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तुलसीदास
गोस्वामी तुलसीदास का जन्म आज के उत्तर प्रदेश में हुआ था। इनका जीवन-काल 16वीं-17वीं शताब्दी (सन् 1532-1623)* के मध्य माना गया है। रामचरितमानस तुलसीदास का प्रसिद्ध महाकाव्य है। रामचरितमानस उनकी अनन्य रामभक्ति और उनके सृजनात्मक कौशल का मनोरम उदाहरण है। उनकी अन्य प्रमुख रचनाएँ कवितावली, गीतावली, दोहावली, कृष्णगीतावली, विनयपत्रिका, हनुमान बाहुक हैं। तुलसीदास की रचनाओं में राम मानवीय मर्यादाओं और आदर्शों के प्रतीक हैं जिनके माध्यम से उन्होंने नीति, स्नेह, शील, विनय, त्याग जैसे मूल्यों को प्रतिष्ठित किया है। मानव-प्रकृति, लोकजीवन और जीवन-जगत संबंधी गहरी अंतर्दृष्टि उनके काव्य में दिखाई पड़ती है।
तुलसीदास संस्कृत के श्रेष्ठ ज्ञाता थे। उनका अवधी और ब्रज दोनों भाषाओं पर समान अधिकार था। उन्होंने रामचरितमानस की रचना अवधी में और विनयपत्रिका तथा कवितावली की रचना ब्रजभाषा में की। काशी में उनका देहावसान हुआ।

प्रस्तुत अंश ‘रामचरितमानस’ के ‘बालकांड’ से लिया गया है। सीता स्वयंवर में श्रीराम द्वारा शिव-धनुष भंग का समाचार जब मुनि परशुराम को मिलता है तो वे आक्रोशित होकर वहाँ आते हैं। शिव-धनुष को खंडित देखकर वे तीव्र रोष प्रकट करते हैं और सभा में उपस्थित सभी राजाओं पर क्रोधित होते हैं। यहाँ तुलसीदास ने परशुराम के रोषपूर्ण और तेजस्वी रूप का वर्णन किया है। प्रस्तुत अंश में, सभा में उपस्थित राजाओं के भय, विश्वामित्र और जनक की सभा में उपस्थिति, जनक द्वारा सीता-स्वयंवर के बारे में बताने, विश्वामित्र द्वारा राम-लक्ष्मण का परशुराम से परिचय एवं सम्मानपूर्वक अभिवादन के बाद कथा आगे बढ़ती है।
*संदर्भ– हिंदी साहित्य कोश (भाग-2), नामवाची शब्दावली, ज्ञानमंडल लिमिटेड, वाराणसी
राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद
देखत भृगुपति बेषु कराला। उठे सकल भय बिकल भुआला।। पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा।। जेहि सुभायँ चितवहिं हितु जानी। सो जानइ जनु आइ खुटानी।। जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा।। आसिष दीन्हि सखीं हरषानीं। निज समाज लै गईं सयानीं।। बिस्वामित्रु मिले पुनि आई। पद सरोज मेले दोउ भाई।। रामु लखनु दसरथ के ढोटा। दीन्हि असीस देखि भल जोटा।। रामहि चितइ रहे थकि लोचन। रूप अपार मार मद मोचन।।
बहुरि बिलोकि बिदेह सन कहहु काह अति भीर। पूछत जानि अजान जिमि ब्यापेउ कोपु सरीर।।

राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद 155
समाचार कहि जनक सुनाए। जेहि कारन महीप सब आए। सुनत बचन फिरि अनत निहारे। देखे चापखंड महि डारे। अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा। बेगि देखाउ मूढ़ न त आजू। उलटउँ महि जहाँ लहि तव राजू। अति डरू उतरू देत नूपु नाही। कुटिल भूप हरषे मन माही। सुर मुनि नाग नगर नर नारी। सोचहिं सकल त्रास उर भारी। मन पछिताति सीय महतारी। बिधि अब सँवरी बात बिगारी। भूगुपति कर सुभाउ सुनि सीता। अरध निमेष कलप सम बीता।
सभय बिलोके लोग सब जानि जानकी भीरु। हृदयँ न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु।
नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा। आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही। सेवकु सो जो करै सेवकाई। अरि करनी करि करिअ लराई। सुनहु राम जेहि सिवधनु तोरा। सहसबाहु सम सो रिपु मोरा। सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहि सब राजा। सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने। बहु धनुही तोरी लरिकाई। कबहुँ न असि रिस कीन्हि गोसाई। एहि धनु पर ममता केहि हेतू। सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू।
रे नूप बालक काल बस बोलत तोहि न सँभार। धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार।
रामचरितमानस में यहाँ से आगे की कथा में परशुराम का आक्रोश, लक्ष्मण और परशुराम के बीच व्यंग्योक्तिपूर्ण संवाद और ऐसी स्थिति में भी राम के धीर-गंभीर शांत स्वरूप का वर्णन है। अंततः राम के विनय और विश्वामित्र के समझाने पर तथा राम की शक्ति की परीक्षा लेकर परशुराम का आक्रोश शांत होता है।
राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद आप प्रश्न-अभ्यास में ‘खोजबीन’ के अंतर्गत दिए गए लिंक के माध्यम से पढ़ सकते हैं।


156 गंगा
अभ्यास
एचना से संवाद
मेरे उत्तर मेरे तर्क
निम्नलिखित प्रश्नों के सटीक उत्तर चुनिए और यह भी बताइए कि आपको ये उत्तर उपयुक्त क्यों लगते हैं?
