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भवानीप्रसाद मिश्र
भवानीप्रसाद मिश्र का जन्म सन् 1913 में मध्य प्रदेश के होशंगाबाद (अब नर्मदापुरम) में हुआ था। साहित्य के साथ-साथ स्वाधीनता आंदोलन में जिन कवियों की सक्रिय भागीदारी थी, उनमें ये प्रमुख हैं। उनकी मुख्य रचनाएँ— गीत-फ़रोश, खुशबू के शिलालेख, चकित है दुख, अँधेरी कविताएँ, बुनी हुई रस्सी, कवितांतर, शतदल, गांधी- पंचशती, त्रिकाल संध्या आदि हैं। बुनी हुई रस्सी (कविता संग्रह) पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला है।
भवानीप्रसाद मिश्र ने राष्ट्रभाषा प्रचार समिति में कार्य किया और सन् 1952-55 तक हैदराबाद से प्रकाशित हिंदी की लोकप्रिय साहित्यिक पत्रिका कल्पना का संपादन भी किया। सन् 1955-58 के बीच वे आकाशवाणी के हिंदी कार्यक्रमों से संबद्ध रहे। उन्होंने संपूर्ण गांधी वाङ्मय का भी संपादन किया। सन् 1985 में उनका निधन हो गया।

भवानीप्रसाद मिश्र ने सन् 1942 के ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ में सक्रिय रूप से भाग लिया जिसके चलते ब्रिटिश सरकार ने उन्हें तीन वर्ष के लिए कारावास का दंड दिया। 1942 के स्वाधीनता आंदोलन के समय जेल में रहते हुए ही उन्होंने ‘घर की याद’ कविता लिखी। परिवार की स्मृति ही इस कविता की केंद्रीय संवेदना है। कारावास के समय घर को याद करते हुए कवि की स्मृति में उनके परिजन एक-एक करके सम्मिलित होते चले जाते हैं। कवि सावन के बादल द्वारा परिवार को संदेश भेज रहा है और उससे आग्रह करता है कि वह उन्हें जेल के कष्टों के विषय में न बताए और सांत्वना दे।
घर की याद
आज पानी गिर रहा है, बहुत पानी गिर रहा है, रात-भर गिरता रहा है, प्राण मन घिरता रहा है,
अब सबेरा हो गया है, कब सबेरा हो गया है, ठीक से मैंने न जाना, बहुत सोकर सिर्फ माना—
क्योंकि बादल की अँधेरी, है अभी तक भी घनेरी, अभी तक चुपचाप है सब, रातवाली छाप है सब,
गिर रहा पानी झरा-झर, हिल रहे पत्ते हरा-हर, बह रही है हवा सर-सर, काँपते हैं प्राण थर-थर,
बहुत पानी गिर रहा है, घर नजर में तिर रहा है, घर कि मुझसे दूर है जो, घर खुशी का पूर है जो, घर कि घर में चार भाई, मायके में बहिन आई, बहिन आई बाप के घर, हाय रे परिताप के घर!
