नए मेहमान
किराये के एक छोटे से मकान में अनेक असुविधाओं और गमी से पेशान घर के लोग रात में सोने की तैयारी कर रहेहैं तभी अचानक दो ऐसे मेहमान आ जातेहैंजिन्हेंघर का कोई व्यक्त नहीं जानता है 'मान न मान मैं तेरा मेहमान शहरी मध्यवगीय परिवार कन पेशानियोंसे जूझता है हम इसका जीवंत चित्रण उदयशंकर भट के 'नए मेहमान' एकांकी में देख सकते हैं
पात्र-परिचय
विश्वनाथ गृहपति न्हेमल, बाबूलाल — अतिथि प्रमोद, किरण विश्वनाथ के बच्चे आगंतुक रेवती का भाई रेवती विश्वनाथ की पत्नी
स्थान
भारत का कोई बड़ा नगर
(गरमी की ऋतु, रात के आठ बजे का समया। कमरे के पूर्व की ओर दो दरवाजे। दक्षिण का द्ार बाहर आने-जाने के लिए पश्चिम का द्ार भीतर खुलता है। उत्तर की ओर एक मेज है, जिस पर कुछ किताबेंऔर अखबार रखे है। पास ही दो कुर्ियाँ, पश्चिम द्वार के पास एक पलंग बिछा है मेज पर रखा हुआ पुराना पंखा चल रहाहै जिससे बहुत कम हवा आ रही है। कमरा बेहद गरम है। मकान एक साधारण गृहस्थ का है। पलंग के ऊपर चार-पाँच साल का एक बच्चा सो रहा है पंखे की हवा केवल उस बच्चे को लग रही है। फिर भी वह पसीने से तर है। इसलिए वह कभी-कभी बेचैन हो उठता है, फिर सो जाता है।
करता-धोती पहने एक व्यक्त प्वेश करता है पसीने से उसके कपड़ तर हैं कुरता उतार कर वह खूटी पर
टॉँग देताहै और हाथ के पंखे से बच्चे को हवा करता है। उसका नाम वश्नाथ है। उप् 45 र्ष, गठा हुआ शरीर, गेहुआ रंग, मुख पर गंभीरता का चिह्न।)
विश्वनाथ ओफ, बड़ी गरमी है! (पंखा जोर-जोर से करने लगता है) इन बंद मकानों ें रहना कितना भयंकर है! मकान है कि भ्टी! (पश्चिम की ओर से एक स्त्ी प्रवेश करती ह)
रेवती (आँचल से मुह का पसीना पोंछती हुई) पत्ा तक नहीं हिल रहा है। जैसे साँस बंद हो जाएगी। सिर फटा जा रहा है (सिर दबाती है)
विश्वनाथ पानी पीते-पीते पेट फूला जा रहा है और प्यास है कि बुझने का नाम नहीं लेती। अभी चार गिलास पीकर आया हूँ फिर भी होंठ सूख रहे हैं एक गिलास पानी और पिला दो ठण्डा तो क्या होगा!
रेवती गरम है। आँगन में घडे में भी तो पानी ठंडा नहीं होता—हवा लगे तब तो ठंडा हो जाने कब तक इस जेलखाने में सड़ना होगा।
विश्वनाथ मकान मिलता ही नहीं आज दो साल से दिन-रात एक करके ढूढ़ रा हूँ हाँ पानी तो ले आओ, जरा गला ही तर कर लू
रेवती बरफ ले आते पर बरफ भी कोई कहाँ तक पिए।
विश्वनाथ बरफ! बरफ का पानी पीने से क्या फायदा? प्यास जैसी-की-तैसी, बल्कदुगुनी लगती है। ओफ! लो पंखा कर लो। बच्चेक्या ऊपर हैं?
रेवती रहने दो, तु्हीं करो। छत इतनी छोटी है कि पूरी खाटे भी तो नहीं आतीं एक खाट पर दो-दो तीन-तीन बच्चे सोते हैं तब भी पूरा नहीं पड़ता।
विश्वनाथ एक यह पड़ोसी है, निदयी, जो खाली छत पड़ी रहने पर भी बच्चों के लिए एक खाट नहीं बिछाने देंगे।
रेवती वे तो हमको मुसीबत में देखकर प्रसन्न होते हैं उस दिन मैने कहा तो लाला की औरत बोली 'क्या छत तु्हरे लिए है? नकद पचास देते हैं, तब चार खाटों की जगह मिली है। न, बाबा, यह नहीं हो सकेगा मैं खाट नहीं बिछाने दूंगी। सब हवा रुक जाएगी। उन्हें और किसी को सोता देखकर नींद नहीं आती।'
विश्वनाथ पर बच्चों के सोनेमें क्या हर्ज है? ज़रा आराम से सो सकेगे कहो तो मैं कहूँ?
रेवती क्या फायदा? अगर लाला मान भी लेगा तो वह नहीं मानेगी। वैसे भी मैं उसकी छत पर बच्चों का अकेला सोना पसन्द नहीं करूंगी।
विश्वनाथ फिर जाने दो मैं नीचे आँगन में सो जाया करंगा। कमरे में भला क्या सोया जाएगा? मै कभी-कभी सोचता हूँ यदि कोई अतिथ आ जाए तो क्या होगा?
रेवती ईशवर करे इन दिनों कोई मेहमान न आए। मैं तो वैसे ही गरमी के मारे मर रही हूँ। पिछले पंद्रह दिन से दरद के मारे सिर फट रहा है मैं ही जानती हू जैसे रोटी बनाती हू।
विश्वनाथ सारे शहर में जैसे आग बरस रही हो। यहाँ की गरमी से तो ईश्वर बचाए। इसीलिए यहाँ गमियों में सभी संपन्न लोग पहाड़ों पर चले जाते हैं
रेवती चले जाते होंगे। गरीबों की तो मौत है। (रवती जाती है। बच्चा गरमी से घबरा उठता है। विश्वनाथ जोर-जोर से पंखा करता है।)
विश्वनाथ इन सुकुमार बालकों का क्या अपराध है? इन्होंने क्या बिगाड़ा है? तमाम शरीर मारे गरमी के उबल उठा है। (रेवती पानी का गिलास लेकर आती है।)
रेवती बड़ का तो अभी तक बुरा हाल है अब भी कभी-कभी देह गरम हो जाती है। ed
विश्वनाथ (पानी पीकर) उसने क्या कम बीमारी भोगी हैपूरे तीन महीने तो पड़ा रहा। वह तो कहो मैने उसे शिमला भेज दिया। नहीं तो न जाने..
