दो बैलों की कथा - CBSE Class 9 Hindi Notes

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Chapter Study Guide & Summary

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Key Concepts & Syllabus Topics

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Quick Revision & Key Points

Full NCERT Chapter: दो बैलों की कथा

गया खंड

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आधुनिक काल में गद्य का आविर्भाव सबसे प्रधान साहित्यिक घटना है। – रामचंद्र शुक्ल

गद्य जीवन संग्राम की भाषा है। – सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

कहानी ऐसी रचना है जिसमें जीवन के किसी अंग या किसी एक मनोभाव को प्रदर्शित करना ही लेखक का उद्देश्य रहता है। उसके चरित्र, उसकी शैली, उसका कथा-विन्यास सभी उसी एक भाव को पुष्ट करते हैं। – प्रेमचंद

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प्रेमचंद

प्रेमचंद का जन्म सन् 1880 में लमही (वाराणसी), उत्तर प्रदेश में हुआ था। उनका मूल नाम धनपत राय था। उन्होंने शिक्षा विभाग में नौकरी की परंतु असहयोग आंदोलन में सक्रिय भाग लेने के लिए सरकारी नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और लेखन कार्य के प्रति पूरी तरह समर्पित हो गए।

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प्रेमचंद की कहानियाँ मानसरोवर के आठ भागों में संकलित हैं। सेवासदन, प्रेमाश्रम, रंगभूमि, कायाकल्प, निर्मला, गबन, कर्मभूमि, गोदान उनके प्रमुख उपन्यास हैं। उन्होंने हंस, जागरण, माधुरी पत्रिकाओं का संपादन भी किया। उन्होंने जिस गाँव और शहर के परिवेश को देखा और जिया, उसकी अभिव्यक्ति उनके कथा साहित्य में मिलती है। किसान, मजदूर, दलित, स्त्री और स्वाधीनता आंदोलन आदि उनकी रचनाओं के मूल विषय हैं।

प्रेमचंद के कथा साहित्य में मनुष्य ही नहीं, पशु-पक्षियों को भी आत्मीयता मिली है। उनकी भाषा सरल, जीवंत एवं मुहावरेदार है तथा लोक प्रचलित शब्दों का प्रयोग उन्होंने कुशलतापूर्वक किया है। सन् 1936 में प्रेमचंद का निधन हो गया।

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‘दो बैलों की कथा’ में प्रेमचंद ने किसानों के जीवन और पशुओं के साथ उनके भावनात्मक संबंधों को मार्मिक ढंग से दिखाया है। इस कहानी में उन्होंने यह भी बताया है कि स्वतंत्रता सहज ही नहीं मिलती, उसके लिए बार-बार संघर्ष करना पड़ता है। इस प्रकार परोक्ष रूप से यह कहानी स्वतंत्रता आंदोलन की भावना से जुड़ी है। प्रेमचंद ने इसमें ‘पंचतंत्र’ और ‘हितोपदेश’ जैसी कहानियों की परंपरा को अपनाया और आगे बढ़ाया है।

दो बैलों की कथा

जानवरों में गधा सबसे ज्यादा बुद्धिहीन समझा जाता है। हम जब किसी आदमी को परले दर्जे का बेवकूफ कहना चाहते हैं, तो उसे गधा कहते हैं। गधा सचमुच बेवकूफ है, या उसके सीधेपन, उसकी निरापद सहिष्णुता ने उसे यह पदवी दे दी है, इसका निश्चय नहीं किया जा सकता। गायें सींग मारती हैं, ब्याई हुई गाय तो अनायास ही सिंहनी का रूप धारण कर लेती है। कुत्ता भी बहुत गरीब जानवर है, लेकिन कभी-कभी उसे भी क्रोध आ ही जाता है; किंतु गधे को कभी क्रोध करते नहीं सुना, न देखा। जितना चाहो गरीब को मारो, चाहे जैसी खराब, सड़ी हुई घास सामने डाल दो, उसके चेहरे पर कभी असंतोष की छाया भी न दिखाई देगी। वैशाख में चाहे एकाध बार कुलेल कर लेता हो; पर हमने तो उसे कभी खुश होते नहीं देखा। उसके चेहरे पर एक स्थायी विषाद स्थायी रूप से छाया रहता है। सुख-दुख, हानि-लाभ, किसी भी दशा में उसे बदलते नहीं देखा। ऋषियों-मुनियों के जितने गुण हैं, वे सभी उसमें पराकाष्ठा को पहुँच गए हैं; पर आदमी उसे बेवकूफ कहता है। सद्गुणों का इतना अनादर कहीं नहीं देखा। कदाचित सीधापन संसार के लिए उपयुक्त नहीं है। देखिए न, भारतवासियों की अफ्रीका में क्या दुर्दशा हो रही है? क्यों अमरीका में उन्हें घुसने नहीं दिया जाता? बेचारे शराब नहीं पीते, चार पैसे कुसमय के लिए बचाकर रखते हैं, जी तोड़कर काम करते हैं, किसी से लड़ाई-झगड़ा नहीं करते, चार बातें सुनकर गम खा जाते हैं फिर भी बदनाम हैं। कहा जाता है, वे जीवन के आदर्श को नीचा करते हैं। अगर वे भी ईट का जवाब पत्थर से देना सीख जाते, तो शायद सभ्य कहलाने लगते। जापान की मिसाल सामने है। एक ही विजय ने उसे संसार की सभ्य जातियों में गण्य बना दिया।

लेकिन गधे का एक छोटा भाई और भी है, जो उससे कम ही गधा है, और वह है ‘बैल’। जिस अर्थ में हम ‘गधा’ शब्द का प्रयोग करते हैं, कुछ उसी से मिलते-जुलते अर्थ में ‘बछिया के ताऊ’ का भी प्रयोग करते हैं। कुछ लोग बैल को शायद बेवकूफों में सर्वश्रेष्ठ कहेंगे; मगर हमारा विचार ऐसा नहीं

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दो बैलों की कथा 5

है। बैल कभी-कभी मारता भी है, कभी-कभी अड़ियल बैल भी देखने में आता है। और भी कई रीतियों से अपना असंतोष प्रकट कर देता है; अतएव उसका स्थान गधे से नीचा है।

झुरी के दोनों बैलों के नाम थे हीरा और मोती। दोनों पछाई जाति के थे— देखने में सुंदर, काम में चौकस, डील में ऊँचे। बहुत दिनों साथ रहते-रहते दोनों में भाईचारा हो गया था। दोनों आमने-सामने या आस-पास बैठे हुए एक-दूसरे से मूक-भाषा में विचार-विनिमय करते थे। एक, दूसरे के मन की बात कैसे समझ जाता था, हम नहीं कह सकते। अवश्य ही उनमें कोई ऐसी गुप्त शक्ति थी जिससे जीवों में श्रेष्ठता का दावा करने वाला मनुष्य वंचित है। दोनों एक-दूसरे को चाटकर और सूँघकर अपना प्रेम प्रकट करते, कभी-कभी दोनों सींग भी मिला लिया करते थे— विग्रह के नाते से नहीं, केवल विनोद के भाव से, आत्मीयता के भाव से, जैसे दोस्तों में घनिष्ठता होते ही धौल-धप्पा होने लगता है। इसके बिना दोस्ती कुछ फुसफुसी, कुछ हल्की-सी रहती है, जिस पर ज्यादा विश्वास नहीं किया जा सकता। जिस वक्त ये दोनों बैल हल या गाड़ी में जोत दिए जाते और गरदन हिला-हिलाकर चलते, उस वक्त हरएक की यही चेष्टा होती थी कि ज्यादा-से-ज्यादा बोझ मेरी ही गरदन पर रहे। दिन-भर के बाद दोपहर या संध्या को दोनों खुलते, तो एक-दूसरे को चाट-चूटकर अपनी थकान मिटा लिया करते। नॉद में खली-भूसा पड़ जाने के बाद दोनों साथ उठते, साथ नॉद में मुँह डालते और साथ ही बैठते थे। एक मुँह हटा लेता, तो दूसरा भी हटा लेता था।

संयोग की बात, झुरी ने एक बार गोई को ससुराल भेज दिया। बैलों को क्या मालूम, वे क्यों भेजे जा रहे हैं। समझे, मालिक ने हमें बेच दिया। अपना यों बेचा जाना उन्हें अच्छा लगा या बुरा, कौन जाने, पर झुरी के साले गया को घर तक गोई ले जाने में दाँतों पसीना आ गया। पीछे से हाँकता तो दोनों दाएँ-बाएँ भागते; पगाहिया पकड़कर आगे से खींचता, तो दोनों पीछे को जोर लगाते। मारता तो दोनों सींग नीचे करके हुँकारते। अगर ईश्वर ने उन्हें वाणी दी होती, तो झुरी से पूछते— तुम हम गरीबों को क्यों निकाल रहे हो? हमने तो तुम्हारी सेवा करने में कोई कसर नहीं उठा रखी। अगर इतनी मेहनत से काम न चलता था तो और काम ले लेते। हमें तो तुम्हारी चाकरी में मर जाना कबूल था। हमने कभी दाने-चारे की शिकायत नहीं की। तुमने जो कुछ खिलाया, वह सिर झुकाकर खा लिया, फिर तुमने हमें इस जालिम के हाथ क्यों बेच दिया?

