आमुख - CBSE Class 9 Hindi Notes

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Chapter Study Guide & Summary

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Mastering the chapter "आमुख" is a crucial step for Class 9 students studying Hindi. This comprehensive study guide breaks down complex topics into clear, digestible explanations, helping learners grasp the fundamental principles, real-world applications, and theoretical concepts prescribed in the NCERT syllabus.

In the Class 9 board curriculum, "आमुख" tests analytical reasoning, conceptual depth, and structured problem-solving skills. Students should focus on understanding the underlying mechanisms, standard definitions, solved examples, and step-by-step methodologies to excel in both school unit tests and final board evaluations.

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Key Concepts & Syllabus Topics

Important Definitions & Terminology

आमुख Overview
The central theme and foundational concept covered in Class 9 Hindi Chapter 13, emphasizing conceptual clarity, NCERT curriculum alignment, and exam readiness.
NCERT Curriculum Alignment
Structured study material adhering strictly to CBSE board guidelines, learning objectives, and standardized assessment criteria for Class 9.
Active Recall & Revision
An effective study technique involving interactive self-testing, key points review, and AI-guided doubt clearing to maximize retention for school and board examinations.

Quick Revision & Key Points

Full NCERT Chapter: आमुख

संज्या

कक्षा 9 के लिए हिंदी की पाठ्यपुस्तक

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विडंबा: 5 नूरनाथपुर

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राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद NATIONAL COUNCIL OF EDUCATIONAL RESEARCH AND TRAINING

0901 – गंगा कक्षा 9 के लिए हिंदी की पाठ्यपुस्तक ISBN 978-93-5729-873-5

प्रथम संस्करण

मार्च 2026 चैत्र 1948

PD 1000T BS

© राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्, 2026

₹ 115.00

एन.सी.ई.आर.टी. वॉटरमार्क 80 जी.एस.एम. पेपर पर मुद्रित। सचिव, राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्, श्री अरविंद मार्ग, नई दिल्ली 110 016 द्वारा प्रकाशन प्रभाग में प्रकाशित तथा सालासर इमेजिंग सिस्टम्स प्राइवेट लिमिटेड, बी-19, सेक्टर-88, नोएडा 201305, उत्तर प्रदेश द्वारा मुद्रित।

सर्वाधिकार सुरक्षित

☐ प्रकाशक की पूर्व अनुमति के बिना इस प्रकाशन के किसी भी भाग को खापना तथा इलैक्ट्रॉनिकी, मशीनी, फोटो प्रतिलिपि, रिकॉर्डिंग अथवा किसी अन्य विधि से पुन: प्रयोग पद्धति द्वारा उसका संग्रहण अथवा प्रचारण वर्जित है। ☐ इस पुस्तक की सिक्की इस शर्त के साथ की गई है कि प्रकाशक की पूर्व अनुमति के बिना यह पुस्तक अपने मूल आवरण अथवा जिल्द के अलावा किसी अन्य प्रकार से व्यापार द्वारा उधारी पर, पुनर्विक्रय या किराए पर न दी जाएगी, न बेची जाएगी। ☐ इस प्रकाशन का सही मूल्य इस पृष्ठ पर मुद्रित है। रबड़ की मुहर अथवा चित्रकाई गई पच्ची (स्टिकर) या किसी अन्य विधि द्वारा अंकित कोई भी संशोधित मूल्य गलत है तथा मान्य नहीं होगा।

रा.श्री.अ.प्र.प. के प्रकाशन प्रभाग के कार्यालय

एन.सी.ई.आर.टी. कैंपस श्री अरविंद मार्ग नई दिल्ली 110 016 108, 100 फीट रोड हेली एक्सटेशन, होस्डेकेरे बनाशकरी III इंस्टेज चैगलुरु 560 085 नवजीवन ट्रस्ट भवन डाकघर नवजीवन अहमदाबाद 380 014 सी.डब्ल्यू.सी. कैंपस निकट : धनकल बस स्टॉप पनिहटी कोलकाता 700 114 सी.डब्ल्यू.सी. कोल्लेका मालीगाँव गुवाहाटी 781 021 फोन : 011-26562708 फोन : 080-26725740 फोन : 079-27541446 फोन : 033-25530454 फोन : 0361-2676869

प्रकाशन सहयोग

अध्यक्ष, प्रकाशन प्रभाग : एम.वी. श्रीनिवासन मुख्य संपादक : बिज्ञान सुतार मुख्य व्यापार प्रबंधक : अमिताभ कुमार मुख्य उत्पादन अधिकारी (प्रभारी) : दीपक जैसवाल सहायक उत्पादन अधिकारी : प्रकाश वीर सिंह

आवरण, चित्रांकन एवं सज्जा जोएल गिल

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आमुख

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 एक ऐसी शिक्षा प्रणाली की संकल्पना करती है जो भारत के सभ्यतागत ज्ञान, मूल्यों और नैतिक परंपराओं को अपने में समाहित करती हो। यह शिक्षा प्रणाली हमारे विद्यार्थियों को निरंतर परिवर्तनशील वैश्विक जटिलताओं और संभावनाओं के साथ हमारी समृद्ध बौद्धिक विरासत से सार्थक रूप से जुड़ने में सक्षम बनाती है। विद्यालयी शिक्षा के लिए निर्मित ‘राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2023’ में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के सुझावों को व्यावहारिक रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसमें विद्यालयी शिक्षा के सभी स्तरों के लिए एक ऐसे सुसंगत पाठ्यक्रम का मार्ग प्रशस्त किया गया है जो विद्यार्थियों में आलोचनात्मक सोच, रचनात्मकता व संवेदनशीलता और मौलिकता के साथ-साथ उनमें मूल्यों को विकसित करने की दिशा देता है। यह परस्पर जुड़े हुए वैश्विक समाज में उन्हें उत्तरदायी नागरिक बनाने के लिए आवश्यक है।