रेवती भगवान ने रकषा की देखा नहीं, सामने वालों की लड़की को फिर से टाइफाइड हो गया और वह चलाबसी। तुम कुछ दिनों की छुटी क्यों नहीं ले लेते। मुझे डर है, कहीं कोई बीमार न पडा जाए
छुट्टी कोई दे तब ना छुटी ले भी लू तो खर्च चाहिए। खर, तुम आज जाकर ऊपर सो जाओ।
मै आँगन में खाट डालकर पड़ा रहूंा बच्चे को ले जाओ यह गरमी मेंभुन रहा है।
रेवती यह नहीं हो सकता। मैं नीचे सो जाऊँगी। तुम ऊपर छत पर जाकर सो जाओ। और ऊपर भी क्या हवा है! चारों तरफ दीवारेंतप रही हैं ुम्हीं जाओ ऊपर।
विश्वनाथ यही तो तुम्हारी बुरी आदत है। किसी का कहना न मानोगी, बस अपनी ही हाँके जाओगी। पंद्रह दिन से सिर में दर्द हो रहा है। मैं कहता हूं खुली हवा में सो जाओगी तो तबीयत ठीक हो जाएगी।
रेवती तुम तो व्यर्थ की जिद करते हो भला यहाँ आँगन में तु्हे नींद आएगी? बंद मकान, हवा का नाम नहीं रात भर नींद न आएगी। सबेरे काम पर जाना है। जाओ, मेरा क्या है, पड़ी रहूंगी।
विश्वनाथ नहीं यह नहीं हो सकता। आज तो तु्हें ऊपर सोना पड़गा वैसे भी मुझे कुछ काम करना ही
रेवती ऐसी गरमी में क्या काम करोगे? तुम्हे भी न जाने क्या धुन सवार हो जाती है जाओ, सो जाओ मैं आँगन में खाट पर इसे लेकर जैसे-तैसे रात काट लूगी, जाओ
विश्वनाथअच्छा तुम जानो। मैं तो तु्हारी भलाई के लिए कह रहा था मैं ही ऊपर जाता हू (बाहर से कोई दरखाजा खटखटाता है।) X
रेवती कौन होगा?
विश्वनाथ न जाने देखता हू
(बच्चे को पंखा करती है बच्चा गरमी के मारे उठ बैठता है, पानी माँगता है। वह बच्चे को पानी पिलाती है, पंखा करती है इसी समय दो व्यक्तियों के साथ विश्वनाथ प्रवेश करता है। रेवती बच्चे को लेकर आँगन में चली जाती है। आगंतुक एक साधारण बिस्तर तथा एक संदक लेकर कमरे मे प्रवेश करते है। विश्वनाथ भी पीछे-पीछे आता है। कमीजों के ऊपर काली बंडी, सिर पर सफेद पगड़ियाँ। बड़ की अवस्था पैंतीस और छोटे की चौबीस है। बड़े की मूछे मुंह को घेर हुए, माथे पर सलवट। छोटे की अधकटी मूछे लंबा मुख। दोनों मैली धोतियाँ पहने हैं बड़े का नाम न्हेमल और छोटे का बाबूलाल है। इस हबड़-तबड़ में दोनों बच्चे ऊपर से उतरकर आते हैं और दरवाजे के पास खड़े होकर आगंतुकों को देखते हैं।)
वनाथ (बड़ लड़के से प्मोद, जर कुसी धर खिसका दो, (दूसरे अतिथ से) आप इधर खाट पर आ जाइए! जरा पंखा तेज कर देना, किरण।
(किरण पंखा तेज करती है, किंतुपंखा वैसे ही चलता है।)
न्हेमल (पगड़ी के पल्ले से मुंह का पसीना पोंछकर उसी से हवा करता हुआ) बड़ी गरमी है। क्या कहे, पंडित जी, पैदल चले आ रहे हैं कपड़े तो ऐसे हो गए कि निचोड़ लो।
विश्वनाथ जी, आप लोग...
बाबूलाल
चाचा, मेरे कपड़ निचोड़कर देख लो, एक लोटे से कम पसीना नहीं निकलेगा। धोती ऐसी चरा रही है, जैसे पुरानी हो। पिछले दिनों नकद नौ रुपये खर्च करके खरीदी थी।
मोतीराम की दुकान से ली होगी। बड़ा ठग है मैने भी कुतों के लिए छह गज मलमल मोल ली थी, सवा रुपया गज दी जबकि नत्थामल के यहाँ सा़े नौ आने गज बिक रही थी पंडित जी, गला सूखा जा रहा है। स्टेशन पर पानी भी नहीं मिला, मन करता है लेमन की पाँच-छह बोतलें पी जाऊँ

बाबूलाल
नन्हेमल अपना लोटा कहा खा है? थैले में ही हैन?
ाल बिस्तर में होगा चाचा, निकालू क्या? और तो और बिस्तर भी पसीने से भीग गया, चाचा मैं तो पहले नहाऊँंगा, फिर जो होगा देखा जाएगा, हाँ नहीं तो! मुझे नहीं मालूम था यहाँ इतनी गरमी है।
नन्हेमल देखते जाओ हाँ साहबा। विश्वनाथ क्षमा कीजिएगा आप कहाँ से पधाे हैं?
विश्वनाथ कौन संपतराम?
ल अर वही गोटेवाले लाओ न, चाचा (संदक खोलकर बंडी रखते हुए) माल-मसाला तो अंटी मे है न?
मल नहीं, जेब मेंहै, बंडी की जेब में है अब डर की क्या बात है! घर ही तो है।
विश्वनाथ मैं संपतराम को नहीं जानता।
नन्हेमल संपतराम को जानने की.. क्यों, वह तो आपसे मिले हैं। आपकी तो वह..
बाबूलाल हाँ, उन्होंने कई बार मुझसे कहा है। आपकी तो वह बहुत तारीफ करते हैं पंडित जी, क्या मकान इतना ही बड़ा है?
