Do Gauraiya - CBSE Class 8 Hindi Notes

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Chapter Study Guide & Summary

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Key Concepts & Syllabus Topics

Important Definitions & Terminology

Do Gauraiya Overview
The central theme and foundational concept covered in Class 8 Hindi Chapter 2, emphasizing conceptual clarity, NCERT curriculum alignment, and exam readiness.
NCERT Curriculum Alignment
Structured study material adhering strictly to CBSE board guidelines, learning objectives, and standardized assessment criteria for Class 8.
Active Recall & Revision
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Quick Revision & Key Points

Full NCERT Chapter: Do Gauraiya

दो गौरिया

घर में हम तीन ही व्यक्त रहते है—माँ, पिताजी और मैं। पर पिताजी कहते हैं कि यह घर सराय बना हुआ है। हम तो जैसे यहाँ मेहमान हैं, घर के मालिक तो कोई दूसरे ही हैं।

आगन में आम का पेड़है तरह-तरह के पक्षी उस पर डेरा डाले रहते हैं। जो भी पक्षी पहाड़ियों घाटियों पर से उड़ता हुआ दिल्ली पहुँचता है पिताजी कहते है वही सीधा हमारे घर पहुंच जाता है, जैसे हमरे घर का पता लिखवाकर लाया हो। यहाँ कभी तोते पहुँच जाते है, तो कभी कौवे और कभी तरह-तरह की गौरेयाँ। वह शोर मचता है कि कानों के पर्द फट जाएँ पर लोग कहते हैं कि पक्षी गा रहे हैं।

घर के अंदर भी यही हाल है बीसियों तो चूहे बसते हैं रात-भर एक कमरे से दूसरे कमरे में भागते फिरते हैं। वह धमा-चौकड़ी मचती है कि हम लोग ठीक तरह से सो भी नहीं पाते। बर्तन गिरते हैं डिब्बे खुलते हैं प्याले टूटते हैं एक चूहा अँगीठी के पीछे बैठना पसंद करता है, शायद बूढ़ा है उसे सदी बहुत लगती है। एक दूसरा है जिसे बाथरूम की टंकी पर चढ़कर बैठना पसंद है उसे शायद गरमी बहुत लगती है। बिल्ली हमारे घर में रहती तो नहीं मगर घर उसे भी पसंद है और वह कभी-कभी झाँक जाती है।

मन आया तो अंदर
आकर दध पी गई, न मन
आया तो बाहर से ही 'फिर
आऊँगी' कहकर चली जाती
है। शाम पड़ते ही दो-तीन चमगादड़
कमरों के आर-पार पर फैलाए कसरत
करने लगते हैं घर में कबूतर भी हैं दिन-भर
गुटर-गूँ गुटर-गू' का संगीत सुनाई देता रहता है

इतने पर ही बस नहीं, घर में छिपकलियाँ भी हैं और बे भी हैं और चींटियों की तो जैसे फौज ही

छावनी डाले हुए है।

अब एक दिन दो गौरिया सीधी अंदर घुस आई और बिना पछे उड़-उड़कर मकान देखने लगीं। पिताजी कहनेलगे कि मकान का निरीक्षण कर रही हैं कि उनके रहने योग्य है या नहीं। कभी वे किसी रोशनदान पर जा बैठतीं, तो कभी खिड़की पर। फिर जैसे आई थीं वैसे ही उड़ भी गईं पर दो दिन बाद हमने क्या देखा कि बैठक की छत में लगे पंखे के गोले में उ्होंने अपना
बिछावन बिछा लिया है और सामान भी ले आई हैं और मजे से दोनो

बैठी गाना गा रही हैं जाहिर है उन्हें घर पसंद आ गया था माँ और पिताजी दोनों सोफे पर बैठे उनकी ओर देखे जा रहे थे थोड़ी देर बाद माँ सिर हिलाकर बोली, "अब तो ये नहीं उड़ेगी। पहले इन्हे उड़ा देते, तो उड़ जाती। अब तो इन्होंने यहाँ घोंसला बना लिया है"

इस पर पिताजी को गुस्सा आ गया। वह उठ खड़े हुए और बोले, "देखता हूँ ये कैसे यहाँ रहती हैं! गौरियाँ मेरे आगे क्या चीज है! मैं अभी निकाल बाहर करता हूँ" "छोड़ो जी, चूहों को तो निकाल नहीं पाए, अब चिड़ियों को निकालेंगे!" माँ न व्यंग्य से कहा

माँ कोई बात व्यंगय में कहें तो पिताजी उबल पड़तेहैं वह समझते हैं कि माँ उनका मजाक उड़ा रही हैं वह फौरन उठ खड़े हुए और पंखे के नीचे जाकर जोर से ताली बजाई और मुह से श..शू' कहा, बाँहे झुलाई, फिर ख़े-ख़ कूदने लगे, कभी बाहें झुलाते, कभी 'श..शू' करते। गौरैयों ने घोंसले े से सिर निकालकर नीचे की ओर झॉककर देखा और दोनों एक साथ चीं-चीं' करने लगीं। और माँ खिलखिलाकर हँंसने लगीं।

पिताजी को गुस्सा आ गया, "इसमे हूंने की क्या बात है?"

मॉँ को ऐसे मौकों पर हमेशा मजाक सूझता है हँंसकर बोली, "चिड़ियाँ एक-दूसरे से पूछ रही है कि यह आदमी कौन है और नाच क्यों रहा है?" 1

तब पिताजी को और भी ज्यादा गस्सा आ गया और वह पहले से भी ज्यादा ऊँचा कूदने लगे।

गौरैयाँ घोसले में से निकलकर दूसरे पंखे के डैने पर जा बैठीं उन्हें पिताजी का नाचना जैसे बहुत पसंद आ रहा था माँ फिर हँंसने लगीं, "्े निकलेंगी नहीं जी। अब इन्होने अंडे दे दिए होग"

"निकलेंगी कैसे नहीं?" पिताजी बोले और बाहर से लाठी उठा लाए। इसी बीच गौरियाँ फिर घोंसले में जा बैठी थीं उन्होंने लाठी ऊँची उठाकर पंखे के गोले को ठकोरा। 'चीं-चीं' करती गौरैयाँ उड़कर पर्द के डंडे पर जा बैठीं।

"इतनी तकलीफ करने की क्या जरूरत थी। पंखा चला देते, तो ये उड़ जातीं" माँ ने हँंसकर

पिताजी लाठी उठाए पर्द के डंडे की ओर लपके। एक गौरैया उड़कर किचन के दरवाजे पर जा बैठी। दूसरी सीढ़ियों वाले दरवाजे पर।

माँ फिर हंस दी "तुम तो बड़ समझदार हो जी, सभी दरवाजे खुले हैं और तुम गौरयों को बाहर निकाल रहे हो एक दरवाजा खुला छो़ो, बाकी दरवाजे बंद कर दो। तभी ये निकलेगी।" अब पिताजी ने मुझे झड़ककर कहा, "तू खड़ा क्या देख रहा है? जा, दोनों दरवाजे बंद कर दे!"

