
हजारी प्रसाद द्विवेदी
(सन् 1907-1979)
हजारी प्रसाद द्वेदी का जन्म गाँव आरत दुबे का छपरा, जिला बलिया (उ.प्र.) में हुआ था। संस्कृत महावि्यालय, काशी से शास्री परीक्षा उत्तर्ण करने के बाद उन्होने 1930 में काशी हिंदू विश्वविद्यालय से ज्योतिषाचार्य की उपाध प्ाप्त की।
इसके बाद वे शांति निकेतन चले गए। 1940-50 तक द्िवेदी जी हिंदी भवन, शांति निकेतन के निदेशक रहे। वहाँ उन्हे गुरुदेव रवंद्नाथ टैंगोर और आचार्य क्षितिमोहन सेन का सान्निध्य प्रापत हुआ। सन् 1950 में वे वापस वाराणसी आए और काशी हिंदू विश्वविद्यालय में हिंदी विभाग के अध्यक्ष बने। 1952-53 में वे काशी नागरी प्रचारिणी सभा के अध्यक्ष थे। 1955 में वे प्रथम राजभाषा आयोग के सदस्य रष्टपति के नामिनी नियुक्त किए गए। 1960-67 तक पंजाब विश्वविद्यालय चंडीगढ़ में हिंदी विभागाध्यक्ष का पद ग्रहण किया। 1967 में काशी हिंदू विश्ववि्यालय में रेक्टर नियुक्त हुए। यहाँ से अवकाश ग्रहण करने पर वे भारत सरकार की हिंदी विषयक अनेक योजनाओं से संबद्र रहे। जीवन के अंतिम दिनों में उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष थे।
आलोक पर्व पुस्तक पर उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया। लखनऊ विश्ववद्यालय ने उन्हे डी.लिट को मानद उपाध दी और भारत सरकार ने उन्हेंपद्मभूषण अलंकरण से विभृषित किया।
द्वेदी जी का अध्यन क्षेत्र बहुत व्यापक था| संस्कृत, प्राकृत, अप्रंश, बाँगला आद भाषाओं एवं इतिहास, दर्शन, संस्कृति, धर्म आदि विषयों में उनकी विशेष गति थी। इसी कारण उनकी रचनाओं में भारतीय संस्कृत की गहरी पैठ और विषय वैविध्य के दर्शन होते हैं। वे परंपरा के साथ आधुनिक प्रगतिशील मूल्यों के समन्वय में विश्वास करते थे।
द्विवेदी जी की भाषा सरल और प्ांजल है। व्यक्तत्व-व्यंजकता और आत्मपरकता उनकी शैली की विशेषता है। व्यंय शैली के प्रयोग ने उनके निबंधों पर पांडित्य के बोझ को हावी नहीं होने दिया है। भाषा-शैली की दृष्ट से उन्होंने हिंदी की गधछ शैली को एक नया रूप दिया
उनकी महत्वपूर्ण रचनाएँ हैं-अशोक के फूल, विचार और वितर्क, कल्पलता, कुटज, आलोक पर्व (निबंध-संकलन), चारूचंद्रलेख, बाणभट्ट की आ्मकथा, पुनर्नवा, अनामदास का पोथा (उप्यास), सूर-साहित्य, कबीर, हिंदी साहित्य की भूमिका, कालिदास
की लालित्य-योजना (आलोचनात्मक ग्रंथ)। उनकी सभी रचनाएँ हजारी प्रसाद द्िवेदी ग्ंथावली (के ग्यारह खंड) में संकलित हैं।
कुटज हिमालय पव्त की ऊँचाई पर सूखी शिलाओं के बीच उगने वाला एक जंगली पौधा है, जिसमे फुल लगते है। इसी फुल की प्रृत पर यह निबंध कुटज लिखा गया है। कुटज में न विशेष सौद्य है, न सुगंध, फिर भी लेखक ने उसमें मानव के लिए एक संदेश पाया है। कुटज में अपाजेय जीवनशक्त है, स्वावलंबन है, आ्मविशवास है और विषम परिस्थितियों में भी शान के साथ जीने की क्षमता है। वह समान भाव से सभी परिस्थितियों को स्वीकारता है। सामान्य से सामा्य वस्तुमें भी विशेष गुण हो सकतेहैं यह जताना इस निबंध का अभीष्ट है।
