्थों के घरों में स्त्री-पुरुष अपनी फुरसत के समय में यह काम करते रहते हैं किसी एक कार्यकता को बहुत कम समय में यह काम सिखाया जा सकता है अथवा यह काम जानने और सिखाने वाले एक नए कार्यकता को आप लोग नियुक्त कर सकते हैं मुझे लगता है कि पत्थरों के ऊपर घिसकर बटन बनाया जा सकता हैहम चाहें तो बना सकते है सर्फ पतला कोई यंत्रहो जिससे छेद किया जा सके इसके अलावा गोल काटने के लिए एक धारदार यंत्र की आवश्यकता पड़ सकती है समिति की ओर से कुछ यंत्र और एक बोरा सीप मँगाकर ही यह काम प्रारंभ किया जा सकता है काम सहायता-प्रथियों में आबद्ध रहेगा, किंतु एक बार कारगर होने पर आप देखेगे कि गरीब परिवार अपनी आय बढ़ाने के लिए यह काम स्वयं आरंभ कर देगा। समिति सर्फ स्ते दामों मेरॉ मैटीरियल आदि जुट देगी और तैया वस्तुओं को अधिक दामो में बेचने की व्यवस्था करेगी। यह काम आरंभ करना पड़ा तो पहले-पहल इसके लिए बहुत अधिक समय देना होगा।
बंगाल में बटनर्माण गूहउ्ोगके रूपमें ही चल रह ह बुतों का खया हैकि बंगाल के बटन फै्टरी में बनते हैं किंतु वास्तव मे ऐसा नहीं है। गाँव-देहात के घर-घर में फुरसत के समय, यहाँ तक कि रसोई के समय में से बचे खाली समय में भी, स्त्या यह काम करती रहती हैं इसीलिए इतने स्ते में यह बटन मिलते हैं।
दक्षण कलकत्ता सेवक-समित के उप-ंत्री श्री अनिलचंद्रविश्वास को मांडले जेल से लिखे गए सुभाषचंद्र बोस के पत्र से।
साझी समझ
उपर्यक्त पत्में नेताजी सुभाषचंद्र बोस ने गृह एवंकुटीर उद्योग की बात की है। यह पत्रदेश की स्वतंत्ता से पहले लिखा गया था। अपने आस-पास के गृह एवं कुटीर उद्योगों के विषय में अपने साथियो के साथ चर्चा कीजिए।
खोजबीन के लिए
नीचे दी गई इंरनेट कड़ी का प्रयोग करके आप सुभाषचं्र बोस पर आधारित फिल्म देख सकते हैं। https://www.youtube.com/watch?v=u zmDD54dU4 आजाद हिंद फौज के विषय में और अधिक जानकारी जुटाए और अपनी क्ा ेंप्र्त कीजिए
यहाँ आपके लिए एक छोटा-सा शब्दकोश दिया गया है। इस शब्दकोश में वे शब्द हैं जो विभिन्न पाठों में आए हैं और आपके लिए नए हो सकते है। किसी-किसी शब्द के कई अर् भी हो सकते है। पाठ के संदर्भ से जोड़कर आप यह अनुमान स्वयं लगाएँ कि कौन-सा अर्थ पाठ के लिए अधिक उपयुक्त है।
कही-कहीं शब्दोंके अनेक समानारथी भी दिए गएहै इसे आप प्रसंग के अनुसार अनुकूल शब्द का चयन करना सीख सकेंगे। यह शब्दकोश आपको शब्दों के न केवल सही अर्थ जानने में सहायता करेगा अपितु शब्दों की सही वर्तनी भी सिखाएगा। शब्द का अर्थ देने से पहले मूल शब्द के बाद कोष्ठक में एक संकेतक्षर दिया गया है। इन संकेतो से हमें शब्दों की भाषा और व्याकरण संबंधी जानकारी मिलती है यहाँ जो संकेतक्षर अथवा संक्षप्तरूप प्युक्त हए हैं वे इस प्रकार हैं—