बुनियादी, प्रारंभिक और मध्य स्तर पर आगे बढ़ते हुए विद्यार्थियों की बौद्धिक क्षमता समग्र रूप से निखरती गई है। अब, वे सोचने, तर्क करने, प्रश्न पूछने और स्वयं को अभिव्यक्त करने की क्षमता के साथ माध्यमिक स्तर में प्रवेश करेंगे। कक्षा 9 से 12 तक विद्यार्थी किशोरावस्था में होते हैं, यह विद्यार्थियों के बौद्धिक और व्यक्तिगत विकास के लिए एक महत्वपूर्ण समय होता है। यह उन्हें अमूर्त विचारों, जटिल सामाजिक वास्तविकताओं, नैतिक दुविधाओं और ज्ञान के विस्तृत संसार से जुड़ने के लिए तैयार करता है; साथ ही स्वयं तथा अपने आस-पास के संसार के बारे में उनकी समझ को सारगर्भित भी बनाता है।

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2023 माध्यमिक स्तर में कक्षा 9-10 के लिए ऐसे कौशल सीखने पर बल देती है जो विद्यार्थियों के लिए जीवन में आगे बढ़ने में सहायक हों ताकि विद्यार्थी इन कौशलों का प्रयोग तर्क, संवाद और प्रभावपूर्ण भाषिक व्यवहार के लिए कर सकें। इसका उद्देश्य उनकी विश्लेषणात्मक और वर्णनात्मक क्षमताओं को बढ़ाना भी है ताकि वे भविष्य में आने वाली चुनौतियों और अवसरों के लिए तैयार हो सकें। यह रूपरेखा बहुआयामी पाठ्यक्रम का सुझाव देती है जिसमें तीन भाषाओं सहित दस विषय शामिल किए गए हैं। भाषाओं के संबंध में यह भी बताया गया है कि तीन में से कम से कम दो भारतीय मूल की भाषाएँ हों। इसके अतिरिक्त विज्ञान, गणित, सामाजिक विज्ञान, कला शिक्षा, शारीरिक शिक्षा और आरोग्य, समाज में व्यक्ति/पर्यावरण शिक्षा और व्यावसायिक शिक्षा को विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए प्रस्तावित किया गया है।

राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2023 में भाषाओं की शिक्षा को महत्व दिया गया है। माध्यमिक स्तर पर भाषा का सिर्फ संप्रेषण/अभिव्यक्ति के माध्यम के तौर पर नहीं बल्कि सूजनात्मक क्षमता, सोचने, समझने, संवाद करने और सौंदर्यबोध के लिए विशेष रूप से महत्व है। राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की

रूपरेखा 2023 इस बात पर भी बल देती है कि भाषा की पढ़ाई विद्यार्थियों में तार्किक, विश्लेषणात्मक और रचनात्मक क्षमताओं के साथ-साथ अंतरसांस्कृतिक समझ भी बनाए और वे अकादमिक, सामाजिक और व्यावसायिक क्षेत्रों में आत्मविश्वासपूर्वक भाग लेने में सक्षम बन सकें। इन्हीं विशेषताओं को ध्यान में रखते हुए कक्षा 9 के लिए हिंदी भाषा की पाठ्यपुस्तक गंगा को अभिकल्पित किया गया है।

गंगा पाठ्यपुस्तक में हिंदी के ऐसे विविध रूपों, शैलियों से संबंधित रचनाओं को सम्मिलित किया गया है जिनमें सामाजिक-सांस्कृतिक और भौगोलिक विविधता परिलक्षित होती है। पाठ्यपुस्तक में विषयों का चयन इस प्रकार किया गया है कि विद्यार्थी समाज, पर्यावरण, नैतिक समझ/मूल्यपरक समझ/ विवेकसम्मत दृष्टि, विज्ञान और प्रौद्योगिकी, सामायिक विषयों और मानवीय संबंधों से युक्त अन्य पहलुओं से जुड़ सकें। इससे विद्यार्थी अपने उस परिवेश के बारे में गंभीरता से सोचने के लिए प्रोत्साहित होंगे जिसमें वे रहते हैं। यह पाठ्यपुस्तक भारत की कलात्मक, साहित्यिक और बौद्धिक परंपराओं पर आधारित है, जिसमें भारतीय ज्ञान प्रणालियों और हमारी सांस्कृतिक विरासत के तत्वों को समावेशित किया गया है और उन्हें हमारे समकालीन अनुभवों से सहजता से जोड़ा गया है।

पाठ्यपुस्तकें सीखने का एकमात्र संसाधन नहीं हैं, इस बात को ध्यान में रखते हुए गंगा पाठ्यपुस्तक विद्यार्थियों को अन्य पुस्तकों, मीडिया, डिजिटल अभिलेखागार, पुस्तकालय और सामुदायिक ज्ञान के व्यापक धरातल से जुड़ने के लिए प्रेरित करती है। इस स्तर पर पढ़ने, संवाद करने और स्वयं से खोज करने की एक अच्छी संस्कृति को बढ़ावा देने में शिक्षक, माता-पिता और विद्यालय के पुस्तकालय महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। पाठ्यपुस्तक हर पाठ में क्यू.आर. कोड का प्रयोग करके तकनीकी रूप से विद्यार्थियों को अतिरिक्त पठन सामग्री उपलब्ध कराती है, जो उन्हें सूजनात्मक अनुभव से संपूक्त करने में सक्षम है।

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद, पाठ्यपुस्तक के निर्माण में सम्मिलित विषय विशेषज्ञ, शिक्षाशास्त्रियों, शिक्षकों, हितधारकों का आभार व्यक्त करती है। हमें विश्वास है कि गंगा पाठकों/विद्यार्थियों को गंभीरता से सोचने, आत्मविश्वास से बात करने और हमारे देश और दुनिया के बौद्धिक और सामाजिक जीवन में सोच-समझकर प्रतिभागिता हेतु प्रेरित करेगी। अगले संस्करण में सुधार के लिए हम इसके सभी हितधारकों से सुझाव और टिप्पणी का भी स्वागत करते हैं जिनसे भावी संशोधनों में सहायता ली जा सकती है।

दिनेश प्रसाद सकलानी निदेशक राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्