नन्हेमल देख नहीं रह, इसके पीछे एक कमरा दिखाई देता है। पंडित जी, इसके पीछे आँगन होगा और ऊपर छत होगी? शहर में तो ऐसे ही मकान होते हैं।
किरण (विश्वनाथ से) माँ पूछती है खाना..
न्हेमल क्यों बाबूलाल? पंडित जी, कष्ट तो होगा, पर तुम जानो खाना तो..
बाबूलाल बस एक साग और पूरी।
न्हेमल वैसे तो मैं पराँठे भी खा लेता हूँ med
बाबूलाल र खाने की भत चाई पेह तो रना ही शहर में आहो कसीकोतकलीफ थोड़े ही देगे, देखिए पंडित जी, जिसमें आपको आराम हो, हम तो रोटी भी खा लेंगे। कल फिर देखी जाएगी।
न्हेमल भूख कब तक नहीं लगेगी—सारा दिन तो गया। uo
बाबूलाल नहाने का प्रबंध तो होगा, पंडित जी?
नन्हेमल हा भेया, ला तो जर, मैं तो डेढ़ लोटा पानी पीऊँगा।
बाबूलाल उतना ही मैं। (दोनों गट-गट पानी पीते हैं)
किरण (विश्वनाथ से धीरे से) फिर खाना?
विश्वनाथ (इशारे से) ठहर जा ज़रा।
नन्हेमल (पानी पीकर) आह! अब जान में जान आई सचमुच गरमी में पानी ही तो जान है।
बाबूलाल पानी भी खूब उंडा है वाह भैया, खुश रहो।
नन्हेमल कितने सीधे लड़के हैं।
विश्वनाथ आप कहाँ से आएँ हैं?
न्हेमल बिजनौर से।
विश्वनाथ (आ्चय े) बजनौर से बिजनोर मे तोमैंबजनर गया हू. ितु..
न्हेमल मैं ज़रा नहाना चाहता हूँ
बाबूलाल मैं भी स्नान करँंगा।
विश्वनाथ पानी तो नल में शायद ही हो, फिर भी देख लो प्रमोद, इन्हें नीचे नल पर ले जाओ
बाबूलाल तब तक खाना भी तैयार हो जाएगा। (दोनों बाहर निकल जातेहै, रेवती का प्रवेश)
रेवती ये लोग कौन है? जान-पहचान के तो मालूम नहीं पड़ते।
विश्वनाथ न जाने कौन हैं।
रेवती पूछ लो न?
विश्वनाथ क्या पूछ लूं? दो-तीन बार पूछा, ठीक-ठीक उत्तर ही नहीं देते।
रेवती मेरा तो दर्द के मारे सिर फटा जा रहा है, इधर पिछली शिकायत फिर बढ़ती जा रही है। पहले सोते-सोते हाथ-पैर सु्न हो जाते थे, अब बैठे-बैठे हो जाते हैं।
विश्वनाथ क्या बताऊँ, जीवन में तु्हें कोई सुख न दे सका। नौकर भी नहीं टिकता है
रेवती पानी जो तीन मंजिल पर चढ़ाना पड़ता है, इसीलिए भाग जाता है और गरमी क्या कम है! किसी को क्या जरूरत पड़ी है जो गरमी में भुने। यह तो हमारा ही भाग्य है कि चने की तरह भाड़ में भुनते रहते है।
विश्वनाथ खाना तो बनाना ही प़गा। कोई भी हों, जब आए हैं तो खाना जरूर खाएंगे, थोड़ा-सा बना लो।
रेवती (तुनककर) खाना तो खिलाना ही होगा—तुम भी खूब हो! भला इस तरह कैसे काम चलेगा? दर्द के मारे सिर फटा जा रहा है, फिर खाना बनाना इनके लिए और इस समय? आखिर ये आए कहाँ से हैं?
विश्वनाथ कहते हैं बिजनौर से आए हैं
रेवती (आश्चर्य से) बिजनौर! क्या बिजनौर में तु्हारी जान-पहचान है? अपनी रिशतेदारी का तो कोई आदमी वहाँ रहता नहीं है?
विश्वनाथ बहुत दिन हुए एक बार काम से बिजनौर गया था, पर तब से अब तो बीस साल हो गए है।
रेवती सोच लो, शायद वहाँ कोई साहित्यिक मित्रहो, उसी ने इ्हें भेजा हो। S
विश्वनाथ ध्यान तो नहीं आता, फिर भी कदाचित कोई मुझे जानता हो और उसी ने भेजा हो, किसी संपतराम का नाम बता रहे थे, मैं जानता भी नहीं।
रेवती बड़ मुश्कल है, ैं खाना नहींबनाऊंगी, पहले आत्मा फर परमात्मा, जब शर ही ठीक नहीं रहता तो फिर और क्या करू?
विश्वनाथ क्या कहेंे कि रातभर भूखा मारा, बाजार से कुछ मंँगा दो न!
रेवती बाजार से क्यामुफ्त में आ जाएगा? तीन-चार रुूये से कम मे क्या इनका पेट भरेगा, पहले तुम पूछ लो, मैं बाद में खाना बनाऊँगी। (बाबूलाल का प्रवेश, रेवती का दूसरी ओर से जाना)
बाबूलाल तबीयत अब शांत हुईहै, फिर भी पसीने से नहा गया हूँ न जाने पंडित जी, आप यहा कैे रहते है! (पंखा करता है)
विश्वनाथ आठ-नौ लाख आदमी इस शहर में रहते हैं और उनमें से छह-सात लाख आदमी इसी तरह के मकानों मं रहते हैं (ऊपर छत पर शोर मचता है ्या बात है? कैसा झगड़ा है प्रमोद?