संध्या समय दोनों बैल अपने नए स्थान पर पहुँचे। दिन-भर के भूखे थे, लेकिन जब नॉद में लगाए गए, तो एक ने भी उसमें मुँह न डाला। दिल भारी हो रहा था। जिसे उन्होंने अपना घर समझ रखा था, वह आज उनसे छूट गया था। यह नया घर, नया गाँव, नए आदमी, सब उन्हें बेगानों-से लगते थे।

6 गंगा

दोनों ने अपनी मूक-भाषा में सलाह की, एक-दूसरे को कनखियों से देखा और लेट गए। जब गाँव में सोता पड़ गया, तो दोनों ने जोर मारकर पगहे तुड़ा डाले और घर की तरफ चले। पगहे बहुत मजबूत थे। अनुमान न हो सकता था कि कोई बैल उन्हें तोड़ सकेगा; पर इन दोनों में इस समय दूनी शक्ति आ गई थी। एक-एक झटके में रस्सियाँ टूट गईं।

ऋतु प्रातः काल सोकर उठा, तो देखा कि दोनों बैल चरनी पर खड़े हैं। दोनों की गरदनों में आधा-आधा गर्गव लटक रहा है। घुटने तक पाँव कीचड़ से भरे हैं और दोनों की आँखों में विद्रोहमय स्नेह झलक रहा है।

ऋतु बैलों को देखकर स्नेह से गद्गद हो गया। दौड़कर उन्हें गले लगा लिया। प्रेमालिंगन और चुंबन का वह दृश्य बड़ा ही मनोहर था।

घर और गाँव के लड़के जमा हो गए और तालियाँ बजा-बजाकर उनका स्वागत करने लगे। गाँव के इतिहास में यह घटना अभूतपूर्व न होने पर भी महत्वपूर्ण थी। बाल-सभा ने निश्चय किया, दोनों पशु-वीरों को अभिनंदन-पत्र देना चाहिए। कोई अपने घर से रोटियाँ लाया, कोई गुड़, कोई चोकर, कोई भूसी।

एक बालक ने कहा— “ऐसे बैल किसी के पास न होंगे।”

दूसरे ने समर्थन किया— “इतनी दूर से दोनों अकेले चले आए।”

तीसरा बोला— “बैल नहीं हैं वे, उस जन्म के आदमी हैं।”

इसका प्रतिवाद करने का किसी को साहस न हुआ।

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दो बैलों की कथा 7

ऋषि की स्त्री ने बैलों को द्वार पर देखा, तो जल उठी। बोली— “कैसे नमक-हराम बैल हैं कि एक दिन वहाँ काम न किया; भाग खड़े हुए।”

ऋषि अपने बैलों पर यह आक्षेप न सुन सका— “नमकहराम क्यों हैं? चारा-दाना कुछ न दिया होगा, तो क्या करते?”

स्त्री ने रोब के साथ कहा— “बस, तुम्हीं तो बैलों को खिलाना जानते हो और तो सभी पानी पिला-पिलाकर रखते हैं।”

ऋषि ने चिढ़ाया— “चारा मिलता तो क्यों भागते?”

स्त्री चिढ़ी— “भागे इसलिए कि वे लोग तुम-जैसे बुद्धुओं की तरह बैलों को सहलाते नहीं। खिलाते हैं, तो रगड़कर जोतते भी हैं। ये दोनों ठहरे कामचोर, भाग निकले। अब देखूँ, कहाँ से खली और चोकर मिलता है! सूखे भूसे के सिवा कुछ न दूँगी, खाएँ चाहें मरें।”

वही हुआ। मजूर को बड़ी ताकीद कर दी गई कि बैलों को खाली सूखा भूसा दिया जाए। बैलों ने नाँद में मुँह डाला, तो फीका-फीका। न कोई चिकनाहट, न कोई रस। क्या खाएँ? आशा-भरी आँखों से द्वार की ओर ताकने लगे।

ऋषि ने मजूर से कहा— “थोड़ी-सी खली क्यों नहीं डाल देता?”

“मालकिन मुझे मार ही डालेंगी।”

“चुराकर डाल आ।”

“ना दादा, पीछे से तुम भी उन्हीं की-सी कहोगे।”

2

दूसरे दिन ऋषि का साला फिर आया और बैलों को ले चला। अबकी उसने दोनों को गाड़ी में जोता।

दो-चार बार मोती ने गाड़ी को सड़क की खाई में गिराना चाहा; पर हीरा ने संभाल लिया। वह ज्यादा सहनशील था।

संध्या-समय घर पहुँचकर उसने दोनों को मोटी रस्सियों से बाँधा और कल की शरारत का मजा चखाया। फिर वही सूखा भूसा डाल दिया। अपने दोनों बैलों को खली, चूनी सब कुछ दी।

दोनों बैलों का ऐसा अपमान कभी न हुआ था। ऋषि इन्हें फूल की छड़ी से भी न छूता था। उसकी टिटकार पर दोनों उड़ने लगते थे। यहाँ मार पड़ी। आहत सम्मान की व्यथा तो थी ही, उस पर मिला सूखा भूसा।

नाँद की तरफ आँखें तक न उठाई।

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8 गंगा

दूसरे दिन गया ने बैलों को हल में जोता, पर इन दोनों ने जैसे पाँव न उठाने की कसम खा ली थी। वह मारते-मारते थक गया; पर दोनों ने पाँव न उठाया। एक बार जब उस निर्दयी ने हीरा की नाक पर खूब डंडे जमाए, तो मोती का गुस्सा काबू के बाहर हो गया। हल लेकर भागा। हल, रस्सी, जुआ, जोत, सब टूट-टाट कर बराबर हो गया। गले में बड़ी-बड़ी रस्सियाँ न होतीं, तो दोनों पकड़ाई में न आते।

हीरा ने मूक-भाषा में कहा— “भागना व्यथ्य है।”

मोती ने उत्तर दिया— “तुम्हारी तो इसने जान ही ले ली थी।”

“अबकी बड़ी मार पड़ेगी।”

“पड़ने दो, बैल का जन्म लिया है, तो मार से कहाँ तक बचेंगे?”

गया दो आदमियों के साथ दौड़ा आ रहा है। दोनों के हाथों में लाठियाँ हैं।

मोती बोला— “कहो तो दिखा दूँ कुछ मजा में भी। लाठी लेकर आ रहा है।”

हीरा ने समझाया— “नहीं भाई! खड़े हो जाओ।”

“मुझे मारेगा, तो मैं भी एक-दो को गिरा दूँगा!”

“नहीं। हमारी जाति का यह धर्म नहीं है।”

मोती दिल में ऐंठकर रह गया। गया आ पहुंचा और दोनों को पकड़ कर ले चला। कुशल हुई कि उसने इस वक्त मारपीट न की, नहीं तो मोती भी पलट पड़ता। उसके तेवर देखकर गया और उसके सहायक समझ गए कि इस वक्त टाल जाना ही मसलहत है।

आज दोनों के सामने फिर वही सूखा भूसा लाया गया। दोनों चुपचाप खड़े रहे। घर के लोग भोजन करने लगे। उस वक्त एक छोटी-सी लड़की दो रोटियाँ लिए निकली और दोनों के मुँह में देकर चली गई। उस एक रोटी से इनकी भूख तो क्या शांत होती; पर दोनों के हृदय को मानो भोजन मिल गया। यहाँ भी किसी सज्जन का वास है। लड़की भैरो की थी। उसकी माँ मर चुकी थी। सौतेली माँ उसे मारती रहती थी, इसलिए इन बैलों से उसे एक प्रकार की आत्मीयता हो गई थी।

दोनों दिन-भर जोते जाते, डंडे खाते, अड़ते। शाम को थान पर बाँध दिए जाते और रात को वही बालिका उन्हें दो रोटियाँ

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दो बैलों की कथा 9

खिला जाती। प्रेम के इस प्रसाद की यह बरकत थी कि दो-दो गाल सूखा भूसा खाकर भी दोनों दुर्बल न होते थे, मगर दोनों की आँखों में, रोम-रोम में विद्रोह भरा हुआ था।

एक दिन मोती ने मूक-भाषा में कहा— “अब तो नहीं सहा जाता, हीरा!”