आज का दिन दिन नहीं है, क्योंकि इसका छिन नहीं है, एक छिन सौ बरस है रे, हाय कैसा तरस है रे,
घर कि घर में सब जुड़े हैं, सब कि इतने कब जुड़े हैं, चार भाई चार बहिनें भुजा भाई प्यार बहिनें,
और माँ बिन-पढ़ी मेरी, दुख में वह गढ़ी मेरी, माँ कि जिसकी गोद में सिर, रख लिया तो दुख नहीं फिर,
माँ कि जिसकी स्नेह-धारा का यहाँ तक भी पसारा, उसे लिखना नहीं आता, जो कि उसका पत्र पाता।
और पानी गिर रहा है, घर चतुर्दिक् घिर रहा है, पिताजी भोले बहादुर, वज्र-भुज नवनीत-सा उर,
पिताजी जिनको बुढ़ापा, एक क्षण भी नहीं व्यापा, जो अभी भी दौड़ जाएँ, जो अभी भी खिलखिलाएँ,
196 गंगा
मौत के आगे न हिचकें, शेर के आगे न बिचकें, बोल में बादल गरजता, काम में झंझा लरजता,
आज गीता-पाठ करके, दंड दो सौ साठ करके, खूब मुगदर हिला लेकर, मूठ उनकी मिला लेकर,
जब कि नीचे आए होंगे, नैन जल से छाए होंगे, हाय, पानी गिर रहा है, घर नजर में तिर रहा है,

चार भाई चार बहिनें, भुजा भाई प्यार बहिनें, खेलते या खड़े होंगे, नजर उनको पड़े होंगे।
पिताजी जिनको बुढ़ापा, एक क्षण भी नहीं व्यापा, रो पड़े होंगे बराबर, पाँचवें का नाम लेकर,
पाँचवाँ में हूँ अभागा, जिसे सोने पर सुहागा, पिताजी कहते रहे हैं, प्यार में बहते रहे हैं,
आज उनके स्वर्ण बेटे, लगे होंगे उन्हें हेटे, क्योंकि मैं उन पर सुहागा बँधा बैठा हूँ अभागा,
और माँ ने कहा होगा, दुख कितना बहा होगा आँख में किसलिए पानी, वहाँ अच्छा है भवानी,
वह तुम्हारा मन समझकर, और अपनापन समझकर, गया है सो ठीक ही है यह तुम्हारी लीक ही है,
पाँव जो पीछे हटाता, कोख को मेरी लजाता, इस तरह होओ न कच्चे, रो पड़ेंगे और बच्चे,
घर की याद 197
पिताजी ने कहा होगा, हाय, कितना सहा होगा, कहाँ, मैं रोता कहाँ हूँ, धीर मैं खोता, कहाँ हूँ,
गिर रहा है आज पानी, याद आता है भवानी, उसे थी बरसात प्यारी, रात दिन की झड़ी झारी,
खुले सिर नंगे बदन वह, घूमता फिरता मगन वह, बड़े बाड़े में कि जाता, बीज लौकी का लगाता,
तुझे बतलाता कि बेला ने फलानी फूल झेला, तू कि उसके साथ जाती, आज इससे याद आती,
मैं न रोऊँगा — कहा होगा, और फिर पानी बहा होगा, दृश्य उसके बाद का रे, पाँचवें की याद का रे,
भाई पागल, बहिन पागल, और अम्मा ठीक बादल, और भोजी और सरला, सहज पानी सहज तरला,
शर्म से रो भी न पाएँ, खूब भीतर छटपटाएँ, आज ऐसा कुछ हुआ होगा आज सबका मन चुआ होगा।

अभी पानी थम गया है, मन निहायत नम गया है, एक-से बादल जमे हैं, गगन-भर फैले रमे हैं,
ढेर है उनका, न फाँकें, जो कि किरनें झुकें-झाँकें, लग रहे हैं वे मुझे यों, माँ कि आँगन लीप दे ज्यों;
गगन-आँगन की लुनाई दिशा के मन में समाई दश-दिशा चुपचाप है रे, स्वस्थ की लय छाप है रे
झाड़ आँखें बंद करके साँस सुस्थिर मंद करके, हिले बिन चुपके खड़े हैं, क्षितिज पर जैसे जड़े हैं
एक पंछी बोलता है, घाव उर के खोलता है, आदमी के उर बिचारे, किसलिए इतनी तुषा रे,
198 गंगा
तू जरा-सा दुख कितना, सह सकेगा क्या कि इतना, और इस पर बस नहीं है, बस बिना कुछ रस नहीं है,
हवा आई उड़ चला तू, लहर आई मुड़ चला तू, लगा झटका टूट बैठा, गिरा नीचे फूट बैठा,
तू कि प्रिय से दूर होकर, बह चला रे पूर होकर, दुख भर क्या पास तेरे, अश्रु सिंचित हास तेरे!
पिताजी का वेश मुझको, दे रहा है क्लेश मुझको, देह एक पहाड़ जैसे, मन कि बड़ का झाड़ जैसे,
एक पत्ता टूट जाए, बस कि धारा फूट जाए, एक हल्की चोट लग ले, दूध की नद्दी उमग ले,
एक टहनी कम न हो ले, कम कहाँ कि खम न हो ले, ध्यान कितना फिक्र कितनी, डाल जितनी जड़ें उतनी!