अं. - अंग्रेज़ी अ. - अव्यय (अ.) - अरबी अ.क्र. - अकर्मक क्रिया पु. -पुलिंग फा. - फारसी वि. -विशेषण सं. - संस्कृत स.क्रि.-सकर्मक क्रिया सर्व.-सर्वनाम स्त्री. -स्त्रीलिंग
अ
अंटी [वि.सं. सत्री] -धोती की कमर के ऊपर की लपेट, गाँठ
अकर्मण्य [वि.सं.] -कर्म के अयोग्य, आलसी, निकम्मा, न करने के योग्य
अखणड [वि.सं.]-जिसका सिलसिा न टूटे, अविकल, संपूर्, पूरा, अटूट, बाधारहि
अि [सत्रीसं.] -आग, उण्णता, प्राश,गरमी, जलानेकी क्रिया, सोना
अति [सं.]–अधिकता, सीमोलंघन
अतिथि [पु.स.] -अचानक आयाहुआ मेहमान, वह संन्यासी जो कहींएक रात से अधिक न ठहे
अनगिन [वि.] अगणित, बेिसाब, अनगनत
अनुपात [पु.सं.]-सापेक्षिक संबंध, अनुसरण, तीन जात संख्याओं के आधार पर चौथी को निकालना
अपराध [पु.सं.]–दोष, गलती, पाप, जु्म, दंड योग्य कर्म
अप्राप्य [वि.सं.] -न मिलने वाला, अलभ्य
अर्ी [वि.सं.] -चाह या गरज रखने वाला, धनी, प्र्थी, वादी, सेवा करने वाला
अवरोहण [प.स.]-उतरना, नीचे आने की क्रिया अवाक [वि.सं.] -स्तबध, मौन, चुप, दक्षिण की ओर, अधोमुख अविश्वास [प.सं.] -विश्वास का न होना, शंका, संदेह अह [ु.]- गर्व घमंड, अहम' का समासगत रूप अहाता [पु.(अ)] –घेरा, चहारदीवारी से घेरी हुई जगह, सूबा, ्रसिडेंसी
आ
आँगन [पु.] - चौक, घर के भीतर का सहन
आंतरिक [वि.सं.] - भीतरी, जिसका संबंध भीतरी बातों से हो, हार्दिक
आगंतुक [वि.सं.] -बिना बुलाए आने वाला, अचानक आने या होने वाला, अजनबी आदर्श [पु.सं.] –नमूना, असल, व्ाख्या, आईना, शीशा, मूल लेख ed
आपा [पु.] –सुध-बुध, अहंकार, अपना स्वरूप, गर्व, सत्ता
आरोहण [पु.सं.] – चढ़ना, सवार होना, ऊपर को जाना, सीढ़ी, अँखुवा फूटना, नृत्य आदि के लिए बना हुआ मंच
ई
ईप्या [सत्रीसं.]-जलन, डाह, दूसरोंकी बढ़ती न देख सकना
उ
उत्राधिकारी [वि.सं.]-किसी के बाद उसकी संपत्त पाने का हकदार, वारिस
उत्स [पु.सं.]–सोता, सोत, जलमय स्थान
उद्वार [पु.सं.] –मुक्त, बाहर निकालना (विपति दुदशा आदि से), ऊपर उठाना, छुटकारा
उपभोग [प.सं.] – भोगना, फलभोग, सुख,स्वाद लेना, व्यवहार
औ
औरन/और [अ.वि.]-दूसरा, अधिक
क
कदाचित [अ.सं.]-कभी, शायद कन [पु.]–कण, बूँद, संक्षिप्त रूप
कल्लोल [प.सं.]-कुछ ऊँची और आवाज करने वाली लहर, मौज, आनंद ्री़ा
कसरत [सत्री(अ.)] -शरीर को पुष् एवं बलवान बनाने वाली क्रियाएँ व्यायाम, वर्जिश, बहुलता
कालीन [पु.(अ)] –गलीचा, सूत या ऊन के धागे से बना हुआ बिछीना
किरण [सीसं रशिम, ज्योति ेप्वाह रपमं निकलने वाीरेखा, अंशु,धूलिक, सू्य
कुटी [स्त्र.स.]-झोपड़ी, कुटिया, मोड़़, घुमाव
कुशा [स्तरीस.] -सरस्सी, कड़ी और नुकीली पतियों वाली एक घास जो य्, पूजन आदि ध्म ृत्यं क आवश्यक सामग्री है।
ख
खजाना [पु.फा.] – भंडार, कोश, राजस्व, रूपया, सोना-चाँदी रखने का स्थान
खाक [स्त्ी.फा.] -धूल, मि्टी, कुछ नहीं तुच्छ, छोटा
खाट [स्त्र.] - चारपाई्, खटिया