“पितु समेत कहि कहि निज नामा। लगे करन सब दंड प्रनामा।” यह पंक्ति सभा में उपस्थित लोगों की किस मनःस्थिति को दर्शाती है? (क) आदर और सम्मान (ख) भक्ति और श्रद्धा (ग) भय और शिष्टाचार (घ) प्रेम और सहिष्णुता
“जनक बहोरि आइ सिरु नावा। सीय बोलाइ प्रनामु करावा” पंक्ति से राजा जनक के व्यवहार की कौन-सी विशेषता उद्घाटित होती है? (क) संवेदनशीलता (ख) शिष्टता (ग) सहनशीलता (घ) उदासीनता
“अति रिस बोले बचन कठोरा।” जनक के प्रति परशुराम के कठोर वचन बोलने का मूल कारण था— (क) उचित आदर-सत्कार न मिलना (ख) जनक द्वारा समाचार छिपाना (ग) शिव-धनुष का खंडित होना (घ) अन्य राजाओं की सभा में उपस्थिति
राम का कथन “होइहि केउ एक दास तुम्हारा” उनके व्यक्तित्व की किस विशेषता को दर्शाता है? (क) कूटनीति और चतुराई (ख) विनम्रता और मर्यादा
राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद 157
(ग) त्याग और समर्पण (घ) दृढ़ता और आत्मविश्वास
- “सुनि मुनि बचन लखन मुसुकाने। बोले परसुधरहि अपमाने।।” लक्ष्मण के मुसकराने और उपहास भरे वचनों का क्या कारण था? (क) वे सभा में अपनी श्रेष्ठता सिद्ध करना चाहते थे। (ख) उन्हें राम के प्रति अपना प्रेम प्रदर्शित करना था। (ग) वे परशुराम की शक्ति से अनभिज्ञ थे। (घ) वे परशुराम को चुनौती देना चाहते थे।
मेरी समझ मेरे विचार
नीचे दिए गए प्रश्नों पर चर्चा कीजिए और उनके उत्तर लिखिए—
- “अरथ निमेष कलप सम बीता” पंक्ति का भाव स्पष्ट करते हुए बताइए कि कविता में यह किसके संदर्भ में कहा गया है और क्यों?
- “सो बिलगाउ बिहाइ समाजा। न त मारे जैहहिं सब राजा।।” पंक्ति के आधार पर बताइए कि परशुराम द्वारा दी गई इस चेतावनी का सभा में उपस्थित राज-समाज पर क्या प्रभाव पड़ा होगा? तर्क सहित उत्तर दीजिए।
- तुलसीदास ने राम और लक्ष्मण के माध्यम से एक ही परिस्थिति के प्रति दो अलग-अलग प्रतिक्रियाएँ दिखाई हैं। आपकी दृष्टि में परशुराम के क्रोध को शांत करने के लिए राम का ‘विनय’ का मार्ग उचित है या लक्ष्मण के ‘तर्क’ का? अपने उत्तर का उचित कारण और तर्क भी प्रस्तुत कीजिए।
- ‘हृदय न हरषु बिषादु कछु बोले श्रीरघुबीरु।।’ श्री राम के हृदय में न हर्ष था, न विषाद। यह उनके व्यक्तित्व के किन गुणों को दर्शाता है? उनका भावनात्मक संतुलन इस पूरे पाठ में उन्हें अन्य पात्रों से अलग कैसे स्थापित करता है?
