क्या लिखूँ? - CBSE Class 9 Hindi Notes

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Chapter Study Guide & Summary

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Key Concepts & Syllabus Topics

Important Definitions & Terminology

क्या लिखूँ? Overview
The central theme and foundational concept covered in Class 9 Hindi Chapter 2, emphasizing conceptual clarity, NCERT curriculum alignment, and exam readiness.
NCERT Curriculum Alignment
Structured study material adhering strictly to CBSE board guidelines, learning objectives, and standardized assessment criteria for Class 9.
Active Recall & Revision
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Quick Revision & Key Points

Full NCERT Chapter: क्या लिखूँ?

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पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी

पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का जन्म सन् 1894 में खैरागढ़, राजनंदगांव, छत्तीसगढ़ (तत्कालीन मध्यप्रदेश) में हुआ था। हिंदी साहित्य में उनकी ख्याति कुशल आलोचक, कवि, निबंधकार, हास्य व्यंग्यकार के रूप में है। निबंध लेखन के लिए वे विशेष रूप से स्मरणीय हैं। उनकी प्रमुख रचनाएँ हैं— पंच-पात्र, पद्म-वन, प्रबंध पारिजात, कुछ बिखरे पन्ने (निबंध संग्रह), अश्रुदल, शातदल (काव्य), झालमला, त्रिवेणी (कहानी संग्रह), विश्व साहित्य, हिंदी कहानी साहित्य, हिंदी साहित्य विमर्श, हिंदी उपन्यास साहित्य (आलोचना)। उन्होंने सरस्वती और छाया पत्रिकाओं का संपादन भी किया।

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पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी ने अपने लेखन में अध्यात्म, समाज-सुधार, लोकजीवन को प्रमुखता दी है। उन्होंने अपने निबंधों में भारतीय कृषि एवं सामाजिक संबंधों का तार्किक मूल्यांकन और विश्लेषण किया है। उनकी रचनाओं में भारतीय और पाश्चात्य साहित्य के सिद्धांतों का सामंजस्य देखने को मिलता है। सन् 1971 में उनका निधन हो गया।

‘क्या लिखूँ?’ निबंध में पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी ने निबंध की रचना प्रक्रिया को समझाया है। इस निबंध में उन्होंने ‘दूर के ढोल सुहावने’ और ‘समाज-सुधार’ शीर्षक दो विषयों को लेकर निबंध लेखन में आने वाली कठिनाइयों की चर्चा की है। निबंध की रचना प्रक्रिया के संबंध में विभिन्न विद्वानों के विचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने निबंध लिखने के आदर्श तरीके को खोजने का प्रयत्न रोचक और सरल ढंग से किया है। लेखक ने अपने विचारों को प्रकट करने के लिए साहित्यिक और सांस्कृतिक संदर्भों का अत्यंत प्रभावी ढंग से प्रयोग किया है। इस निबंध की आत्मपरक शैली— जिसमें लेखक स्वयं पाठकों से संवाद करता है— इसे अधिक जीवंत, आत्मीय और प्रभावशाली बनाती है। आइए, निबंध लेखन की अन्य प्रक्रियाओं को समझने के लिए पढ़ते हैं— ‘क्या लिखूँ?’

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क्या लिखूँ?

मुझे आज लिखना ही पड़ेगा। अंग्रेजी के प्रसिद्ध निबंध लेखक ए.जी. गार्डिनर का कथन है कि लिखने की एक विशेष मानसिक स्थिति होती है। उस समय मन में कुछ ऐसी उमंग-सी उठती है, हृदय में कुछ ऐसी स्फूर्ति-सी आती है, मस्तिष्क में कुछ ऐसा आवेग-सा उत्पन्न होता है कि लेख लिखना ही पड़ता है। उस समय विषय की चिंता नहीं रहती। कोई भी विषय हो, उसमें हम अपने हृदय के आवेग को भर ही देते हैं। हैट टाँगने के लिए कोई भी खूँटी काम दे सकती है। उसी तरह अपने मनोभावों को व्यक्त करने के लिए कोई भी विषय उपयुक्त है। असली वस्तु है हैट, खूँटी नहीं। इसी तरह मन के भाव ही तो यथार्थ वस्तु हैं, विषय नहीं।

गार्डिनर साहब के इस कथन की यथार्थता में मुझे संदेह नहीं, पर मेरे लिए कठिनता यह है कि मैंने उस मानसिक स्थिति का अनुभव ही नहीं किया है, जिसमें भाव अपने आप उल्थित हो जाते हैं। मुझे तो सोचना पड़ता है, चिंता करनी पड़ती है, परिश्रम करना पड़ता है, तब कहीं मैं एक निबंध लिख सकता हूँ। आज तो मुझे विशेष परिश्रम करना पड़ेगा, क्योंकि मुझे कोई साधारण निबंध नहीं लिखना है। आज मुझे नमिता और अमिता के लिए आदर्श निबंध लिखना होगा। नमिता का आदेश है कि मैं ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’ इस विषय पर लिखूँ। अमिता का आग्रह है कि मैं समाज-सुधार पर लिखूँ, ये दोनों ही विषय परीक्षा में आ चुके हैं और उन दोनों पर आदर्श निबंध लिखकर मुझे उन दोनों को निबंध-रचना का रहस्य समझाना पड़ेगा।