खानि [सत्र.सं.] -खान, सोत, भंडार, वह जगह जहाँ से धातु कोयला आदि खोदकर या पत्थर की सिलेंतोड़कर निकाली जाए
खीझ [स्री] खीझनेका भाव, झुझलाहट, कुढ़न, गुसा
खोय (खोना) [स.क्रि.] - गँवाना, अपनी चीज कहीं भूल या छोड़ आना
ग
गज [पु.फा.] –लंबाई का एक मान, 36 इंच
गण्य [विसं]-गणनीय-गिने लायक, मान्य, लिहाज करने योग्य
गति स्तर.स.] चाल, गमन, प्तार, हरकत प्वेश,जाना, दशा हालत
गर्वित[विस.] गर्वयुक्त, घमंडी
गुमसुम [वि. -चुप और निश्चष् स्त्ध होना
गोविद [प.सं] -गोपालक, कृष्,बृह्पति
घ
घाटी [स्री]-दो पहाडों के बीच की नीची जमीन, पहाड़ का ढाल, मैदान, दर्रा घृणा [सत्री.सं.] – घिन, नफरत, दया, करणा
च
चराना [अ.क्र. -खाल मेंखशकी से तनाव या हलका दर् होना, चर-च करके टूटना, ्बल इच्छा होना
चुगा [पु. -चि़ियों के चुगन के लिए डाली गई चीज, वह चारा जो चिड़िया चोंच से उठाकर बच्चेके मुह में द चुटीला [वि.]-जो चोट खाए हो, चोट करने वाला, जख्मी, चोटी का या सबसे बढिया
छ
छज्जा [पु.] -छत का दीवार के बाहर निकला हुआ भाग, बारजा, धूप से बचने के लिए छावनी [स्तरी.] -वह स्थान जहा सेना रखी जाए, शिविर, पड़ाव
ज
जमाना [पु.(अ.)] –-काल, युग, अरसा, अवधि, बहुत समय, दुनिया, संसार
ज़मींदार [पुफा.] – जमीन का मालिक, किसान, काश्तकार
जावित्ी [सत्ी.] -जायफल का छिलका जो मसाले और दवा के रूप में काम में लाया जाता है।
जोश [पु.फा.] -उत्साह, आवेश, उबाल, उफान, गरमी
जझ
झलना [स.क्ि.] - पंखा आदि हिलाकर हवा करना, हवा करने के लिए हिलाना झालर [्त्री.] -लटकने वाला हासिया, किनारा, एक तरह का घंटा या घड़ियाल
ट
टोकरी [स्री] घास, फल, तरकारी आदिरखने का बास या झाऊ आदि का बना गोला, गहरा पात्र, खंचिया
ठ
ठिठक [अ.क्रि]- चलते-चलते सहसा रुक जाना, बिल्कुल स्थर हो जाना ठूसना [स.क्र] दबा-दबाकर भरना, कसकर रखना
ड
डेरा [प.] - टिकाव, पड़ाव, ठहरनेके लिए, फैलाया हुआ सामान, रहने की जगह, घर, मकान डैना[प. -पंख,पर, नाव खेनेक डंडा
त
तकलीफ [स्री.(अ.)] -दुःख, कष्ट, क्लेश
तज- दारचीनी की जाति का एक वृक्ष जिसकी छाल दवा के काम आती है (इसके पते को तेजपत्ता कहते हैं)
तप [पु.सं.]-तपस्य, ताप, दाह, सू्, ग्री्म ऋतु
तर [वि.फा]-उंढा, उंढक पैदा करने वाला, आर्द, अत्यंत शिक्त
तरूण [वि.सं.]-युवा, सोलह वर्ष से ऊपर की अवस्था वाला
तहवाँ [अ.] वहाँ
तार [पु.] -वह तार जिसके दवा बिजली की शक्त से समाचार भेजे जते हैं तारद्वा भेजी हुई खबर
तुनककर/तुनकना [अ.क्रि] -छोटी-छोटी बातों पर चिढ़ जाना
त्र
्रभुवन [प.स.] -—स्व्ग पृ्वी और पाताल- इन तीनों भुवनों का समहार
थ
थिगली [स्री] -छेद बं कने के लिए टॉका गया कपड़ पैंद, चमड़ आदि का टुड़ा, चकती थोथा [वि.]-भीतर से खाली, खोखला, निकम्मा, नि:सार
द
दक्ष [विस.] क्षसहिता के नि्मा मुनि, सती के पिता, निपुण, कुशल, माहिर, जिसमे किसी विषय को तत्कल समझने तथा कोई कार्य शीघ्र करने की शक्ति हो