“क्या करना चाहते हो?”

“एकाध को सींगों पर उठाकर फेंक दूंगा।”

“लेकिन जानते हो, वह प्यारी लड़की, जो हमें रोटियाँ खिलाती है, उसी की लड़की है, जो इस घर का मालिक है। यह बेचारी अनाथ न हो जाएगी?”

“तो मालकिन को न फेंक दूं। वही तो उस लड़की को मारती है।”

“लेकिन औरत जात पर सींग चलाना मना है, यह भूले जाते हो।”

“तुम तो किसी तरह से निकलने ही नहीं देते। बताओ, तुड़ाकर भाग चलें।”

“हाँ, यह मैं स्वीकार करता, लेकिन इतनी मोटी रस्सी टूटेगी कैसे?”

“इसका एक उपाय है। पहले रस्सी को थोड़ा-सा चबा लो। फिर एक झटके में टूट जाती है।”

रात को जब बालिका रोटियाँ खिलाकर चली गई, तो दोनों रस्सियाँ चबाने लगे, पर मोटी रस्सी मुँह में न आती थी। बेचारे बार-बार जोर लगाकर रह जाते थे।

सहसा घर का द्वार खुला और वही लड़की निकली। दोनों सिर झुकाकर उसका हाथ चाटने लगे। दोनों की पूँछें खड़ी हो गईं। उसने उनके माथे सहलाए और बोली— “खोले देती हूँ। चुपके से भाग जाओ, नहीं तो यहाँ लोग तुम्हें मार डालेंगे। आज घर में सलाह हो रही है कि इनकी नाकों में नाथ डाल दी जाएँ।”

उसने गर्तव खोल दिया, पर दोनों चुपचाप खड़े रहे।

मोती ने अपनी भाषा में पूछा— “अब चलते क्यों नहीं?”

हीरा ने कहा— “चलें तो, लेकिन कल इस अनाथ पर आफत आएगी। सब इसी पर संदेह करेंगे।” सहसा बालिका चिल्लाई— “दोनों फूफावाले बैल भागे जा रहे हैं। ओ दादा! दादा! दोनों बैल भागे जा रहे हैं, जल्दी दौड़ो।”

गया हड़बड़ाकर भीतर से निकला और बैलों को पकड़ने चला। वे दोनों भागे। गया ने पीछा किया। वह और भी तेज हुए। गया ने शोर मचाया। फिर गाँव के कुछ आदमियों को भी साथ लेने के लिए लौटा। दोनों मित्रों को भागने का मौका मिल गया। सीधे दौड़ते चले गए। यहाँ तक कि मार्ग का ज्ञान न रहा। जिस परिचित मार्ग से आए थे, उसका यहाँ पता न था। नए-नए गाँव मिलने लगे। तब दोनों एक खेत के किनारे खड़े होकर सोचने लगे, अब क्या करना चाहिए।

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10 गंगा

हीरा ने कहा— “मालूम होता है, राह भूल गए|”

“तुम भी बेतहाशा भागे। वहीं उसे मार गिराना था।”

“उसे मार गिराते, तो दुनिया क्या कहती? वह अपना धर्म छोड़ दे, लेकिन हम अपना धर्म क्यों छोड़ें?”

दोनों भूख से व्याकुल हो रहे थे। खेत में मटर खड़ी थी। चरने लगे। रह-रहकर आहट ले लेते थे, कोई आता तो नहीं है।

जब पेट भर गया और दोनों ने आजादी का अनुभव किया तो मस्त होकर उछलने-कूदने लगे। पहले दोनों ने डकार ली। फिर सींग मिलाए और एक-दूसरे को ठेलने लगे। मोती ने हीरा को कई कदम पीछे हटा दिया, यहाँ तक कि वह एक खाई में गिर गया। तब उसे भी क्रोध आया। संभलकर उठा और फिर मोती से भिड़ गया। मोती ने देखा— खेल में झगड़ा हुआ चाहता है तो किनारे हट गया।

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अरे! यह क्या? कोई साँड़ डौंकता चला आ रहा है। हाँ, साँड़ ही है। वह सामने आ पहुँचा। दोनों मित्र बगलें झाँक रहे हैं। साँड़ पूरा हाथी है। उससे भिड़ना जान से हाथ धोना है; लेकिन न भिड़ने पर भी तो जान बचती नहीं नजर आती। इन्हीं की तरफ आ भी रहा है। कितनी भयंकर सूरत है!

मोती ने मूक-भाषा में कहा— “बुरे फँसे। जान बचेगी? कोई उपाय सोचो।”

हीरा ने चिंतित स्वर में कहा— “अपने घमंड में भूला हुआ है। आरजू-विनती न सुनेगा।”

“भाग क्यों न चलें?”

“भागना कायरता है।”

“तो फिर यहीं मरो। बंदा तो नौ-दो-ग्यारह होता है।”

“और जो दौड़ाए?”

“तो फिर कोई उपाय सोचो जल्द!”

“उपाय यही है कि उस पर दोनों जने एक साथ चोट करें। मैं आगे से रगेदता हूँ, तुम पीछे से रगेदो, दोहरी मार पड़ेगी, तो भाग खड़ा होगा। मेरी ओर झपटे, तुम बगल से उसके पेट में सींग घुसेड़ देना। जान जोखिम है; पर दूसरा उपाय नहीं है।”

दोनों मित्र जान हथेलियों पर लेकर लपके। साँड़ को भी संगठित शत्रुओं से लड़ने का तजुरबा न था। वह तो एक शत्रु से मल्लयुद्ध करने का आदी था। ज्योंही हीरा पर झपटा, मोती ने पीछे से दौड़ाया। साँड़ उसकी तरफ मुड़ा, तो हीरा ने रगेदा। साँड़ चाहता था कि एक-एक करके

दो बैलों की कथा 11

दोनों को गिरा लें; पर ये दोनों भी उस्ताद थे। उसे यह अवसर न देते थे। एक बार साँड़ झल्लाकर हीरा का अंत कर देने के लिए चला कि मोती ने बगल से आकर पेट में सींग भोंक दी। साँड़ क्रोध में आकर पीछे फिरा तो हीरा ने दूसरे पहलू में सींग चुभा दिया। आखिर बेचारा जख्मी होकर भागा और दोनों मित्रों ने दूर तक उसका पीछा किया। यहाँ तक कि साँड़ बेदम होकर गिर पड़ा। तब दोनों ने उसे छोड़ दिया।

दोनों मित्र विजय के नशे में झूमते चले जाते थे।

मोती ने अपनी सांकेतिक भाषा में कहा— “मेरा जी तो चाहता था कि बच्चा को मार ही डालूँ।”

हीरा ने तिरस्कार किया— “गिरे हुए बैरी पर सींग न चलाना चाहिए।”

“यह सब ढोंग है। बैरी को ऐसा मारना चाहिए कि फिर न उठे।”

“अब घर कैसे पहुँचेंगे, वह सोचो।”

“पहले कुछ खा लें, तो सोचें।”

सामने मटर का खेत था ही। मोती उसमें घुस गया। हीरा मना करता रहा, पर उसने एक न सुनी। अभी दो ही चार ग्रास खाए थे कि दो आदमी लाठियाँ लिए दौड़ पड़े और दोनों मित्रों को घेर लिया। हीरा तो मेड़ पर था, निकल गया। मोती सींचे हुए खेत में था। उसके खुर कीचड़ में धँसने लगे। न भाग सका। पकड़ लिया गया। हीरा ने देखा, संगी संकट में है, तो लौट पड़ा। फँसेंगे तो दोनों फँसेंगे। रखवालों ने उसे भी पकड़ लिया।

प्रातः काल दोनों मित्र काँजीहौस में बंद कर दिए गए।

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दोनों मित्रों को जीवन में पहली बार ऐसा साबिका पड़ा कि सारा दिन बीत गया और खाने को एक तिनका भी न मिला। समझ ही में न आता था, यह कैसा स्वामी है। इससे तो गया फिर भी अच्छा था। यहाँ कई भैंसें थीं, कई बकरियाँ, कई घोड़े, कई गधे; पर किसी के सामने चारा न था, सब जमीन पर मुरदों की तरह पड़े थे। कई तो इतने कमजोर हो गए थे कि खड़े भी न हो सकते थे। सारा दिन दोनों मित्र फाटक की ओर टकटकी लगाए ताकते रहे; पर कोई चारा लेकर आता न दिखाई दिया। तब दोनों ने दीवार की नमकीन मिट्टी चाटनी शुरू की, पर इससे क्या तृप्ति होती?