दूर के ढोल सुहावने अवश्य होते हैं। पर क्या वे इतने सुहावने होते हैं कि उन पर पाँच पेज लिखे जा सकें? इसी प्रकार जिस समाज-सुधार की चर्चा अनादि काल से लेकर आज तक होती आ रही है और जिसके संबंध में बड़े-बड़े विज्ञों में भी विरोध है, उसको मैं पाँच पेज में कैसे लिख दूँ? मैंने सोचा कि सबसे पहले निबंधशास्त्र के आचार्यों की सम्मति जान लूँ। पहले यह तो समझ लूँ कि आदर्श निबंध है क्या और वह कैसे लिखा जाता है, तब फिर मैं विषय की चिंता करूँगा। इसलिए मैंने निबंधशास्त्र के कई आचार्यों की रचनाएँ देखीं।

एक विद्वान का कथन है कि निबंध छोटा होना चाहिए। छोटा निबंध बड़े की अपेक्षा अधिक अच्छा होता है, क्योंकि बड़े निबंध में रचना की सुंदरता नहीं बनी रह सकती। इस कथन को मान लेने में ही मेरा लाभ है। मुझे छोटा ही निबंध लिखना है, बड़ा नहीं। पर लिखूँ कैसे? निबंधशास्त्र के उन्हीं आचार्य महोदय का कथन है कि निबंध के दो प्रधान अंग हैं—

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सामग्री और शैली। पहले तो मुझे सामग्री एकत्र करनी होगी, विचार-समूह संचित करना होगा। इसके लिए मुझे मनन करना चाहिए। यह तो सच है कि जिसने जिस विषय का अच्छा अध्ययन किया है, उसके मस्तिष्क में उस विषय के विचार आते हैं। पर यह कौन जानता था कि ‘दूर के ढोल सुहावने’ पर भी निबंध लिखने की आवश्यकता होगी। यदि यह बात पहले से ज्ञात होती तो पुस्तकालय में जाकर इस विषय का अनुसंधान कर लेता; पर अब समय नहीं है। मुझे तो यहीं बैठकर दो ही घंटों में दो निबंध तैयार कर देने होंगे। यहाँ न तो विश्वकोश है और न कोई ऐसा ग्रंथ जिसमें इन विषयों की सामग्री उपलब्ध हो सके। अब तो मुझे अपने ही ज्ञान पर विश्वास कर लिखना होगा।

विज्ञों का कथन है कि निबंध लिखने के पहले उसकी रूपरेखा बना लेनी चाहिए। अतएव सबसे पहले मुझे ‘दूर के ढोल सुहावने’ की रूपरेखा बनानी है। मैं सोच ही नहीं सकता कि इस विषय की कैसी रूपरेखा है। निबंध लिख लेने के बाद मैं उसका सारांश कुछ ही वाक्यों में भले ही लिख दूँ, पर निबंध लिखने के पहले उसका सार दस-पाँच शब्दों में कैसे लिखा जाए? क्या सचमुच हिंदी के सब विज्ञ लेखक पहले से अपने-अपने निबंधों के लिए रूपरेखा तैयार कर लेते हैं? ए.जी. गार्डिनर को तो अपने लेखों का शीर्षक बनाने में ही सबसे अधिक कठिनाई होती है। उन्होंने लिखा कि मैं लेख लिखता हूँ और शीर्षक देने का भार मैं अपने मित्र पर छोड़ देता हूँ। उन्होंने यह भी लिखा है कि शोक्सपीयर को भी नाटक लिखने में उतनी कठिनाई न हुई होगी, जितनी कठिनाई नाटकों के नामकरण में हुई होगी। तभी तो घबराकर नाम न रख सकने के कारण उन्होंने अपने एक नाटक का नाम रखा ‘जैसा तुम चाहो’। इसलिए मुझसे तो रूपरेखा तैयार न होगी।

अब मुझे शैली निश्चित करनी है। आचार्य महोदय का कथन है कि भाषा में प्रवाह होना चाहिए। इसके लिए वाक्य छोटे-छोटे हों, पर एक-दूसरे से संबद्ध। यह तो बिल्कुल ठीक है। मैं छोटे-छोटे वाक्य अच्छी तरह लिख सकता हूँ। पर मैं हूँ मास्टर। अपनी विद्वता का

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शैली का विषय

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प्रदर्शन करने के लिए, अपना गौरव स्थापित करने के लिए यह आवश्यक है कि वाक्य कम-से-कम आधे पृष्ठ में तो समाप्त हों। बाणभट्ट ने कादंबरी में ऐसे ही वाक्य लिखे हैं। वाक्यों में अस्पष्टता भी चाहिए, क्योंकि यह अस्पष्टता या दुर्बोधता गांभीर्य ला देती है। इसीलिए संस्कृत के प्रसिद्ध कवि श्रीहर्ष ने जान-बूझकर अपने काव्य में ऐसी गुट्थियाँ डाल दी हैं, जो अज्ञों से न सुलझ सकें और सेनापति ने भी अपनी कविता दुर्बोध कर दी है। तभी तो अलंकारों, मुहावरों और लोकोक्तियों का समावेश भी निबंधों के लिए आवश्यक बताया जाता है। तब क्या किया जाए?