कुटज
कहते हैं, पर्ंत शोभा-निकेतन होते हैं। फिर हिमालय का तो कहना ही क्या! पूर्व और अपर समुद्र-महोदिध और रलाकार-दोनों को दोनों भुजाओं से थाहता हुआ हिमालय 'पृथ्वी का मानदंड' कहा जाए तो गलत क्या है? कालिदास ने ऐसा ही कहा था। इसी के पाद-देश में यह शृंखला दूर तक लोटी हुई है, लोग इसे शिवालिक शृंखला कहते हैं। 'शिवालिक' का क्या अर्थ है? 'शिवालिक' या शिव के जटाजूट का निचला हिस्सा तो नहीं है। लगता तो ऐसा ही है। शिव की लटियायी जटा ही इतनी सूखी, नीरस और कठोर हो सकती है। वैसे, अलकनंदा का सरोत यहाँ से काफ़री दूरी पर है, लेकिन शिव का अलक तो दूर-दूर तक छितराया ही रहता होगा। संपू्ण हिमालय को देखकर ही किसी के मन में समाधिस्थ महादेव की मूत्ति स्पष्ट हुई होगी। उसी समाधिस्थ महादेव के अलक-जाल के निचले हिस्से का प्रतिनिधित्व यह गिरि-शृंखला कर रही होगी। कहीं-कहीं अज्ञात नाम-गोत्र झाड-झंखाड और बेहया-से पेड़ खड़े अवश्य दिख जाते हैं पर और कोई हरियाली नहीं। दूब तक सूख गई है। काली-काली चटनें और बीच-बीच में शुष्कता की अंतर्निरुूद्ध सत्ता का इजहार करने वाली रक्ताभ रेती! रस कहाँ है? ये जो ठिंगने से लेकिन शानदार दरखत गरमी की भयंकर मार खा-खाकर और भूख-प्यास की निरंतर चोट सह-सहकर भी जी रहे हैं, इन्हें क्या कहूं? सिरफ्फ जी ही नहीं रहे हैं, हँस भी रहे हैं। बेहया हैं क्या? या मस्तमौला हैं? कभी-कभी जो लोग ऊपर से बेहया दिखते हैं, उनकी जड़ें काफ़ी गहरी, पैठी रहती हैं। ये भी पाषाण की छाती फाड़कर न जाने किस अतल गहर से अपना भोग्य खींच लाते हैं।
शिवालिक की सूखी नीरस पहाड़ियों पर मुसकुराते हुए ये वृकष ददधतीत हैं, अलमस्त हैं। मैं किसी का नाम नहीं जानता, कुल नहीं जानता शील नहीं जानता पर लगता है, ये जैसे मुझे अनादि काल से जानते हैं। इन्हीं में एक छोटा-सा, बहुत ही ठिगना पेड़ है, पते चौड़े भी हैं बड़े भी हैं। फूलों से तो ऐसा लदा है कि कुछ पूछिए नहीं। अजीब सी अदा है, मुसकुराता जान पड़ता है। लगता है, पूछ रहा है कि क्या तुम मुझे भी नहीं पहचाने? पहचानता तो हूँ, अवश्य पहचानता हूँ। लगता है, बहुत बार देख चुका हूँ पहचानता हूँ उजाड़ के साथी, तुमहें अच्छी तरह पहचानता हूँ। नाम भूल रहा हूं प्राय: भूल जाता हूँ रूप देखकर प्राय: पहचान जाता हूँ, नाम नहीं याद आता। पर नाम ऐसा है कि जब तक रूप के पहले ही हाजिर न हो जाए तब तक रूप की पहचान अधूरी रह जाती है। भारतीय पंडितों का सैकड़ों बार का कचारा-निचोड़ा प्र्न सामने आ गया-रूप मुख्य है या नाम?