मैने भागकर दोनों दरखाज बंद कर दिए केवल किचन वाला दरवाजा खुला रहा

पिताजी ने फिर लाठी उठाई और गौरियों पर हमला बोल दिया एक बार तो झूलती लाठी माँ के सिर पर लगते-लगते बची। चीं-चीं करती चिड़ियाँ कभी एक जगह तो कभी दूसरी जगह जा बैठतीं। आखिर दोनों किचन की ओर खुलने वाले दरवाजे में से बाहर निकल गईं माँ तालियाँ बजाने लगीं पिताजी ने लाठी दीवार के साथ

टिकाकर रख दी और छाती फैलाए कुसी पर आ बैठे

"आज दरवाजे बंद रखो" उन्होने हु्म दिया "एक दिन अंदर नहीं घुस पाएँगी, तो घर छोड़ देंगी।"

तभी पंखे के ऊपर से चीं-चीं की आवाज सुनाई पड़ी। और माँ खिलखिलाकर हूँस दी मैने सिर उठाकर ऊपर की ओर देखा, दोनों गौरैयाँ फिर से अपने घोंसले मे मौजूद थीं।

"दरवाजे के नीचे से आ गई है" माँ बोलीं मैने दरवाजेके नीचे देखा। सचमुच दरवाजो के नीचे थोड़ीथोड़ी जगह खाली थी

पिताजी को फिरगुस्सा आ गया माँ मद तो करती नहीं थीं, बैठी हँसे जा रही थीं

अब तो पिताजी गौरैयों पर पिल पड़ी उन्होने दरवाजों के नीचे कपड़ ूँंस दिए ताकि कहीं कोई छेद बचा नहीं रह जाए। और फिर लाठी झुलाते हुए उन पर टूट पड़ी चिड़ियाँ चीं-चीं करती फिर बाहर निकल गई पर थोड़ी ही देर बाद वे फिर कमरे मे मौजूद थीं अबकी बार वे रोशनदान में से आ गई थीं जिसका एक शीशा टूटा हुआ था।

"देखो—जी, चिड़ियों को मत निकालो," माँ ने अबकी बार गंभीरता से कहा, अब तो इन्होंने अंडे भी दे दिए होंगे। अब ये यहाँ से नहीं जाएंगी

"क्या मतलब? मैं कालीन बरबाद करवा लूँ?" पिताजी बोले और कुसी पर चढ़कर रोशनदान में कपड़ा टूस दिया और फिर लाठी झुलाकर एक बार फिर चिड़ियों को खदेड़ दिया दोनो पिछले आँगन की दीवार पर जा बैठीं

इतने में ात पड़ गई हम खाना खाकर ऊपर जाकर सो गए जाने से पहले मैने आँगन में झककर देखा, चिड़ियाँ वहाँ पर नहीं थीं मैने समझ लिया कि उन्हें अक्ल आ गई होगी। अपनी हार मानकर किसी दूसरी जगह चली गई होंगी

दूसरे दिन इतवार था। जब हम लोग नीचे उतरकर आए तो वे फिर से मौजूद थीं और मजे से बैठी मल्हार गा रही थीं पिताजी ने फिर लाठी उठा ली उस दिन उनहेंगरयों को बाहर निकालने में बहत देर नहीं लगी।

अब तो रोज यही कुछ होने लगा। दिन में तो वे बाहर निकाल दी जाती पर रात के वक्त जब हमा सो रहे होते, तो न जाने किस रासते सेवे अंदर घुस आतीं।

पिताजी पेशान हो उठे आखिर कोई कहाँ तक लाठी झुला सकता है? पिताजी बार-बार कहे, "मैं हार मानने वाला आदमी नहीं हू" पर आखिर वह भी तंग आ गए थे आखिर जब उनकी सहनशीलता चुक गई तो वह कहने लगे कि वह गौरियों का घोंसला नोचकर निकाल देगे। और वह फौरन

ही बाहर से एक स्टूल उठा लाए

घोसला तोड़ना कठिन काम नहीं था। उन्होंने पंखे के नीचे फर्श पर स्टूल रखा और लाठी लेकर स्टूल पर चढ़ गए "किसी को सचमुच बाहर निकालना हो, तो उसका घर तोड़़ देना चाहिए," उन्होंे गुस्सो से कहा।

घोंसले में से अनेक तिनके बाहर की ओर लटक रहे थे, गौरैयों ने सजावट के लिए मानो झालर टाँग रखीहो। पिताजी ने लाठी का सिरा सूखी घास के तिनकों पर जमाया और दाई ओर को खीँंचा। दो तिनके घोंसले में से अलग हो गए और फरफराते हुए नीचे उतरने लगे। "चलो, दो तिनके तो निकल गए" माँ हँसकर बोलीं, "अब बाकी दो हजार भी निकल जाएंगे!" तभी मैने बाहर आँगन की ओर देखा और मुझे दोनों गौरैया नजर आई दोनों चुपचाप दीवार पर बैठी थीं इस बीच दोनों कुछ-कुछ दुबला गई थीं, कुछ-कुछ काली पड़ गई थीं। अब वे चहक भी नहीं रही थीं।

अब पिताजी लाठी का सिरा घास के तिनकों के ऊपर रखकर वहीं रखे-रखे घुमाने लगे। इससे घोंसले के लंबे-लंबे तिनके लाठी के सिरे के साथ लिपटने लगे। वे लिपटते गए, लिपटते गए और घोंसल

लाठी के इद्द-गिर्द खिंचता चला आने लगा। फिर वह खींच-खींचकर लाठी के सिरे के इद्द-गर्द लपेटा जाने लगा। सूखी घास और रुई के फाहे और धागे और थिगलियाँ लाठी के सिरे पर लिपटने लगीं। तभी सहसा जोर की आवाज आई, "चीं-ची, चीं-चीं!"

पिताजी के हाथ ठिठक गए। यह क्या? क्या गौरियाँ लौट आई हैं मैंने झट से बाहर की ओर देखा नहीं, दोनों गौरैयाँ बाहर दीवार पर गुमसुम बैठी थीं

"चीं-चीं, ची-ची!" फिर आवाज आई। मैने ऊपर देखा। पंखे के गोले के ऊपर से न्हीं-न्हीं गौरैयाँ सिर निकाले नीचे की ओर देख रही थीं और चीं-चीं किए जा रही थीं अभी भी पिताजी के हाथ में लाठी थी और उस पर लिपटा घोसले का बहुत-सा हिस्सा था न्हीं-न्हीं दो गौरैयाँ वे अभी भी झाँके जा रही थीं और चीं-चीं करके मानो अपना परिचय दे रही थीं, हम आ गई हैं हमारे माँ-बाप कहाँ हैं?