अंग्रेजी के निबंधकारों ने एक दूसरी ही पद्धति को अपनाया है। उनके निबंध इन आचार्यों की कसौटी पर भले ही खरे सिद्ध न हों, पर अंग्रेजी साहित्य में उनका मान अवश्य है। उस पद्धति के जन्मदाता मानटेन समझे जाते हैं। उन्होंने स्वयं जो कुछ देखा, सुना और अनुभव किया, उसी को अपने निबंधों में लिपिबद्ध कर दिया। ऐसे निबंधों की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि वे मन की स्वच्छंद रचनाएँ हैं। उनमें न कवि की उदात्त कल्पना रहती है, न आख्यायिका-लेखक की सूक्ष्म दृष्टि और न विज्ञों की गंभीर तर्कपूर्ण विवेचना। उनमें लेखक की सच्ची अनुभूति रहती है। उनमें उसके सच्चे भावों की सच्ची अभिव्यक्ति होती है, उनमें उसका उल्लास रहता है। ये निबंध तो उस मानसिक स्थिति में लिखे जाते हैं, जिसमें न ज्ञान की गरिमा रहती है और न कल्पना की महिमा, जिसमें जीवन का गौरव भूलकर हम अपने में ही लीन हो जाते हैं, जिसमें हम संसार को अपनी ही दृष्टि से देखते हैं और अपने ही भाव से ग्रहण करते हैं। तब इसी पद्धति का अनुसरण कर मैं भी क्यों न निबंध लिखूँ। पर मुझे तो दो निबंध लिखने होंगे।

मुझे अमीर खुसरो की एक कहानी याद आई। एक बार प्यास लगने पर वे एक कुएँ के पास पहुँचे। वहाँ चार औरतें पानी भर रही थीं। पानी माँगने पर पहले उनमें से एक ने खीर पर कविता सुनने की इच्छा प्रकट की, दूसरी ने चरखे पर, तीसरी ने कुत्ते पर और चौथी ने ढोल पर। अमीर खुसरो प्रतिभावान थे, उन्होंने एक ही पद्य में चारों की इच्छाओं की पूर्ति कर दी। उन्होंने कहा—

खीर पकाई जतन से, चरखा दिया चला। आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजा।।

मुझमें खुसरो की प्रतिभा नहीं है, पर उनकी इस पद्धति को स्वीकार करने से मेरी कठिनाई आधी रह जाती है। मैं भी एक निबंध में इन दोनों विषयों का समावेश कर दूँगा।

दूर के ढोल सुहावने होते हैं, क्योंकि उनकी कर्कशता दूर तक नहीं पहुँचती। जब ढोल के पास बैठे हुए लोगों के कान के पर्दे फटते रहते हैं, तब दूर किसी नदी के तट पर संध्या

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समय, किसी दूसरे के कान में वही शब्द मधुरता का संचार कर देते हैं। ढोल के उन्हीं शब्दों को सुनकर वह अपने हृदय में किसी के विवाहोत्सव का चित्र अंकित कर लेता है। कोलाहल से पूर्ण घर के एक कोने में बैठी हुई किसी लज्जाशील नव-वधू की कल्पना वह अपने मन में कर लेता है। उस नव-वधू के प्रेम, उल्लास, संकोच, आशंका और विषाद से युक्त हृदय के कंपन ढोल की कर्कश ध्वनि को मधुर बना देते हैं। सच तो यह है कि ढोल की ध्वनि के साथ आनंद का कलरव, उत्सव का प्रमोद और प्रेम का संगीत, ये तीनों मिले रहते हैं। तभी उसकी कर्कशता समीपस्थ लोगों को भी कटु नहीं प्रतीत होती और दूरस्थ लोगों के लिए तो वह अत्यंत मधुर बन जाती है।

यह बात सच है कि दूर रहने से हमें यथार्थता की कठोरता का अनुभव नहीं होता। यही कारण है कि जो तरुण संसार के जीवन-संग्राम से दूर हैं, उन्हें संसार का चित्र बड़ा ही मनमोहक प्रतीत होता है; जो वृद्ध हो गए हैं, जो अपनी बाल्यावस्था और तरुणावस्था से दूर हट आए हैं, उन्हें अपने अतीतकाल की स्मृति बड़ी सुखद लगती है। वे अतीत का ही स्वप्न देखते हैं। तरुणों के लिए जैसे भविष्य उज्ज्वल होता है, वैसे ही वृद्धों के लिए अतीत। वर्तमान से दोनों को असंतोष होता है। तरुण भविष्य को वर्तमान में लाना चाहते हैं और वृद्ध अतीत को खींचकर वर्तमान में देखना चाहते हैं। तरुण क्रांति के समर्थक होते हैं और वृद्ध अतीत-गौरव के संरक्षक। इन्हीं दोनों के कारण वर्तमान सदैव क्षुब्ध रहता है और इसी से वर्तमान काल सदैव सुधारों का काल बना रहता है।