फरवरी 2026 नई दिल्ली

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यह पुस्तक

संपूर्ण शिक्षा प्रक्रिया में भाषा का केंद्रीय स्थान है। भाषा की शिक्षा विभिन्न स्तरों पर विद्यार्थियों के दृष्टिकोण और मूल्यों का विकास करती है। नवीं कक्षा के लिए हिंदी भाषा की पाठ्यपुस्तक गंगा आपके सामने है। यह पुस्तक नवीं कक्षा के उन विद्यार्थियों के लिए है जो पहली कक्षा से हिंदी पढ़ते आ रहे हैं और आठ वर्षों तक हिंदी का विधिवत अध्ययन कर चुके हैं। नवीं के ये विद्यार्थी किशोर विद्यार्थी हैं जिनका भाषा और विचार-बोध का एक आधार तैयार हो चुका है। अब उनके भाषिक दायरे और वैचारिक समृद्धि को विकसित करने की आवश्यकता है ताकि वे आगे चलकर अपनी रुचि और आवश्यकता के अनुरूप हिंदी भाषा और साहित्य की पढ़ाई कर सकें। वे भाषिक रूप से इतने दक्ष हो जाएँ कि हिंदी उनके विमर्श और ज्ञान-विज्ञान की भाषा भी बन सके।

पाठ्यपुस्तक पाठ्यचर्या और पाठ्यक्रम का मूर्त रूप होती है जिसमें पाठ्यक्रम के उद्देश्य बहुत बारीकी से पिरोए जाते हैं। राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 तथा विद्यालयी शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2023 में जिन बिंदुओं की ओर विशेष रूप से ध्यान आकर्षित किया गया है, उन बिंदुओं को इस पाठ्यपुस्तक में रचनात्मक रूप से समाहित करने की कोशिश की गई है। शिक्षकों और विद्यार्थियों द्वारा पाठ्यपुस्तक के दक्षतापूर्ण उपयोग पर ही उसकी संपूर्णता निर्भर करती है। वर्तमान समय में शिक्षा का शास्त्र और व्यवहार विद्यार्थियों की सहभागिता को ही दक्षता का पर्याय मानता है, इसलिए विद्यार्थियों को केंद्र में रखकर ही इस पुस्तक का ताना-बाना बुना गया है। अत: शिक्षकों द्वारा पाठ्यपुस्तक का दक्षतापूर्ण उपयोग भी तभी संभव है जब उनकी तमाम शिक्षण तकनीकों के केंद्र में विद्यार्थी हों। इस दृष्टि से शिक्षक की भूमिका किसी उपदेशक या एकतरफा ज्ञान प्रदान करने वाले के रूप में नहीं हो सकती। पाठ्यपुस्तक की सामग्री का रचनात्मक उपयोग करने के लिए उसे एक प्रेक्षक की भूमिका निभानी पड़ेगी। विद्यार्थियों के किशोर मानस को ध्यान में रखकर शिक्षक को अपने तमाम शिक्षण कार्य के दौरान भाषा और साहित्य के अध्ययन-अध्यापन की चली आती परंपरागत पद्धतियों से आगे जाना पड़ेगा ताकि विद्यार्थी आधुनिक जीवन के परिवेश, समकालीन यथार्थ और दिन-प्रतिदिन के बदलते जीवन की चुनौतियों के बीच मानव मूल्यों के प्रति अडिग आस्था बनाए रखने की प्रेरणा प्राप्त कर सकें।

पाठगत बाधाओं को दूर करते हुए विद्यार्थियों की सहभागिता को सही दिशा प्रदान करने का काम शिक्षक ही कर सकता है। शिक्षक पाठ पढ़ाने के साथ पुस्तक में निर्देशित शैक्षिक गतिविधियों को कराते हुए विद्यार्थियों की भाषिक कुशलताओं को बढ़ाता है और जीवन-जगत के संबंध में उनके अनुभव क्षेत्र का विस्तार करता है। विद्यार्थियों को अपनी सांस्कृतिक धरोहर से जोड़ने का काम भी भाषा और साहित्य की शिक्षा ही करती है, इसलिए भारत के बहुभाषी परिवेश को शिक्षण पद्धति का हिस्सा बनाना होगा

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और उसे एक संसाधन के रूप में शामिल करना होगा। साझी संस्कृति, सामाजिक दृष्टि से उपेक्षित समाज, बालिकाओं के प्रति समान दृष्टिकोण, शारीरिक रूप से चुनौतीपूर्ण वर्ग और पर्यावरण एवं शांति जैसे संवेदनशील मुद्दे शिक्षकों से सकारात्मक व्यवहार की माँग करते हैं।

हम सभी जानते हैं कि शिक्षण की कोई एक विधि नहीं होती। हर शिक्षक अपने ढंग से पढ़ता-पढ़ाता है परंतु मौलिकता और सूजनात्मकता द्वारा शिक्षण को रुचिकर बनाया जा सकता है। सहायक सामग्री (संदर्भ से जुड़ी नई पुस्तकें, पत्र-पत्रिकाएँ, ऑडियो-वीडियो, चित्र आदि) का उपयोग करते हुए शिक्षण को एकरसता और यांत्रिकता से बचाया जा सकता है। शिक्षक अपने कक्षा-अध्यापन को इस तरह व्यवस्थित करें कि विद्यार्थियों को भाषा शिक्षण के सभी कौशलों के विकास का समुचित अवसर मिले, साथ ही विद्यार्थियों के भीतर जो कल्पनाशीलता, विस्मय, कौतूहल, जिज्ञासा एवं सूजनात्मकता है, उसे विकसित किया जा सके।

हम जानते हैं कि साहित्य अंतरविषयी होता है और उसे समझने-समझाने के कोई पूर्व-निर्धारित उपाय भी नहीं होते। अंततः जीवन-जगत की संपूर्णता में ही साहित्य के पढ़ने-पढ़ाने को विस्तार देना चाहिए। विशेष रूप से कविता का कथ्य साझेदारी के बिना पूरी तरह समझ में नहीं आ सकता। कविता का अर्थ खंडों में नहीं, समग्र प्रभाव के रूप में ही ग्रहण किया जाता है। शिक्षण में यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि कविताओं का कोई एक निश्चित अर्थ नहीं होता है, इसीलिए विद्यार्थियों को कल्पना करने की पूरी छूट देनी चाहिए। कविता अपनी वाक्य संरचना, शब्दों की स्थिति एवं लय के कारण गद्य से भिन्न होती है। गद्य की भाषा हमारे दैनिक व्यवहार की भाषा के निकट होती है और उसमें विचार प्रधान होता है जबकि कविता की भाषा सामान्यतः संकेतात्मक होती है। हम कह सकते हैं कि कविता जीवन-अनुभवों की कलात्मक अभिव्यक्ति है। वह मनुष्य के भावजगत का विस्तार करती है, उसकी कल्पनाशक्ति को जगाती है और सौंदर्यबोध का विकास करती है।