इस तरह का हाल उनका, इस तरह का ख्याल उनका, हवा, उनको धीर देना, यह नहीं जी चीर देना,
हे सजीले हरे सावन, हे कि मेरे पुण्य पावन, तुम बरस लो वे न बरसें, पाँचवें को वे न तरसें,
मैं मजे में हूँ सही है, घर नहीं हूँ बस यही है, किंतु यह बस बड़ा बस है, इसी बस से सब विरस है,
किंतु उनसे यह न कहना, उन्हें देते धीर रहना, उन्हें कहना लिख रहा हूँ, उन्हें कहना पढ़ रहा हूँ,
काम करता हूँ कि कहना, नाम करता हूँ कि कहना, चाहते हैं लोग, कहना मत करो कुछ शोक, कहना,
और कहना मस्त हूँ मैं, कातने में व्यस्त हूँ मैं, वजन सत्तर सेर मेरा, और भोजन ढेर मेरा,
कूदता हूँ, खेलता हूँ, दुख डटकर टेलता हूँ, और कहना मस्त हूँ मैं, यों न कहना अस्त हूँ मैं,
हाय रे, ऐसा न कहना, है कि जो वैसा न कहना, कह न देना जागता हूँ, आदमी से भागता हूँ,
घर की याद 199
कह न देना मौन हूँ मैं, खुद न समझूँ कौन हूँ मैं, देखना कुछ बक न देना, उन्हें कोई शक न देना,
हे सजीले हरे सावन, हे कि मेरे पुण्य पावन, तुम बरस लो वे न बरसें, पाँचवें को वे न तरसें।
अभ्यास
एचना से संवाद
मेरे उत्तर मेरे तर्क
निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं?
भवानीप्रसाद मिश्र ने यह कविता कहाँ और क्यों लिखी? (क) विदेश से मित्र के लिए (ख) युद्धभूमि से जनता के लिए (ग) जेल से परिवार के लिए (घ) यात्रा से किसी संबंधी के लिए
लगातार बरसता पानी कवि के मन की किस भावना का परिचायक है? (क) उत्साह और आवेग (ख) भय और क्रोध (ग) साहस और उमंग (घ) चिंता और बेचैनी
कविता में माँ की कैसी छवि उभरती है? (क) कमजोर और निष्क्रिय (ख) स्नेहमयी और दूढ़ (ग) शिक्षित और अनुशासनप्रिय (घ) सरल और उदासीन
“वज्र-भुज नवनीत-सा उर” पंक्ति के माध्यम से पिता के व्यक्तित्व की कैसी छवि प्रस्तुत की गई है? (क) कर्मठ और सूजनशील (ख) साहसी और पराक्रमी
200 गंगा
(ग) दूढ़ और संवेदनशील (घ) प्रसन्नचित्त और सक्रिय
“एक पत्ता टूट जाए, बस कि धारा फूट जाए” पंक्ति किस ओर संकेत करती है? (क) पिता की कठोरता (ख) पिता की भावुकता (ग) वर्षा की तीव्रता (घ) पिता की निर्बलता
“बहिन आई बाप के घर, हाय रे परिताप के घर” पंक्ति में ‘परिताप’ शब्द से क्या संकेत मिलता है? (क) घर का समूद्ध होना (ख) घर की सजावट (ग) घर में दुख का वातावरण (घ) घर की शांति
“और कहना मस्त हूँ मैं” पंक्ति में कवि का ऐसा कहना किस बात की ओर संकेत करता है? (क) कवि अपने जीवन में बहुत खुश है। (ख) अपने दुख को परिजनों से छिपाना चाहता है। (ग) घर के लोगों के प्रति उदासीन है। (घ) कवि प्राकृतिक सौंदर्य से अभिभूत है।
इस कविता में किस बात को प्रमुखता से वर्णित किया गया है? (क) घर की शांति और सुरक्षा (ख) घर के सदस्यों के बीच का संबंध (ग) घर के निर्माण की प्रक्रिया (घ) घर की याद और अकेलेपन की पीड़ा
मेरी समझ मेरे विचार
नीचे दिए गए प्रश्नों पर कक्षा में चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए—
कविता में वर्णित पिता के व्यक्तित्व की उन विशेषताओं का वर्णन कीजिए जिनसे उनका बहुआयामी रूप सामने आता है।
“दुख डटकर टेलता हूँ” यह कथन मनुष्य के संघर्षशील स्वभाव को उजागर करता है। कविता के आधार पर बताइए कि कठिन परिस्थितियों में कवि किस प्रकार धैर्य, साहस और त्याग का परिचय देता है?