प्रमोद (आकर) उन्होने दूसरी छत पर हाथ धो लिए, पानी फैल गया, इसीलिए वह पड़ोस की स्ी चिल्ला रही है मैने कहा, सबेरे साफ कर देगे, इन्हे मालूम नहीं था।
विश्वनाथ तुमने क्यों नहीं बताया कि हाथ दूसरी जगह धोओ।
प्रमोद मै पानी पीने चला गया था वहाँ उषा रोने लगी उसे चुप कराया, पानी पिलाया और पंखा झलता रहा।
विश्वनाथ चलो कोई बात नहीं, उनसे कह दो कि सबेरे साफ करा देगे। (नेप्य में"अरे बाबू मेरी ोतीद देनामै भी नहालूँ)
बाबूलाल लाया चाचा। (जाता है) (पड़ोसी का तेजी से प्रवेश)
पड़ोसी देखिए साहब, मेहमान आपके होंगे, मेरे नहीं। मैं यह ब्दाश्त नहीं कर सकता कि मेरी छत पर इस तरह गंदा पानी फैलाया जाए
विश्वनाथ वाकई गलती हो गई कल सबे साफ करा दूँगा।
पड़ोसी आपसे रोज ही गलती होती है C
विश्वनाथ अनजान आदमी से गलती हो ही जाती है उसे क्षमा कर देना चाहिए कल से ऐसा नहीं होगा।
पड़ोसी होग क्यों हीं रो होगा रो होत ह अभी उसी दिन आपके एक औरमेहमान ने पानी फैला दिया था। फिर वह हमारी खाट बिछाकर लेट गया था।
विश्वनाथ मैंने समझा तो दिया था फिर तो वह आदमी खाट पर नहीं लेटा था।
पड़ोसी तो आपके यहाँ इतने मेहमान आते ही क्योंहै? यदि मेहमान बुलाने हों तो बड़ा-सा मकान लो।
विश्वनाथ यह भी आपने खब कहा कि इतने मेहमान क्यों आते हैं! अरे भाई मेहमानों को क्या मैं बुलाता हू? खेर, आज क्षमा करे, अब आगे ऐसा नहीं होगा।
पड़ोसी कहाँ तक कोई क्षमा करे क्षमा,क्षमा! बस एक ही बात याद कर ली है—कषमा! (पड़ोसी चला जाता है। दोनों अतिथ आते हैं)
दोनों क्या बात है? 0
विश्वनाथ कुछ नहीं, आप धोतियाँ छज्जे पर सुखा दें।
नन्हेमल सचमुच हमारी वजह से आपको बड़ा कष्ट हुआ। भैया, ज़रा-सा पानी और पिला दो। उपफफ, बड़ी गरमी है। हाँ साहब, खाने में क्या देर-दार है? बात यह है कि नींद बड़ जोर से आ रही है।
विश्वनाथ देखिए, मैं आपसे एक-दो बात पूछना चाहता हूँ
न्हेमल हाँ, हा पूछिए, मालूम होता है, आपने हमें पहचाना नहीं है।
विश्वनाथजी हाँ, बात यह है कि मैं बिजनौर गया तो अवश्य हू पर बहुत दिन हो गए हैं
नन्हेमल तो क्या हर्ज है—कभी-कभी ऐसा भी हो जाता है। हम तो आपको जानतेहैं कई बार आपको देखा भी है।
बाबूलाल लाला भानामल की लड़की की शादी में आप नजीबाबाद गए थे?
नन्हेमल अरे, दूर क्यों जाते हो अभी पिछले साल आप मुरादाबाद गए थे?
विश्वनाथ हा पिछले साल मैं लखनऊ जाते हुए दो दिन के लिए जगदीशप्रसाद के पास मुरादाबाद ठहरा था।
नन्हेमल हाँ, सेठ जगदीशप्रसाद के यहाँ हमने आपको देखा था।
बाबूलाल उनकी आटे की मिल है, क्या कहने हैं उनके—बड़े आदमी हैं। हम उन्हीं के रिश्तेदार हैं।
विश्वनाथ पर उनका तो प्रेस है।
नन्हेमल रही है।
बाबूलाल
विश्वनाथ तो आप कोई चिट्ठी-विट्ठी लाए हैं?
दोनों (सकपकाकर) चिट्ठी, चिट्ठी तो नहीं लाए है।
नन्हेमल में वह रहते हैं।
विश्वनाथ
नन्हेमल छह है बहुत बड़ा शह है साहब! हमें तो यह मालूम नहीं है, शायद बताया हो याद ही नहीं रहा।
विश्वनाथ
बाबूलाल क्या नाम था चाचा?
न्हेमल नाम तो याद नहीं आता। ज़रा ठहरिए, सोच लूँ।
बाबूलाल अरे चाचा, कविराज या कवि बताया था। मैं उस समय नहीं था सामान लेने घर गया था तुम्हीं ने रेल में बताया था।
न्हेमल हाँ, साहब, कविराज बताया था। आप तो बेकार शक में पड़ हैं! हम कोई चोर थोड़़े ही है।
बाबूलाल चोर छिपे थोड़़े ही रहते हैं पंडित जी, क्या बताएँ, हमारे घर चलकर देख ले तो पता लगेगा कि हम भी...
दान। (पएएाफर ता जाय हो पताया हामा, साहपा
नन्हेमल हमें याद नहीं आ रहा। हमें तो जो पता दिया था उसी के सहरे आ गए। नीचे आवाज लगाई और आप मिल गए, ऊपर चढ़ आए। पहले हमने सोचा होटल या धर्मशाला में ठहर जाएँ। फिर सोचा घर के ही तो हैं चलो, घर ही चलें।
विश्वनाथ जिनके यहाँ आपको जाना था, वह काम क्या करते हैं?
नन्हेमल काम? क्या काम बताया था बाबू?
बाबूलाल मेरे सामने तो कोई बात ही नहीं हुई मैं तो सामान लेने चला गया था। आप तो, पंडित जी शायद वैद्य हैं?
नन्हेमल हाँ, याद आया बताया था वैद् हैं।
विश्वनाथ पर मै तो वध्य नहीं हू।
प्रमोद पिछली गली में एक कविराज वैदघ रहते हैं
विश्वनाथ
दोनों (उछलकर) अरे हाँ, वही तो कविराज रामलाल।
विश्वनाथ शायद वह उधर के हैं भी।
नन्हेमल न संपतराम को जानते हैं, न जगदीशप्रसाद को— (प्रमोद से) कहाँ है उन कविराज का घर?
विश्वनाथ जाओ, इन्हे उनका मकान बता दो। मैं भीतर हो आऊँ।
दोनों चलो, जल्दी चलो भेया, अच्छा साहब, राम-राम
विश्वनाथ (भीतर से ही) राम-राम!