सभी काल की कविताओं को एक ही पद्धति से नहीं पढ़ाया जा सकता। मध्यकालीन कविताओं में अलंकार, छंद विधान, तुक आदि के प्रति विशेष आग्रह रहा है जबकि आज की कविता में लय और प्रवाह का महत्व है, परंपरागत छंद और तुक आदि का नहीं। शिक्षकों को यह भी ध्यान में रखना होगा कि कवि की काव्य-संवेदना के निर्माण में उसके युग और परिवेश का हाथ होता है, इसलिए कविता पढ़ाते समय कवि की युग-चेतना का बोध और अपने समय के प्रति सजगता दोनों आवश्यक हैं। तभी आज के समय में उस कविता की प्रासंगिकता को ठीक से समझा जा सकता है। संभव हो तो कविताओं की संगीतात्मक प्रस्तुति के ऑडियो-वीडियो उपलब्ध हों तो उसे भी सुनवाएँ। समय-समय पर शैक्षणिक भ्रमण और यात्राओं का आयोजन भी किया जाना चाहिए।

गद्य विधाओं की भी अपनी विशेष संरचना होती है और प्रत्येक विधा को पढ़ने-पढ़ाने की विशिष्ट विधियाँ होती हैं। किसी विधा विशेष की रचना पढ़ाते समय उसकी मूल विशेषता की ओर अवश्य ध्यान देना चाहिए। उदाहरण के लिए निबंध शिक्षण में अर्थ-ग्रहण की योग्यता विकसित करना और भाषा के

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अभिव्यक्ति कौशल से विद्यार्थियों को परिचित कराना अपेक्षित है। निबंध में लेखक के दृष्टिकोण का और उसकी भाषा-शैली का विशेष महत्व होता है। उसी प्रकार विद्यार्थियों की कल्पना, उत्सुकता एवं जिज्ञासा के विस्तार के लिए कहानी पढ़ाई जाती है। हम सभी जानते हैं कि एक कहानी में कई कहानियाँ छिपी रहती हैं। शिक्षकों को ऐसे मोड़ों या बिंदुओं को खोजना होगा जहाँ से कहानी किसी भी दिशा में जा सकती है। ऐसी स्थिति से आगे की कल्पना करने (लिखित या मौखिक) के लिए विद्यार्थियों को कहा जा सकता है। साथ ही कहानी के अंतर्गत कई दृश्य-चित्र एवं शिक्षण बिंदु होते हैं। शिक्षकों को इन दृश्य-चित्रों एवं शिक्षण बिंदुओं का अभ्यास-कार्य द्वारा या किसी अन्य विधि से रचनात्मक उपयोग करना चाहिए, तभी कहानी वस्तु एवं शिल्प दोनों रूपों में विद्यार्थियों के ज्ञान का हिस्सा बन पाएगी। कहानी शिक्षण के दौरान शिक्षक प्रायोगिक रूप से कहानी को नाटक में परिवर्तित करने की प्रक्रिया का प्रारंभ भी कर सकते हैं। निबंध, यात्रा-वृत्तांत और साक्षात्कार द्वारा युग विशेष की परिस्थितियों के आकलन के साथ-साथ वैयक्तिक गुणों, क्षमताओं और अनुकूल या प्रतिकूल स्थितियों की चर्चा इस तरह की जाए कि विद्यार्थियों को उनके व्यक्तित्व के विकास में सहायता मिल सके। नाटक या एकांकी को पढ़ते-पढ़ाते समय पढ़न के साथ-साथ उसके मंचन की ओर भी ध्यान देना चाहिए। इससे विद्यार्थियों को एकांकी में निहित सामाजिक या अन्य परिस्थितियों तथा पात्रों की मन:स्थिति को स्वयं अनुभव करने का अवसर मिलता है। यह प्रक्रिया उन्हें सजग और संवेदनशील मनुष्य बनने की ओर अग्रसर करती है। इस प्रकार विभिन्न साहित्यिक विधाओं के लक्षणों और विशेषताओं को जानकर उनके अध्ययन-अध्यापन को सुगम बनाया जा सकता है।

शिक्षा की दुनिया में प्राय: यह कहा जाता है कि भाषा की कक्षाएँ रोचक और चुनौती भरी नहीं होतीं। आज इस मानसिकता को बदलना आवश्यक है। यह पुस्तक इस ओर एक छोटा-सा प्रयास है। इस पुस्तक को बनाते समय यह कोशिश की गई है कि भाषा की कक्षा विशेषकर ‘हिंदी की घंटी’ आनंददायी हो और विद्यार्थियों के मानसिक बोझ को हलका करने वाली भी। यहाँ यह भी सुनिश्चित करने का प्रयास किया गया है कि शिक्षा रटने पर आधारित पद्धतियों का त्याग करे।

इस संकलन की रचनाएँ जहाँ एक ओर विद्यार्थियों में साहित्यिक संवेदना पैदा करने वाली हैं तो दूसरी ओर उन्हें जीवन के विविध संदर्भों से भी जोड़ती हैं। इस बात का विशेष रूप से ध्यान रखा गया है कि विद्यार्थी साहित्य की विविध विधाओं से परिचित हो सकें। वे एक ओर साहित्य की समृद्ध परंपरा की पहचान के लिए मध्यकालीन कविता का आस्वाद लें और आज के जीवन को जानने के लिए आधुनिक कविता का भी बोध प्राप्त करें। भक्तिकाल की व्यापक जनचेतना को रैदास और तुलसीदास की कविताओं तथा स्वतंत्रता आंदोलन, प्रकृति के प्रति संवेदनशीलता और मानवीय गरिमा को महत्व देने के लिए हिंदी कविता के विभिन्न कालों का प्रतिनिधित्व करने वाले तीन अन्य कवियों की कविताओं को यहाँ संकलित किया गया है। प्रयास यह किया गया है कि हिंदी कविता की समृद्धि और शक्ति की एक झलक हमारे किशोर विद्यार्थियों को मिल सके। इस पाठ्यपुस्तक में लगभग चौदह रचनाकारों की रचनाएँ सम्मिलित हैं जिनमें सात गद्य रचनाएँ और पाँच कवियों की कविताएँ हैं। इसके साथ ही अतिरिक्त पठन