दालचीनी [स्त्ी.] – दारचीनी, एक प्रकार का तज जिसका छिलका दवा और मसाले के काम आता है।
दीप्त [्त्र.स.]-चमक, कांत, प्रा,जान क प्राश,छटा जान की अभिव्यक्ति
दोऊ [वि.] - दोनों
ध
धन-मद [विप.]-धन का गर्व
धमा-चौकड़ी स्त्ी.] – उछल-कूद, कूद-फाँद, ऊधम
धर्मशाला [स्री.सं.] - वह स्थान जहाँ धर्मा्थ अन्नादि बॉटता हो, यात्रयों के लिए नःशुल्क ठहरने के लिए बनवाया हुआ स्थान
धूम [पु.सं.] -धुआँ, कुहरा, बादल, मकान बनाने के लिए तैयार किया गया स्थान
न
नकद [पु.(अ.)] -वह धन जो सिक्कों के रूप में हो, वह रकम जो फौरन अदा की जाए
नक्षत्र [पु.सं.] – तारा, अश्वनी, रोहिणी, चित्रा, स्वाती, विशाखा
नगर [पु.सं.] -शहर, कस्बे से बड़ी और समृद् बस्ती जिसमें अनेक जातियों और पेशों के लोग बसते हों
नभ [पुसं.] –आकाश, सावन का महीना
निंदक [वि.स] -निंदा, बदगोई करने वाला, किसी के दोष का वर्णन करने वाला
नियरे [अ.] -निकट, पास
निरीक्षण [प.सं.]–गौर से देखना, जँच करना, देखेख करना, आशा
निझर [पु.सं.]झरना, प्रपात, हाथी, भूसी की आग
निदयी [विसं] - दयारहित, निर, कठोर हदय वा प्रंड, उ्र
निमल [विसं. -स्वच्छ, शुद्ध पतित्र दोषों से हित
निफफल [वि.स.]-जिससे कुछ अर्थ न सिद् हो, बेकार, जिसका कुछ फल ना हो
नुक्कड़ [पु.] –मोड़, छोर, निकला हुआ कोना, नाका, नोंक
नप्य पुस.-संगमंच केपदेकेपीछेकी वह जग जहॉकला की वेश रचनाकी जाती ै वेशभष
प
पंडे/पंडा [पु.] – तीर्थ, मंदिर या घाट पर धर्मकृत्य कराने वाला, तीर्थ का पुजारी, रसोइया
पंथी [प.] - यातरी, बटोही, किसी मत को माननेवाला
पना [पु.]-पन्ना, अपने से पके या आग में पकाए हुए आम, इमली आदि के रस या गूदे से तैयार किया जाने वाला एक प्रकार का पेय पदार्थ
परमानंद [पु.सं.] – उत्तम आनंद, उत्तम आनंदरूप परमात्मा
परवाना [पु.फा.] – पतिंगा, पंखी, आज्ञापत्र, नियुक्तिपत्र
परिधि [स्त्ी.स.] -लकड़ी आदि का घेरा या बा़ा, परिवेश, वृतबनाने वाली गोल रेखा, पहिये का घेरा
पलंग [पु.]-बड़ी और बढ़िया चारपाई, अधिक लंबी-चौड़ी और सुदर चारपाई
पश्चाताप [अ.सं.] -पछतावा, कोई अनुचित कार्य करने के बाद में उसके लिए दु:खी होना
पसीजा- पसीजना [अ.क्रि] -दया से आद्र होना, खिन्न होना
पाँय [पु.] – पैर, चरण
पाट [पु.सं.] -विस्तार, फैलाव, चौड़ाई, रेशम, वस्तर, सिंहासन, पत्थर की पटिया, पीढ़ा, चक्की के दो भागों में से कोई एक
पार - किसी वस्तु का दूसरा किनारा, अंत, हद, पारा
पारायण [पु.सं.] -किसीग्रंथ का आद से अंत [आांत] पाठ, संपू्णता, पार जाना
पावन [वि.सं] - पवित्र, शुद्ध, शुद्ध करने वाला
प्रबंध [पु.सं.] - व्यवस्था, आयोजन, ग्रथ, कथा आदि की रचना
पेरणा [स्त्ी.सं.]-किसी को किसी का्य मे प्रृत करने की क्रया, उकसाने की क्रिया, फेिकना, भेजना
फ