कविता में बार-बार वर्षा का वर्णन कवि के भावों को किस प्रकार व्यक्त करता है?
घर की याद 201
- कविता से उन पंक्तियों को चुनकर लिखिए और भाव स्पष्ट कीजिए जिनसे माँ की भावनात्मक मजबूती का परिचय मिलता है।
- कविता का कौन-सा अंश आपको सबसे अधिक भावनात्मक और प्रभावी लगता है और क्यों?

विधा से संवाद
कविता का सौंदर्य
“गिर रहा पानी झरा-झर, हिल रहे पत्ते हरा-हर, बह रही है हवा सर-सर, काँपते हैं प्राण थर-थर”
उपर्युक्त पंक्तियों में रेखांकित शब्दों को ध्यानपूर्वक पढ़िए। यहाँ शब्दों का चयन और संयोजन इस प्रकार किया गया है कि कविता में ध्वन्यात्मकता और नाद सौंदर्य की सृष्टि हुई है। शब्दों के ऐसे प्रयोग से कविता आकर्षक बनती है। कविता में ऐसी अनेक विशेषताएँ हैं जो इसे जीवंत और प्रभावपूर्ण बनाती हैं। ऐसी कुछ विशेषताओं की सूची नीचे दी गई है। कविता से ऐसी विशेषताओं वाली पंक्तियों को ढूँढ़कर लिखिए।
विशेषताएँ
- स्मृति और दृश्य बिंब
- लोकभाषा की सहजता
- पंक्तियों का दोहराव
- आलंकारिक प्रयोग
- प्राकृतिक दृश्यों और भावों का संयोजन
- संबोधनात्मकता
कविता की संरचना
‘घर की याद’ कवि के भीतर उठते भावों की यात्रा है। कविता में प्रकृति के माध्यम से व्यक्त इस यात्रा के प्रमुख चरणों का वर्णन करें। (संकेत – पानी का गिरना, सबेरा होना)

विषयों से संवाद
- कविता में चित्रित ‘घर’ एक भौतिक स्थान से बढ़कर भावनाओं और संबंधों के केंद्र के रूप में चित्रित हुआ है। वर्तमान में एकल परिवारों के बढ़ते चलन के संदर्भ में संयुक्त परिवार और
202 गंगा
एकल परिवार की तुलना कीजिए और कारण सहित लिखिए कि दोनों की कौन-कौन-सी बातें आपको पसंद हैं और कौन-कौन-सी नापसंद?
कविता में बार-बार पानी गिरने का वर्णन है। लगातार बारिश होती रहे तो ग्रामीण और शहरी क्षेत्र में किस प्रकार की समस्याएँ उत्पन्न हो सकती हैं?
कविता में सावन के बादल का प्रयोग एक संचार माध्यम के रूप में किया गया है जिसके द्वारा कवि अपने परिवार तक संदेश भेज रहा है। कक्षा में संचार के नए-पुराने माध्यमों में अंतर बताते हुए चर्चा कीजिए और लिखिए।
भवानीप्रसाद मिश्र ने यह कविता स्वतंत्रता संग्राम के दौरान कारावास में लिखी थी। अपने शिक्षक और पुस्तकालय की सहायता से ‘भारत का स्वतंत्रता संग्राम’ विषय पर लेख लिखिए।
1. सूजन
कल्पना कीजिए कि कवि की माँ को पत्र लिखना आता है। कविता में वर्णित उनकी छवि और अनुमान के आधार पर लिखिए कि वे कवि के लिए पत्र में क्या-क्या लिखतीं?