मनुष्य जाति के इतिहास में कोई ऐसा काल ही नहीं हुआ, जब सुधारों की आवश्यकता न हुई हो। तभी तो आज तक कितने ही सुधारक हो गए हैं, पर सुधारों का अंत कब हुआ है? भारत के इतिहास में बुद्धदेव, महावीर स्वामी, नागार्जुन, शंकराचार्य, कबीर, नानक, राजा राममोहन राय, स्वामी दयानंद और महात्मा गांधी में ही सुधारकों की गणना समाप्त नहीं होती। सुधारकों का दल नगर-नगर और गाँव-गाँव में होता है। यह सच है कि जीवन में नए-नए दोष उत्पन्न होते जाते हैं और नए-नए सुधार हो जाते हैं। न दोषों का अंत है और न सुधारों का। जो कभी सुधार थे, वही आज दोष हो गए हैं और उन सुधारों का फिर नव सुधार किया जाता है। तभी तो यह जीवन प्रगतिशील माना गया है।

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हिंदी में प्रगतिशील साहित्य का निर्माण हो रहा है। उसके निर्माता यह समझ रहे हैं कि उनके साहित्य में भविष्य का गौरव निहित है। पर कुछ ही समय के बाद उनका यह साहित्य भी अतीत का स्मारक हो जाएगा और आज जो तरुण हैं, वही वृद्ध होकर अतीत के गौरव का स्वप्न देखेंगे। उनके स्थान में तरुणों का फिर दूसरा दल आ जाएगा, जो भविष्य का स्वप्न देखेगा। दोनों के ही स्वप्न सुखद होते हैं, क्योंकि दूर के ढोल सुहावने होते हैं।

अभ्यास

एचना से संवाद

मेरे उत्तर मेरे तर्क

निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं?

  1. “हैट टॉगने के लिए कोई भी खूंटी काम दे सकती है... असली वस्तु है हैट, खूंटी नहीं।” निबंध में ‘हैट’ और ‘खूंटी’ का उल्लेख किस भाव को सबसे अधिक उजागर करता है? (क) विषय से अधिक लेखक के भावों की प्रधानता को दर्शाना (ख) विचार से अधिक तथ्य आधारित सामग्री को प्रमुख बताना (ग) शैली से अधिक भाषा व्यवस्था की उपयोगिता बताना (घ) उदाहरण से अधिक सिद्धांत आधारित लेखन का समर्थन करना

  2. “उनमें लेखक की सच्ची अनुभूति रहती है... उसका उल्लास रहता है।” मानटेन की पद्धति लेखक के लिए किस निर्णय का आधार बनती है? (क) शैली और स्पष्ट-सहज भाषा को महत्व न देना (ख) परंपरागत निबंधकारों को अस्वीकार करना (ग) अध्ययन के बिना अपने विचार प्रस्तुत कर देना (घ) अनुभव आधारित स्वच्छंद लेखन को अपनाना

  3. “तरुणों के लिए भविष्य उज्ज्वल... वृद्धों के लिए अतीत सुखद...” यह तुलना किस पर आधारित है? (क) तर्क और भावना (ख) ज्ञान और शिक्षा (ग) परिश्रम और उपलब्धि (घ) अभिलाषा और अनुभव

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  1. निबंध में अमीर खुसरो की कहानी का उल्लेख किस संदर्भ में किया गया है? (क) कविता लेखन की कला को समझाने के लिए (ख) एक साथ कई विषयों को संबोधित करने की प्रतिभा दिखाने के लिए (ग) डोल के महत्व को दर्शाने के लिए (घ) सामाजिक सुधार के उदाहरण के रूप में

  2. निबंध में समाज-सुधार के संदर्भ में क्या कहा गया है? (क) सुधारों की आवश्यकता हर युग में बनी रहती है। (ख) सुधार केवल बड़े विचारकों द्वारा संभव हैं। (ग) सुधार केवल आधुनिक युग की देन हैं। (घ) सुधारों का कोई अंत नहीं, लेकिन दोष समाप्त हो जाते हैं।

मेरी समझ मेरे विचार

नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए—

  1. निबंध लेखन के विषय में ए.जी. गार्डिनर और लेखक के विचारों में क्या अंतर है?
  2. लेखक के अनुसार वृद्ध और तरुण दोनों ही वर्तमान से असंतुष्ट रहते हैं, पर दोनों की असंतुष्टि के कारण भिन्न हैं। आपके विचार से उनकी असंतुष्टि के क्या-क्या कारण हो सकते हैं?
  3. नमिता और अमिता किन विषयों पर निबंध लिखवाना चाहती हैं? उनके द्वारा सुझाए गए विषयों पर निबंध लिखने में लेखक को क्या-क्या कठिनाइयाँ आईं?
  4. निबंधशास्त्र के आचार्यों ने आदर्श निबंध लिखने की कौन-सी युक्तियाँ सुझाई हैं? आप किसी भी विषय पर निबंध लिखने से पहले किस तरह की तैयारी करते हैं?
  5. मानटेन ने “जो कुछ देखा, सुना और अनुभव किया, उसी को अपने निबंधों में लिपिबद्ध कर दिया!” निबंध लेखन के लिए देखने, सुनने और अनुभव करने की क्या उपयोगिता हो सकती है?