नाम बड़ा है या रूप? पद पहले है या पदार्थ? पदर्थ सामने है, पद नहीं सूझ रहा है। मन व्याकुल हो गया। ्मृतियों के पंख फैलाकर सुदूर अतीत के कोनों में झकता रहा। सोचता हूं इसमें व्याकुल होने की क्या बात है? नाम में क्या रखा है-हाट्स देअर इन ए नेम! नाम की जरूरत ही हो तो सौ दिए जा सकते हैं ुस्मता, गिरिकांता, वनप्रभा, शुभरकिरीटिनी, मदोद्धता, विजितातपा, अलकावतंसा, बहुत से नाम हैं! या फिर पौरुष-व्यंजक नाम भी दिए जा सकते है-अकुतोभय, गिरिगौरव, कूटोल्लास, अपराजित, धरतीधकेल, पहाड़फोड़, पातालभेद! पर मन नहीं मानता। नाम इसलिए बड़ा नहीं है कि वह नाम है। वह इसलिए बड़ा होता है कि उसे सामाजिक स्वीकृति मिली होती है। रूप व्यक्त-सत्य है, नाम समाज-सत्या नाम उस पद को कहते हैं जिस पर समाज की मुहर लगी होती है। आधुनिक शिक्षित लोग जिसे 'सोशल सेक्शन' कहा करते है। मेरा मन नाम के लिए व्याकुल है, समाज द्वारा स्वीकृत, इतिहास द्वार प्रमाणित, समष्ट-मानव की चित्त-गंगा में स्नात। इस गिरिकूट-बिहारी का नाम क्या है? मन दूर-दूर तक उड़ रहा है-देश में और काल मे-मनोरथानामगतिनीविदते! अचानक याद आया-अरे, यह तो कुटज है! संस्कृत साहित्य का बहुत परिचित किंतु कवियों द्वारा अवमानित, यह छोटा सा शानदार वृक्ष 'कुटज' है।'कूटज' कहा गया होता तो कदाचित् ज्यादा अच्छा होता। पर नाम इसका चाहे कुटज ही हो, विरुद तो निस्संदेह 'कूटज' होगा। गिरिकूट पर उत्पन्न होने वाले इस वक्ष को 'कूटज' कहने में विशेष आनंद मिलता है।
बहरहाल, यह कूटज-कुटज है, मनोहर कुसुम-स्तबकों से झबराया, उल्लास-लोल चारुस्मत कुटज! जी भर आया। कालिदास ने 'आषाढ़स्य प्रथम-दिवसे' रामगिरि पर यक्ष को जब मेघ की अभ्यर्थना के लिए नियोजित किया तो कम्बख्त को ताजे कुटज पुष्षों की अंजल देकर ही संतोष करना पड़ा- चंपक नहीं, बकुल नहीं, नीलोत्पल नहीं, मल्लका नहीं, अरविंद नहीं-फकत कुटज के फूल! यह और बात है कि आज आषाढ़ का नहीं, जुलाई का पहला दिन है। मगर फर्क भी कितना है। बार-बार मन विश्वास करने को उतारू हो जाता है कि यक्ष बहाना मात्र है, कालिदास ही कभी 'शापेनास्तंगमितमहिमा' होकर रामगिरि पहुँचे थे, अपने ही हाथों इस कुटज पुष्प का अच्य देकर उन्होंने मेघ की अभ्यर्थना की थी। शिवालिक की इस अनत्युच्च पर्वत-शृंखला की भाँति रामगिरि पर भी उस समय और कोई फूल नहीं मिला होगा। कुटज ने उनके संतृप्त चित्त को सहारा दिया था-बड़भागी फूल है यह! धन्य हो कुटज, तुम 'गाढ़े के साथी' हो। उत्तर की ओर सिर उठाकर देखता हूं, सुदूर तक ऊँची काली पर्वत-शृखला छाई हुई है और एकाध सफेद बादल के बच्चे उससे लिपटे खेल रहे हैं। मैं भी इन पुषपों का अघ्य उन्हें चढ़ा दू। पर काहे वास्ते? लेकिन बुरा भी क्या है? कुटज के ये सुदर फूल बहुत बुरे तो नहीं हैं। जो कालिदास के काम आया हो उसे ज्यादा इज्जत मिलनी चाहिए। मिली कम है। पर इज्जत तो नसीब की बात है। रहीम को मैं बड़े आदर के साथ स्मरण करता हूँ। दरियादिल आदमी थे, पाया सो लुटाया। लेकिन दुनिया है कि मतलब से मतलब है, रस चूस लेती है, छलका और गुठली फेंक देती है। सुना है, रस चूस लेने के बाद रहीम को भी फेंक दिया गया था। एक बादशाह ने आदर के साथ बुलाया, दूसरे ने फेक दिया! हुआ ही करता है। इससे रहीम का मोल घट नहीं जाता। उनकी फक्क़ाना मस्ती कहीं गई नहीं। अच्छे-भले कद्रदान थे। लेकिन बड़े लोगों पर भी कभी-कभी ऐसी वितृष्णा सवार होती है कि गलती कर बैठते हैं। मन खराब रहा होगा, लोगों की बेरुखी और बेकद्दरदानी से मुरझा गए होंगे-ऐसी ही मन:स्थिति में उन्होंने बिचारे कुटज को भी एक चपत लगा दी। झुझलाए थे, कह दिया-

वे रहीम अब बिरछ कह, जिनकर छाँह गंभीर; बागन बिच-बिच देखियत, सेहुड़ कुटज करीर।
गोया कुटज अदना-सा 'बिरछ'हो। 'छाँह' ही क्या बड़ी बात है, फूल क्या कुछ भी नहीं? छाया के लिए न सही, फूल के लिए तो कुछ सम्मान होना चाहिए। मगर कभी-कभी कवियों का भी 'मूड' खराब हो जाया करता है। वे भी गलत-बयानी के शिकार हो जाया करते हैं। फिर बागों से गिरिकूट-बिहारी कुटज का क्या तुक है?