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के रूप में ‘साथ-साथ पढ़ें’ के अंतर्गत एक गद्य रचना और एक कविता भी दी गई है। अतिरिक्त पठन के लिए दी गई ये रचनाएँ विविध विषय केंद्रित हैं— पहली वीरगाथा है और दूसरी प्रकृति से संबंधित कविता है। कविताओं की प्रस्तुति में ऐतिहासिक कालक्रम को ध्यान में रखा गया है। उद्देश्य यह रहा है कि मध्यकाल और आधुनिक काल की विभिन्न प्रवृत्तियों का प्रतिनिधित्व करने वाले कवियों की कविताओं के माध्यम से विद्वार्थी हिंदी कविता की विकास-यात्रा से परिचित हो सकें।

गद्य विधाओं के चयन में यह प्रयास रहा है कि विद्वार्थी अधिक से अधिक विधाओं और विविध गद्य शैलियों का आस्वादन कर सकें। कहानी, यात्रा-वृत्तांत, निबंध, साक्षात्कार, एकांकी आदि विधाओं की कुल सात गद्य रचनाएँ पुस्तक में रखी गई हैं। पुस्तक तैयार करते समय इस बात का भी ध्यान रखा गया है कि रचनाएँ जीवन की बृहत्तर परिधि से जुड़ी हुई हों। वे एक ओर तो साहित्यिक विधाओं का प्रतिनिधित्व कर रही हों तथा दूसरी ओर समाज के विभिन्न वर्गों का भी। हम साहित्य की प्रभावकारी क्षमता का उपयोग करते हुए सभी प्रकार की विविधताओं के प्रति सकारात्मक और संवेदनशील रवैये का विकास कर सकें। भारतीय समाज के बहुभाषिक परिवेश को भी ध्यान में रखा गया है। आशा है कि संकलित रचनाएँ विद्वार्थियों को रुचिकर लगेंगी और उन्हें अन्य रचनाएँ पढ़ने के लिए प्रेरित करेंगी।

अभ्यास-प्रश्नों और आकलन की दृष्टि से इस पुस्तक की एक प्रमुख विशेषता है उसका नया प्रस्तुतीकरण। यह नया प्रस्तुतीकरण अभ्यास-प्रश्नों के माध्यम से किया गया है। पाठ्यपुस्तक में रचनाएँ एक वातावरण निर्मित करती हैं और अभ्यास-प्रश्न उन रचनाओं को परखने और पाठ से गहराई से जुड़ने का अवसर देते हैं। वे विद्वार्थियों को स्वतंत्र और मौलिक रूप से सोचने की प्रेरणा भी देते हैं, इसलिए इस पुस्तक में संदर्भ को फैलाने वाले, कल्पना को विस्तार देने वाले और वैज्ञानिक सोच विकसित करने वाले प्रश्न पूछे गए हैं। पुस्तक में दी गई रचनाओं को समझ के साथ पढ़ने, उन पर तार्किक, रचनात्मक और विश्लेषणात्मक समझ के साथ विचार करने की दृष्टि से अभ्यास-प्रश्नों में विविधता का ध्यान रखा गया है। यह भी ध्यान रखा गया है कि अलग-अलग रुचियों और क्षमताओं के रूप में स्वयं को व्यक्त करने वाले विद्वार्थियों को सीखने के अवसर मिलें। अभ्यास-प्रश्नों की प्रकृति इस प्रकार की है कि हर परिवेश, भाषा और सामाजिक स्तर के विद्वार्थी समाहित हो सकें और उनको चिंतन करके प्रश्नों का उत्तर देने का अवसर मिले। साथ ही यह ध्यान रखा गया है कि वे विशेष शोधपरक दृष्टि से पाठ्यक्रम से परे भी अध्ययन करने के लिए प्रोत्साहित हों (4.43, राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020)।

अभ्यास-प्रश्नों को मुख्य रूप से आठ शीर्षकों में बाँटा गया है— रचना से संवाद, विधा से संवाद, विषयों से संवाद, सूजन, भाषा से संवाद, गतिविधियाँ, झरोखे से और खोजबीन।

रचना से संवाद के अंतर्गत रचना से सीधे जुड़े बहुविकल्पीय प्रश्न तथा अनुभव और विचार संबंधी प्रश्नों को समाहित किया गया है। अपेक्षा यह है कि विद्वार्थी को व्यक्तिगत अनुभव और विचार के साथ-साथ सामूहिक अनुभव को प्रस्तुत करने का अवसर मिले।

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विधा से संवाद के अंतर्गत रचना की विधा से संबंधित ऐसे अभ्यास-प्रश्न दिए गए हैं जिनके माध्यम से साहित्य की विविध विधाओं की विशेषताओं, उनकी परतों और सौंदर्य से विद्यार्थी न केवल परिचित हों, बल्कि स्वयं उनकी पड़ताल भी कर सकें।

विषयों से संवाद के अंतर्गत साहित्य के अंतरविषयी संबंध से जुड़े प्रश्न दिए गए हैं। साहित्य के अंतर्गत समाज विज्ञान, विज्ञान, कला, कानून, अर्थशास्त्र, प्रकृति-पर्यावरण इत्यादि सभी विषय समाहित होते हैं। साहित्य बहुत से विषयों को समाहित करते हुए निर्मित होता है, लेकिन अंततः वह साहित्य होता है। इसलिए भाषा-साहित्य को पढ़ते हुए उसकी परिधि और व्यापकता में बहुत से अन्य विषयों पर ध्यान दिलाने का प्रयास किया गया है।

सूजन शीर्षक के अंतर्गत साहित्य में लेखन, कला, खेल, कल्पना, चिंतन और स्वयं करके सीखने से संबंधित गतिविधियाँ दी गई हैं जिससे कल्पना और सूजन को विस्तार मिलेगा।

