Meri Maa - CBSE Class 6 Hindi Notes

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Chapter Study Guide & Summary

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Key Concepts & Syllabus Topics

Important Definitions & Terminology

Meri Maa Overview
The central theme and foundational concept covered in Class 6 Hindi Chapter 6, emphasizing conceptual clarity, NCERT curriculum alignment, and exam readiness.
NCERT Curriculum Alignment
Structured study material adhering strictly to CBSE board guidelines, learning objectives, and standardized assessment criteria for Class 6.
Active Recall & Revision
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Quick Revision & Key Points

Full NCERT Chapter: Meri Maa

6

मेरी माँ

"श्री रामप्रसाद बिस्मल' बड़़ होनहार नौजवान थे गजब के शायर थे। देखने में भी बहुत सुद थे योय बहुत थे जाने वाले कहे हैं क यदि किसी और जगह या किसी और देश या किसी और समय पैदा हु होते तो सेनध्यक्ष बनतो" यह कहना है हमर देश केप्रसिद् स्वतंत्रता सेनानी भगत सिंह का बिस्मल के बार मे। रामप्रसाद बिस्मल' का जन्म जब हुआ, उस समय भारत पर अंग्रेजों का आधिपत्य था बिस्मल' छोटी-सी आयु से ही भारत की स्वतंत्रता के लिए अंगरेज़ं से लड़ते रहे अंग्रेजो ने उन्हेंजेल भेज दिया और फ़सी की सज़ दे दी। जेल में भीउन्होंने अंग्ेज़ं के अनेक अत्याचार सहे। जेल मेंरहते-रहते ही उन्होने चोरी-छिपे अपनी आत्मकथा लिखी और अंग्ेज़ं से बचते-बचाते जेल से बाहर भेजते रहे उनके साथियो ने उसे प्काशित भी करवा दिया इसका नाम रखा गया- निज जीवन की एक छटा इसपुस्तक ने अंगरेजो क होश उडा दिए लोगों में अंग्ेज़ो के विरुद् क्रोध और बढ गया इस तरह इस आत्मकथा के कारण अंग्रेज़ बिस्मिल को फ़ॉसी देने के बाद भी उन्हें हरा न सके। इस आत्मकथा के माध्यम से आज भी बिस्मिल' हमारे मस्तष्क में जीवित हैं आज भी यह आत्मकथा लोगों को प्रित करती है। क्या आप भी उनकी आत्मकथा को पढ़ना चाहत हैं? क्या कहा? हाँ? तो यहाँ प्तुत है उसी आत्मकथा का एक अंश लखनऊ काग्रेस में जाने के लिए मेरी बड़ी इच्छा थी दादीजी और पिताज़ी तो विरोध करते रहे, किंतु माताजी ने मुझे खर् दे ही दिया उसी समय शाहजहॉपुर में सेवा-समिति का आरंभ हुआ था। मैं बड़े उत्साह के साथ सेवा समित में सहयोग देता था। पिताजी और दादीजी को मेर इस प्रकार के कार्य अच्छे न लगते थे, किंत

माताजी मेरा उत्साह भंग न होने देती थीं, जिसके कारण उन्हें अक्सर पिताजी की डॉँट-फटकार तथा दंड सहन करना पड़ता था वास्तव में, मेरी माताजी देवी है। मुझमे जो कुछ जीवन तथा साहस आया, वह मेरी माताजी तथा गुरुदेव श्री सोमदेव जी की कृपाओं का ही परिणाम है। दादीजी और पिताजी मेर विवाह के लिए बहुत अनुरोध करते, किंतु माताजी यही कहतीं कि शिक्षा पा चुकने के बाद ही विवाह करना उचित होगा माताजी के ्रोत्साहन तथा सदव्यवहार नेमेरे जीवनमें वह दृढ़ता उत्न की कि किसी आपति तथा संकट के आने पर भी मैंने अपने संकल्प को न त्यागा। एक समय मेरे पिताजी दीवानी मुकदमे में किसी पर दावा करके वकील से कह गए थे कि जो काम हो वह मुझसे करा लें कुछ आवश्यकता पड़ने पर वकील साहब ने मुझे बुला भेजा और कहा कि मैं पिताजी के हस्ताक्षर वकालतनामे पर कर दू मैंने तुरंत उत्तर दिया कि यह तो धर्म विरुद्ध होगा, इस प्रकार का पाप मैं कदापि नहीं कर सकता। वकील साहब ने बहुत समझाया कि मुकदमा खारिज हो जाएगा। किंतु मुझ पर कुछ भी प्भाव न हुआ, न मैने हस्ताक्षर किए। अपने जीवन मे हमेशा सत्य का आचरण करता था, चाहे कुछ हो जाए, सत्य बात कह देता था। ग्यारह वर्ष की उ्र में माताजी विवाह कर शाहजहापुर आई थीं उस समय वह नितांत अशिक्षित एक ग्रामीण कन्या के समान थीं शाहजहाॉपुर आने के थोड़़ दिनों बाद दादीजी ने अपनी छोटी बहन को बुला लिया। उन्होंने माताजी को गृहकार्य की