कुटज अर्ात जो कुट से पैदा हुआ हो। 'कुट' घड़ को भी कहते हैं, घर को भी कहते हैं। कुट अर्थात घ़ से उत्पन्न होने के कारण प्तापी अगस्त्य मुन भी 'कुटज' कहे जाते हैं घ़े से तो क्या उत्पन्न हुए होंे। कोई और बात होगी। संस्कृत में 'कुटिहारिका' और 'कुटकारिका' दासी
को कहते हैं क्यों कहते हैं? 'कुटिया' या 'कुटीर' शब्द भी कदाचित इसी शब्द से संबद् है। क्या इस शब्द का अर्थ घर ही है। घर में काम-काज करने वाली दासी कुटकारिका और कुटहारिका कही ही जा सकती है। एक जरा गलत ढंग की दासी 'कुटनी' भी कही जा सकती है। संस्कृत में उसकी गलतियों को थोड़ा अधिक मुखर बनाने के लिए उसे 'कुृटृनी' कह दिया गया है। अगस्त्य मुनि भी नारद जी की तरह दासी के पुतर थे क्या? घड़े में पैदा होने का तो कोई तुक नहीं है, न मुन कुटज के सिलसिले में, न फूल कुटज के। फूल गमले में होते अवश्य हैं, पर कुटज तो जंगल का सैलानी है। उसे घड़े या गमले से क्या लेना-देना? शब्द विचारोतेजक अवश्य हैं। कहाँ से आया? मुझे तो इसी में संदेह है कि यह आर्यभाषाओं का शब्द है भी या नहीं। एक भाषाशास्री किसी संस्कृत शब्द को एक से अधिक रूप से प्रचलित पाते थे तो तुरंत उसकी कुलीनता पर शक कर बैठते थे। संस्कृत में 'कुटज' रूप भी मिलता है और 'कुटच' भी। मिलने को तो 'कूटज' भी मिल जाता है। तो यह शब्द किस जाति का है? आर्य जाति का तो नहीं जान पड़ता। सिलवाँ लेवी कह गए हैं कि संस्कृत भाषा में फूलों, वृक्षों और खेत-बागबानी के अधिकांश शब्द आगनेय भाषा-परिवार के हैं। यह भी वहीं का तो नहीं है। एक जमाना था जब आस्टेलिया और एशिया के महाद्दीप मिले हुए थे, फिर कोई भयंकर प्राकृतिक विस्फोट हुआ और वे दोनों अलग हो गए। उन्नीसवीं शताब्दी के भाषा-विज्ञानी पंडितों को यह देखकर आश्चर्य हुआ कि आस्टेलिया से सुदूर जंगलों में बसी जातियों की भाषा एशिया में बसी हुई कुछ जातियों की भाषा से संबद्ध है। भारत की अनेक जातियाँ वह भाषा बोलती हैं, जिनमें संथाल, मुंडा आदि भी शामिल हैं शुरू-शुरू में इस भाषा का नाम आस्ट्रे-एशियाटिक दिया गया था दक्षिण-पूर्व या अगनिकोण की भाषा होने के कारण इसे आग्नेय-परिवार भी कहा जाने लगा है। अब हम लोग भारतीय जनता के वर्ग-विशेष को ध्यान में रखकर और पुराने साहित्य का स्मरण करके इसे कोल-परिवार की भाषा कहने लगे हैं। पंडितों ने बताया है कि संस्कृत भाषा के अनेक शब्द, जो अब भारतीय संस्कृति के अविच्छे्य अंग बन गए हैं, इसी श्रेणी की भाषा के हैं कमल, कुड्मल, कंबु, कंबल, ताबूल आद शब्द ऐसे ही बताए जाते हैं। पेड़-पौधों, खेती के उपकरणों और औजारों के नाम भी ऐसे ही हैं। 'कुटज' भी हो तो क्या आश्चर्य? संस्कृत भाषा ने शब्दों के संग्रह में कभी छूत नहीं मानी। न जाने किस-किस नस्ल के कितने शब्द उसमें आकर अपने बन गए हैं। पंडित लोग उसकी छानबीन करके हैरान होते हैं। संस्कृत सर्वग्रासी भाषा है।