रेवती अब जान में जान आई हाय, सिर फटा जा रहा है। (नीचे से आवाज आती है) (नेपथ्य में— भले आदमी, न जाने कहाँ मकान लिया है— ढूढ़े-ढूँढते आधी रात हो गई)
रेवती फिर, फिर, (प्रसन्न होकर) अरे अरे भैया हैं! आओ, आओ, तुमने तो खबर भी न दी।
आगंतुक रेवती! (दोनों मिलते हैं विश्वनाथ से) पिछले चार घटे से बराबर मकान खोज रहा हू क्या मेरा तार नहीं मिला?
विश्वनाथ नहीं तो, कब तार दिया था?
आगंतुक
रेवती लो, कपड़े उतार डालो पंखा करती हू अरे प्रमोद, जा जल्दी से बरफ तो ला। मामा जी को उंडा पानी पिला। और देख, नुक्कड़ पर हलवाई की दुकान खुली हो तो.
आगंतुक भाई, बहुत बड़ा शहर है। वह तो कहो, मैं भी ढूढ़कर ही रहा, नहीं तो न जाने कहाँ होटल या धर्मशाला में रहना पड़ता। बड़ी गरमी है। मैं ज़रा बाथरूम जाना चाहता हू।
विश्वनाथ हाँ, हाँ, अवश्य। सामने चले जाइए।
आगंतुक एक बार तो जी में आया कि सामने होटल में ठहर जाऊँ शायद रात को आप लोगों को कोई कष्ट हो।
रेवती ऐसा क्यों सोचते हो! कष्ट काहे का! यह तो हम लोगों का कत्तव्य था। अच्छा, तुम तैयार हो, मैं खाना बनाती हूँ।
आगंतुक भई, देखो, इस समय खाना-वाना रहने दो मैं पानी पीकर सो जाऊँगा। वैसे मुझे भूख भी नहीं है।
रेवती (जाती हुई, लौटकर) कैसी बातें करते हो भैया! मैं अभी खाना बनाती हू।
आगंतुक इतनी गरमी में! रहने दो ना।
विश्वनाथ तुम नहाने तो जाओ। (आगंतुक जाता है। रेवती से) कहो, अब?
रेवती अब क्या, मैं खाना बनाऊँंगी। भैया भुखे नहीं सो सकते।


लेखक से परिचय

अभी आपने जो एकांकी पढ़ी, उसके लेखक है—उदयशंकर भटा इनका जन्म उत्तर प्रदेश के इटावा में हुआ। परिवार में साहित्यिक वातावरण था इसलिए इनकी साहित्य में अधिक
(1898-1966)
रच थी। इन्होन रेडियो के लिए अनेक 'नाटक' लिखे। साथ ही नाटकों तथा फिल्मो में अभिनय भी किया है। इन्होंने कविता और उपन्यास भी लिखे हैं लेकिन नाटक व एकांकी के क्षत्में इन्हे विशेष प्रसिद्ि मिली है। इनका लोक-परलोक उप्यास और पदे के पीछे एकांकी संग्रह बहुत चर्चित रहे हैं
पाठ से
आइए, अब हम इस एकांकी को थोड़ा और विस्तार से समझते हैं। नीचे दी गई गतिविधियाँ इस कार् में आपकी सहायता करेगी।
मेरी समझ से
(क) निन्मलिखित पर्नोंके उपयु्त उत्र के स्मुख तारा (*) बनाइए कुछ प्र्नोंके एक से अधिक उत्र भी हो सकते हैं।
- आगंतुको ने विश्वनाथ के बच्चों को 'सीधे लड़के' किस संद्भ में कहा?
• अतिथियों की सेवा करने के कारण किसी तरह का प्र्न न करने के कारण आज्ञाकारिता के भाव के कारण गरमी को चुपचाप सहने के कारण

२."एक ये पड़ोसी है, निदयी.." विश्वनाथ ने अपने पड़ोसी को निदयीक्यों कहा?
0 उन्हे कष्ट में देखक प्रन होते हैं पड़ोसी किसी प्रकार का सहयोग नहीं करते हैं लड़ने-झगडइने के अवसर ढूढ़ते है 0 अतिथियों का अपमान करते हैं
3."ईश्र करें इन दिनों कोई मेहमान न आए" रेवती इस तरह की कामना क्यों कर रही है?
• मेहमान के ठहरने की उचित व्यवस्था न होने के कारण रेवती का स्वास्थ्य कुछ समय से ठीक न होने के कारण अतिथियों के आने से घर का कार्य बढ़ जाने के कारण 0 उसे अतिथियों का आना-जाना पसंद न होने के कारण
- "हे भगवान! कोई मुसीबत न आ जाए"रेवती कौन-सी मुसीबत नहीं आने के लिए कहती है?
• पानी की कमी होने की पड़ोसियों के चिल्लाने की मेहमानों के आने की गरमी के कारण बीमारी की

- इस एकांकी के आधार पर बताएँ कि मुख्य रूप से कौन-सी बात किसी रचना को नाटका का रूप देती है?
संवाद कथा वर्णन मंचन
(ख) हो सकता है कि आप सभी ने अलग-अलग उत्तर चुने हों अब अपने सहपाठियों के साथ चर्चा कीजिए कि आपने ये उत्त ही क्यों चने?