मैं अवाक उनकी ओर देखता रहा। फिर मैने देखा, पिताजी स्टूल पर से नीचे उतर आए हैं और घोंसले के तिनकों में से लाठी निकालकर उन्होंने लाठी को एक ओर रख दिया है और चुपचाप कुसी पर आकर बैठ गए हैं इस बीच माँ कुसी पर से उठीं और सभी दरवाजे खोल दिए। न्हीं चिड़ियाँ अभी भी हाॉफ-हॉफकर चिल्लाए जा रही थीं और अपने माँ-बाप को बुला रही थीं।

उनके माँ-बाप झट-से उड़कर अंदर आ गए और चीं-चीं करते उनसे जा मिले और उनकी न्हीं-न्हीं चोंचोंमें चुग्गा डालने लगे। माँ-पिताजी और मैं उनकी ओर देखते रह गए। कमरे में फिर से शोर होने लगा था, पर अबकी बार पिताजी उनकी ओर देख-देखकर केवल मुसकराते रहे

—भीष्म साहनी

लेखक से परिचय


(1915–2003)

भीष्म साहनी हिंदी साहित्य के बहुमुखी प्रतिभा के लेखक थे उन्होने अपनी कहानियों में देश विभाजन और मानवीय मूल्यों की मार्मिक अभिव्यक्त की है उनके प्रसिद्ध उपन्यास तमस पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया था साहित् में उनके योगदान के लिए

उन्हेंभारत सरकार न पद्म भूषण से अलंकृत किया था बच्चों के लिए उन्होने गुलेल का खेल' आदि कई कहानियाँ लिखी हैं।

आइए, अब हम इस कहानी को थोड़ी और स्पष्टता से समझते हैं नीचे दी गई गतिविधियाँ इस कार् में आपकी सहायता करेंगी।

मेरी समझ से

(क) निन्नलिखित प्रनों े उपयुतउत्तरके समुख ता () नाए कछ पर्नोंके एक से अधिक उत्तर भी हो सकते हैं।

(1) पिताजी ने कहा कि घर सराय बना हुआ है क्योंकि • घर की बनावट सराय जैसी बहुत विशाल है 0 घर में विभिन्न पक्षी और जीव-ंत रहते है पिताजी और माँ घर के मालिक नहीं हैं 0 घर में विभि्न जीव-जंतु आते-जाते रहते है (2) कहानी मे 'घर के असली मालिक' किसे कहा गया है?

0 माँ और पिताजी को जिनका वह मकान है लेखक को जिसने यह कहानी लिखी है जीव-जंतुओं को जो उस घर में रहते थे 0 मेहमानों को जो लेखक से मिलने आते थ (3) गौरियों केप्रतिमा और पिताजी की प्रतिक्रियाएँ कैसी थीं?

• दोनों ने खुशी से घर में उनका स्वागत किया 0 पिताजी ने उन्हें भगाने की कोशिश की लेकिन माँ ने मना किया दोनों ने मिलकर उन्हें घर से बाहर निकाल दिया माँ ने उन्हें निकालने के लिए कहा लेकिन पिताजी ने घर में रहने दिया (4) माँबार-बार पिताजी की बातों पर मुसकराती और मजाक करती थीं। इससे क्या पता चलता है?

. माँ चाहती थीं कि गौरियाँ घर से भगाई न जाएँ माँ को पिताजी के प्रयत व्यर्थ लगते थे माँ को गौरियों की गतिविधियों पर हँसी आ जाती थी माँ को दूसरो पर हँसना और उपहास करना अच्छा लगता था (

  1. कहानी मेंगौरयों के बार-बार लौटने को जीवन के किस पहलू से जोड़ा जा सकता है?

दूसरों पर निर्भर रहना असफलताओं से हार मान लेना अपने प्रयास को निरंतर जारी रखना संघर्ष को छोड़कर नए रास्ते अपनाना

(ख) हो सकता है कि आपके समूह के साथियोंने अलग-अलग उत्तर चुने हों। अपने मितरों के साथ विचार कीजिए कि आपने ये उत्त ही क्यो चुने?

मिलकर करे मिलान

(क) पाठ मेंसे चुनकर कुछ वाक्य नीचे दिए गए है प्र्येक वाकय के सामने दो-्दो अर्थ दिए गए हैं अपने समूह में इन पर चर्चा कीजिए और इन्हे इनके सबसे उपयुक्त अर् से मिलाइए।

क्रम
वाक्य अर्थवह शोर मचता है कि कानों के पर्द• पकषियों का शोर बहुत तेज होता है लेकिन लोग उसे संगीत की तरह सराहत हंफट जाएँ पर लोग कहते हैं कि पक्षी . पिताजी को पक्षियों का चहकना शोर जैसा लगता था लेकिन लोगों को वहगा रहे हैं! संगीत जैसा लगता था।
1.
2.आगन में आम का पेड़ है। तरह-तरह आम के पेड़ पर अलग-अलग प्रकार के पक्षी हर समय निवास करते हैं।के पक्षी उस पर डेरा डाले रहते हैं। पक्षी पेड़ पर तंबू लगाकर रहते हैं जैसे किसी मेले में डेरा डाला जाता है।
3.वह धमा-चौकड़ी मचती है कि हम पिताजी की भागदौड़ और शोर इतना होता है कि घर के चूहे चैन से सोलोग ठीक तरह से सो भी नहीं पाते। नहीं पाते।चूहों की भागदौड़ और शोर इतना होता है कि घर के लोग चैन से सो नहीं पाते।
4.वह समझते हैं कि माँ उनका मजाक पिताजी माँ का मजाक समझ जाते हैं।उड़ा रही हैं। पिताजी को ऐसा श्रम होने लगता है कि माँ उनकी चेष्टाओं का उपहास कररही हैं।
5.पिताजी ने लाठी दीवार के साथ . पिताजी ने लाठी एक ओर रख दी और गव् से, विजयी मुद्र मे बैठ गए।टिकाकर रख दी और छाती फैलाए . पिताजी की छाती और साँस फूुलने लगी और उन्होंने लाठी एक ओरकुर्सी पर आ बैठे। रख दी
6.इतने में रात पड़ गई। रात किसी भारी चीज की तरह ऊपर से गिर पड़ी।कहानी की घटनाओं के बीच धीरे-धीरे रात हो गई और अँधेरा छा गया।
7.जब हम लोग नीचे उतरकर आए तो • गौरयाँ फिर से लौट आई थीं और शांत व प्रसन्न भाव से चहचहा रही थींवे फिर से मौजूद थीं और मजे से बैठी जैसे कोई राग गा रही हों।मल्हार गा रही थीं। गौरेयाँ शास्त्ीय संगीत का अभ्यास कर रही थीं और 'राग मल्हार' गा रही थीं।

() अपने उतर को अपने मित्ोंकेउत्त से मिलाइए और विचार कीजिए क आपने कौन-से अ्थ का चुनाव किया है और क्यों?