शिक्षा दी। थोड़़े दिनों में माताजी ने घर के सब काम-काज को समझ लिया और भोजनादि का ठीक-ठीक प्रबंध करने लगीं मेरे जन्म होने के पाँच या सात वर्ष बाद उन्होंने हिंदी पढ़ना आरंभ किया। पढ़ने का शौक उन्हें खुद ही पैदा हुआ था मुहल्े की सखी-सहेली जो घर पर आया करती थीं, उन्हीं में जो शिक्षित थीं, माताजी उनसे अक्षर-बोध करतीं। इस प्रकार घर का सब काम कर चुकने के बाद जो कुछ समय मिल जाता, उसमे पढ़ना-लिखना करती। परश्रम के फल से थोड़ दिनो में ही वह देवनागरी पुस्तकों का अध्ययन करने लगीं मेरी बहनों को छोटी आयु में माताजी ही शिक्षा दिया करती थीं जब से मैने आर्यसमाज में प्रेश किया, माताजी से खूब वात्तालाप होता। उस समय की अपेक्षा अब उनके विचार भी कुछ उदार हो गए है। यदि मुझे ऐसी माता न मिलतीं तो मै भी अति साधारण मनुष्यों की भाँति संसार-चक्र में फँसकर जीवन निवांह करता। शिक्षादि के अतिरिक्त क्रांतिकारी जीवन में भी उन्होंने मेरी वैसी ही सहायता की है, जैसी मेजिनी को उनकी माता ने की थी। माताजी का सबसे बड़ा आदेश मेरे लिए यही था कि किसी की प्राणहानि न हो। उनका कहना था कि अपने श्रु को भी कभी प्राणदंड न देना उनके इस पूर्ति करने के लिए मुझे मजबूरन दो-एक ब प्रति्ञा भंग करनी पड़ी थी। जन्मदात्री जननी! इस जीवन में तो तुम्हारा ऋण उतारने का प्रयत्न करने का भी अवसर न मिला। इस जन्म में तो क्या यदि मैं अनेक जन्मों में भी सारे जीवन प्रयलन करू तो भी तुमसे उक्रण नहीं हो सकता जिस प्रे तथा दृढ़ता के साथ तुमने इस तुच्छ जीवन का सुधार किया है, वह अवर्णनीय है मुझे जीवन की प्रत्येक घटना का स्मरण हैकि तुमने जिस प्रकार अपनी देववाणी का उपदेश करके मेरा सुधार किया है।

तुमहारी दया से ही मैंदेश-सेवा में संलमन हो सका धार्मिक जीवन में भी तुम्हरे ही प्रोत्साहन ने सहायता दी। जो कुछ शिक्षा मैने ग्रहण की उसका भी श्रेय तुम्हीं को है। जिस मनोहर रूप से तुम मुझे उपदेश करती थीं उसका स्मरण कर तु्हरी मंगलमयी मूर्ति का ध्यान आ जाता है और मस्तक झुक जाता है तु्हें यदि मुझेताइ़ना भी देनी हुई, तो बड़े स्ेह से हर बात को समझा दिया यदि मैंने धृष्टतापूर्ण उत्तर दिया तब तुमे प्रेम भरे शब्दोंमें यही कहा कि तु्हेंजो अच्छा लगे, वह करो, कितु ऐसा करना ठीक नहीं, इसका परिणाम अच्छा न होगा। जीवनदात्री! तुमने इस शरीर को जन्म देकर केवल पालन-पोषण ही नहीं किया बल्क आत्मिक, धार्मिक तथा सामाजिक उन्नति में तम्हीं मेरी सदैव सहायक रहीं जन्म-जन्मांतर परमात्मा ऐसी ही माता दें। महान से महान संकट में भी तुमने मुझे अधीर नहीं होने दिया। सदैव अपनी प्रेम भरी वाणी को सुनाते हुए मुझे सात्वना देती रहीं तुम्हारी दया की छाया में मैने अपने जीवन भर में कोई कष्ट अनुभव न किया। इस संसार मे मेरी किसी भी भोग-विलास तथा ऐश्वर्य की इच्छा नहीं केवल एक इच्छा है, वह यह कि एक बार शबद्ापूर्वक तुम्हारे चरणों की सेवा करके अपने जीवन को सफल बना लेता। किंतु यह इच्छा पूर्ण होती नहीं दिखाई देती और तुमहेंमेरी मृत्यु की दुखभरी खबर सुनाई जाएगी माँ! मुझे विश्वास है कि तुम यह समझ कर धैर्य धारण करोगी कितुमहा पुत्रमाताओं की माता या भारत माता की सेवा में अपने जीवन को बल-देवी की भेंट कर गया और उसने तुम्हारी कोख कलंकित न की, अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहा। जब स्वाधीन भारत का इतिहास लिखा जाएगा तो उसके किसी पृष्ठ पर उज्ज्वल अक्षों ें तुम्हारा भी नाम लिखा जाएगा। गुरुगोबिंद सिंह जी की धर्मपत्नी ने जब अपने पुत्रो की मृत्यु की खबर सुनी तो बहुत प्रसन्न हुई थीं और गु के नाम पर धर्म-रक्षार्थ अपने पुत्रं के बलिदान पर मिठाई बाँटी थी जन्मदात्री! वर दो कि अंतिम समय भी मेरा हृदय किसी प्रकार विचलित न हो और तुम्हरे चरण कमलों को प्रणाम कर मैं परमात्मा का स्मरण करता हुआ शरीर त्याग करूा।