फाहा [पु.] -घी आदि मेंतर की हुई ु याकपड़ा, मरहम चुपड़ी हुई प्वी,इत्र
ब
बंधु —भाई, मित्र स्वजन, आत्मीय
बखेड़ा [पु.] – झंझट, झगड़ा, पेशानी, टेंटा, कठिनाई
बधिक [पु.]–बहेलिया,व्याध, वध करने वाला, जल्लाद
बरे [प.] - ततैया, भिड़, सरसों के आकार का एक काँटेदार पौधा जिसमेंकेसरिया रंग के फूल लगते है और बीज तेलहन के काम आता है
बलिहारी [स्री] - निछावर होना, ु्ान जाना
बहुतेरा [वि.] – बहुत-सा, अनेक lished
बानी-वाणी [्त्री.सं.] - वचन, सार्थक शब्द, स्वर, जीभ, प्रशंसा
बिछायत [स्त्री.] – बिछ्ाने की चीज, बिदछावन, बिछौना
ब्रह्मांड [पु.सं.] – विश् गोलक, सम्पूर्ण विश्व, खोपड़ी
भ
भ्ी सत्री - खास कामों के लिए बा हुआ ब़ा चूल्ह भाड़ [पु.] -भड़ भूँजे की भ्टी जिसमें बालू गरम कर वह दाना भूनता है भावना [स्त्ी.सं.] - चिंतन, खयाल, कल्पना, इच्छा, ध्यान, स्मरण, उत्पादन भावै [अ.] - मन में आएँ जी चाहे तो भू स्ती.सं.] भूमि, धरती, जमीन, स्थान, पदार्थ एक का संकेत भोगी [विस. -भोग करने वाला, भोग-विलास मे रत, कुडलीयु्त
म
मचलना [अ.क्रि] -किसी चीज को लेने या देने का हठ पकड़ लेना, किसी चीज के लिए रोना-धोना
मठ [पु.सं.] - साधु-संन्यासियों के रहने का स्थान, आश्रम, देवालय
मनोरथ [पु.सं.] - मनोर्थ, मन की कामना, अभिलाषा
मयादा [स्तरी.स.] -सीमा, परंपरा आदिद्रा निधारित सीमा, अवधि, नदी, समुद्रका किनारा, सदाचार, ्रतिषठा
मलमल [स्त्ी] - भारत का एक बारीक, सफेद सूती कपड़ा जो बहुत पुराने जमाने से प्रसिद्ध था
मिष्ट[वि.सं] – मीठा,स्वादिष्ट, तर, मिठास, मिठाई
मु्त [वि.सं.] -बंधन रहित, खुला हुआ, मोकष प्रा्त, छूटा हुआ, फेंका हुआ
मेघ [प.सं. -बादल, बरसने वा बादल, समू, छ मुख्य रागो मंे एक, मथा
र
रूठना [अ.क्र.] - नाराज होना, अप्रसन्न
ल
लज्जित [वि.सं.] - शर्मिदा, लजायु्त लजाया हुआ लासानी [स्री वि.] बेजोड़, जिसका सानी न हो लीन [वि.सं.] - विलीन, ध्यानमन, तन्मय, तत्पर, छिपा हुआा, पिघला हुआ
व
वल्ली [स्री.सं.] -लता, बेल, जमीन या किसी आधार पर फैलने वाला पौधा S
विचरण [प.स.]– घूमना-फिरना, ्रमण करना, पर्यटन, चलना
विजातीय [विस.] - भिन्न जाति दूसरी जाति का, वर्ग का
विदित [पु.सं. अवगत, जाना हुआ,स्वीकृत, सूचना, विद्न, कवि प्रसिद्धि लाभ, ्रात
विमुख [विस.] वंचत, हताश, मुखीन, विरत उदासीन, बहिमुख
विराट [वि.स.] बहुत बड़ा, विशव, ्रहमा, मतय्यदेश का राजा
विलक्षण [विसं.] असाधारण, अलौकिक, भिन् चिहों वाला
वृद्वाकाल [पु.वि.सं.] -बुढ़ापा
वैच [वि.सं. -आयरवेंद का ़ाता, चिकित्सक,विद्ान, वेद-संधी
वैराय पु.स. -विषयासना और संसरिक संबंों से म उचट जा, उदासीनता, ंग दलन
श
शंख [प.वि.] - सौ पद्म की संख्या, सौ पद्म, समुद मेंपैदा होने वाले एक जंत का खोल याघर जो पत्थर-सा कड़ा और सफेद होता है