पंक्तियों पर चर्चा

पाठ में े चुनकर कुछ पंक्तिया नीचे दी गई हैं इ्हे ध्यानपूर्वक पढिए और इन पर विचार कीजिए। आपको इनका क्या अर्थ समझ में आया? अपने विचार अपने समूह में साझा कीजिए और लिखिए।

(क) "अब तो ये नहीं उड़ंगी। पहले इ्हें उड़ा देते, तो उड़ जातीं अब तो इन्होंने यहाँघोसला बना लिया है" (ख) "एक दिन अंदर नहीं घुस पाएँगी, तो घर छोड़ देगी।" (ग)"किसी को सचमुच बाहर निकालना हो, तो उसका घर तोड़़ देना चाहिए" λ

सोच-विचार के लिए

पाठ को पुन: ध्या से पढिए, पता लगाइए और लिखिए।

(क) आपको कहानी का कौन-सा पात्र सबसे अच्छा लगाघर पर रहने आई गौरैयाँ, माँ, पिताजी, लेखक या कोई अन्य प्राणी? आपको उसकी कौन-कौन सी बाते अच्छी लगीं और क्यो?
(ख) लेखक के घर में चिड़िया ने अपना घोंसला कहाँ बनाया? उसने घोंसला वहीं क्यों बनाया होगा?
(ग) क्या आपको लगता है कि पशु-पक्षी भी मनुष्यों के समान परिवार और घर का महत्व समझतेहैं? अपने उत्तर के समर्थन में कहानी से उदाहरण दीजिए
(घ) "अब मै हार मानने वाला आदमी नहींहूं" इस कथन से पिताजी के स्वभाव के कौन-से गुण उभरकर आते हैं?
(ड) कहानी में गौरियों के व्यवहार में कब और कैसा बदलाव आया? यह बदलाव क्यों आया? (संकेत—कहानी में खोजिए कि उन्होंने गाना कब बंद कर दिया?)
(च) कहानी में गौरयाँ ने किन-किन स्थानों से घर मे प्रेश किया था? सूची बनाइए
(छ) इस कहानी को कौन सुना रहा है? आपको यह बात कैसे पता चली?
(ज) माँ बार-बार क्यों कह रही होंगी कि गौरैयाँ घर छोड़कर नहीं जाएँगी?

अनुमान और कल्पना से

(क) कल्पना कीजिए कि आप उस घर में रहतेहै जहाँ चिड़िाँ अपना घर बन रही हैं अपने घर में उ्हें देखकर आप क्या करते?
(ख) मान लीजिए कि कहानी में चिड़िया नहीं, बल्क नीचे दिए गए प्राणियों में से कोई एक प्राणी घर में घुस गया है। ऐसे में घर के लोगों का व्यवहार कैसा होगा? क्यों? (प्राणियों के नाम—चूहा, कुत्ा, मच्छर, बिल्ली, कबूतर, कॉकरोच, तितली, मक्खी)
(ग) "मैं अवाक उनकी ओर देखता रहा" लेखक को विस्मय या हैरानी किसे देखकर हुई? उसे विस्मय क्यों हुआ होगा?
(घ) "माँ मद तो करती नहीं थीं बैठी हंँसे जा रही थीं" माँ ने गौरेयों को निकालने में पिताजी की सहायता क्यों नहीं की होगी?
(ड) "एक चूहा अगीठी के पीछे बैठना पसंद करता है, शायद बूढ़ाहै उसे सदीं बहुत लगती है" लेखक ने चूहे के विशेष व्यवहार से अनुमान लगाया कि उसे सदी लगती होगी। आप भी किसी एक अपरिचित व्यक्ति या प्राणी के व्यवहार को ध्यान से देखकर अनुमान लगाइए कि वह क्या सोच रहा होगा, क्या करता होगा या वह कैसा व्यक्त होगा आदि (संकेतआपको उसके व्यवहार पर ध्यान देना है, उसके रंग-रूप या वेशभूषा पर नहीं)
(च) "पिताजी कहते हैं कि यह घर सराय बना हुआ है।" सराय और घर में कौन-कौन से अंतर होते होंगे?

संवाद और अभिनय

नीचे दी गई स्थितियों के लिए अपने समूह में मिलकर अपनी कल्पना से संवाद लिखिए और बातचीत को अभिनय द्वार प्र्तुत कीजिए

(क) "वे अभी भी झाँके जा रही थीं और चीं-ची करके मानो अपना परिचय दे रही थी, हम आ गई हैं हमरे माँ-बाप कहा हैं" न्हीं-न्हीं दो गौरिया क्या-क्या बोल रही होंगी?
(ख) "चिड़ियाँ एक-दूसरे से पूछ रही हैं कि यह आदमी कौन है और नाच क्यों रहा है?" घोसले से झॉकती गौरयाँ क्या-क्या बातें कर रही होंगी?
(ग) "एक दिन दो गौरया सीधी अंदर घुस आई और बिना पूछे उड़-उड़कर मकान देखने लगीं" जब उन्होने पहली बार घर में प्रवेश किया तो उन्होने आपस में क्या बातें की होंगी?
(घ) "उनके मा-बाप झट से उड़कर अंदर आ गए और चीं-चीं करते उनसे जा मिले और उनकी न्हीं-न्हीं चोंचों में चुगा डालने लगे।" गौरैयों और उनके बच्चों

बदली कहानी

मान लीजिए क घोसले में डों स ब्चे न निकले होते। ऐसेमें कहानी आगे कैसे बढती? यह बदली हुई कहानी लिखिए।

कहने के ढंग/क्रिया विशेषण

"माँ खिलखिलाकर हॅँस दीं"

इस वाक्य में खिलखिलाकर' शब्द बता रहा है कि माँ कैसे हँंसी थीं कोई कार्य कैसे किया गया है, इसे बताने वाले शब्द क्रिया विशेषण' कहलाते हैं 'खिलखिलाकर' भी एक क्रिया विशेषण शब्द है।

अब नीचे दिए गए रेखांकित शब्दों पर ध्यान दीजिए इन शब्दों का प्रयोग करते हुए अपने मन से वाक्य बनाइए।

(क) पिताजी ने झिड़ककर कहा, "तू खड़ा क्या देख रहा है?" 5 (ख) "देखो जी, चिड़यों को मत निकालो", माँ ने अबकी बार गंभीरता से कहा। (ग) "किसी को सचमुच बाहर निकालना हो, तो उसका घर तोड़ देना चाहिए"', उन्होंने गुस्स में कहा।

अब आप इनसे मिलतेजुलते कुछ और क्िा विशेषण शब् सोचिए और उनका प्यो करते हुए कुछ

वाक्य बनाइए।

(संकेत—धीर से, जोर से, अटकते हुए, चिल्लाकर, शरमाकर, सहमकर, ुसफुसाते हुए आदि)

घर के प्राणी

कहानी में आपने पढ़ा कि लेखक के घर में अनेक प्ाणी रहते थे लेखक ने उनका वर्णन ऐसे किया है जैसे वे भी मनुषयों की तरह व्यवहार करते हैं कहानीमें से चुनकर उन प्राणियों की सूची बनाइए और बताइए कि वे मनुष्यों जैसे कौन-कौन से काम करते थे?