पक्तियों पर चर्चा

पाठ में से चुनकर कुछ पंक्तियाँ नीचे दी गई हैं इ्हेंध्यानपूर्वक पढिए और इन पर विचार कीजिए। आपको इनका क्या अर् समझ में आया? अपने विचार अपनी ककषा में साझा कीजिए।
"पानी पीते-पीत पेट फूला जा रहा है, और प्यास है कि बुझने का नाम नहीं लेती" "सारे शहर में जैसे आग बरस रही हो" "यह तो हमारा ही भाग्य है कि चने की तरह भाड में ुनते रहते है" "आह, अब जान में जान आईं सचमुच गरमीमें पानी ही तो जान है।"
मिलकर करें मिलान

स्तंभ 1 में कुछ पंक्तियाँ दी गई हैं और स्तंभ 2 में उनसे मिलते-जुलते भाव दिए गए हैं स्तंभ 1 की पंक्तियों को स्तंभ 2 की उनके सही भाव वाली पंक्तियो से रेखा खींचकर मिलाइए
| क्रम | स्तंभ 1 | स्तंभ २ |
| 1. | लाखों के आदमी खाक में मिल गए। | 1. भोजन की व्यवस्था कब तक हो जाएगी |
| 2. | धोती ऐसी चरा रही है, जैसे पुरानी हो। | 2. पहले अपना ध्यान फिर दूसरा काम |
| 3. | माल-मसाला तो अंटी में है न? | 3. बहुत ही समृद्धव्यक्त थे पर अब उनके पास कुछ भी नहींह |
| 4. | खाने में क्या देर-दार है। | 4. कपड़ा पसीने से भीगकर पुराने जैसा हो गया है |
| 5. | पहले आत्मा फिर परमात्मा | 5. धनराशि सुरक्षित तो है न! |
सोच-विचार के लिए
एकांकी को पुन पढिए, पता लगाइए और लिखिए
(क) "शहर में तो ऐसे ही मकान होते हैं" न्हेमल
का 'ऐसे ही मकान' से क्या आशय है?
(ख) पड़ोसी को विश्वनाथ से किस तरह की शिकायत है? आपके विचार से पड़ोसी का व्यवहार उचित है या अनुचित? तके सहित उत्र दीजिए।
(ग) एकांकी में विश्वनाथ न्हेमल और बाबूलाल को नहीं जानता है, फिर भी उ्हें अपने घरमें आने देता है। क्यों?
(घ) एकांकी के उन संवादों को ढूढ़कर लिखिए जिनसे पता चलता है कि बाबूलाल और न्हेमल विश्वनाथ के परिचित नहीं हैं?
(उ) एकांकी के उन वाक्यों को ढूढ़कर लिखिए जिनसे पता चलता है कि शहर में भीषण गरमी पड़रही है।
अनुमान और कल्पना से
अपने समूह में मिलकर चर्चा कीजिए
(क) एकांकी में विश्वनाथ अपनी पत्नी को अतिथियों के लिए भोजन की व्यवस्था करने के लिए कहता है। साथ ही रेवती की अस्वस्थता का विचार करके भोजन बाजार से मँगवाने का सुझाव भी देता है। लेकिन उसने स्वयं अतिथियों के लिए भोजन बनाने के विषय में क्यों नहीं सोचा?
(ख) एकांकी में विश्वनाथ का बेटा प्रमोद अतिथियों के पेयजल की व्यवस्था करता है और छोटी बहन का भी ध्यान रखता है प्रमोद को इस तरह के उतरदायित्व क्यों दिए गए होंगे?
(ग) "कैसी बाते करते हो, भैया! मैं अभी खाना बनाती हू" भीषण गरमी और सिर में दर् के बावजूद भी रेवती भोजन की व्यवस्था करने के लिए क्यों तैयार हो गई होगी?
(घ) एकांकी से गरमी की भीषणता दशाने वाली कुछ पंक्तियाँ दी जा रही हैं। अपनी कल्पना और अनुमान से बताइए कि सदी और वर्षा की भीषणता के लिए आप इनके स्थान पर क्या-क्या वाक्य प्रयोग करते हैं? अपने वाक्यों को दिए गए उचित स्थान पर लिखिए—
| गरमी की भीषणतादश्शाने वाली पंक्तियाँ | सदी की भीषणतादर्शाने वाली पंक्तियाँ | वर्ष की भीषणतादशाने वाली पंक्तियाँ |
| 1. यह गरमी में भुन रहा है। | यह सर्दी में जम गया। | यह वर्षा में भीग रहा है। |
| २. पर बरफ भी कोई कहाँ तक पिए। | ||
| 3. सारे शहर में जैसे आग बरस रही हो | ||
| ४. प्यास है कि बुझने का नाम नहीं लेती। | ||
| 5. चारों तरफ दीवारे तप रही हैं |
| . ंडा-ंडा पानी पिलाओ दोस्त,प्राण सूखे जा रहे हैं। |
| 7. सचमुच गरमी में पानी ही तो जान है। |
| 8. यह तो हमारा ही भाग्य है कि चनेकी तरह भाड़ में भुनते रहते हैं। |
| 9. फिर भी पसीने से नहा गया हूँ। |
एकांकी की रचना
इस एकांकी के आरंभ में पात्-परिचय, स्थान, समय और विश्वनाथ औरेवती के घर के विषय में बताया गया है, जैसे कि
• ारमी की ऋत, रात के आठ बजे का समय कमेक पूर्वकी ओर दो दरवाज."
• विश्वनाथ— उफ्फ, बड़ी गरमी है (पंखा जोर-जोर से करने लगता है) इन बंद मकानों में रहना कितना भयंकर है। मकान है कि भट्ी
(पश्चम की ओर से एक स्रीप्रेश करती है)
रेवती(आँचल सेमुह का पसीना पोंछत हुई)प्ता तक नह हिल रहा है जसे साँस बंद हो जाएगी सिर फटा जा रहा है।

एकांकी की इन पंक्तियों को ध्यान से पढिए। इन्हे पढ़कर स्पष्ट पता चल रहा है कि पहली पंक्त समय और स्थान आदि के विषय में बता रही है इसे रंगमंच-निदेश कहते हैं वहीं दूसरी पंक्तयो से स्पष्ट है कि ये दो लोगों द्वारा कही गई बाते हैं इन्हे संवाद कहा जाता है ये 'नए मेहमान' एकांकी का एक अंश है।
एकांकी एक प्रकार का नाटक होता है जिसमें केवल एक ही अंक या भाग होता है। इसमे किसी कहानी या घटना को संक्षेपमे दशाया जाता है आप इस एकांकी में ऐसी अनेक विशेषताएँ खोज सकते हैं (जैसे—इस एकांकी में कुछ संकेत कोष्ठक में दिए गए हैं, पात्र-परिचय, अभिनय संकेत, वेशभूषा संबंधी निदेश आदि)
(क) अपने समूह में मिलकर इस एकांकी की विशेषताओं की सूची बनाइए
(ख) आगे कुछ वाक्य दिए गए हैं। एकांकी के बार में जो वाक्य आपको सही लग रहे हैं उनके सामने 'हाँ' लिखिए। जो वाक्य सहीं नहीं लग रहेहैं उनके सामने 'नहीं' लिखिए
| वाक्य | हॉ/नहीं |
| "नए मेहमान' एकांकी में पूरी कहानी एक ही स्थान, घर में घटित होती दिखाई गई है। | |
| 2. एकांकी में पात्रों की संख्या बहुत अधिक है | |
| 3. एकांकी में एक कहानी छिपी है। | |
| 4. एकांकी और कहानी में कोई अंतर नहीं है। | |
| 5. एकांकी में कहानी की घटनाएँ अलग-अलग दनों या महीनों में हो रही हैं। | |
| 6.एकांकी में कहानी मुख्य रूप से संवादों से आगे बढ़ती है। | |
| 7.एकांकी में ात्रों को अभिनय के लिए निदेश दिए गए हैं। |
अभिनय की बारी
(क) क्या आपने कभी मंच पर कोई एकांकी या नाटक देखा है? टीवी पर फिल्में और धारावाहिक तो अवश्य देखे होंगे! अपने अनुभवों से बताइए कि यदि आपको अपने विद्ालय में नए मेहमान' एकांकी का मंचन करना हो तो आप क्या-क्या तैयारियाँ करंगे (उदाहरण के लिएइस एकांकी में आप क्या-क्या जोड़़ंगे जिससे यह और अधिक रोचक बने, कौन-से पात्र जो़ंगे या पात्रों की वेशभूषा क्या रखेंग?)