मेरी कल्पना मेरे अनुमान
नीचे दिए गए प्रश्नों के उत्तर अपनी कल्पना और अनुमान के आधार पर दीजिए—
- कल्पना कीजिए कि आप जनक की सभा में उपस्थित एक राजा हैं। परशुराम जी के आगमन से लेकर उनके गमन तक की कथा अपने शब्दों में लिखिए।
- “अति डरू उतरू देत नूपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं।।” जनक द्वारा डर से चुप रहने पर अन्य राजा मन में प्रसन्न क्यों हुए होंगे? (संकेत—सोचिए, यह मनुष्य के व्यवहार की किस सच्चाई को उजागर करता है?)
158 गंगा
विद्या से संवाद
कविता का सौंदर्य
यह कविता तुलसीदास द्वारा रचित महाकाव्य रामचरितमानस के ‘बालकांड’ का एक अंश है जहाँ शिव-धनुष के टूटने से क्रोधित परशुराम के रोष भरे वाक्यों का उत्तर लक्ष्मण व्यंग्य वचनों से देते हैं। दोनों के बीच के ये संवाद कविता में नाटकीयता उत्पन्न करते हैं। संवादों के माध्यम से ही पूरी कविता का कथात्मक विकास होता है, संवाद ही चरित्र का निर्माण करते हैं और संवादों से ही भावों में विविधता भी आती है। इस प्रकार यह कविता काव्यात्मक विधा में संवाद-प्रस्तुति का एक उत्कृष्ट उदाहरण है। नीचे कविता के संवादों की कुछ विशेषताएँ दी गई हैं। उन विशेषताओं को दर्शाने वाली पंक्तियों के उदाहरण कविता से ढूँढ़कर लिखिए।
संवादों की विशेषता
- राम की विनम्रता
- परशुराम का रौद्र रूप
- लक्ष्मण का प्रत्युत्तर
- पौराणिक संदर्भ
- नाटकीयता
भाव-पहचान एवं विश्लेषण
- आपने पढ़ा कि राजा जनक की सभा में उपस्थित विभिन्न पात्रों की मनःस्थिति अलग-अलग है। नीचे दिए गए भावों/मनःस्थिति को दर्शाने वाली पंक्तियों को कविता से चिह्नित कीजिए और बताइए कि यह भाव किस पात्र से संबंधित है और उसकी इस मनःस्थिति का कारण क्या है? आपकी सहायता के लिए एक उदाहरण नीचे दिया गया है।
चिंता, क्रोध, व्यग्रता, भय, संयम/विनम्रता, ईष्या/कुटिलता
| भाव/मनःस्थिति | संबंधित पंक्ति | संबंधित पात्र | मनःस्थिति का कारण |
|---|---|---|---|
| चिंता | विधि अब सँवरी बात बिगारी | सीता की माता सुन्यना | पुत्री सीता के भविष्य (विवाह) के प्रति आशंकित और चिंतित |
राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद 159
- “अति डरू उतरू देत नूपु नाहीं।”
परशुराम के पूछने पर जनक का मौन भयजनित है या विवेकपूर्ण निर्णय? संवाद की स्थिति के आधार पर विश्लेषण कीजिए।
विश्लेषण कैसे करें
- संदर्भ स्पष्ट कीजिए— आरंभ में यह बताइए कि यह पंक्ति/घटना किस स्थिति में आई है, उससे पहले क्या घट चुका था।
- विश्लेषण में घटना का वर्णन कम, उसका कारण और प्रभाव अधिक लिखना होता है— केवल क्या हुआ नहीं, बल्कि क्यों हुआ लिखिए।
- कारण → भाव → परिणाम का क्रम बनाइए।
- निष्कर्ष दीजिए— अंत में 1-2 पंक्तियों में ‘अपना’ स्पष्ट निष्कर्ष लिखिए जैसे— ‘इससे स्पष्ट होता है कि...’ या ‘यह पंक्ति संकेत देती है कि...’
- संक्षेप में क्या, क्यों, कैसे के आधार पर विश्लेषण कीजिए और निष्कर्ष लिखिए।
काव्य-पंक्ति और भाव
“रे नूप बालक काल बस बोलत तोहि न सँभार। धनुही सम तिपुरारि धनु बिदित सकल संसार।!”