(क) बिल्ली फिर आऊँंगी' कहकर चली जाती है।

हेर-फेर मात्रा का

"माँ और पिताजी दोनों सोफे पर बैठे उनकी ओर देखे जा रहे थे"

"पहले इन्ें उड़ा देते, तो उड़ जाती"

उपर्युक्त वाक्यो मेंरेखांकित शब्दों पर ध्यान दीजिए। आपने ध्यान दिया होगा कि शब्द में एक मात्रा-भर के अंतर से उसके अर्थ में परिवर्तन हो जाता है।

अब नीचे दिए गएशब्दोंकी मा्राओं और अथयं े अंतर प ध्या दीजिए इ शब्दोंक प्यो कते हए अपने मन से वाक्य बनाइए

नाच-नाचा-नचा • हार-हरा-हारा पिता-पीता चूक-चुक • नीचा-नीचे • सहसा-साहस

वाद-विवाद

कहानी में माँ ्वारा कही गई कुछ बातें नीचे दी गई हैं

"अब तो ये नहीं उड़ंगी पहले इनहें उड़ादेते, तो उड़ जातीं"

"एक दरवाजा खुला छोड़ो बाकी दरवाजे बंद कर दो। तभी ये निकलेंगी।"

"देखो जी, चिड़यों को मत निकालो। अब तो इ्हंने अंडे भी दे दिए होंगे। अब यहाँ से नहीं जाएँगी।"

कक्षा में एक वाद-विवाद गतिविधि का आयोजन कीजिए। वाद-विवाद का विषय है

"माँ चिड़ियों को घर से निकालना चाहती थीं"

कक्षा में आधे समूह इस कथन के पक्ष में और आधे समूह इसके विपक्ष में तक देगे

कहानी की रचना

"कमर में फिर से शोर होने लगा था, पर अबकी बार पिताजी उनकी ओर देख-देखकर केवल मुसकराते रहे" इस पंक्त में बताया गया है कि पिताजी का दृष्टिकोण कैसे बदल गया। इस प्रकार यह विशेष वाक्य है। इस तरह के वाक्यों से कहानी और अधिक प्रभावशाली बन जाती है।

(क) आपको इस कहानी मेंऐसी अनेक विशेषताएँ दिखाईदेंगी उन्हेंअपने समूह के साथ मिलकर ढूँढ़िए और उनकी सूची बनाइए। (ख) इस कहानी की कुछ विशेषताओं को नीचे दिया गया है इनके उदाहरण कहानी मेंसे चुनकर लिखिए।

आपकी बात

कहानी की विशेषताएँकहानी में से उदाहरण
1. किसी बात को कल्पना से बढ़ा-चढ़ाकर कहनाजो भी पक्षी पहाड़ियों-घाटियों पर से उड़ता हुआ दिल्ली पहुँचता है,पिताजी कहते हैं वही सीधा हमारे घर पहुँच जाता है, जैसे हमारे घरका पता लिखवाकर लाया हो।
2. हास्य यानी हँसी-मज़ाक का उपयोग किया जाना
3. सोचा कुछ और, हुआ कुछ और
4. दूसरों के मन के भावों का अनुमान लगाना
5. किसी की कही बात को उसी के शब्दों में लिखनाL
6. किसी प्रणी या उसके कार्य को कोई अन्य नामदेना
7. किसने किससे कोई बात कही, यह सीधे-सीधेबताए बिना उस संवाद को लिखना7

पाठ से आगे

(क) "ौरेयों न घोंसले में से सिर निकालकर नीचे की ओर झॉककर देखा और दोनों एक साथ 'चीं-चीं करने लगीं" आपने अपने घर के आस-पास पक्षियों को क्या-क्या करते देखा है? उनके व्यवहार में आपको कौन-कौन से भाव दिखाई ेतेहैं

(ख) "कमर में फिर से शोर होने लगा था, पर अबकी बार पिताजी उनकी ओर देख-देखकर केवल मुसकराते रहे'" कहानी के अंत में पिताजी गौरियों का अपने घर में रहना स्वीकार कर लेते हैं क्या आप भी कोई स्थान या वस्तु किसी अन्य के साथ साझा करते हैं? उनके बारे में बताइए। साझेदारी में यदि कोई समस्या आती है तो उसे कैसे हल करते हैं?

(ग) परिवार के लोग गौरियों को घर से बाहर भगाने की कोशिश करते हैं कितु गौरैयो के बच्चों के कारण उनका दृष्टिकोण बदल जाता है क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि किसी को देखकर या किसी से मिलकर आपका दृष्टिकोण बदल गया हो?

चिड़ियों का घोंसला

घोसला बनाना चिड़ियों के जीवन का एक सामान्य हिस्सा है विभिन्न पक्षी अलग-अलग तरह के घोंसले बनाते हैं। इन घोसलों में वे अपने अंडे देते हैं और अपने चूजों को पालते हैं।

(क) अपने आस-पास विभिन्न प्रकार के घोंसले ढूंढ़िए और उन्हें ध्यान से देखिए और नीचे दी गई तालिका को पूरा कीजिए। (सावधानी— उन्हे हाथ न लगाएँ अन्यथा पक्षियों, उनके अंडों और आपको भी खतरा हो सकता है)

क्रम संख्याघोंसले को कहाँ देखाघोंसला किन चीजों से बनाया गया थाघोंसला खाली था या नहींघोंसला किस पक्षी का था
oudhed
VCEXT

(ख) विभिन्न पक्षियों के घोंसलों के संबंध में एक प्र्तुति तैयार कीजिए। उसमें आप चाहें तो उनके चित्र और थोड़ी रोचक जानकारी सम्मिलित कर सकते हैं।

मल्हार

"जब हम लोग नीचे उतरकर आएँ तो वे फिर से मौजूद थीं और मजे से बैठी मल्हार गा रही थीं" मल्हार' भारतीय शास्रीय संगीत के एक प्रसिद्ध राग का नाम है। यह राग वर्ष ऋतु से जुड़ा है। आप जानते ही हैं कि आपकी हंदी पाठयपुस्तक का नाम मल्हार भी इसी राग के नाम पर है।

नीचे दी गई इंरनेट कड़ियों के माध्यम से राग मल्हार को सुनिए और इसका आनंद लीजिए

https://www.youtube.com/watch?v=3iQHe2hIJGM https://www.youtube.com/watch?v=pHbXFAhQtpI https://www.youtube.com/watch?v $r =$ 7K3SYX8THkw

हास्य-व्यंग्य

"छोड़ो जी, चूहों को तो निकाल नहीं पाए, अब चिड़ियों को निकालेंगे! माँ ने व्यं्य से कहा" आप समझ गए होंगे कि इस वाक्य में मा ने पिताजी से कहा है कि वे चिड़ियों को नहीं निकाल सकते। इस प्रकार से कही गई बात को 'व्यं्य करना' कहते हैं

व्यंग्य का अर्थ होता हैहँंसी-मजाक या उपहास के माध्यम से किसी कमी, बुराई या विडंबना को

उजागर करना।

्यं्य में बात को सीधे न कहकर उलटा या संकेतात्मक ढंग से कहा जाता है ताकि उसमें चुटकीलापन भी हो और गंभीर सोच की संभावना भी बनी रहे। अनेक बार व्यंग्य में हास्य भी छिपा होता है।

(क) आपको इस कहानी मेंकौन-कौन से वाक्य पढ़कर हूसी आई? उन वाक्यों को चुनकर लिखिए।

(ख) अबचने हु वाक्योंमे से कौन-कौन से वा्य व्यं्य' कहे जा सकते हैं? उन पर सही का चिह्न लगाइए

आज की पहेली

नीचे दी गई चित्रपहेली मेंबिल्ली को चहे तक पहुँचाए '