रात को भी जब कुछ भोजन न मिला, तो हीरा के दिल में विद्रोह की ज्वाला दहक उठी। मोती से बोला— “अब तो नहीं रहा जाता मोती!”

12 गंगा

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मोती ने सिर लटकाए हुए जवाब दिया—“मुझे तो मालूम होता है, प्राण निकल रहे हैं।” “इतनी जल्द हिम्मत न हारो भाई! यहाँ से भागने का कोई उपाय निकालना चाहिए।” “आओ दीवार तोड़ डालें।” “मुझसे तो अब कुछ नहीं होगा।” “बस इसी बूते पर अकड़ते थे!” “सारी अकड़ निकल गई।” बाड़े की दीवार कच्ची थी। हीरा मजबूत तो था ही, अपने नुकीले सींग दीवार में गड़ा दिए और जोर मारा, तो मिट्टी का एक चिप्पड़ निकल आया। फिर तो उसका साहस बढ़ा। उसने दौड़-दौड़कर दीवार पर चोटें कीं और हर चोट में थोड़ी-थोड़ी मिट्टी गिराने लगा। उसी समय काँजीहौस का चौकीदार लालटेन लेकर जानवरों की हाजिरी लेने आ निकला। हीरा का यह उज्ज्वलपन देखकर उसने उसे कई डंडे रसीद किए और मोटी-सी रस्सी से बाँध दिया। मोती ने पड़े-पड़े कहा—“आखिर मार खाई, क्या मिला?” “अपने बूते-भर जोर तो मार दिया।” “ऐसा जोर मारना किस काम का कि और बंधन में पड़ गए।” “जोर तो मारता ही जाऊँगा, चाहे कितने ही बंधन पड़ते जाएँ।” “जान से हाथ धोना पड़ेगा।” “कुछ परवाह नहीं। यों भी तो मरना ही है। सोचो, दीवार खुद जाती तो कितनी जानें बच जातीं। इतने भाई यहाँ बंद हैं। किसी की देह में जान नहीं है। दो-चार दिन और यही हाल रहा तो सब मर जाएँगे।” “हाँ, यह बात तो है। अच्छा, तो ला, फिर मैं भी जोर लगाता हूँ।” मोती ने भी दीवार में उसी जगह सींग मारा। थोड़ी-सी मिट्टी गिरी और फिर हिम्मत बढ़ी। फिर तो वह दीवार में सींग लगाकर इस तरह जोर करने लगा, मानो किसी प्रतिद्वंद्वी से लड़ रहा है। आखिर कोई दो घंटे की जोर-आजमाई के बाद दीवार ऊपर से लगभग एक हाथ गिर गई।

दो बैलों की कथा 13

उसने दूनी शक्ति से दूसरा धक्का मारा, तो आधी दीवार गिर पड़ी।

दीवार का गिरना था कि अधमरे-से पड़े हुए सभी जानवर चेत उठे। तीनों घोड़ियाँ सरपट भाग निकलीं। फिर बकरियाँ निकलीं। इसके बाद भैंसें भी खिसक गईं; पर गधे अभी तक ज्यों-के-त्यों खड़े थे।

हीरा ने पूछा— “तुम दोनों क्यों नहीं भाग जाते?”

एक गधे ने कहा— “जो कहीं फिर पकड़ लिए जाएँ!”

“तो क्या हरज है। अभी तो भागने का अवसर है।”

“हमें तो डर लगता है, हम यहीं पड़े रहेंगे।”

आधी रात से ऊपर जा चुकी थी। दोनों गधे अभी तक खड़े सोच रहे थे कि भागों या न भागों और मोती अपने मित्र की रस्सी तोड़ने में लगा हुआ था। जब वह हार गया, तो हीरा ने कहा— “तुम जाओ, मुझे यहीं पड़ा रहने दो। शायद कहीं भेंट हो जाए।”

मोती ने आँखों में आँसू लाकर कहा— “तुम मुझे इतना स्वार्थी समझते हो, हीरा? हम और तुम इतने दिनों एक साथ रहे हैं। आज तुम विपत्ति में पड़ गए, तो मैं तुम्हें छोड़कर अलग हो जाऊँ।”

हीरा ने कहा— “बहुत मार पड़ेगी। लोग समझ जाएँगे यह तुम्हारी शरारत है।”

मोती गर्व से बोला— “जिस अपराध के लिए तुम्हारे गले में बंधन पड़ा, उसके लिए अगर मुझ पर मार पड़े, तो क्या चिंता। इतना तो हो ही गया कि नौ-दस प्राणियों की जान बच गई। वे सब तो आशीर्वाद देंगे।”

यह कहते हुए मोती ने दोनों गधों को सींगों से मार-मारकर बाड़े के बाहर निकाला और तब अपने बंधु के पास आकर सो रहा।

भोर होते ही मुंशी और चौकीदार तथा अन्य कर्मचारियों में कैसी खलबली मची, इसके लिखने की जरूरत नहीं। बस, इतना ही काफी है कि मोती की खूब मरम्मत हुई और उसे भी मोटी रस्सी से बाँध दिया गया।

5

एक सप्ताह तक दोनों मित्र वहाँ बँधे पड़े रहे। किसी ने चारे का एक तूण भी न डाला। हाँ, एक बार पानी दिखा दिया जाता था। यही उनका आधार था। दोनों इतने दुर्बल हो गए थे कि उठा तक न जाता था; ठठरियाँ निकल आई थीं।

एक दिन बाड़े के सामने डुग्गी बजने लगी और दोपहर होते-होते वहाँ पचास-साठ आदमी जमा हो गए। तब दोनों मित्र निकाले गए और उनकी देखभाल होने लगी। लोग

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14 गंगा

आ-आकर उनकी सूरत देखते और मन फीका करके चले जाते। ऐसे मृतक बैलों का कौन खरीदार होता?

सहसा एक दद्दियल आदमी, जिसकी आँखें लाल थीं और मुद्रा अत्यंत कठोर, आया और दोनों मित्रों के कूल्हों में उँगली गोदकर मुंशी जी से बातें करने लगा। उसका चेहरा देखकर अंतर्ज्ञान से दोनों मित्रों के दिल काँप उठे। वह कौन है और उन्हें क्यों टटोल रहा है, इस विषय में उन्हें कोई संदेह न हुआ। दोनों ने एक-दूसरे को भीत नेत्रों से देखा और सिर झुका लिया।

हीरा ने कहा— “गया के घर से नाहक भागे। अब जान न बचेगी।”

मोती ने अश्वद्धा के भाव से उत्तर दिया— “कहते हैं, भगवान सबके ऊपर दया करते हैं। उन्हें हमारे ऊपर क्यों दया नहीं आती।”

“भगवान के लिए हमारा मरना-जीना दोनों बराबर है। चलो, अच्छा ही है, कुछ दिन उसके पास तो रहेंगे। एक बार भगवान ने उस लड़की के रूप में हमें बचाया था। क्या अब न बचाएँगे?”

“यह आदमी छुरी चलाएगा। देख लेना।”

“तो क्या चिंता है? माँस, खाल, सींग, हड्डी सब किसी-न-किसी काम आ जाएँगी।”

नीलाम हो जाने के बाद दोनों मित्र उस दद्दियल के साथ चले। दोनों की बोटी-बोटी काँप रही थी। बेचारे पाँव तक न उठा सकते थे, पर भय के मारे गिरते-पड़ते भागे जाते थे; क्योंकि वह जरा भी चाल धीमी हो जाने पर जोर से डंडा जमा देता था।

राह में गाय-बैलों का एक रेवड़ हरे-हरे हार में चरता नजर आया। सभी जानवर प्रसन्न थे, चिकने, चपला। कोई उछलता था, कोई आनंद से बैठा पागुर करता था। कितना सुखी जीवन था इनका; पर कितने स्वार्थी हैं सब। किसी को चिंता नहीं कि उनके दो भाई बधिक के हाथ पड़े कैसे दुखी हैं।

सहसा दोनों को ऐसा मालूम हुआ कि यह परिचित राह है। हाँ, इसी रास्ते से गया उन्हें ले गया था। वही खेत, वही बाग, वही गाँव मिलने लगे। प्रतिक्षण उनकी चाल तेज होने लगी। सारी थकान, सारी दुर्बलता गायब हो गई। आह? यह लो! अपना ही हार आ गया। इसी कुएँ पर हम पुर चलाने आया करते थे; यही कुआँ है।

मोती ने कहा— “हमारा घर नगीच आ गया।”

हीरा बोला— “भगवान की दया है।”

“मैं तो अब घर भागता हूँ।”

“यह जाने देगा?”