कविता में माँ और पिताजी के बीच कवि के विषय में की जाने वाली बातचीत का वर्णन है। उनकी इस बातचीत को संवाद-लेखन के रूप में प्रस्तुत कीजिए।
इस कविता में कवि ने सावन के बादल को संदेशवाहक बनाया है। अगर आपको किसी प्राकृतिक उपादान के माध्यम से अपने घर, मित्र या किसी संबंधी व्यक्ति को कोई संदेश भेजना हो तो आप किसे चुनेंगे और क्यों?
2. भाषा से संवाद
व्याकरण की बात
- “आज सबका मन चुआ होगा।”
उपर्युक्त पंक्ति में रेखांकित शब्द कवि की क्षेत्रीय/स्थानीय भाषा का शब्द है। कविता में स्थानीय भाषा के शब्दों का सहज प्रयोग हुआ है। कविता से कुछ पंक्तियाँ नीचे दी गई है। उनमें रेखांकित शब्दों का अर्थ स्पष्ट करते हुए उनसे नए वाक्य बनाइए।
- एक छिन सौ बरस है रे
- तुझे बतलाता कि बेला/ने फलानी फूल झेला
- और भौजी और सरला, सहज पानी सहज तरला
- मन कि बड़ का झाड़ जैसे
घर की याद 203
- नीचे दी गई कविता की पंक्तियों में आए शब्दों की व्याकरणिक पहचान लिखिए। आपकी सहायता के लिए एक उदाहरण नीचे दिया गया है।
(क) “बहुत पानी गिर रहा है”
- ‘पानी’ शब्द है — संज्ञा
- ‘बहुत’ शब्द है — विशेषण
- ‘गिर रहा है’ है — क्रिया
(ख) “पिताजी जिनको बुढ़ापा, एक क्षण भी नहीं व्यापा”
- ‘बुढ़ापा’ शब्द है —
- ‘व्यापा’ शब्द है —
- ‘जिनको’ शब्द है —
(ग) “खुले सिर नंगे बदन वह, घूमता फिरता मगन वह”
- ‘खुले’ शब्द है —
- ‘वह’ शब्द है —
- ‘बदन’ शब्द है —
- ‘फिरता’ शब्द है —
(घ) “एक पत्ता टूट जाए, बस कि धारा फूट जाए”
- ‘एक’ शब्द है —
- ‘फूट जाए’ है —
- ‘पत्ता’ शब्द है —
(ड) “हे सजीले हरे सावन, हे कि मेरे पुण्य पावन”
- ‘सजीले’ शब्द है —
- ‘मेरे’ शब्द है —
- ‘सावन’ शब्द है —


कवि ने कविता में अपने परिवार का उल्लेख किया है। आप भी अपना एक परिवार-वृक्ष तैयार कीजिए और प्रत्येक सदस्य के व्यक्तित्व के बारे में कुछ पंक्तियाँ लिखिए।
कविता में प्रयुक्त ध्वनि आधारित शब्द (जैसे— झरा-झर, थर-थर, सर-सर) को पढ़कर एक छोटी-सी ऑडियो रिकॉर्डिंग या मौखिक पाठ तैयार कीजिए। बताइए कि ये शब्द कविता में कैसे वातावरण का निर्माण करते हैं?
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भाषा संगम
“घर कि घर में सब जुड़े हैं”
नीचे ‘घर’ शब्द के लिए संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त शब्दों की सूची दी गई है।
मकान, गृह, निवास (हिंदी); गृहम् (संस्कृत); घर (पंजाबी); घर (उर्दू); गैंरु (कश्मीरी); घरु (सिंधी); घर (मराठी); घर (गुजराती); घर (कोंकणी); घर, आवास (नेपाली); घर, बाड़ी (बांग्ला); घर (असमिया); युम (मणिपुरी); घर, गृह, आलय, आबास (ओडिआ); इल्लु (तेलुगु); वीडु, इल्लम् (तमिल); वीडु, इल्लम (मलयालम); गृह, मने (कन्नड़)।
- इनके अतिरिक्त यदि आप ‘घर’ शब्द को किसी और भाषा में भी जानते हैं तो उस भाषा में भी लिखिए।
- उपर्युक्त वाक्य को अपनी मातृभाषा में भी लिखिए।
https://shabd.education.gov.in/lexicon.jsp
खोजबीन
- शिक्षक की सहायता से ऐसी किसी अन्य कविता अथवा कहानी के बारे में जानकारी एकत्रित कीजिए जिसमें घर, परिवार की याद जैसी भावनाएँ चित्रित हों। साथ ही पुस्तकालय अथवा इंटरनेट की सहायता से उस रचना को कक्षा में पढ़कर एक संक्षिप्त प्रस्तुति दीजिए।
- ‘घर की याद’ कविता में कवि सावन के बादलों को दूत बनाकर अपने परिवार के पास संदेश ले जाने का आग्रह करता है। प्रकृति के उपादानों की कल्पना संदेशवाहक के रूप में करने के अनेक उदाहरण साहित्य में मिलते हैं। शिक्षक, पुस्तकालय और इंटरनेट की सहायता से ऐसी कुछ रचनाओं के बारे में पता लगाइए और बताइए कि इनमें प्रकृति के किन उपादानों को संदेशवाहक बनाया गया है?