भाषा से संवाद शीर्षक के अंतर्गत पाठों में आए भाषिक संदर्भों (व्याकरण) को आधार बनाते हुए उनके विश्लेषण संबंधी प्रश्नों को समाहित किया गया है। उपसर्ग, प्रत्यय, समास, विशेषण, क्रिया, क्रिया विशेषण, वाक्य विवेचन या बहुभाषिक स्वरूप को जीवंत अनुभवों से जोड़कर प्रस्तुत किया गया है।

गतिविधियाँ शीर्षक के अंतर्गत पाठ से जोड़ते हुए ऐसी गतिविधियाँ दी गई हैं जिनसे विद्यार्थियों को अन्य साहित्यिक विधाओं, पत्र, विज्ञापन आदि लिखने का अवसर तो मिले ही, उनकी कल्पना और रचनात्मकता भी समृद्ध हो सके। इन्हें ‘विद्यालय में कक्षा के अतिरिक्त’ भी किया जा सके।

झरोखे से के अंतर्गत पाठ के संदर्भ को ध्यान में रखते हुए कुछ ऐसी रचनाएँ दी गई हैं जो पाठ के प्रति विद्यार्थियों की रुचि और समझ को और अधिक विस्तार दे सकेंगी। ये रचनाएँ ऐसे झरोखे हैं जिनसे झाँककर विद्यार्थी साहित्य की विशाल दुनिया का आनंद उठा सकेंगे। दूसरी ओर, इन झरोखों के माध्यम से साहित्य तथा सूजन के विविध स्वरूपों से जुड़ सकेंगे।

खोजबीन के अंतर्गत पाठों से जुड़ी कुछ सामग्री (ऑडियो, वीडियो या प्रिंट के रूप में) के लिंक खोजबीन के लिए दिए गए हैं ताकि विद्यार्थियों के पठन का विस्तार हो सके और साथ ही रचनाओं के प्रति उनकी समझ समृद्ध हो।

इस पुस्तक में ‘भाषा संगम’ शीर्षक से दो प्रकार की प्रस्तुतियाँ दिखाई पड़ेंगी। एक, पुस्तक के प्रारंभ में भारतीय भाषाओं में से किसी एक भारतीय भाषा की रचना, जैसे इसमें गुजराती भाषा की ‘वैष्णव जन तो तेने कहिए’ रचना दी गई है। दूसरे, रचना में आए किसी एक केंद्रीय शब्द को भारतीय भाषाओं में अनुवाद के रूप में दिया गया है। अपेक्षा यह है कि इसके माध्यम से विद्यार्थियों का अन्य भारतीय भाषाओं के प्रति तो झुकाव होगा ही, इसके साथ-साथ बहुत-सी भारतीय भाषाओं को एक साथ रखकर उनकी समानता, सौंदर्य और विशेषता पर कक्षा में विचार करने का अवसर मिलेगा।

अभ्यास-प्रश्नों में जगह-जगह भारतीय भाषाओं से संबंधित गतिविधियाँ भी दी गई हैं।

not to be republished

पुस्तक को रुचिकर और पठनीय बनाने में चित्रों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इस बात को ध्यान में रखते हुए लेखकों के परिचय के साथ उनके चित्र भी दिए गए हैं। रचनाओं से जुड़े कुछ चित्र भी पुस्तक में सम्मिलित किए गए हैं। ये चित्र रचना की व्याख्या करते हुए उन्हें समझने में सहायता तो करते ही हैं, उन्हें विस्तार भी देते हैं।

आशा है, विद्यार्थी इस पुस्तक को बिना बोझ का अनुभव किए आनंद के साथ पढ़ेंगे और हिंदी भाषा तथा हिंदी साहित्य के साथ-साथ व्यापक सामाजिक जीवन की चेतना प्राप्त करेंगे।

संध्या सिंह प्रोफेसर, भाषा शिक्षा विभाग एवं संयोजक, पाठ्यचर्या क्षेत्र समूह, हिंदी राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्

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राष्ट्रीय पाठ्यक्रम एवं शिक्षण-अधिगम सामग्री समिति

(एन.एस.टी.सी.)

महेश चंद्र पंत, कुलाधिपति, राष्ट्रीय शैक्षिक योजना एवं प्रशासन संस्थान (अध्यक्ष)

मञ्जूल भार्गव, प्रोफेसर, प्रिंसटन यूनिवर्सिटी (सह-अध्यक्ष)

सुधा मूर्ति, प्रतिष्ठित लेखिका एवं शिक्षाविद

शेखर मांडे, पूर्व महानिदेशक, सी.एस.आई.आर. एवं प्रतिष्ठित प्रोफेसर, सावित्रीबाई फुले पुणे विश्वविद्यालय, पुणे

सुजाता रामदोरई, प्रोफेसर, ब्रिटिश कोलंबिया यूनिवर्सिटी, कनाडा

शंकर महादेवन, संगीत विशेषज्ञ, मुंबई

यू. विमल कुमार, निदेशक, प्रकाश पादुकोण बैडमिंटन अकादमी, बेंगलुरु

सुरीना राजन, आई.ए.एस. (सेवानिवृत्त), हरियाणा एवं पूर्व महानिदेशक, एच.आई.पी.ए.

चमू कृष्ण शास्त्री, अध्यक्ष, भारतीय भाषा समिति, शिक्षा मंत्रालय

संजीव सान्याल, सदस्य, प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (ई.ए.सी.-पी.एम.)

गजानन लॉंडे, प्रमुख, कार्यक्रम कार्यालय, एन.एस.टी.सी.