“इसे मैं मार गिराता हूँ।”

दो बैलों की कथा 15

“नहीं-नहीं, दौड़कर थान पर चलो। वहाँ से हम आगे न जाएँगे।”

दोनों उन्मत्त होकर बछड़ों की भाँति कुलेलें करते हुए घर की ओर दौड़े। वह हमारा थान है। दोनों दौड़कर अपने थान पर आए और खड़े हो गए। दढ़ियल भी पीछे-पीछे दौड़ा चला आता था।

ऋषी द्वार पर बैठा धूप खा रहा था। बैलों को देखते ही दौड़ा और उन्हें बारी-बारी से गले लगाने लगा। मित्रों की आँखों से आनंद के आँसू बहने लगे। एक ऋषी का हाथ चाट रहा था। दढ़ियल ने जाकर बैलों की रस्सियाँ पकड़ लीं।

ऋषी ने कहा— मेरे बैल हैं।

“तुम्हारे बैल कैसे? मैं मवेशीखाने से नीलाम लिए आता हूँ।”

“मैं तो समझता हूँ चुराए लिए आते हो! चुपके से चले जाओ। मेरे बैल हैं। मैं बेचूँगा तो बिकेंगे। किसी को मेरे बैल नीलाम करने का क्या अख्तियार है?”

“जाकर थाने में रपट कर दूँगा।”

“मेरे बैल हैं। इसका सबूत यह है कि मेरे द्वार पर खड़े हैं।”

दढ़ियल झल्लाकर बैलों को जबरदस्ती पकड़ ले जाने के लिए बढ़ा। उसी वक्त मोती ने सींग चलाया। दढ़ियल पीछे हटा। मोती ने पीछा किया। दढ़ियल भागा। मोती पीछे दौड़ा। गाँव के बाहर निकल जाने पर वह रुका; पर खड़ा दढ़ियल का रास्ता देख रहा था। दढ़ियल दूर खड़ा धमकियाँ दे रहा था, गालियाँ निकाल रहा था, पत्थर फेंक रहा था। और मोती विजयी शूर की भाँति उसका रास्ता रोके खड़ा था। गाँव के लोग यह तमाशा देखते थे और हँसते थे।

जब दढ़ियल हारकर चला गया, तो मोती अकड़ता हुआ लौटा।

हीरा ने कहा—“मैं डर रहा था कि कहीं तुम गुस्से में आकर मार न बैठो।”

“अगर वह मुझे पकड़ता, तो मैं बे-मारे न छोड़ता।”

“अब न आएगा।”

“आएगा तो दूर ही से खबर लूँगा। देखूँ, कैसे ले जाता है।”

“जो गोली मरवा दे?”

“मर जाऊँगा; पर उसके काम तो न आऊँगा।”

“हमारी जान को कोई जान ही नहीं समझता।”

“इसीलिए कि हम इतने सीधे हैं।”

जरा देर में नाँदों में खली, भूसा, चोकर और दाना भर दिया गया और दोनों मित्र खाने लगे। ऋषी खड़ा दोनों को सहला रहा था और बीसों लड़के तमाशा देख रहे थे। सारे गाँव में उछाह-सा मालूम होता था।

उसी समय मालकिन ने आकर दोनों के माथे चूम लिए।

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16 गंगा

अभ्यास

एचना शे शंवाद

मेरे उत्तर मेरे तर्क

निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं?

  1. कहानी में हीरा और मोती का आपसी संबंध किस गुण को मुख्य रूप से दर्शाता है? (क) प्रतिस्पर्धा और प्रतिद्वंद्विता (ख) एकता और सहयोग (ग) गर्व और दंभ (घ) विद्रोह और क्रोध

  2. हीरा-मोती ने नया स्थान स्वीकार क्यों नहीं किया? (क) उन्हें भरपेट भोजन दिया गया। (ख) उन्हें बहुत मोटी रस्सी से बाँधा गया। (ग) मालिक ने बेचा, यह सोचकर उन्हें अपमान लगा। (घ) उन्हें अलग-अलग बाँधा गया।

  3. बैलों ने रस्सी तोड़कर घर लौटने का निर्णय क्यों लिया? (क) कष्टों से बचने के लिए (ख) स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए (ग) अभिमान की रक्षा के लिए (घ) अपनापन पाने के लिए

  4. गया द्वारा डंडे से मारने पर मोती का आक्रोश किस मानवीय मनोवृत्ति का श्रोतक है? (क) स्वाभिमान (ख) अहिंसा (ग) पराधीनता (घ) अन्याय की रक्षा

  5. कहानी में बैलों की ‘मूक-भाषा’ का प्रयोग लेखक ने किस लिए किया? (क) कहानी को रोचक बनाने के लिए (ख) मनुष्य जैसी चेतना दिखाने के लिए

दो बैलों की कथा 17

(ग) संवादों को छोटा रखने के लिए (घ) कथा में हास्य उत्पन्न करने के लिए

  1. ‘दो बैलों की कथा’ को यदि स्वतंत्रता आंदोलन से जोड़ें, तो हीरा और मोती किसके प्रतीक हो सकते हैं? (क) भारत पर अंग्रेजों के क्रूर और अन्यायपूर्ण शासन के (ख) स्वतंत्रता संग्राम में पशुओं के योगदान के (ग) सत्याग्रह और अहिंसा के आंदोलन के (घ) स्वतंत्रता के लिए भारतीय जनता के संघर्ष के

मेरी समझ मेरे विचार

नीचे दिए गए प्रश्नों पर कथा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए—

  1. “दूसरे दिन गया ने बैलों को हल में जोता, पर इन दोनों ने जैसे पाँव न उठाने की कसम खा ली थी।” जब बैल नए मालिक के यहाँ गए, तो उन्होंने काम करने से इनकार क्यों कर दिया था?

  2. “गाँव के इतिहास में यह घटना अभूतपूर्व न होने पर भी महत्वपूर्ण थी।” बैलों का घर लौट आना कोई साधारण घटना नहीं है। कैसे? (संकेत— वे क्यों लौट आए, उनके और झूरी के मन में कौन-कौन से भाव रहे होंगे, क्या वास्तविक जीवन में भी ऐसा होता है आदि।)

  3. “मोती ने मूक-भाषा में कहा— अब तो नहीं सहा जाता, हीरा!” ‘कभी-कभी संघर्ष करना आवश्यक हो जाता है’ इस कथन को कहानी के उदाहरणों से सिद्ध कीजिए।

  4. “जब पेट भर गया और दोनों ने आजादी का अनुभव किया...” हीरा एवं मोती ‘स्वतंत्रता’ और ‘अपनापन’ दोनों में से किस भावना से अधिक प्रेरित थे? कारण सहित लिखिए।

  5. “बैलों ने जैसे पाँव न उठाने की कसम खा ली थी।” ‘अत्याचार सहना भी अन्याय में भागीदारी है’— क्या आप इस कथन से सहमत हैं? अपने उत्तर के कारण भी बताइए।

  6. “बहुत दिनों साथ रहते-रहते दोनों में भाईचारा हो गया था।” हीरा और मोती अभिन्न मित्र थे। कहानी की किन-किन घटनाओं के आधार पर यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है? कम से कम तीन बिंदु लिखिए।

  7. “उसी समय मालकिन ने आकर दोनों के माथे चूम लिए।” कहानी में मालकिन और छोटी लड़की, दोनों के व्यवहार की तुलना कीजिए।

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18 गंगा

मेरी कल्पना मेरे अनुमान

  1. “उसने उनके माथे सहलाए और बोली— खोले देती हूँ। चुपके से भाग जाओ...” यदि आप वह छोटी लड़की होते, तो बैलों की मदद किस प्रकार करते?
  2. “दोनों गधे अभी तक ज्यों-के-त्यों खड़े थे।” भय और संकोच इंसान को अवसर मिलने पर भी जकड़े रखता है। क्या आप इस कथन से सहमत हैं? इस वाक्य के संबंध में कहानी और अपने अनुभवों से उदाहरण लेते हुए अपने विचार लिखिए।