(ख) अब आपको अपने-अपने समूहमें इस एकांकी को प्र्तुत करने की तैयारी करनी है। इसके लिए आपको यह सोचना है कि कौन किस पात्र का अभिनय करेगा। आपके शिक्षक आपको तैयारी के बाद अभिनय के लिए निधारित समय देंग (जैसे 10 मिनट या 15 मिनट) आपको इतने ही समय में एकांकी प्र्त करनी है बारी-बारी से प्त्येक समूह एकांकी प्र्तुत करेगा।
सुझञाव—
आप एकांकी को जैसा दिया गया है बिलकुल वैसा भी प्र्तुत कर सकते हैं या इसमे थोड़ा-बहुत परिवर्तन भी कर सकते हैं। • एकांकी के लिए आस-पास की वस्तुओं का ही उपयोग कर लेना है, जैसे—कुसी, मेज आदि स्थान की कमी हो तो अभिनेता बच्चे अपने स्थान पर खड़े-खड़े भी संवाद बोल सकते हैं। आप चाहें तो अपने अभिनय को अपने शिक्षक की सहायता से रिकॉर्ड करके उसे अपने परिवार या संबंधियों के साथ साझा भी कर सकते हैं।
भाषा की बात
"सारे शहर में जैसे आग बरस रही हो" "चारों तरफ दीवारेंतप रही है"
"यह तो हमारा ही भाग्य है कि चने की तरह भाड़ में भुनते रहते हैं"
उपयुक्त वाक्यं मं रेखांकित शब्द गरमी की प्रचंडता को दरशा रहेहैंकि तापमान अत्यधिक है।
एकांकी में इस प्रकार के और भी प्रयोग हुए हैं जहाँ शब्दोंके माध्यम से विशेषप्रभाव उत्पन किया गया है उन प्रयोगों को छॉटकर अपनी लेखन पुस्तका में लिखिए।
मुहावरे
"आज दो साल से दिन-रात एक करके ढूँढ रहा हू" "लाखों के आदमी खाक में मिल गए"
उपर्ुक्त वाक्यं मे रेखांकित वाक्यांश 'रात-दिन एक करना' तथा 'खाक में मिलना' मुहावरों का प्रायोगिक रूप है ये वाक्य में एक विशे प्रभाव उत्पन्न कर रहे हैं एकांकी में आए अन्य मुहावरों की पहचान करके लिखिए और उनके अर्थ समझते हुए उनका अपने वाक्यों ें प्रयोग कीजिए
बात पर बल देना
"वह तो कहो, मैं भी ढूढकर ही रहा"

उपयुक्त वाकय से ेांकित शब्द'ही हटाकर पढिए "वह तो कहो, मैं भी ढूढ़कर रहा"
(क) दो-दो के जोड़़ेमें चर्चा कीजिए कि वाक्य में 'ही' के प्रयोग से किस बात को बल मिल रहा था और 'ही' हटा देने से क्या कमी आई? (ख) नीचे लिखे वाक्यों मं ऐसे स्थान पर 'ही' का प्रयोग कीजिए कि वे सामने लिखा अर्थ देने लगे—
और किसी के अतिथि नहीं। यहाँ के अतिरिक्त और कहीं नहीं।
3.विश्वनाथ के अतिथि यहाँ रूकेंगे यहाँ रुकना निश्चित है।
"तुम नहाने तो जाओ"
उप्यक्त वाक्य मं तो क स्थान बदलकर अर् में आए परिवर्तन पर ध्यान दे
"तुम तो नहाने जाओ"
"तुम नहाने जाओ तो"
'ही' और 'तो के ऐसे और प्रयोग करके वाक्य बनाइए
पाठ से आगे
आपकी बात
(क) "रेवती—ये लोग कौन हैं? जान-पहचान के तो मालूम नहीं ड़ते विश्वनाथ—क्या पूछ लूँ? दो-तीन बार पूछा, ठीक-ठीक उत्र ही नहीं देती"
उप्युक्त संवाद से पता चलता है कि विश्वनाथ दुविधा की स्थित में है क्या आपके सामने कभी कोई ऐसी दुविधापूर्ण स्थिति आई है जब आपको यह समझने में समय लगा हो कि क्या सही है और क्या गलत? अपने अनुभव साझा कीजिए।
(ख) एकांकी से ऐसा लगता है कि न्हेमल और बाबूलाल सगे संबंधी ही नहीं, अच्छे मित्र भी हैं आपके अच्छे मित्र कौन-कौन हैं? वे आपको क्यों प्रय हैं?
(ग) आप अपने किसी संबंधी या मित् के घर जाने से पहले क्या-क्या तैयारी करते हैं? ne
(घ) विश्वनाथ के पड़ोसी उनका किसी प्रकार से भी सहयोग नहीं करते हैं आप अपने पड़ोसियों का किस प्रकार से सहयोग करते हैं?