लेखक से परिचय

भारत के स्वतंत्ता संग्रामें अने ्रांतिकारी वीों ने अपना बलिदान दिया। 'सरफरोशी की तमन्ना' जैसा तराना लिखने वाले रामप्रसाद बिस

्मल' भी उन्हीं क्रातिकारियों में से एक थो मात् तीस वर्षकी आयुमें ंग्रे सरकार द्वा उन्हें फ़ासी पर लटका दिया गया असाधारण प्रतिभा के धनी रामप्रसाद बिस्मिल' एक अच्छे कवि और लेखक भी थे उन्होने अनेक पुस्तकें लिखीं जिनमे उनकी आत्मकथा काफ़ी चर्ित रही मेरी माँ' उनकी आत्मकथा का ही एक अंश हैी


(1897–1927)

पाठ से

मेरी समझ से

(क) नीचे दए गए प्र्नो का सटीक उत्त कौन-साहै? उसके सामने तार (*) बनाए (1) किंतु यह इच्छा पूरण होती नहीं दिखाई देती। बिस्मिल को अपनी किस इच्छा के पूर्ण न होने की आशंका थी?

भारत माता के साथ रहने की अपनी प्रतिज्ञा पर दृढ़ रहने की अपनी माँ की जीवनपर्यंत सेवा करने की भोग विलास तथा ऐ्वर्य भोगने की

(2) रामप्रसाद बिस्मिल की माँ का सबसे बड़ा आदेश क्या था?

देश की सेवा करें कभी किसी के प्राण न लेना कभी किसी से छल न करना सदा सच बोलना

(ख) अब अपने मि्रो के साथ तर्कपूर्ण चर्चा कीजिए कि आपने ये ही उत्तर क्यो ुने?

पंक्तियों पर चर्चा

पाठ मे से चुनकर कुछ पंक्तयाँ नीचे दी गई हैं इनहें पढ़कर समझिए और इन पर विचार कीजिए। आपको इनका क्या अर्थ समझ में आया? कक्ा में अपने विचार साझा कीजिए और लिखिए।

(क) "यदि मुझे ऐसी माता न मिलतीं, तोमैं भी अति साधारण मनु्यों की भाँति संसार-चक्र में फँसकर जीवन निर्वंह करता।"
(ख) "उनके इस आदेश की पूर्ति करने के लिए मुझे मजबूरन दो-एक बार अपनी प्रतिज्ञा भंग भी करनी पड़ी थी।"

मिलकर करें मिलान

पाठ में से चुनकर कुछ शब्द नीचे दिए गए हैं अपने समूह में इन पर च्चा कीजिए और इन्हेंइनके सही अर्थ या संदभों से मिलाइए। इसके लिए आप शब्दकोश, इंटरनेट, पुस्तकालय या अपने शिक्षकों की सहायता ले सकते हैं।

शब्दअर्थ या संदर्भ
1.देवनागरी सिखों के दसवें और अंतिम गुरु थे उन्होंने खालसा पंथ की स्थापना की।
2.आर्यसमाज इटली के गुप्त राष्ट्वादी दल का सेनापति; इटली का मसीहा था जिसने लोगों को एक सूत् में बाँधा।
मेजिनी 3.O महर्ष दयानंद द्वारा स्थापित एक संस्था।
4.गोबिंद सिंह की एक भाषा-लिपि जिसमें हिंदी, संस्कृत, भारत मराठी आदि भाषाएँ लिखी जाती हैं।

सोच-विचार के लिए

पाठ को एक बार फिर से पढिए और दिए गएप्रनों के बरेमें पता लगाकर अपनी लेखन पुस्तिका में लिखिए

1 बिस्मल की माता जी जब ब्याह कर आई तो उनकी आयुकाफ़ी कम थी।

(क) फिर भी उन्होने स्वयं को अपने परिवार के अनुकूल कैसे ढाला? (ख) उन्होंने अपनी इच्छाशक्त के बल पर स्वयं को कैसे शिक्षित किया?