मेरे अनुभव मेरे विचार

  1. “दोस्तों में घनिष्ठता होते ही धौल-धप्पा होने लगता है। इसके बिना दोस्ती कुछ फुसफुसी, कुछ हल्की-सी रहती है, जिस पर ज्यादा विश्वास नहीं किया जा सकता।” क्या आप इस बात से सहमत हैं? आपको ऐसा क्यों लगता है? अपने अनुभवों के आधार पर बताइए।
  2. “हीरा ने तिरस्कार किया— गिरे हुए बैरी पर सींग न चलाना चाहिए।” “यह सब दोंग है। बैरी को ऐसा मारना चाहिए कि फिर न उठे।” आपका इस संबंध में क्या विचार है? आप किसके साथ हैं— हीरा के या मोती के या दोनों के? क्यों?
  3. “हम और तुम इतने दिनों एक साथ रहे। आज तुम विपत्ति में पड़ गए तो मैं तुम्हें छोड़कर अलग हो जाऊँ?” क्या कभी आपने किसी विपत्ति या चुनौती का सामना अपने किसी मित्र या परिजन के साथ मिलकर किया है? उस घटना के विषय में बताइए।

विद्या से संवाद

कहानी की पड़ताल

कहानी ऐसी रचना है जिसमें जीवन के किसी एक अंग या किसी एक मनोभाव को प्रदर्शित करना ही लेखक का उद्देश्य रहता है। उसके चरित्र, उसकी शैली, उसका कथा-विन्यास सभी उसी एक भाव को पुष्ट करते हैं।

कोई कहानी वास्तविक या काल्पनिक घटनाओं पर आधारित हो सकती है और इसमें वास्तविक या काल्पनिक पात्र भी शामिल हो सकते हैं।

आप कहानी लेखन की इस प्रक्रिया को ध्यान में रखते हुए एक कहानी का शीर्षक चुनिए और दिए गए मुख्य बिंदुओं को पूरा कीजिए—

दो बैलों की कथा 19

शीर्षक और लेखक
विषय
क्रिया/कार्य
परिवेश/देश-काल और मुख्य विचार
चरित्र/पात्र
परिणाम

कहानी का सौंदर्य

“दोनों सिर झुकाकर उसका हाथ चाटने लगे। दोनों की पूँछें खड़ी हो गईं।”

इस वाक्य को पढ़कर आँखों के सामने एक दृश्य-सा बन जाता है। आप जानते हैं कि भाषा की इस विशेषता को चित्रात्मकता कहते हैं। ‘दो बैलों की कथा’ कहानी में ऐसी अनेक विशेषताएँ हैं जो इसे अद्भुत और प्रभावपूर्ण बनाती हैं।

नीचे इस कहानी में आए कुछ विशेष बिंदुओं को उदाहरण के साथ दिया गया है। आप भी एक-एक उदाहरण खोजकर तालिका में लिखिए—

विशेषता विशेषता का अर्थ उदाहरण 1 उदाहरण 2
चित्रात्मक भाषा शब्दों के माध्यम से पाठक के मन में स्पष्ट और जीवंत चित्र या छवियाँ बनाना। घुटने तक पाँव कीचड़ से भरे हैं। सहसा घर का द्वार खुला और वही लड़की निकली।
संवादात्मकता कथ्य को आगे बढ़ाने के लिए, पात्रों के विचार, भाव आदि व्यक्त करने के लिए बातचीत और संवादों का प्रयोग। मर जाऊँगा, पर उसके काम तो न आऊँगा।
विरोधाभास एक ही प्रसंग या रचना में दो विपरीत या परस्पर विरोधी बातें एक साथ मौजूद होना। झूरी बैलों को देखकर स्नेह से गद्गद हो गया। झूरी की स्त्री ने बैलों को द्वार पर देखा, तो जल उठी।

20 गंगा

विशेषता विशेषता का अर्थ उदाहरण 1 उदाहरण 2
व्यंग्य वह शैली जिसमें मजाक, हास्य या कटाक्ष (चुभते हुए संकेतों) के माध्यम से किसी दोष, कुरीति, अन्याय, पाखंड या कमजोरी को प्रकट किया जाता है। भारतवासियों की अफ्रीका में क्या दुर्दशा हो रही है? अगर वे भी ईट का जवाब पत्थर से देना सीख जाते तो शायद सभ्य कहलाने लगते।
संघर्ष दो विरोधी शक्तियों, विचारों, इच्छाओं या परिस्थितियों का आपस में टकराना। उससे भिड़ना जान से हाथ धोना है; लेकिन न भिड़ने पर भी जान बचती नहीं नजर आती। (बैल बनाम सॉइड)
अतिशयोक्ति किसी पात्र, घटना, भाव या वस्तु का वर्णन इतना बढ़ाकर करना कि वह असंभव या अविश्वसनीय लगे। झूरी इन्हें फूल की छड़ी से भी न छूता था। उसकी टिटकार पर दोनों उड़ने लगते थे।
संदेह/उलझन जब पात्र किसी निर्णय पर नहीं पहुँच पाता। सारा दिन बीत गया और खाने को एक तिनका भी न मिला। समझ ही में न आता था, यह कैसा स्वामी है?

कहानी की रचना

प्रायः कहानी के प्रारंभ में ही कहानी के मुख्य चरित्र, कहानी का समय, कहानी की भाषा, घटनाओं आदि के कुछ संकेत मिलने लगते हैं। प्रेमचंद की इस कहानी में भी ऐसे संकेत हैं। आप कहानी के ऐसे संकेत/ बिंदुओं को ढूँढ़कर लिखिए।

विषयों से संवाद

कहानी का समय और समाज

‘दो बैलों की कथा’ कहानी जिस समय लिखी गई थी, उस समय भारत पर अंग्रेजों का दमनकारी शासन चल रहा था। उस समय भारतवासी भी अपने-अपने ढंग से इस अंग्रेजी शासन का विरोध कर रहे थे। इस कार्य में लेखक भी किसी से पीछे नहीं थे। वे अपनी रचनाओं के माध्यम से लोगों को स्वतंत्रता के लिए संघर्ष करने हेतु प्रेरित कर रहे थे।

दो बैलों की कथा 21

इस कहानी में से कुछ वाक्य चुनकर नीचे दिए गए हैं। इन वाक्यों का मिलान स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े उपयुक्त वाक्यों के साथ कीजिए—

कहानी में से वाक्य स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ाव
1. जोर तो मारता ही जाऊँगा, चाहे कितने ही बंधन पड़ते जाएँ। 1. भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद जैसे क्रांतिकारियों ने बलिदान दिया, जिससे लाखों भारतीयों में आजादी की प्रेरणा जगी।
2. मर जाऊँगा, पर उसके काम तो न आऊँगा। 2. भारतीय जनता के मन में ब्रिटिश शासन के प्रति विद्रोह धीरे-धीरे गहराता गया।
3. हमारी जान को कोई जान ही नहीं समझता। 3. ब्रिटिश साम्राज्य बहुत शक्तिशाली था, फिर भी स्वतंत्रता सेनानियों ने साहसपूर्वक उसका सामना किया।
4. दोनों मित्रों की आँखों में, रोम-रोम में विद्रोह भरा हुआ था। 4. दासता के काल में भारतीयों के प्राण, सम्मान और अधिकारों की कोई महत्ता नहीं थी।
5. इतना तो हो ही गया कि नौ-दस प्राणियों की जान बच गई। वे सब तो आशीर्वाद देंगे। 5. स्वतंत्रता के लिए प्राण देना स्वीकार्य था, पर अंग्रेजों की सेवा में लगना अस्वीकार्य।
6. साँड़ पूरा हाथी है... पर दोनों मित्र जान हथेलियों पर लेकर लपके। 6. स्वतंत्रता सेनानी बार-बार जेल गए, फाँसी पर चढ़े, पर संघर्ष छोड़ने को तैयार नहीं हुए।

पशुओं के लिए कानून

नीचे दिए गए संवाद पढ़िए और प्रश्नों के उत्तर दीजिए—

“मैं तो समझता हूँ, चुराए लिए आते हो। चुपके से चले जाओ। मेरे बैल हैं। मैं बेचूँगा, तो बिकेंगे। किसी को मेरे बैल नीलाम करने का क्या अखिल्यार है?”

“जाकर थाने में रपट कर दूँगा।”

“मेरे बैल हैं। इसका सबूत यह है कि मेरे द्वार पर खड़े हैं।”

  1. बैलों का काँजीहाउस में बंद होना न्याय और अन्याय दोनों को दर्शाता है। कैसे?
  2. यदि आपको अवसर मिले तो आप बैलों की ओर से कौन-कौन से कानूनी अधिकार माँगेंगे?