दो गौरैया' कहानी में आपने पढ़ा कि 'दो गौरया' लेखक के घर में बिन बुलाए अतिथि की तरह आ जाती हैं। पिछले कई वरषों से गाँव-नगरोंमें इन न्हीं चिड़ियों की संख्या निरंतर कम होती जा रही है। इसलिए भारत सरकार ने इनके संरक्षण के लिए 20 मार्च को 'विश्व गौरिया दिवस' घोषित किया है। आइए, पढ़ते हैं विश्ख गौरया दिवस' पर प्रस सूचना ब्ूरो द्वार प्रकाशित लेख का एक अंश—

कभी बहुतायत में पाई जाने वाली घरेलू गौरैया अब कई जगहों पर एक दुर्तभ दृश्य और रहस्य बन गई है। इन छोटे प्राणियों के प्रति जागरूकता बढ़ाने और उनकी रकषा करने के लिए, हर साल 20 मार्च को विश् गौरया दिवस मनाया जाता है।

भारत में गौरया सिर्फ पक्षी नहीं हैं; वे
साझा इतिहास और संस्कृति का प्रतीक हैं।
हिंदी ें "गौरया", तिमिल में "कुवी" और उद
में "चिरिया'" जैसे कई नामों से जानी जाने वाली
गौरैया पीढ़ियों से दैनिक जीवन का हिस्सा रही हैं। उनकी महता के बावजूद, गौरैया तेजी से

लुप्त हो रही हैं इस गिरावट के कई कारण हैं सीसा रहित पेटोल के उपयोग से जहरीले यौगिक पदा हए हैंजो उ ीटों को नुकसान पहुँात है,ंजन पर गौैया भोजन के लिए निभर है शहरीकरण ने उनके प्राृतिक घोंसले के स्थान भी छीन लिए हैं आधुनिक इमारतोंमेंवेस्थान नहीं होते जहाँ गौरैया घोंसला बना सकें, जिससे उनके बच्चों को पालने के लिए जगह कम हो गई है।

साभार- पर्यावरण, वन एवं जलवायु परवर्तन मंत्ालय (भारत सरकार)

साझी समझ

नीचे दी गई इंटरनेट कड़ी काप्रयोग कर इस लेख को पूर पढिए और कक्ा में चर्चा कीजिए।

https://www.pib.gov.in/PressReleasePage.aspx?PRID $\vDash$ 2112370

मित्रलाभ

दक्षिण देश के एक परांत में महिलारोप्य नाम का एक नगर था। वहाँ एक विशाल वटवृक्ष की शाखाओं पर लघुपतनक नाम का कौआ रहता था एक दिन वह अपने आहार की चिंता में शहर की ओर चला ही था कि उसने देखा कि एक फटे पाँव और बिखरे बालों वाला भयंकर व्याध उधर ही चला आ रहा है कौवे को उसे देखकर वृ्ष पर रहने वाले अन्य पक्षयों की चिंता हुई उन्हें व्याध के चंगुल से बचाने के लिए वह पीछे लौट पड़ा और वहाँ सब पक्षियों को सावधान कर दिया और कहा कि जब यह व्याध वृकष के पास भूमि पर अनाज के दाने बिखेरे, तब कोई भी पक्षी उन्हे चुगने के लालच से न जाय, उन दानों को कालकूट की तरह जहरीला समझे कौआ अभी यह कह ही रहा था कि व्याध ने वटवृक्ष के नीचे आकर दाने बिखेर दिए और स्वयं दूर जाकर झाड़ी के पीछे छिप गया। पक्षियों ने भी लघुपतनक का उपदेश मानकर दाने नहीं चुगे। वे उन दानों को हलाहल विष की तरह मानते रहे किंतु, इसी बीच मे व्याध के सौभाग्य से कबूतरों का राजा चि्ग्ीव अपने हजारों अनुचरों के सहित उड़ता हुआ वहाँ आया। लघुपतनक ने उसे भी चेतावनी दी परंतु वह भूमि पर बिखे हुए उन दानों को चुगने की लालसा को न रोक सका परिणाम यह हुआ कि वह अपने परिजनों समेत जाल में फँस गया लोभ का यही परिणाम होता है। लोभ से विवेकशक्त नष्ट हो जाती है। जाल में फँसने के बाद चि्रग्रीव ने अपने साथी कबूतरों को समझाया कि वे डेरे नहीं और एकजुट होकर पूरी शक्त से जाल समेत उड़कर व्याध की दृष्ट से ओझल हो जाएँ तो बच जाएँगे। तत्पश्चात सब कबूतर जाल लेकर उड़ गये और व्याध देखता रह गया! लघुपतनक ने जब देखा तो वह कौतूहलवश कबूतरों के पीछे-पीछे उड़ने लगा।

व्याध जब दूर हो गया तब चि्ग्रीव ने अपने साथियों को कहा—"व्याध तो लौट गया। अब चिंता की कोई बात नहीं चलो, हम महिलारोप्य शहर के पूवोत्र भाग की ओर चलें वहाँ मेरा घनिष्ठ मित्र हिरण्यक नाम का चूहा रहता है। उससे हम अपने जाल को कटवा लेगे। तभी हम आकाश में स्वच्छंद घूम सकेंगे।"

वहाँ हिण्यक नाम का चूहा अपने एक हजार बिलोंवाले दुग में रहता था इसीलिए उसे डर नहीं लगता था चित्री ने उसकेदवा पर पहुँच कर पुकारा"मित्रहिपण्य! शीत्र आाओो मु प विपत्त का पहा टूट पड़ा है"

उसकी आवाज सुनकर हिरण्यक ने अपने ही बिल में छिपे-छिपे प्रशन किया—"तुम कौन हो? कहा से आए हो? क्या प्रयोजन है?."

ि्रीव ने कहाै तु्हा ि्रचितग्रीव ूँ तुम जल्दी ाहर आाओो मुझे ुमसे विशेष काम है"

यह सुनकर हिरण्यक प्रफुल्लत होकर अपने बिल से बाहर आया। अपने मित्र चित्ग्रीव को साथियों सहित जाल में फँसा देखकर दुखित स्वर में बोला, "मित्र यह क्या हो गया तुम्हं?" चित्ऋ्रीव ने कहा—"जीभ के लालच से हम जाल मेंफंस गए तुम हमें जाल से मुक्त कर दो" हिरण्यक जब चित्ग्रीव के जाल का धागा काटने लगा तब उसने कहा"पहले मेर साथियों के बंधन काट दो, बाद में मेरे काटना।"

हिरण्यक— "तुम इन सब के नायक हो, पहले अपने बंधन कटवा लो, साथियों के पीछे कटवाना।"

चि्ग्रीव—"वे मेरे अनुच हैं अपने घर-बार को छोड़कर मेरे साथ आए हैं मेर धमे है कि पहले इनकी सुख-सुविधा को दृषटमें खू

हिरण्यक चित्रीव की यह बात सुनकर बहुत प्रस्न हुआा उसने सबके बंधन काटकर चित्ग्रीव से कहा—"ि्र! अब अपने घर जाओ। विपत्त के समय फिर मुझेयाद करना।" उन्हे भेजकर हिरण्यक चूहा अपने बिल में घुस गया। चि्ग्ीव भी मित्रं सहित अपने घर चला गया।

लघुपतनक कौआ यह सब दूर से देख रहा था। वह हिरण्यक के कौशल और उसकी सज्जनता पर मुग्ध हो गया। उसने मन ही मन सोचा— "यदधप मेरा स्वभाव है कि मैं किसी का विश्वास नहीं करता, किसी को अपना हितैषी नहीं मानता, तथापि इस चहे के गुणों से प्रभावित होकर मैं इसे अपना मित्र बनाना चाहता हूं"

यह सोचकर वह हिरण्यक के बिल के दरवाजे पर जाकर चितरग्रीव के समान ही आवाज बनाकर हिरण्यक को पुकारने लगा। उसकी आवाज सुनकर हिरण्यक ने सोचा, यह कौन-सा

हिरण्यक ने पूछा"तुम कौन हो?"