रेबिन छेत्री, निदेशक, एस.सी.ई.आर.टी., सिक्किम

प्रत्यूष कुमार मंडल, प्रोफेसर एवं संकायाध्यक्ष (अनुदेश), क्षेत्रीय शिक्षा संस्थान, मैसूर

दिनेश कुमार, प्रोफेसर एवं संकायाध्यक्ष (अनुसंधान), रा.श्री.अ.प्र.प., नई दिल्ली

कीर्ति कपूर, पूर्व प्रोफेसर, भाषा शिक्षा विभाग, रा.श्री.अ.प्र.प., नई दिल्ली

रंजना अरोड़ा, प्रोफेसर एवं अध्यक्ष, पाठ्यचयार्य अध्ययन एवं विकास विभाग, रा.श्री.अ.प्र.प., नई दिल्ली

(सदस्य-सचिव)

भारत का संविधान

उद्देशिका

हम, भारत के लोग, भारत को एक '[संपूर्ण प्रभुत्व-संपन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य] बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को :

  • सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय,
  • विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म
  • और उपासना की स्वतंत्रता,
  • प्रतिष्ठा और अवसर की समता
  • प्राप्त कराने के लिए,

तथा उन सब में

  • व्यक्ति की गरिमा और '[राष्ट्र की एकता
  • और अखंडता] सुनिश्चित करने वाली बंधुता
  • बढ़ाने के लिए

द्वृत्तसंकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवंबर, 1949 ई. (मिति मार्गशीर्ष शुक्ला सप्तमी, संवत् दो हजार छह विक्रमी) को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।

  1. संविधान (बयालीसवां संशोधन) अधिनियम, 1976 की धारा 2 द्वारा (3.1.1977 से) “‘प्रभुत्व-संपन्न लोकतंत्रात्मक गणराज्य’” के स्थान पर प्रतिस्थापित।
  2. संविधान (बयालीसवां संशोधन) अधिनियम, 1976 की धारा 2 द्वारा (3.1.1977 से) “‘राष्ट्र की एकता’” के स्थान पर प्रतिस्थापित।

पाठ्यपुस्तक निर्माण समिति

अध्यक्ष

सुरेंद्र दुबे, उपाध्यक्ष, केंद्रीय हिंदी शिक्षण मंडल, आगरा, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार

सदस्य

अंजनी श्रीवास्तव, एसोसिएट प्रोफेसर एवं विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग, महात्मा गाँधी केंद्रीय विश्वविद्यालय, मोतिहारी

अक्षय कुमार दीक्षित, टी.जी.टी. (हिंदी), आचार्य तुलसी स्वौंदय बाल विद्यालय, छतरपुर, नई दिल्ली

अनुराधा, पी.जी.टी. (हिंदी) (अवकाश प्राप्त), सरदार पटेल विद्यालय, नई दिल्ली

चमन लाल गुप्त, प्रोफेसर एवं पूर्व विभागाध्यक्ष, हिंदी विभाग, हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय, शिमला

नंद किशोर पांडेय, कुलपति, हरिदेव जोशी पत्रकारिता एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, जयपुर

नीलकंठ कुमार, असिस्टेंट प्रोफेसर, भाषा शिक्षा विभाग, रा.शै.अ.प्र.प., नई दिल्ली

प्रणय कुमार, विभागाध्यक्ष, हिंदी एवं संस्कृत विभाग, एल.के. सिंघानिया एजुकेशन सेंटर, गोटन

मीनू सिंह, पी.जी.टी. (हिंदी), स्वौंदय कन्या विद्यालय, रजोकरी, नई दिल्ली

राजीव रंजन सिन्हा, पी.जी.टी. (हिंदी), स्वौंदय सह-शिक्षा विद्यालय, मेहराम नगर, नई दिल्ली

लक्ष्मी प्रसाद मालगुड़ी, पी.जी.टी. (हिंदी), राजकीय इंटर कॉलेज, कोटी कॉलोनी, कलसी ब्लॉक, देहरादून

विवेकानंद उपाध्याय, असिस्टेंट प्रोफेसर, काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी

शारदा कुमारी, प्राचार्य (अवकाश प्राप्त), डी.आई.ई.टी., आर.के. पुरम, सेक्टर-7, नई दिल्ली

संजय कुमार श्रीवास्तव, पी.जी.टी. (हिंदी), महात्मा गाँधी इंटर कॉलेज, गोरखपुर

साकेत बहुगुणा, असिस्टेंट प्रोफेसर (भाषाविज्ञान), केंद्रीय हिंदी संस्थान (दिल्ली केंद्र), नई दिल्ली

सुमन कुमार सिंह, प्रधानाध्यापक, गवर्मेंट सेकेंडरी स्कूल, कौड़िया वसंती, भगवानपुर हाट, सिवान

सदस्य-समन्वयक

संध्या सिंह, प्रोफेसर, भाषा शिक्षा विभाग एवं संयोजक, पाठ्यचर्या क्षेत्र समूह (हिंदी भाषा उप-समूह), रा.शै.अ.प्र.प., नई दिल्ली

सदस्य सह-समन्वयक

नरेश कोहली, एसोसिएट प्रोफेसर, भाषा शिक्षा विभाग, रा.शै.अ.प्र.प., नई दिल्ली

भारत का संविधान

भाग 4क

नागरिकों के मूल कर्तव्य

अनुच्छेद 51 क

मूल कर्तव्य – भारत के प्रत्येक नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह –

(क) संविधान का पालन करे और उसके आदर्शों, संस्थाओं, राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर करे;

(ख) स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शों को हृदय में संजोए रखे और उनका पालन करे;

(ग) भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता की रक्षा करे और उसे अक्षुण्ण बनाए रखे;

(घ) देश की रक्षा करे और आह्वान किए जाने पर राष्ट्र की सेवा करे;

(ङ) भारत के सभी लोगों में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का निर्माण करे जो धर्म, भाषा और प्रदेश या वर्ग पर आधारित सभी भेदभावों से परे हो, ऐसी प्रथाओं का त्याग करे जो महिलाओं के सम्मान के विरुद्ध हों;

(च) हमारी सामासिक संस्कृति की गौरवशाली परंपरा का महत्व समझे और उसका परिरक्षण करे;

(छ) प्राकृतिक पर्यावरण की, जिसके अंतर्गत वन, झील, नदी और वन्य जीव हैं, रक्षा करे और उसका संवर्धन करे तथा प्राणिमात्र के प्रति दयाभाव रखे;

(ज) वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानववाद और ज्ञानार्जन तथा सुधार की भावना का विकास करे;

(झ) सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षित रखे और हिंसा से दूर रहे;

(ञ) व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रों में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करे, जिससे राष्ट्र निरंतर बढ़ते हुए प्रयत्न और उपलब्धि की नई ऊँचाइयों को छू सके; और