(क) यदि आप इन पंक्तियों को मंच पर बोलते, तो आपके चेहरे पर कौन-सा भाव होता?
(ख) आपने अनुभव किया होगा कि इस कविता में परिस्थितिवश प्रत्येक पात्र एक अलग भाव का प्रतिनिधि बन जाता है। निम्नलिखित पात्रों को आप कौन-कौन से भावों द्वारा प्रदर्शित करेंगे—
- परशुराम
- राजा जनक
- लक्ष्मण
- राम
- सभा में उपस्थित अन्य राजा
विषयों से संवाद
- सभा में परशुराम के प्रति राम के व्यवहार से उनकी विनम्रता, मयांदा, धीर और उदात्त चरित्र के संबंध में पता चलता है जो किसी भी कुशल शासक के लिए आवश्यक है। आपको किन-किन परिस्थितियों में इन विशेषताओं का परिचय देना पड़ता है? चर्चा कीजिए और लिखिए।
160 गंगा
- कविता में वर्णित प्रसंग सीता-स्वयंवर की सभा का है। प्राचीन भारतीय समाज में वर-चयन के लिए स्वयंवर की प्रथा प्रचलित थी। इसके अनेक उदाहरण मिलते हैं। ऐसी किसी एक पौराणिक-ऐतिहासिक आदि घटना/प्रसंग का वर्णन कीजिए जिससे स्वयंवर विधि द्वारा विवाह की जानकारी मिलती है।
सूजन
परशुराम के क्रोध को देखकर सीता और उनकी माता सुनयना दोनों चिंतित हैं और सीता के लिए एक-एक पल युग के समान भारी और लंबा प्रतीत हो रहा है। उनकी मन:स्थिति का अनुमान लगाते हुए उस क्षण दोनों के बीच चल रहा मौन संवाद लिखिए।
सभा में हो रहे संवाद को दूर बैठी सीता, राजा जनक और अन्य लोग भी सुन रहे थे। अपनी कल्पना और अनुमान के आधार पर लिखिए कि उस समय सीता के मन में किस तरह के भाव उत्पन्न हो रहे होंगे? सीता के दृष्टिकोण से पूरी घटना का विश्लेषण कीजिए। (संकेत– लक्ष्मण के प्रत्युत्तर पर चिंता, गर्व, हँसी, भय, शंका इत्यादि)
कविता में सभा में उपस्थित राजाओं ने अपनी वीरता, पराक्रम आदि का उल्लेख करते हुए अपना परिचय दिया है। यदि आपको अपना परिचय देना हो तो आप अपना परिचय किस प्रकार देना उचित समझेंगे? अपना परिचय देते हुए कुछ वाक्य लिखिए जिससे आपके व्यक्तित्व की महत्वपूर्ण बातों का पता चलता हो।
भाषा से संवाद
व्याकरण की बात
नीचे दी गई पंक्तियों को ध्यान से पढ़िए—
- “देखत भूगुपति बेषु कराला।”
- “बोले परसुधरहि अपमाने।”
- “सुनि रिसाइ कह भृगुकुलकेतू”
यहाँ परशुराम को विभिन्न नामों से संबोधित किया गया है, जैसे– भूगुपति, परसुधर और भृगुकुलकेतू। आप इस कविता में अनेक विशेषताएँ देख सकते हैं, जैसे– दोहा-चौपाई का क्रम से होना, बिना वक्ता का नाम बताए उनका कथन कह देना, मुहावरों का उपयोग करना आदि। नीचे इस कविता की कुछ विशेषताएँ और उनके एक-एक उदाहरण दिए गए हैं। एक-एक उदाहरण आप लिखिए।
राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद 161
| विशेषता | अर्थ | उदाहरण |
|---|---|---|
| अनुप्रास अलंकार | एक ही वर्ण की बार-बार आवृत्ति | अरि करनी करि करिअ लराई |
| अतिशयोक्ति अलंकार | बात को बढ़ा-चढ़ाकर कहना | अरध निमेष कलप सम बीता |
| रूपक अलंकार | रूप का आरोपण करना | पद सरोज मेले दोउ भाई |
बहुभाषिकता