लघुपतनकमैं लघुपतनक नाम का कौआ हूं"

लघुपतनक—"मुझे तुम से बहुत जरूरी काम है; एक बार दर्शन तो दे दो"

हिरण्यक—"मुझे तुम्हे दर्शन देने का कोई प्रयोजन दिखाई नहीं देता" लघुपतनक— "चित्ग्रीव के बंधन काटते देखकर मुझेतुमसे बहुत प्रेम हो गया है। कभी मै भी बंधन में पड़ जाऊँगा तो तुमहारी सेवा में आना पड़गा"

हिरण्यक— "तुम भोक्ता हो, मे तुम्हा भोजन हू; हम मं ग्ेम कैसा? जाओ, दो प्रृत से विरोधी जीवों े मैतरी नहीं हो सकती।"

लघुपतनक "हिरण्यक! मं तुम्हरे द्र पर मित्रा की भीख लेकर आाया हूं तुम मैत्री नहीं करोगे तो यहीं प्राण दे दूँगा"

हिरण्यक— "हम सहज-वैरी हैं हमें ैत्री नहीं हो सकती।"

लघुपतनक"मैने तो कभी तुमहरे दर्शन भी नहीं किए। हमें वैर कैसा?"

हिण्यक—"वैर दोतरह का होताहैसहज और कृत्रिा तुम मेरे सहज-वैरी हो"

लघुपतनक"ैं दोतरह के वैरोंका लक्षण ुन चाहता हू"

सकता है स्वाभाविक वैर निष्कारण होता है, उसका अंत हो ही नहीं सकता।" लघुपतनक ने बहुत अनुरोध किया, किंतु हिरण्यक ने मैत्ी के प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। तब लघुपतनक ने कहा"प्यदितु्हे मुझ पर विश्वास न हो तो तुम अपने बिल में छिपे रहो; मैं बिल के बाहर बैठा-बैठा ही तुमसे बातें कर लिया करूगा"

हिण्यक ने लघपतनक की यह बात मान ली। कितु, लघुपतनक को सावधान करते हुए कहा— "कभी मेर बिल मे प्रवेश करने की चेष्टा मत करना।" कौआ इस बात को मान गया। उसने शपथ ली कि कभी वह ऐसा नहीं करेगा।

तब से वे दोनों ित् बन गए। नित्यप्रत परस्पर बातचीत करते थे दोनो के दिन बड़े सुख से कट रहे थे कौआ कभी-कभी इधर-उधर से अन्न संग्रह करके चूहे को भेटमें भी देता था मित्रता में यह आदान-प्रदान स्वाभाविक था धीरे-धीरे दोनों की मैत्री घनिषछ होती गई दोनों एक क्षण भी एक-दसरे से अलग नहीं रह सकते थे।

बहुत दिन बाद एक दिन आँखो में ऑसू भर कर लघुपतनक ने हिण्यक से कहा— "मित्र! अब मुझे इस देश से विरक्त हो गई ह, इसलिए दूसरे देश में चला जाऊँगा"

कारण पूछने पर उसने कहा—"इस देश में अनावृष्ट के कारण दुरभक्ष पड़ गया है लोग भूखे मर रहे हैं एक दाना भी नहीं रहा। घर-घर में पक्षियों के पकड़ने के लिए जाल बिछ गए है मैं तो भाग्य से ही बच गया। ऐसे देश में रहना ठीक नहीं है।"

हिरण्यक— "कहाँ जाओगे?"

लघुपतनक— "दक्षिण दिशा की ओर एक तालाब है वहाँ मन्थरक नाम का एक कछुआ रहता है। वह भी मेरा वैसा ही घनिष्ठ मित्र है जैसे तुम हो। उसकी सहायता से मुझे पेट भरने योगय अन्न-मांस आदि अवश्य मिल जाएगा।" हिण्यक— "यही बात है तोमैं भी तुम्हरे साथ जाऊँगा लघुपतनक—"कितु, मै तो आकाश में उ़ने वाला हू मेरे साथ तुम कैसे जाओगे?"

हिण्यक"मुझे अपनी पीठ पर बिठा कर वहाले चलो"

लघुपतनक यह बात सुनकर प्रसन्न हुआ। हिरण्यक चूहा लघुपतनक कौवे की पीठ पर बैठ गया। दोनों आकाश में उड़ते हुए तालाब के किनारे पहुच।

मन्थरक ने जब देखा कि कोई कौआ चूहे को पीठ पर बिठा कर आ रहा है तो वह डर के मरे पानी में घुस गया। लघुपतनक को उसने पहचाना नहीं

तब लघुपतनक हिण्यक को थोड़ी दूर छोड़कर पानी में लटकती हुई शाखा पर बैठ कर जोर-जोर से पुकारने लगा"मन्थरक! मन्थरक! मै तु्हा मित्रलघुपतनक आया हूँ आकर मुझसे मिलो"

लघुपतनक की आवाज सुनकर मन्थरक प्रसन्न होकर बाहर आया। हिरण्यक भी तब वहाँ आ गया और मन्थरक को प्रणाम करके वहीं बैठ गया

मन्थरक कछुआ, लघुपतनक कौआ और हिरण्यक चहा वहाँ बैठे-बैठे बाते कर रहे थे कि वहां चित्रांग नाम का हिरन कहीं से दौड़ता-हाॉफता आ गया। एक व्याध उसका पीछा कर रहा था। उसे आता देखकर कौआ उड़कर वृक्ष की शाखा पर बैठ गया। हिरण्यक पास के बिल में घुस गया और मन्थरक तालाब के पानी में जा छिपा।

कौवे ने हिरन को अच्छी तरह देखने के बाद मन्थरक से कहा— "मित्र मन्थरक! यह हिरन पानी पीने के लिए तालाब पर आया है'"

मन्थरक—"यह हिरन बार-बार पीछे मुड़कर देख रहा है और डरा हुआ सा है। इसलिए यह प्यासा नहीं, बल्क व्याध के डर से भागा हुआ है देखो तो सही, इसके पीछे व्याध आ रहा है या नहीं?"