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22 गंगा

  1. मान लीजिए कि हीरा-मोती अपने साथ हुए अन्याय की शिकायत करना चाहते हैं। उनकी ओर से उनकी शिकायत थानाध्यक्ष को करते हुए एक पत्र लिखिए। (संकेत– “थानाध्यक्ष महोदय, हमारा नाम... है। हमारे साथ अन्याय हुआ है...।”)

हमारी धरोहर और संस्कृति

  1. “वह अपना धर्म छोड़ दे लेकिन हम अपना धर्म क्यों छोड़ें!” कहानी के अनुसार हीरा और मोती सदैव ध्यान रखते थे कि कौन-से कार्य करने योग्य हैं और कौन-से नहीं। वे कौन-कौन से कार्य कभी नहीं करते थे?

  2. “गिरे हुए बैरी पर सींग न चलाना चाहिए!” “लेकिन औरत जात पर सींग चलाना मना है, यह भूले जाते हो!” हीरा के ये कथन किन भारतीय मूल्यों की ओर संकेत करते हैं?

  3. “दूसरे दिन गया ने बैलों को हल में जोता” (क) खेतों में जुताई के लिए बैल और हल कृषि के पारंपरिक उपकरण हैं। कृषि के अन्य पारंपरिक और आधुनिक उपकरणों तथा उनके उपयोग के विषय में पता लगाइए और लिखिए। (ख) भारत में बैल केवल पशु नहीं बल्कि कृषि संस्कृति का अभिन्न अंग हैं। लिखिए कि भारतीय गाँवों एवं शहरों में भी बैल किस-किस काम में सहायक होते हैं?

अलग-अलग और साथ-साथ

“दो-चार बार मोती ने गाड़ी को सड़क की खाई में गिराना चाहा; पर हीरा ने संभाल लिया। वह ज्यादा सहनशील था।”

  1. कहानी के आधार पर हीरा और मोती की विशेषताएँ लिखिए। (संकेत– धैर्यवान, गुस्सैल, मेहनती, शांत, सहनशील आदि)

  2. हीरा और मोती की विशेषताएँ कुछ-कुछ समान और कुछ-कुछ अलग हैं, किंतु उनकी भिन्न विशेषताएँ एक-दूसरे को पूरा करती हैं। कैसे?

  3. आपकी कक्षा में भी कुछ-कुछ समान और कुछ-कुछ भिन्न विशेषताओं वाले सहपाठी हैं। सबकी आवश्यकताएँ भी थोड़ी समान और थोड़ी भिन्न हैं। बताइए कि आप भिन्न विशेषताओं वाले सहपाठी से अपने लिए कैसा व्यवहार चाहते हैं? उनसे पता कीजिए कि वे आपसे अपने लिए कैसा व्यवहार चाहते हैं? (संकेत– क्या-क्या करें और क्या-क्या न करें, कैसे पढ़ाई खेल आदि में एक-दूसरे की सहायता करें और साथ दें)

दो बैलों की कथा 23

  1. “दोनों आमने-सामने या आस-पास बैठे हुए एक-दूसरे से मूक-भाषा में विचार-विनिमय करते थे।” कहानी में अनेक स्थानों पर ‘मूक-भाषा’ का उल्लेख किया गया है। आपके विचार से हीरा और मोती किस प्रकार आपस में बातें किया करते होंगे? अनुमान और कल्पना से बताइए।

  2. आप भी अनेक अवसरों पर बिना शब्दों का उच्चारण किए संवाद करते हैं। कब-कब? कहाँ-कहाँ? कुछ उदाहरण लिखिए।

भारतीय सांकेतिक भाषा

आप नीचे दी गई इंटरनेट कड़ी (लिंक) पर जाकर भारतीय सांकेतिक भाषा सीख सकते हैं— https://www.youtube.com/@ISLRTC https://islrtc.nic.in/

मार्ग खोजेंगे कैसे?

“सीधे दौड़ते चले गए। यहाँ तक कि मार्ग का ज्ञान न रहा। जिस परिचित मार्ग से आए थे, उसका यहाँ पता न था। नए-नए गाँव मिलने लगे।”

  1. हीरा-मोती अपने घर के मार्ग से भटक गए थे। क्या कभी आपके साथ ऐसा हुआ है कि आप रास्ता भूल गए या भटक गए? तब आपने अपने मार्ग का पता कैसे लगाया था?
  2. यदि कोई व्यक्ति भटक जाए तो उसे क्या करना चाहिए कि वह सुरक्षित रूप से अपने गंतव्य तक पहुँच जाए। कक्षा में चर्चा कीजिए और लिखिए। (संकेत— ऑनलाइन मानचित्र, पुलिस, स्कूल, सरकारी भवन, विद्यार्थी, सड़क पर लगे सूचना-पट, दुकानों के बोर्डों पर लिखे पते, डाकघर आदि।)
  3. आपके विद्यालय में आपदा की स्थिति में निकासी का मार्ग दर्शाने वाला मानचित्र अवश्य होगा। उसे ध्यानपूर्वक देखिए और पता लगाइए कि आपदा की स्थिति में आपकी कक्षा के सबसे निकट और सुरक्षित कौन-सा मार्ग है।

भूजान

  1. हीरा और मोती की दैनंदिनी कहानी में हीरा और मोती आपस में मनुष्यों की तरह बातें करते दिखते हैं। कल्पना कीजिए कि वे लिख-पढ़ भी सकते हैं। हीरा या मोती की नजर से उस दिन की डायरी लिखिए जब उन्हें काँजीहाउस ले जाया गया।

24 गंगा

कैसे लिखें—

  • “आज का दिन...” से आरंभ करें।
  • भावनाएँ लिखें (भूख, गुस्सा, दर्द)।
  • अंत में आशा या संकल्प लिखें।

(संकेत– “आज हमें काँजीहाउस में बंद किया गया। भूख से पेट जल रहा है। पर विश्वास है कि झूरी हमें वापस ले जाएगा।”)

  1. आज के समाचार

मान लीजिए आप एक स्थानीय समाचार पत्र के संवाददाता हैं। अपने समाचार पत्र के लिए बैलों के काँजीहाउस से भागने का समाचार लिखिए।

कैसे लिखें—

  • शीर्षक दें।
  • घटना का विवरण (कहाँ, कब, क्या हुआ)।
  • परिणाम और लोगों की प्रतिक्रिया।

(संकेत– शीर्षक ‘दो बहादुर बैलों ने तोड़ी बेड़ियाँ’)

  1. कहानी का नया अंत

यदि बैल वापस न लौटते तो कहानी का अंत कैसे होता? कहानी का नया अंत लिखिए।

कैसे लिखें—

  • बैलों की नई जगह।
  • झूरी की स्थिति।

(संकेत– “हीरा और मोती अब एक बूढ़े किसान के घर शांति से रह रहे हैं।”)

  1. चित्रकथा लेखन

नीचे ‘दो बैलों की कथा’ की एक घटना को चित्रकथा के रूप में दिया गया है। इन घटनाओं को पहचानिए। प्रत्येक घटना के लिए उपयुक्त संवाद और घटनाक्रम बताने वाले वाक्य लिखिए।

कैसे लिखें—

  • हर चित्र के लिए एक छोटा संवाद बनाकर लिखिए।
  • दृश्य का क्रम— बंद करना, भागने की योजना, दीवार तोड़ना, आजादी।

(संकेत– चित्र 4: “अब हम आजाद हैं।”)

दो बैलों की कथा 25

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भाषा से संवाद

व्याकरण की बात

मेरे शब्द

कहानी में से पाँच ऐसे शब्द चुनकर लिखिए जो आपके लिए बिल्कुल नए हैं। अब उन शब्दों के अर्थ अपने अनुमान से लिखिए। इसके बाद उनके अर्थ शब्दकोश में से देखकर लिखिए।

26 गंगा

भाषा गढ़ते मुहावरे

“लोग आ-आकर उनकी सूरत देखते और मन फीका करके चले जाते।”

‘मन फीका करना’ एक मुहावरा है जिसका अर्थ आपको वाक्य पढ़कर समझ में आ ही गया होगा। इसी से मिलते-जुलते मुहावरे हैं— जी फीका होना, जी खट्टा होना आदि। ‘दो बैलों की कथा’ कहानी में कई मुहावरे हैं जिनसे यह कहानी जीवंत हो गई है। ऐसी भाषा को ही मुहावरेदार भाषा कहा जाता है।