विद्या से संवाद

निबंध लिखने की कला

‘निबंध’ का शाब्दिक अर्थ है— ‘बौधना’ (निःबंध), अर्थात भली-भाँति बौधा या गठा हुआ। यह गद्य की वह विधा है जिसमें रचनाकार किसी विषय पर अपने अनुभव, विचार, दृष्टिकोण और भावनाओं को तार्किक, भावनात्मक, क्रमबद्ध और साहित्यिक रूप से प्रस्तुत करते हैं।

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शैली का अर्थ अभिव्यक्ति का ढंग होता है। निबंधकार विभिन्न प्रकार से विषय को प्रस्तुत करता है। इस पाठ में निबंध लेखन की प्रक्रियाओं के विषय में चर्चा की गई है। दिए गए आरेख को देखिए और इसके आधार पर एक निबंध लिखिए। अगर आपको निबंध लेखन का कोई और ढंग बेहतर लगता है तो उसे ऐसे ही आरेख से दर्शाइए और बताइए कि आपको वह ढंग क्यों बेहतर लगता है?

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भाव-विस्तार

“तरुण क्रांति के समर्थक होते हैं और वृद्ध अतीत गौरव के संरक्षक”

यदि उपर्युक्त वाक्य का भाव-विस्तार किया जाए तो कहा जा सकता है कि— युवा पीढ़ी में किसी समस्या को लेकर आक्रोश की भावना प्रबल होती है। वह किसी भी समस्या के समाधान के लिए बैठकर बातचीत करने के बजाय उस पर त्वरित निर्णय लेना चाहते हैं जबकि वृद्ध पीढ़ी किसी समस्या के समाधान के लिए अनुभव और परंपरागत ढंग पर विश्वास करती है।

पाठ में से चुनकर कुछ ऐसे और वाक्य नीचे दिए गए हैं। इन वाक्यों का अपने शब्दों में भाव-विस्तार कीजिए—

  • “जो तरुण संसार के जीवन-संग्राम से दूर हैं, उन्हें संसार का चित्र बड़ा ही मनमोहक प्रतीत होता है।”
  • “मनुष्य जाति के इतिहास में कोई ऐसा काल ही नहीं हुआ, जब सुधारों की आवश्यकता न हुई हो।”
  • “आज जो तरुण हैं, वही वृद्ध होकर अतीत के गौरव का स्वप्न देखेंगे।”
  • “निबंध छोटा होना चाहिए। छोटा निबंध बड़े की अपेक्षा अधिक अच्छा होता है।”

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मेरा अनुभव

इस निबंध में लेखक को दो विषयों (‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’ और ‘समाज-सुधार’) पर निबंध लिखने थे। पिछली कक्षाओं में आपने भी बहुत से विषयों पर अनुच्छेद, संवाद और निबंध लिखे हैं। आपको किन विषयों पर लिखना सरल या कठिन लगा और क्यों?

विषयों से संवाद

  1. निबंध में बुद्धदेव, महावीर स्वामी, नागार्जुन, शंकराचार्य, कबीर, नानक आदि कई महान व्यक्तियों के नाम आए हैं। इनके विषय में जानकारी एकत्रित करके संक्षेप में बताइए कि इन्होंने अपने समय में समाज के लिए क्या-क्या कार्य किए।

  2. निबंध में उल्लिखित महान व्यक्तियों ने अपने द्वारा किए गए कार्यों से समाज को एक नई दिशा दिखाई। हमारे आस-पास और भी ऐसे व्यक्ति और संस्थाएँ हैं जो स्त्री-शिक्षा, पर्यावरण, असमानता, विशेष आवश्यकता समूह (दिव्यांगजन) आदि के लिए कार्य करते हैं। ऐसे व्यक्तियों, संस्थाओं के विषय में पता लगाइए और लिखिए।

  3. आपको ‘समाज-सुधार’ करने का अवसर मिले तो आप क्या-क्या सुधार करना चाहेंगे और कैसे करना चाहेंगे? लिखिए।

  4. भारतीय ज्ञान साहित्य में अनेक स्थानों पर नैतिक, आध्यात्मिक और व्यावहारिक जीवन में संतुलन की बात की गई है। इस विषय पर अपने शिक्षक के साथ मिलकर चर्चा कीजिए।

भूजन

  1. ‘दूर के ढोल सुहावने होते हैं’ एक लोकोक्ति है। लोक में प्रचलित लोकप्रिय वाक्य या वाक्यांश को लोकोक्ति कहते हैं, जो किसी विशेष अर्थ या सीख को व्यक्त करता है। लोकोक्ति भाषा को समृद्ध करती है तथा विचारों को प्रभावशाली ढंग से व्यक्त करने में सहायता करती है। यह लोगों के अनुभव, विश्वास और मूल्यों को दर्शाती है।

आपने यह लोकोक्ति भी सुनी होगी— ‘आम के आम गुठलियों के दाम’। अब आप इस लोकोक्ति और ‘जैविक खाद की निर्मिति में हमारा प्रयास’ विषय को मिलाकर एक संक्षिप्त लेख तैयार कीजिए।

  1. “जब ढोल के पास बैठे हुए लोगों के कान के पर्दे फटते रहते हैं, तब दूर किसी नदी के तट पर संध्या समय, किसी दूसरे के कान में वही शब्द मधुरता का संचार कर देते हैं।”

आपने पढ़ा कि ढोल के पास बैठे व्यक्ति की अपेक्षा दूर बैठे व्यक्ति के लिए ढोल की आवाज़ का अनुभव भिन्न है। अपने अनुभव के आधार पर किसी ऐसी घटना का उल्लेख अपनी