दोनों की बात हिरन ने सुन ली और बोला—"मन्थरक! मेरे भय का कारण तुम जान गए हो मैव्याध के बाणों से डरकर बड़ी कठनाई से यहा हुँच पाया हूं तुम मेरी रकषा करो अब तुम्हारी शरण में हू मुझे कोई ऐसी जगह बतलाओ जहाँ व्याध न पहुँच सके"

मन्थरक ने हिरन को घने जंगलों में भाग जाने की सलाह दी किंतु लघुपतनक ने ऊपर से देखकर बतलाया कि व्याध दूसरी दिशा में चला गया है, इसलिए अब डर की कोई बात नहीं है अब चित्रंग की भी लघुपतनक, हिरण्यक और मन्थरक से गाढ़ी मित्रता हो गई। एक दिन हिरन घूमता हुआ जंगल में चला गया और शाम तक वापस नहीं लौटा। उसके तीनों मित्रों को संदेह होने लगा कि कहीं वह व्याध के जाल में न फँस गया हो; अथवा शेर, बाघ आदि ने उस पर हमला न कर दिया हो। घर में बैठे स्वजन अपने प्रवासी प्रयजनों के संबंध में सदा शंकित रहते हैं0

बहुत देर तक भी चितरांग हिरन नहीं आया तो मन्थरक कछुए ने लघुपतनक कौवे को जंगल में जाकर हिरन को खोजने की सलाह दी। लघुपतनक ने कुछ दूर जाकर देखा कि वहाँ चित्रंग एक जाल में बँधा हुआ है लघुपतनक उसके पास गया। उसे देखकर चित्ांग की आँखों में ऑँसू आ गए। वह बोला अब मेरी मृत्यु निश्चत है। अन्तिम समय में तुमहरे दर्शन कर के मुझे बड़ी प्रसन्नता हो रही है। प्राण विसर्जन के समय मित्र-दर्शन बड़ा सुखद होता है मेरे अपराध क्षमा करना।

लघुपतनक ने धीरज बँधाते हुए कहा"घबराओ मत! मैं अभी हिरण्यक चूहे को बुला लाता हू वह तुमहरे जाल काट देगा।"

यह कहकर वह हिरण्यक के पास चला गया और शीत्र ही उसे पीठ पर बिठाकर ले आया। हिरण्यक अभी जाल काटने की सोच ही रहा था कि लघुपतनक ने वृक्ष के ऊपर से किसी को देखकर कहा—"यह तो बहुत बुरा हुआ"

हिरण्यक ने पूछा"क्या कोई व्याध आ रहा है?"

लघुपतनक—"नहीं, व्याध तो नहीं, कितु मन्थरक कछुआ इधर चला आ रहा है।"

हिण्यक—"तब तो खुशी की बात है दुखी क्यों होते हो?"

लघुपतनक— "दुखी इसलिए होता हूँ कि व्याध के आने पर मैं ऊपर उड़ जाऊँंगा, हिरण्यक बिल में घुस जाएगा, चि्रांग भी छलागें मारकर घने जंगल में घुस जाएगा; लेकन मन्थरक कैसे अपनी जान बचाएगा? यही सोचकर चिंतित हो रहा हूँ"

मन्थरक के वहाँ आने पर हिरण्यक ने मन्थक से कहा"मि्! तुमने यहाँ आकर अच्छा नहीं किया। अब भी वापस लौट जाओ, कहीं व्याध न आ जाए"

इसीलिए मन्थरक ने कहा"मि्! मैं अपने मित्र को आपतिमें जानकर वहा नीं रह सका। सोचा, उसकी आपत्त में हाथ बटाऊँंगा, तभी चला आया।"

ये बाते हो ही रही थीं कि उन्होंने व्याध को उसी ओर आते देखा। उसे देखकर चूहे ने उसी क्षण चित्ांग के बंधन काट दिए। चितरांग भी उठकर घूम-घूमकर पीछे देखता हुआ आगे भाग खड़ा हुआ। लघुपतनक वृक्ष पर उड़ गया। हिरण्यक पास के बिल में घुस गया। व्याध अपने जाल में किसी को न पाकर बड़ा निराश हुआ वहाँ से वापस जाने को मुड़ा ही था कि उसकी दृष्ट धीरे-धीरे जाने वाले मन्थरक पर पड़ गईी उसने सोचा, "आज हिरन तो हाथ आया नहीं, कछुए को ही ले चलता हूँ कछुए को ही आज भोजन बनाऊँगा। उससे ही पेट भरूगा" यह सोचकर वह कछुए को जाल मेंबँधकर कंधे पर डालकर चल दिया। उसे ले जाते देख हिण्यक और लघुपतनक को बड़ी चिंा हुई दोनों मित्र मन्थरक को बड़ प्रम और आदर से देखते थे चित्रंग ने भी मन्थरक को व्याध के कन्धों पर देखा तो व्याकुल हो गया तीनों मि्र

कौवे ने तब एक उपाय दूढ निकाला। वह यह कि चित्रांग व्याध के मा्ग में तालाब के किनारे जाकर लेट जाए मैं तब उसे चोंच मारने लगूगा। व्याध समझेगा कि हिरन मरा हुआ है वह मन्थरक को जमीन पर रखकर इसे लेने के लिए जब आएगा तो हिरण्यक तीब्रता से मन्थरक के बंधन काट दे मन्थरक तालाब में घुस जाए और चित्रांग छलागें मारकर घने जंगल में चला जाया। मै उड़कर वृक् पर चला ही जाऊँगा सभी बच जाएंगे, मन्थरक भी छूट जाएगा! तीनों मित्रो ने यही उपाय किया। चित्ांग तालाब के किनारे मृतवत जा लेटा कौआ उसकी गरदन पर सवार होकर चोंच चलाने लगा। व्याध ने देखा तो समझा कि हिरन जाल से छूट कर दौड़ता-दौड़ता यहाँ मर गया है। उसे लेने के लिए वह जाल-बद् कछुए को जमीन पर छोड़कर

आगे बढ़ा तो हिरण्यक ने अपने तीखे दातों से जाल काट दिया मन्थरक पानी में घुस गया। चित्ांग भी भाग गया।

व्याध ने चित्रांग को दौड़ते देखा तो आश्र् मेंडूब गया। फिर देखा कि कछुआ भी जाल से

निकलकर भाग गया है, तब वह और भी विस्मित हुआ और निराश होकर चला गया। उधर चारों ित्रलघुपतनक, मन्थरक, हिरण्यक और चितरां प्रसन्नता से फूले नहीं समाते थे
मित्रता के बल पर ही चारों ने व्याध से मुक्त पाई थी।

मितता में बड़ी शक्त है हेंअपने ित्ों की सहायता के लिए सदैवतत्पर रहना चाहिए अभी आपने जो कहानी पढ़ी वह पंचत्र से ली गई है पंचत्रहमरे देश की ऐसी अद्भुत पुस्तक है जो आज भी विश्ख में मनोरंजन और नैतिक जान प्रा्त करने के उ्ेश्य से पढ़ी-पढ़ाई जाती है अपने पुस्तकालय में स पंचतंत्रकी कहानियों की ुस्तक खोजकर पढिएऔर इसकी कोई एक कहनी ककषा ें सुनाए

Do Gauraiya - CBSE Class 8 Hindi Notes