2.बिस्मल को साहसी बनाने में उनकी माता जी ने कैसे सहयोग दिया?

  1. आज से कई दशक पहले बिस्मल की माँ शिक्षा के महत्व को समझती थीं, बताइए कैसे?

4.हम कैसे कह सकते है कि बिस्मिल की माँ स्वतंत्रऔर उदार विचारों वाली थीं?

आत्मकथा की रचना

यह पाठ रामप्रसाद बिस्मल' की आत्मकथा का एक अंश है आत्मकथा यानी अपनी कथा। दुनिया में अनेक लोग अपनी आत्मकथा लिखते हैं कभी अपने लिए, तो कभी दूसरों के पढ़ने केलिए।

(क) इस पाठ को एक बार फिर से पढिए और अपने-अपने समूह में मिलकर इस पाठ की ऐसी पंक्तियों की सूची बनाइए जिनसे पता लगे कि लेखक अपने बारे में कह रहा है। (ख) अपने समूह की सूची को कक्षा में सबके साथ साझा कीजिए।

शब्द-प्रयोंग तरह-तरह के

(क ) "माता जी उनसे अक्षर-बोध करतीं " इस वाक्य में अक्षर-बोध का अर् है—अक्षर का बोध या जञान।

एक अन्य वाक्य देखिए"जो कुछ समय मिल जाता, उसमें पढ़ना-लिखना करतीं" इस वाक्य में पढ़ना-लिखना अरथात पढ़ना और लिखना।

हम लेखन में शब्दों को मिलाकर छोटा बना लेतेहैंजिससे समय, स्याही, कागज़ आदि की बचत होती है संक्षेपीकरण मानव का स्वभाव भी हैं इस पाठ से ऐसे शब्द खोजकर

सू्ची बनाइए।

आपकी बात

(क) रामप्रसाद बिस्मल' के मित्रं के नाम खोजिए और स्वतंत्रता आंदोलन में उनकी भागीदारी पर कक्षा में चर्चा कीजिए।

(ख) नीचे लिखे बिंदुओं को आधार बनाते हुए अपनी माँ या अपने अभिभावक से बातचीत कीजिए और उनके बारे में गहराई से जानिए कि उनका प्रय रंग, भोज्य पदार्थ, गीत, बचपन की यादे, प्रिय स्थान आदि कौन-कौन से थे?

उदाहरण के लिए—

आपका जन्म कहाँ हुआ था?

आपकी प्रि पुस्तक का नाम क्या है?

पुस्तकालय या इंटरनेट से

आप पुस्तकालय से रामप्रसाद बिस्मल' की आत्मकथा खोजकर पढिए। देशभक्तं से संबंधित अन्य पुस्तकें, जैसे— उनके पत्र आत्मकथा, जीवनी आदि पढिए और अपने मित्रो से साझा कीजिए।

शब्दों की बात

आप अपन माँ को क्या कहकर संबोधित करते हैं? अन्य भाषाओ मेंमाँ के लिएप्युक्त संबोधन
और मा के लिए शब् दूँढिए
क्या उनमें कुछ समानता दिखती है? हाँ, तो क्या?

आज की पहेली

यहाँ दी गई वर्ग पहेली में पाठ से बारह विशेषण दिए गए हैं उन्हें छाटकर पाठ में रेखांकित कीजिए

मंयी
प्रत्येनोछोटी
धाग्याखू
म्मिसाधाडा
दुरी
हास्वाधी

झरोखे से

ऐ मातृभूमि!

ऐमातृभूमि! तेरी जय हो, सदा विजय हो। प्रत्येक भक्त तेरा, सुख-शांति-कांतिमय हो। अज्ञान की निशा मे, दुख से भरी दिशामें संसार के हृद में तेरी प्रा उदय हो। तेरा प्रकोप सारे जग का महाप्रलय हो तेरी प्रसन्नता ही आनंद का विषय हो वह भक्त दे कि बिस्मिल सुख मेंतुझे न भूले, वह शक्त दे कि दुख में कायर न यह हृदय हो। रामप्रसाद बिस्मल'

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