यह कविता अवधी भाषा में लिखी गई है जो कि हिंदी भाषा का ही एक स्वरूप है और उत्तर प्रदेश के अनेक स्थानों पर बोली जाती है। कविता में ऐसे बहुत से शब्द आए हैं, जो अवधी भाषा के हैं। ऐसे शब्दों को पहचान कर उनके खड़ी बोली हिंदी रूप लिखिए। साथ ही आपकी भाषा में इनके लिए कौन-से शब्द प्रयुक्त होते हैं, उन्हें भी लिखिए।
उदाहरण—
| अवधी शब्द | खड़ी बोली का शब्द | मेरी भाषा में शब्द |
|---|---|---|
| कोही | क्रोधी | |
| वेषु | वेष |
लोक में भाषा
नीचे कोष्ठक में कविता से कुछ शब्द चुनकर दिए गए हैं। उन शब्दों से संबंधित लोकोक्ति और उनका अर्थ लिखकर स्वतंत्र वाक्यों में प्रयोग कीजिए। आपकी सहायता के लिए एक उदाहरण नीचे दिया गया है।
मन राम राजा बात सिरु (सिर)
उदाहरण—
| शब्द | लोकोक्ति | अर्थ |
|---|---|---|
| मन | मन के जीते जीत है, मन के हारे हार। | आत्मविश्वास, साहस और मनोबल से सफलता निश्चित है। |
162 गंगा
गद्य-रूप
नीचे लिखी चौपाई को पढ़िए—
“नाथ संभुधनु भंजनिहारा। होइहि केउ एक दास तुम्हारा॥ आयसु काह कहिअ किन मोही। सुनि रिसाइ बोले मुनि कोही॥”
इस चौपाई को हम गद्य-रूप में भी लिख सकते हैं। इसमें राम परशुराम से विनम्रतापूर्वक कहते हैं— हे नाथ! शिव-धनुष को तोड़ने वाला आपका ही कोई एक दास होगा आपकी क्या आज्ञा है, मुझसे क्यों नहीं कहते? राम की यह बात सुनकर क्रोधित परशुराम कहते हैं।
अब आप नीचे दी गई चौपाई को गद्य-रूप में लिखिए—
“अति डरु उतरु देत नूपु नाहीं। कुटिल भूप हरषे मन माहीं॥ सुर मुनि नाग नगर नर नारी। सोचहिं सकल त्रास उर भारी॥”
1. अतिविधियाँ
- यह कविता संवाद का सुंदर उदाहरण है। तालिका में दिए गए कथनों को पढ़कर बताइए कि कौन-सा कथन किसका हो सकता है। अपनी समझ से सही (☑) का चिह्न लगाइए—
| कथन | राम | लक्ष्मण | परशुराम | जनक | सीता की माता
(सुनयना) | | --- | --- | --- | --- | --- | --- | | शिव के धनुष को तोड़ने वाला आपका कोई दास ही हो सकता है। | | | | | | | विधाता ने बनी-बनाई बात बिगाड़ दी। | | | | | | | सेवक वह होता है जो सेवा का काम करे। | | | | | | | इस कारण ये सब राजा आए हैं। | | | | | | | बचपन में हमने ऐसी बहुत-सी धनुहियाँ तोड़ डाली हैं। | | | | | |
राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद 163
| क्या आज्ञा है, मुझसे क्यों नहीं कहते? | |||||
|---|---|---|---|---|---|
| कहो जनक, किस कारण यह भीड़ है? | |||||
| इसी धनुष पर इतनी ममता क्यों! |
रामचरितमानस के इस प्रसंग का मंचन लोकनाट्य, रामलीला और कठपुतली कला में बड़ी जीवंतता से किया जा सकता है। कलात्मक तकनीकों (ध्वनि, भाव, संगीत, वेशभूषा) का उपयोग करते हुए कविता को एक दृश्य नाटक के रूप में प्रस्तुत कीजिए।
‘कठिन परिस्थितियों में भी सत्य कहने का साहस करना आवश्यक है।’ इस विषय पर कक्षा में एक परिचर्चा अथवा वाद-विवाद गतिविधि के माध्यम से अपने विचार साझा कीजिए।
मेरी पहेली
पाठ में से चुनकर कुछ शब्द नीचे दिए गए हैं। अब अपने समूह में मिलकर ऐसी पहेलियाँ बनाइए जिनके उत्तर निम्नलिखित हों—
| समाचार | धनुष | मन | नाग | नगर |
|---|
> “अति रिस बोले बचन कठोरा। कहु जड़ जनक धनुष कै तोरा।।”