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डायरी में कीजिए, जब किसी वस्तु, व्यक्ति या संस्था के विषय में दूर से आपका अनुमान कुछ और रहा हो, पर निकट से आपका अनुभव बिल्कुल अलग रहा हो।

भाषा से संवाद

व्याकरण की बात

समास

“मुझे उन दोनों को निबंध-रचना का रहस्य समझाना पड़ेगा”

उपर्युक्त पंक्ति में रेखांकित शब्द को ध्यानपूर्वक पढ़िए। यह दो पदों ‘निबंध’ और ‘रचना’ के मेल से बना है जिसका अर्थ है— निबंध की रचना।

समास

समास का अर्थ है संक्षेप। समास में दो या अनेक शब्दों के मेल से एक नए शब्द की रचना होती है, जैसे— गंगा + जल = गंगाजल, देश + भक्ति = देशभक्ति। इस प्रकार समास वह शब्द रचना है, जिसमें दो (या दो से अधिक), अर्थ की दृष्टि से परस्पर स्वतंत्र संबंध रखने वाले, स्वतंत्र शब्द रचना के अंग होते हैं।

समास रचना में प्रायः दो पद (शब्द) होते हैं। पहले पद को पूर्वपद और दूसरे पद को उत्तरपद कहते हैं। जैसे— गंगाजल में ‘गंगा’ पूर्वपद और ‘जल’ उत्तरपद है। इसी तरह देशभक्ति शब्द में ‘देश’ को पूर्वपद और ‘भक्ति’ को उत्तरपद कहेंगे। समास रचना से बने शब्द को ‘समस्त पद’ कहते हैं; जैसे— गंगाजल, देशभक्ति।

यदि समास रचना से बने शब्द (समस्त पद) के अंग अलग-अलग करने हों, तो उस प्रक्रिया को समास विग्रह कहते हैं। जैसे यदि ‘गंगाजल’ समस्त पद के अंग अलग-अलग (समास विग्रह) करें, तो दो पद निकलेंगे— गंगा और जल। समास विग्रह इस प्रकार लिखते हैं— गंगाजल = गंगा + जल (गंगा का जल)।

समास के छह प्रमुख भेद हैं—

| 1. तत्पुरुष समास | इस समास में उत्तरपद प्रधान होता है और पूर्वपद गौण होता है। तत्पुरुष समास की रचना में समस्त पदों के बीच में आने वाले परसगों (का, से, पर आदि) का लोप हो जाता है।

जैसे— रसोईघर → रसोई + घर = रसोई के लिए घर | | --- | --- |

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2. कर्मधारय समास कर्मधारय समास में पूर्वपद विशेषण तथा उत्तरपद विशेष्य होता है अथवा पूर्वपद और उत्तरपद में उपमेय-उपमान का संबंध होता है। जैसे– नीलकमल → नील + कमल = नीले रंग का कमल
3. द्विगु समास जिन समासों का पूर्वपद संख्यावाची शब्द हो, वहाँ द्विगु समास होता है। अर्थ की दृष्टि से यह समास प्रायः समूहवाची होता है। जैसे– तिरंगा = तीन रंगों का समाहार
4. बहुब्रीहि समास बहुब्रीहि समास में दोनों पद गौण होते हैं तथा ये दोनों पद मिलकर किसी अन्य पद के विषय में कुछ संकेत करते हैं। अन्य पद ही ‘प्रधान’ होता है। जैसे– पीतांबर → पीत + अंबर = पीला है अंबर (वस्त्र) जिसका अर्थात कृष्ण/विष्णु
5. द्वंद्व समास इस समास में दोनों ही पद प्रधान होते हैं तथा दोनों पदों को जोड़ने वाले समुच्चयबोधक अव्यय का लोप हो जाता है। अव्यय वे शब्द होते हैं जिनमें वचन, लिंग, पुरुष आदि की दृष्टि से कोई रूप परिवर्तन नहीं होता है। जैसे– भाई-बहन = भाई और बहन
6. अव्ययीभाव समास इस समास में पूर्वपद अव्यय होता है और समस्त पद भी अव्यय (क्रिया-विशेषण) का काम करता है। जैसे– यथाशक्ति → यथा + शक्ति = शक्ति के अनुसार पुनरुक्त शब्दों में समास होने पर भी अव्ययीभाव समास होता है। जैसे– धीरे-धीरे, जल्दी-जल्दी, दिनोदिन।

निबंध में ऐसे अनेक सामासिक शब्द आए हैं। उन शब्दों को ढूँढ़कर उनका समास विग्रह कीजिए और समास का नाम लिखिए। आपकी समझ के लिए एक उदाहरण तालिका में दिया गया है। पाठ से अन्य उदाहरण चुनकर अपनी लेखन पुस्तिका में लिखिए।

सामासिक पद समास विग्रह समास का नाम
निबंधशास्त्र निबंध का शास्त्र तत्पुरुष समास

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उपसर्ग एवं प्रत्यय

  • “सेनापति ने भी अपनी कविता दुबोध कर दी है।”
  • “समाज-सुधार की चर्चा अनादि काल से लेकर आज तक होती आ रही है।”