कहानी में से चुनकर कुछ वाक्य नीचे दिए गए हैं। इन वाक्यों में मुहावरों को पहचानकर रेखांकित कीजिए। इन मुहावरों का प्रयोग करते हुए नए वाक्य बनाकर लिखिए—

  1. “झूरी के साले गया को घर तक गोई ले जाने में दाँतों पसीना आ गया।”
  2. “उसका चेहरा देखकर अंतर्ज्ञान से दोनों मित्रों के दिल काँप उठे।”
  3. “झूरी की स्त्री ने बैलों को द्वार पर देखा, तो जल उठी।”
  4. “मोती दिल में ऐंठकर रह गया।”
  5. “आएगा तो दूर ही से खबर लूँगा। देखूँ कैसे ले जाता है।”
  6. “जी तोड़कर काम करते हैं, किसी से लड़ाई-झगड़ा नहीं करते, चार बातें सुनकर गम खा जाते हैं।”
  7. “अगर वे भी ईंट का जवाब पत्थर से देना सीख जाते, तो शायद सभ्य कहलाने लगते।”
  8. “तो फिर वहीं मरो। बंदा तो नौ-दो व्यारह होता है।”

1. अतिविधियाँ

नीचे दी गई गतिविधियाँ अपने समूह के साथ मिलकर कीजिए—

  1. कविता (गीत) और अभिनंदन-पत्र

“बाल-सभा ने निश्चय किया, दोनों पशुवीरों को अभिनंदन-पत्र देना चाहिए।”

(क) मान लीजिए कि बाल-सभा ने हीरा और मोती की प्रशंसा में एक गीत लिखा और गाया। अपनी कल्पना से वह गीत लिखिए।

(ख) हीरा और मोती के लिए अभिनंदन-पत्र लिखिए।

  1. बाल सभा में भाषण

मान लीजिए कि आपको बाल-सभा ने हीरा-मोती के लौटने के बाद भाषण देने के लिए बुलाया है। भाषण का विषय है— ‘पशुओं के अधिकार’। अपना भाषण लिखिए और कक्षा में प्रस्तुत कीजिए।

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दो बैलों की कथा 27

  1. शीर्षक इस कहानी के पाँच भाग हैं। कहानी के प्रत्येक भाग को अपने मन से उपयुक्त शीर्षक दीजिए।

मेरी पहेली अपने समूह के साथ मिलकर ऐसी पहेलियाँ बनाइए जिनके उत्तर निम्नलिखित हों—

हीरा, झूरी, मोती, गया, बैल, मटर, रस्सी, रोटी

भाषा संगम “कभी-कभी अड़ियल बैल भी देखने में आता है।”

नीचे ‘बैल’ शब्द के लिए संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित कुछ भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त शब्दों की सूची दी गई है।

बैल (हिंदी); वृषभ: (संस्कृत); बओलद, बल्द (पंजाबी); बैल (उर्दू); दॉंद (कश्मीरी); ढगो (सिंधी); बैल (मराठी); बल्द (गुजराती); बैल (कोंकणी); गोरु (नेपाली); बलद (बांग्ला); पाँड़, बलध (असमिया); शन लाबा (मणिपुरी); बलद (ओड़िआ); एंददु (तेलुगु); एरिदु/काळैमाहु (तमिल); काळ (मलयालम); एतु (कन्नड़)।

  • इनके अतिरिक्त यदि आप ‘बैल’ शब्द को किसी और भाषा में भी जानते हैं तो उस भाषा में भी लिखिए।
  • उपर्युक्त वाक्य को अपनी मातृभाषा में भी लिखिए।

https://shabd.education.gov.in/lexicon.jsp

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दो बैलों की कथा https://www.youtube.com/watch?v=cq0Lgg7iM14&ab_channel=NCERTOFFICIAL

कथा सम्राट– प्रेमचंद https://www.youtube.com/watch?v=3314rJcclul&ab_channel=NCERTOFFICIAL

प्रेमचंद का बचपन और बच्चों की कहानियाँ https://www.youtube.com/watch?v=bg0MzrE36Dg&t=187s&ab_channel=NCERTOFFICIAL

28 गंगा

शब्द-संपदा

निरापद आपत्ति से रहित, निर्विघ्न, सुरक्षित
सहिष्णुता/सहिष्णुत्व सहनशीलता, क्षमा
विषाद उदासी, अवसाद, जड़ता, मन उचट जाना
पराकाष्ठा अंतिम सीमा, चरम कोटि या सीमा,
कदाचित् कभी, शायद
पछाई/पछौह पश्चिमी प्रदेश का, पश्चिम दिशा
चौकस चौकन्ना, सावधान, ठीक
डील शरीर की ऊँचाई-चौड़ाई आदि, कद, देह, शरीर
विग्रह अलगाना, फैलाना, फूट पैदा करना, खंड, भाग, विस्तार
विनोद परिहास, मनोरंजन, हटाना, क्रीड़ा, कौतूहल
आत्मीयता अपनापन, मैत्री
नॉद मिट्टी का एक बड़ा और चौड़ा बर्तन जिसमें पशुओं को चारा-पानी आदि दिया जाता है, हौदी
गोई/गुइयाँ खेल का साथी, सखी
पगाहिया/पगाहा/पघा ढोर (पशु) बाँधने की रस्सी
कनखियों/कनखी आँख की कोर, तिरछी निगाह से देखना, आँख का इशारा
चरनी मेंड़दार लंबा चबूतरा जिस पर गाय-बैल को चारा पानी दिया जाता है, गाय-बैल को चारा-पानी देने के लिए गाड़ी हुई नॉद
गराँव फंदेदार रस्सी जो बैल आदि के गले में पहनाई जाती है
प्रतिवाद विरोध, खंडन, वादी की बात के विरोध में कही जाने वाली बात
ताकीद किसी कार्य के लिए बार-बार चेताने की क्रिया
टिटकार/टिटकारना ‘टिक-टिक’ शब्द करके घोड़े, बैल आदि को चलने के लिए प्रेरित करना
तेवर क्रोधभरी दृष्टि, कोप प्रकट करने वाली तिरछी नजर, भौंह
थान पशुओं के बाँधे जाने की जगह, बँधी हुई लंबाई का कपड़े का बड़ा टुकड़ा
बरकत वृद्धि, बढ़ती, सौभाग्य, लाभ, प्रभाव
बेतहाशा बहुत तेजी से, बदहवास होकर (भागना), बिना सोचे-विचारे

दो बैलों की कथा 29

व्याकुल — घबड़ाया हुआ, हतबुद्धि, व्यग्र, अभिभूत, भीत रोगदता/रोगदना — भगाना, खदेड़ना, दौड़ाना तजुरबा/तजरबा — अनुभव मल्लयुद्ध — कुश्ती, बाहुयुद्ध ग्रास — कौर, निवाला, आहार, निगलना, ग्रहण मेंड़ — खेत की सीमा, सिंचाई आदि के लिए उसके चारों ओर बनाया हुआ मिट्टी का घेरा खुर — नख, चारपाई के पाये का निचला हिस्सा काँजीहौस/काँजीहाउस [‘काइन हाउस’] — वह बाड़ा जिसमें दूसरे का खेत आदि खाने वाले या अनाथ चौपाए (पशु) बंद किए जाते और कुछ दंड लेकर छोड़े या नीलाम किए जाते हैं साबिका/साविका — वास्ता, सरोकार, काम (पड़ना, होना) तृप्ति — भोजन आदि की प्राप्ति से उत्पन्न संतोष या तृप्त होने का भाव दहक — आग का दहकना, लपट, ज्वाला उज्ज्वचन — अशिष्टता, उद्दंडता, उच्छ्वखलता बूते/बूता — सामथ्य, बल, शक्ति, बस आजमाई/आजमाना — परीक्षार्थ प्रयोग करना, परीक्षा, जाँच करना चेत — होश, संज्ञा, याद, ज्ञान, चित्त, मन, इच्छा, सावधानी डुग्गी — चमड़े से मढ़ा चौड़े मुँह का छोटा बाजा उन्मत्त — मतवाला, सनकी नीलाम — बिक्री की एक रीति जिसमें सबसे अधिक दाम बोलने वाले के हाथ माल बेचा जाता है, बोली बोलकर बेचना अख्तियार/इख्तियार — पसंद करना या इसका अधिकार, वश, विचाराधिकार, ग्रहण

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दो बैलों की कथा - CBSE Class 9 Hindi Notes