नीचे ‘धनुष’ शब्द के लिए संविधान की आठवीं अनुसूची में सम्मिलित कुछ भारतीय भाषाओं में प्रयुक्त शब्दों की सूची दी गई है।
कमान (हिंदी); धनु:, चापम् (संस्कृत); धणुख (पंजाबी); कमान (कौस) (उर्दू); कमान (कश्मीरी); धनुष, कमानु (सिंधी); धनुष्य (मराठी); धनुष, कामटु (गुजराती); धनुश (कोंकणी); धनु (नेपाली); धनुक (बांग्ला); धनु (असमिया); लिस्ट (मणिपुरी); धनुष, धनु, कार्मुक (ओडिआ); धनुस्सु, विल्लु (तेलुगू); विल् (तमिल); धनुस्सु, विल्लु (मलयालम); बिल्लु, धनुष (कन्नड़)
- इनके अतिरिक्त यदि आप धनुष शब्द को किसी और भाषा में भी जानते हैं तो उस भाषा में भी लिखिए।
- उपर्युक्त वाक्य को अपनी मातृभाषा में भी लिखिए।
https://shabd.education. gov.in/lexicon.jsp
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164 गंगा
रवोजबीन
बालकांड का यह अंश और गोस्वामी तुलसीदास जी की अन्य रचनाएँ इंटरनेट की सहायता से सुनिए और देखिए—
तुलसीदास— राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद https://www.youtube.com/watch?v=7laq-BLnig4 https://www.youtube.com/watch?v=M7yZx2C0O68
दोहे— कबीर, रहीम, तुलसी https://www.youtube.com/watch?v=A5v38R3VwaE https://www.youtube.com/watch?v=cnrjLCkggr4&
गोस्वामी तुलसीदास https://www.youtube.com/watch?v=oCLrWoky6UI https://www.youtube.com/watch?v=MJbKZoLLeSs
कवि तुलसीदास और उनकी कविता https://www.youtube.com/watch?v=rE-iTNN6SsE
शब्द-संपदा
| भृगुपति | — | भृगुकुल के स्वामी |
|---|---|---|
| कराला | — | भयानक, डरावना |
| भुआला | — | राजा, महीप, भूपाल |
| सुभायें | — | स्वभाव, आदत, सहज प्रकृति |
| चितवहिं | — | देखना, निरखना |
| खुटानी | — | पूरी होना, समाप्त होना |
| बहोरि | — | इकट्ठा करना, फिर, अनंतर, पीछे |
| आसिष/असीस | — | आशीर्वाद |
| ढोटा | — | पुत्र, बेटा, बालक |
| जोटा | — | जोड़ा, गोनी |
| लोचन | — | आँख, देखने की क्रिया |
राम-लक्ष्मण-परशुराम संवाद 165
अनत — अन्यत्र, और कहीं चापखंड — धनुष का टुकड़ा, धनुष का भाग रिस — रोष, क्रोध, गुस्सा बेगि — शीघ्र, जल्दी, वेगपूर्वक जहाँ — जहाँ, जिस स्थान पर, जिस जगह महि — पृथ्वी, महिमा, महत्व लहि — तक, पर्यंत त्रास — भय, डर विधि — विधि, विधाता, ईश्वर अरध निमेष — आधा क्षण, आधा पल, आधा पलक झपकना कलप (कल्प) — काल का एक विभाग, ब्रह्मा का एक दिन (एक हजार महायुग—4 अरब 32 करोड़ मानव-वर्ष), प्रलय बिलोके — देखा, अवलोकन किया भीर — भयभीत, डरा हुआ भंजनिहारा — भंग करने वाला, तोड़ने वाला आयसु — आज्ञा, आदेश रिसाइ — क्रोध करना, कोप करना कोही — क्रोधी सहसबाहु — सहसबाहु, बाणासुर, शिव, स्कंद का एक अनुचर बिलगाउ — अलग होना, अलग करने वाला बिहाइ — छोड़कर जैहहि — जाएँगे परसु (परशु) — फरसा, कुल्हाड़ी की तरह का एक शस्त्र परसुधरहि — परशुराम (फरसा धारण करने वाले) लरिकाई — लड़कपन, बचपन में, बाल्यावस्था, चंचलता भृगुकुलकेतु — भृगुकुल के दीपक, परशुराम के लिए संबोधन तिपुरारि — त्रिपुरारी, शिव, शंकर
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