दिए गए वाक्यों में रेखांकित शब्दों पर ध्यान दीजिए। दोनों रेखांकित शब्दों में मूल शब्द ‘बोध’ के पहले ‘दुर’ उपसर्ग और ‘आदि’ के पहले ‘अन्’ उपसर्ग जोड़कर नए शब्द बनाए गए हैं। उपसर्ग भाषा के ऐसे सार्थक और लघुतम खंड हैं जिनका स्वतंत्र रूप से प्रयोग नहीं होता है। ये शब्दों के आरंभ में लगकर नए शब्दों का निर्माण करते हैं।

अब नीचे दिए गए वाक्यों में रेखांकित शब्दों को देखिए—

  • “आज तक कितने ही सुधारक हो गए हैं।”
  • “लेखों का शीर्षक बनाने में ही सबसे अधिक कठिनाई होती है।”

रेखांकित शब्दों में मूल शब्द ‘सुधार’ के बाद में ‘क’ प्रत्यय और ‘कठिन’ शब्द के बाद में ‘आई’ प्रत्यय जोड़कर नए शब्द बनाए गए हैं। प्रत्यय भाषा के ऐसे सार्थक और लघुतम खंड हैं जिनका प्रयोग स्वतंत्र रूप में नहीं होता और जो शब्दों के अंत में लगकर नए शब्दों का निर्माण करते हैं।

  1. निबंध से उपसर्ग और प्रत्यय वाले शब्द ढूँढ़कर अपनी लेखन-पुस्तिका में लिखिए।
  2. नीचे दिए गए वाक्यों को उचित उपसर्ग या प्रत्यय लगाकर पूरा कीजिए—
  • निबंध लिखना बड़ी ———— (कठिन”) की बात है।
  • वर्तमान से दोनों को ———— (”संतोष” होता है।
  • वाक्यों में कुछ ———— (”स्पष्ट”) भी चाहिए, क्योंकि यह ———— (”स्पष्ट”) या ———— (”बोध”) गांभीर्य ला देती है।
  1. नीचे दिए गए शब्दों में उपसर्ग या प्रत्यय लगाकर नए शब्द बनाकर लिखिए। आपकी सहायता के लिए एक उदाहरण नीचे दिया गया है।

मधुर सुधार सुंदर गति समाज

उदाहरण — मधुर —→ मधुरता, मधुरमय, सुमधुर

भाव एक शब्द अनेक

इस पाठ में अनेक ऐसे शब्दों का प्रयोग किया गया है जिनके अर्थ परस्पर मिलते-जुलते हैं। उदाहरण के लिए, विचार-मनन-चिंतन या सुहावने-मधुर-मनमोहक। पाठ में से ऐसे शब्द ढूँढ़िए तथा वाक्य प्रयोग के द्वारा उनके अर्थ स्पष्ट कीजिए।

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अतिविधियाँ

  1. “खीर पकाई जतन से, चरखा दिया चला। आया कुत्ता खा गया, तू बैठी ढोल बजा।।”

पाठ में अमीर खुसरो की यह प्रसिद्ध अनमेली आई है। अनमेली एक प्रकार की हास्य-व्यंग्यपूर्ण काव्य शैली है जिसमें असंगत वाक्यों एवं विपरीत स्थितियों को जोड़कर मनोरंजन किया जाता है। अमीर खुसरो आम लोगों के मन को बहलाने व हँसाने के उद्देश्य से ऐसे प्रयोग किया करते थे। आप उनके द्वारा रचित अन्य अनमेलियों, मुकरियों व पहेलियों का शिक्षक की सहायता से ढूँढ़कर संकलन कीजिए।

  1. कक्षा में ‘युवा और वृद्ध— दो पीढ़ियों के पीढ़ीगत अंतर’ पर वाद-विवाद का आयोजन कीजिए। वाद-विवाद के नियमों के लिए आप कक्षा 7 और 8 की पाठ्यपुस्तक मल्हार के कुछ पाठों का अभ्यास देखकर अपनी प्रतियोगिता के नियम निर्धारित कर सकते हैं।

भाषा संगम

“निबंध लिखने के पहले उसकी रूपरेखा बना लेनी चाहिए।”

नीचे ‘निबंध’ शब्द के लिए संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित कुछ भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त शब्दों की सूची दी गई है।

निबंध (हिंदी); निबंध (संस्कृत); निबंध (पंजाबी); मजमून (उर्दू); मजमून (कश्मीरी); मज्मून, निबंधु (सिन्धी); निबंध (मराठी); निबंध (गुजराती); निबंध (कोंकणी); निबंध (नेपाली); निबंध, प्रबंध (बांग्ला); निबंध-रचना (असमिया); निबंध, वाड्डू (मणिपुरी); प्रबंध, रचना (ओडिआ); व्यासमु (तेलुगु); कट्टुरे (तमिल); उपन्यासमु (मलयालम); लेख, प्रबंध (कन्नड़)।

  • इनके अतिरिक्त यदि आप ‘निबंध’ शब्द को किसी और भाषा में भी जानते हैं तो उस भाषा में भी लिखिए।
  • उपर्युक्त वाक्य को अपनी मातृभाषा में भी लिखिए।

https://shabd.education.gov.in/lexicon.jsp

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क्या लिखूँ? 43

अरोखे से

पाठ में आदर्श निबंध लेखन के विषय में विस्तार से बताया गया है। अब आप सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ का लेख ‘मैं क्यों लिखता हूँ?’ पढ़िए—

मैं क्यों लिखता हूँ?