शिखर [प.स.] पर्ताग्र हाड़ का सबसे ऊँचा भाग, मकान का सबसे ऊँंचा हिस्सा, मड़े, कलश, गुंद, वृक्ष का सबसे ऊँंचा हिस्सा
शिल्प [प.स.]कारीगरी, क्ता, हुनर हस्तकम, रूप, आकृति, नि्मा, सृष्ट, अनु्ठान
स
संख्यातीत [वि.सं.] - अगणित, बेशुमार
संग [पु.सं.] –साथ, साथ होना, योग, मिलन
संगति [स्त्ी.सं.] – मिलन, योग सभा, समाज, साथ, मोक्ष
संदक [पु.(अ.)] - लकड़ी या लोहे का बकस जो कपड़े आदि रखने के काम आता है
संस्कृति [्त्री.] - आचरणगत परंपरा, सभ्यता का वह स्वरूप जो आध्यात्मिक एवं मानसिक वैशिष्टय का द्योतक होता है, सजावट
सकपकाकर [स्त्ी.] - हिचककर, घबराकर
सराय [स्त्री.फा.] - धर्मशाला, मुसाफिरखाना, घर, जमीन के नीचे का तल
सव्वागीण [वि.सं.] -सब वेदागों से संबंध रखने वाला, सब अंगों मे व्याप्त होने वाला
सवोंपर [अ.सं.]-सबसे ऊपर या बढ़कर
सलवट [सत्री] - सिलवट, शिकन, सिकुड़न
साँच [वि.] - सच्ची बात, सत्य, ठीक blished
साधू [पु.वि.सं.] - सच्चा या नेक आदमी, संत, मुनि, सदाचारी
सार [पु॰विसं.]–सारांश, यथार्थ बात, मूल भाग
सीतल/शीतल [विसं] - उंढा, शांत, संतु्ट, आनंदित, मृदु, सौम्य
सुकुमार [वि.सं.] – कोमल, बहुत नाजुक, साँवा, ईख का एक भेद
सुभाय [पु.] –स्वभाव, आदत, अपनी अवस्था, मिजाज, सहज प्रकृति
सूप [प.-अनाज पछोरने का बाँस के छिलके या सींक आदि का बना हुआ पत्र, छाज
सृष्ट [स्त्री.सं.] – जगत, संसार, परित्याग, निरमाण, निर्मित
सौरभ [पु.वि.सं.]– खुशबूदार, सुगंधित, आम, धनिया, केसर
स्वप्न [पु.सं.] सपना, ख्वाब, ऊँची कल्पना, निद्र, कोई महत्वपूर्ण कार्य करने का विचार
स्वाधीन [वि.सं.] —स्वतंत्र स्वच्छंद, जो अपने ही अधीन हो, दूसे के नहीं, आजाद
स्वार् [प.सं.] – अपना मतलब, अपना धन, अपना लाभ, गरज, प्रयोजन
ह
हर्ज [पु.(अ)] -हरज, हानि, ्ति, काम में होने वाली रुकावट, देर, समय-नाश
'ब्रेल भारती' हिंदी वर्ण व गिनती
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पहेलियों के उत्तर
| पाठ | |||
| संख्या 4. | हरिद्वार | आज की पहेली | 1. दालचीनी / जावित्री |
| 2.जनेऊ (जिसे सामान्यतः सूती धागे से बनाया जाता है | |||
| 3. हरि की पैरी, घाट | |||
| . फल, फूल, पत्े, छाल, बीज, लकड़ी और जड (कोई भी एक) | |||
| . कनखल, हरद्ार आदि। | |||
| दुकान | |||
| 7. गंगा | |||
| 8.विल्व पर्वत | |||
| श्री भागवत 9. | |||
निराला की इस संगीतात्मक कविता को पढ़कर आनंद लीजिए विस्तार से इस कविता को आप आगे की कक्षा में पढ़ंगे
भारति, जय, विजय करे!

भारति, जय, विजय करे! कनक-शस्य-कमल धरे! < लंका पदतल शतदल गर्जितोर्मि सागर-जल, धोता-शुंचि चरण युगल स्तव कर बहु-अर्थ-भरे। तरु-तृण-वन-लता वसन, अंचल में खचित सुमन, गंगा ज्योतिर्जल-कण धवल धार हार गले मुकुट शुश्र हिम-तुषार प्राण प्रणव ओंकार, ध्वनित दिशाएँ उदार, शतमुख-शतरव-मुखरे!
सूर्यकांत त्रिपाठी निराला'