(ट) यदि माता-पिता या संरक्षक है, छह वर्ष से चौदह वर्ष तक की आयु वाले अपने, यथास्थिति, बालक या प्रतिपाल्य को शिक्षा के अवसर प्रदान करे।

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आभार

राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद्, राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा पर्यवेक्षण समिति के अध्यक्ष एवं सदस्यों; पाठ्यचर्या क्षेत्र समूह (भाषा) के सभी सदस्यों तथा अन्य अंतःसंबंधी विषयों के लिए गठित पाठ्यचर्या क्षेत्र समूहों के अध्यक्षों एवं सदस्यों के प्रति इस पुस्तक के निर्माण की प्रक्रिया में मार्गदर्शन एवं समीक्षा हेतु बहुमूल्य योगदान के लिए आभार व्यक्त करती है।

परिषद्, संयुक्त निदेशक, केंद्रीय शैक्षिक प्रौद्योगिकी संस्थान; अध्यक्ष, सामाजिक विज्ञान शिक्षा विभाग; अध्यक्ष, विज्ञान एवं गणित शिक्षा विभाग; अध्यक्ष, शैक्षिक सर्वेक्षण प्रभाग; अध्यक्ष, विशेष आवश्यकता समूह शिक्षा विभाग; अध्यक्ष, जेंडर अध्ययन विभाग; अध्यक्ष, कला एवं सौंदर्यबोध शिक्षा विभाग के साथ ही इन विभागों के सदस्यों का पाठ्यपुस्तक में अंतरानुशासनिक विषयों के अंतःसंबंध को सुनिश्चित करने के लिए आभार व्यक्त करती है।

इस पुस्तक में जिन रचनाओं को सम्मिलित किया गया है, उनकी स्वीकृति देने के लिए सभी रचनाकारों, उनके परिजनों एवं उनसे संबद्ध प्रकाशकों के प्रति परिषद् अपना आभार व्यक्त करती है।

इस पाठ्यपुस्तक में योगदान के लिए श्याम सिंह सुशील, लेखक, दिल्ली के प्रति परिषद् विशेष आभार प्रकट करती है।

परिषद्, वरिष्ठ शोध सहायक— सुनीत मिश्र; कनिष्ठ परियोजना अध्येता— प्रिया, सत्यम सिंह, अरुण कुमार, सोनम सिंह तथा राहुल कुमार यादव; और तकनीकी सहयोग हेतु फरहीन फातिमा, डी.टी.पी. ऑपरेटर का हार्दिक आभार व्यक्त करती है।

परिषद्, इस पुस्तक के संपादन के लिए प्रकाशन प्रभाग में कार्यरत अतुल मिश्रा, संपादक (संविदा); अब्दुल मजीद, प्रूफरीडर (संविदा) के प्रति तथा इस पुस्तक को प्रकाशन हेतु अंतिम रूप से तैयार करने के लिए पवन कुमार बरियार, प्रभारी, डी.टी.पी. प्रकोष्ठ; विवेक राजपूत, उपासना, अनिता कुमारी और मनोज कुमार, डी.टी.पी. ऑपरेटर (संविदा) के प्रति भी आभार व्यक्त करती है।

क्या

भारत की प्रमुख नदियों में गंगा, हमारी सभ्यता व संस्कृति का अविरल प्रवाह है। गंगोत्री से निकलकर इसकी धारा गंगासागर (बंगाल की खाड़ी) तक जाती है। इस तरह गंगा भारत के बड़े भौगोलिक क्षेत्र की जीवन-रेखा है। गंगा की तरह हिंदी भी हमारी सभ्यता व संस्कृति की एक पहचान है। हिंदी भारत के व्यापक क्षेत्र में बोली, समझी व पढ़ी जाती है। गंगा पाठ्यपुस्तक भी न केवल विद्यार्थियों की भाषाई दक्षता विकसित करती है बल्कि उन्हें भारतीय सामाजिक-सांस्कृतिक मूल्यों के सतत प्रवाह से भी जोड़ती है।

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विषय-क्रम

आमुख यह पुस्तक भाषा संगम— वैष्णव जन तो तेने कहिए...

iii v xviii

गद्य खंड

  1. दो बैलों की कथा प्रेमचंद 3

  2. क्या लिखूँ? पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी 30

  3. संवादहीन शोखर जोशी 45

  4. ऐसी भी बातें होती हैं (लता मंगेशकर से साक्षात्कार) यतींद्र मिश्र 62

  5. आखिरी चट्टान तक मोहन राकेश 84

  6. रीढ़ की हड्डी जगदीशचंद्र माथुर 100

  7. मैं और मेरा देश कन्हैयालाल मिश्र ‘प्रभाकर’ 120

निर्मल जीत सिंह सेखों (साथ-साथ पढ़ें) रा.श्री.अ.प्र.प. 139

काव्य खंड

  1. पद रैदास 145

  2. राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद तुलसीदास 153

  3. भारति, जय, विजयकरे! सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ 166

  4. झाँसी की रानी सुभद्रा कुमारी चौहान 176

  5. घर की याद भवानीप्रसाद मिश्र 194

तब याद तुम्हारी आती है (साथ-साथ पढ़ें) रामनरेश त्रिपाठी 206

भाषा संगम

वैष्णव जन तो तेने कहिए...

वैष्णव जन तो तेने कहिए, जे पीड़ पराई जाणे रे। परदुःखे उपकार करे तोये, मन अभिमान न आणे रे। सकल लोकमां सहुने वंदे, निंदा न करे केनी रे। वाच काछ मन निश्चल राखे, धन-धन जननी तेनी रे। समदृष्टी ने तृष्णा त्यागी, परस्त्री जेने मात रे। जिह्वा थकी असत्य न बोले, परधन नव झाले हाथ रे। मोह माया व्यापे नहीं जेने, दूढ़ वैराग्य जेना मनमां रे। रामनामशुं ताली लागी, सकल तीरथ तेना तनमां रे। वणलोभी ने कपटरहित छे, काम क्रोध निवार्या रे। भणे नरसैयो तेनुं दरसन करतां, कुल एकतेर तार्या रे। – नरसी मेहता (गुजराती भाषा के प्रसिद्ध कवि)

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आमुख - CBSE Class 9 Hindi Notes