(उ) न्हेमल और बाबूलाल का व्यवहार सामान्य अतिथियों जैसा नहीं है। आपके अनुसार सामान्य अतिथियों का व्यवहार कैसा होना चाहिए?
सावधानी और सुरक्षा
(क) विश्वनाथ ने न्हेमल और बाबूलाल से उनका परिचय नहीं पूछा और उ्ें घर के भीतर ले आए यद आप उनके स्थान पर होते तो क्या करते?
(ख) आपके माता-पिता या अभिभावक की अनुपस्थिति में यदि कोई अपरिचित व्यक्ति आए तो आप क्या-क्या सावधानियाँ बरतेंगे?
सृजन
(क) आपने यह एकांकी पढ़ी। इस एकांकी में एक कहानी कही गई है। उस कहानी को अपने शब्दो में लिखिए। (जैसे—एक दिन मेरे घर में मेहमान आ गए...)

गरमी का प्रकोप
"तमाम शरीर मारे गरमी के उबल उठा है"
एकांकी में भीषण गरमी का वर्णन किया गया है आप गरमी के प्रकोप से बचने के लिए क्या-क्या
सावधानी बरतेंे? पाँच-पाँच के समू में चर्चा कें ुख्य बिंदुओं को चार् पेपर पर लिखकर बुलेटिन बो्ड पर लगाएँ और इन्हे व्यवहर में लाएँ
तार से संदेश
"क्या मेरा तार नहीं मिला?"

रेवती के भाई ने अपने आने की सूचना तार द्वारा भेजी थी 'तार' संदेश भेजने का एक माध्यम था। जिसके द्ारा शीप्रता से किसी के पास संदेश भेजा जा सकता था, किंतु अब इसका प्रचलन नहीं है।
टेलीग्राफ
हो गई है।
(क) तार भेजने के आधार पर अनुमान लगाएँ कि यह एकांकी लगभग कितने वर्ष पहले लिखी गई होगी?
(ख) आजकल संदेश भेजने के कौन-कौन से साधन सुलभ हैं?
(ग) आप किसी को संदेश भेजने के लिए किस माध्यम का सव्वाधिक उपयोग करते हैं?
(घ) अपने किसी प्रिय व्यक्त को एक पत्र लिखकर भारतीय डाक द्वारा भेजिए।
नाप, तौल और मुद्वाएँ
"जबकि नत्थामल के यहाँ साढ़ नौ आने गज बिक रही थी।"
उप्युक्त पंक्त के रेखांकित शब्दों पर ध्यान दीजिए। रेखांकित शब्द 'सा़े नौ', 'आने', गज' में 'साढ़े नौ भारतीय भाषा में अंतराष्टीय अंक (9.5) को दशा रहा है तो वहीं 'आने' शब्द भारतीय मुद्ा और गज शब्द लंबाई नापने का मापक है।
(क) पता लगाइए कि एक रुूपयेमें कितने आने होतेहैं?
(ख) चार आने में कितने पैसे होते हैं?
(ग) आपके आस-पास गज शब्द का प्रयोग किस संदर्भ ें किया जाता है? पता लगाइए और लिखिए।
(घ) बताइए कि एक गज में कितनी फीट होती हैं?

झरोखे से
कवि सर्यकांत त्रिपाठी निराला' का जीवन सादगी भरा था, परंतु वे अपने आतिथ्य के लिए जाने जाते थे। उनके घर में कोई अतिथि आ जाए तो वे उसके सत्कार के लिए जी-जान से जुट जाते थे महादेवी वमा की पस्तक पथ के साथी से निराला के आतिथ्य भाव का एक छोटा-सा अंश पढ़िए
ऐसे अवसरों की कमी नहीं ज वे अकस्मात पहुँच कर कहने लग.ेर इक पर कुछ लकड़याँ। थोड़ा घी आदि रखवा दो। अतिथ आए हैं घर में सामान नहीं है"
उनके अतिथि यहाँ भोजन करने आ जावें सुनकर उनकी दृषटमें बालकों जैसा विस्मय छलक आता है। जो अपना घर समझकर आएहैं उनसे यह कैसे कहा जाए कि उन्हें भोजन के लिए दूसरे घर जाना होगा। भोजन बनाने से लेकर जूठे बर्तन मॉँजने तक का काम वे अपने अतिथ देवता के लिए सहर्ष करते हैं तैतीस कोटि देवताओं के दे में इस वर्ग के देवताओं की संख्या कम नहीं, पर आधुनिक युग ने उनकी पूजा विधि में बहुत कुछ सुधार कर लिया है अब अतिथि-पूजा के अवसर वैसे कम ही आतेहैं और यदि आ भी प़ तो देवता के और अभिषेक, शृंगार आदि संस्कार बेयरा, नौकर आदि ही संपन करा देतेहैं पुजारी गृहपति को तो भोग लगाने की मेज पर उपस्थत रहने भर का कर्तव्य सभालना पड़ता है। कुछ देवता इस कर्तव्य से भी उसे मुक्त दे देते हं।
ऐसे युग में आतिथ्य की दृष्ट से निराला जी मे वही पुरातन संस्कार है जो इस देश के ग्रामीण किसान में लता है।
उनके भाव की अतल गहराई और अबाध वेग भी आधुनिक सभ्यता के छिछले और बँधे भाव-व्यापार से भिन्न हैं।
भारत में 'अतिथ देवो भव? की परंपरा रही है। आपके घर जब अतिथ आते हैं तो आप उनका अभिवादन कैसे करते हैं, अपनी भाषा में बताइए और अपने सहपाठियों के साथ चर्चा कीजिए कि अतिथियों को आप अपने राज्य, क्ेत्र का कौन-सा पारंपरिक व्यंजन खिलाना चाहते हैं।
खोजबीन के लिए
इस एकांकी में 'आने', 'गज' और 'तार' शब्द आए हैं इनके विषय में विस्तार से जानकारी इकट्ठी कीजिए। इसके लिए आप अपने अभिभावक, अध्यापक, पुस्तकालय या इंटरनेट की सहायता भी ले सकते हैं।