शब्द-संपदा
| घनेरा/घना | — | गाढ़ा, गुंजान, जिसके अवयव पास-पास सटे हों |
|---|---|---|
| तिर/तिरना/तरना | — | तैरना, उतराना, पार होना |
| परिताप | — | अत्यधिक दुख, शोक, भय, बहुत गर्मी, अत्यधिक ताप |
| चतुर्दिक् | — | चारों ओर, चौखूँट |
घर की याद 205
वज्र — बहुत कठोर, जिस पर किसी का प्रभाव न पड़े नवनीत — ताजा मक्खन उर — हृदय, श्रेष्ठ, उत्तम, मन झंझा — तेज हवा, आँधी-पानी, खोई हुई वस्तु, झंकार लरजता/लरजना — काँपना, हिलना-डुलना, दहल जाना, भयभीत मूठ — मुटूठी-भर चीज, कब्जा, मुटूठी, दस्ता अभागा — भाग्यहीन धीर — जिसका चित्त विकारजनक कारणों के रहते हुए भी विचलित न हो, दूढ़, गंभीर झारी — पानी परसने, हाथ मुँह धुलाने आदि के लिए काम में लाया जाने वाला टोटीदार बर्तन बेला — एक सुगंधित फूल, मोगरा, कटोरा फलानी/फलाना/फलाँ — कोई आदिष्ट (व्यक्ति या वस्तु), अमुक निहायत — बहुत ज्यादा, अत्यधिक लुनाई — सुंदरता, सलोनापन, फसल काटने की क्रिया क्षितिज — वह स्थान जहाँ धरती और आकाश मिले दिखाई देते हैं, वृक्ष तुषा — तीव्र इच्छा, अभिलाषा, लोभ, प्यास अश्रु — आँसू हास — हँसने की क्रिया, प्रसन्नता, खुशी, चौंध पैदा करने वाली सफेदी क्लेश — दुख, पीड़ा, क्रोध, राग, द्वेष बड़ — बरगद, वट उमग — उल्लास, मौज, जोश, आकांक्षा ख्रम — झुका हुआ, टेढ़ा, वक्र, घुमाव, टेढ़ापन विरस — नीरस, अप्रिय, जी उबाने वाला, कष्टकर कातने/कातना — चरखे या तकली पर रुई या ऊन से धागा निकालना, सन से सुतली बनाना अस्त — डूबा हुआ, फेंका हुआ, समाप्त, (सूर्य-चंद्र का) डूबना, अदृश्य होना, पतन, अंत
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तब याद तुम्हारी आती है
जब बहुत सुबह चिड़ियाँ उठकर, कुछ गीत खुशी के गाती हैं। कलियाँ दरवाजे खोल-खोल, जब दुनिया पर मुस्काती हैं।। जब ठंडी-ठंडी हवा कहीं से, मस्ती ढोकर लाती है। हे जग के सिरजनहार प्रभो! तब याद तुम्हारी आती है।।
चुपचाप चमकते तारों की, महफिल जब रात सजाती है। जब चाँद शान से उठता है, दिल की दुनिया जग जाती है।। कुछ पता नहीं, लेकिन जरूर, वह संदेश कुछ पाती है। हे जग के सिरजनहार प्रभो! तब याद तुम्हारी आती है!!
– रामनरेश त्रिपाठी