मैं क्यों लिखता हूँ? यह प्रश्न बड़ा सरल जान पड़ता है पर बड़ा कठिन भी है, क्योंकि इसका सच्चा उत्तर लेखक के आंतरिक जीवन के स्तरों से संबंध रखता है। उन सबको संक्षेप में कुछ वाक्यों में बाँध देना आसान तो नहीं ही है, न जाने संभव भी है या नहीं? इतना ही किया जा सकता है कि उनमें से कुछ का स्पर्श किया जाए— विशेष रूप से ऐसों का जिन्हें जानना दूसरों के लिए उपयोगी हो सकता है।

एक उत्तर तो यह है कि मैं इसीलिए लिखता हूँ कि स्वयं जानना चाहता हूँ कि क्यों लिखता हूँ— लिखे बिना इस प्रश्न का उत्तर नहीं मिल सकता है। वास्तव में सच्चा उत्तर यही है। लिखकर ही लेखक उस आभ्यंतर विवशता को पहचानता है जिसके कारण उसने लिखा और लिखकर ही वह उससे मुक्त हो जाता है। मैं भी उस आंतरिक विवशता से मुक्ति पाने के लिए तटस्थ होकर उसे देखने और पहचान लेने के लिए लिखता हूँ। मेरा विश्वास है कि सभी कृतिकार— क्योंकि सभी लेखक कृतिकार नहीं होते, न उनका सब लेखन ही कृति होता है— इसीलिए लिखते हैं। यह ठीक है कि कुछ ख्याति मिल जाने के बाद कुछ बाहर की विवशता से भी लिखा जाता है— संपादकों के आग्रह से, प्रकाशक के तकाजे से, आर्थिक आवश्यकता से। पर एक तो कृतिकार हमेशा अपने सम्मुख ईमानदारी से यह भेद बनाए रखता है कि कौन-सी कृति भीतरी प्रेरणा का फल है, कौन-सा लेखन बाहरी दबाव का, दूसरे यह भी होता है कि बाहर का दबाव वास्तव में दबाव नहीं रहता, वह मानो भीतरी उन्मेष का निमित्त बन जाता है।

— सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’

रवोजबीन

पाठ में आए साहित्यकारों बाणभट्ट, श्रीहर्ष, अमीर खुसरो, सेनापति, महात्मा गांधी, ए.जी. गार्डिनर, शेक्सपीयर, मानटेन के विषय में पुस्तकालय या इंटरनेट से ढूँढ़कर पढ़िए।

44 गंगा

शब्द-संपदा

स्फूर्ति फुरती, उत्तेजना, कंपन, उछलना, मन में प्रकट होना
आवेग बिना सोचे-विचारे कुछ कर बैठने की अंत:प्रेरणा, झोंक, अशांति, उतावली, एक संचारी भाव
यथार्थता/यथार्थ सत्य, प्रकृत, उचित
उत्थित उठा हुआ, उठता हुआ, बल-वैभव में बढ़ा हुआ, उत्पन्न, ऊँचा, फैलाया हुआ
रहस्य गुप्तभेद, गोपनीय विषय, मर्म
विज्ञों/विज्ञ जानकार, समझदार, विद्वान
सम्मति सहमति, स्वीकृति, अनुमति, राय, मत, आदर, सम्मान
अनुसंधान अन्वेषण, खोज, जाँच-पड़ताल, प्रयत्न, योजना, आयोजन
विश्वकोश वह ग्रंथ जिसमें संसार के सारे विषयों का विवरण हो, वह भंडार जिसमें विश्व की सारी वस्तुएँ संगृहीत हों
दुर्बोधता/दुर्बोध जो शीघ्र समझ में न आए, गूढ़
गांभीर्य गंभीरता, गहराई, चित्त की स्थिरता, जटिलता
गुत्थी उलझन, कठिनाई, तागे आदि में उलझने से पड़ी हुई गाँठ
अज्ञों/अज्ञ ज्ञानरहित, नासमझ, अचेतन
पद्धति प्रथा, परिपाटी, मार्ग, पंथ, रास्ता, प्रणाली
पाश्चात्य पश्चिम का, बाद का, पच्छिमी, पिछला हिस्सा
आख्यायिका सिलसिलेवार कहानी या वृत्तांत, शिक्षा देने वाली कल्पित कथा
उदात्त ऊँचा, महान, श्रेष्ठ, उदार, प्रसिद्ध, प्रिय, ऊँचे स्वर में उच्चरित
अभिव्यक्ति व्यक्त, प्रकट होना, प्रकाशन
अनुसरण पीछे चलना, अनुकरण, अभ्यास, अनुकूल आचरण
समावेश साथ रहना, शामिल होना, मिलना, एकत्र होना, प्रवेश
संध्या शाम का वह समय जब दिन के दो भागों का मेल होता है, साँझ, योग, मेल, ठहराव, सीमा
अंकित लिखित, चिह्नित, चित्रित, गिना हुआ
कोलाहल बहुत से लोगों के एक साथ बोलने से होने वाला शोर, हंगामा, हल्ला
विषाद अवसाद, उदासी, तंद्रा
कलरव मधुर ध्वनि, कोमल
क्या लिखूँ? - CBSE Class 9 Hindi Notes