यह जो मेरे सामने कुटज का लहराता पौधा खड़ा है वह नाम और रूप दोनों में अपनी अपराजेय जीवनी शक्त की घोषणा कर रहा है। इसीलिए यह इतना आकर्षक है। नाम है कि हजारों वर्ष से जीता चला आ रहा है। कितने नाम आए और गए। दुनिया उनको भूल गई, वे दुनिया को भूल गए। मगर कुटज है कि संस्कृत की निरंतर स्फीयमान शब्दराशि में जो जमके बैठा, सो बैठा ही है। और
रूप की तो बात ही क्या है! बलिहारी है इस मादक शोभा की। चारों ओर कुपित यमराज के दारुण नि:श्वास के समान धधकती लू में यह हरा भी है और भरा भी है, दुर्जन के चित्त से भी अधिक कठोर पाषाण की कारा में रुद् अज्ञात जलस्रोत से बरबस रस खींचकर सरस बना हुआ है। और मूख के मस्तिष्क से भी अधिक सूने गिरि कांतार में भी ऐसा मस्त बना है कि ईंष्या होती है। कितनी कठिन जीवनी-शक्त है! प्राण ही प्राण को पुलकित करता है, जीवनी-शक्त ही जीवनी-शक्त को प्रणा देती है। दूर पर्वतराज हिमालय की हिमाच्छादित चोटियाँ है, वहीं कहीं भगवान महादेव समाधि लगाकर बैठे होंे; नीचे सपाट पथरीली जमीन का मैदान है, कहीं-कहीं पर्वतनंदिनी सरिताएँ आगे बढ़ने का रास्ता खोज रही होंगी-बीच में यह चटानों की ऊबड़ खाबड़ जटाभूम है-सूखी, नीरस, कठोर। यहीं आसन मारकर बैठे हैं मेरे चिरपरिचित दोस्त कुटज। एक बार अपने झबरीले मू्धा को हिलाकर समाधिनिष् महादेव को पुष्पस्तबक का उपहार चढ़ा देते हैं और एक बार नीचे की ओर अपनी पाताल भेदी जड़ों को दबाकर गिरिनंदिनी सरिताओं को संकेत से बता देते है कि रस का स्रोत कहाँ है। जीना चाहते हो? कठोर पाषाण को भेदकर, पाताल की छाती चीरकर अपना भोग्य संगरह करो; वायुमंडल को चूसकर, झंझा-तूफान को रगड़कर, अपना प्ाप्य वसूल लो; आकाश को चूमकर अवकाश की लहरी में झूमकर उल्लास खींच लो। कुटज का यही उपदेश है- भित्वा पाषाणपिठरं छित्वा प्रभञ्जनी व्यथाम् पीत्वा पातालपानीयंकुजट शम्बते नभः।
दुरंत जीवन-शक्त है। कठिन उपदेश है। जीना भी एक कला है। लेकिन कला ही नहीं, तपस्या है। जियो तो प्राण ढाल दो जिंदगी में, मन ढाल दो जीवनरस के उपकरणों में! ठीक है। लेकिन क्यों? क्या जीने के लिए जीना ही बड़ी बात है? सारा संसार अपने मतलब के लिए ही तो जी रहा है। याजवल्क्य बहुत बड़े ब्रह्मवादी ऋृष थे। उन्होंने अपनी पत्नी को विचित्र भाव से समझञाने की कोशिश की कि सब कुछ स्वार्थ के लिए है। पुत्र के लिए पुत्र प्रय नहीं होता, पत्नी के लिए पत्नी प्रिया नहीं होती-सब अपने मतलब के लिए प्रिय होते है-'आत्मनस्तु कामाय सर्व प्रियं भवति!' विचित्र नहीं है यह तर्क? संसार में जहाँ कहीं प्रेम है, सब मतलब के लिए। सुना है, पश्चम के हाब्स और हेल्वेशियस जैसे विचारकों ने भी ऐसी ही बात कही है। सुनके हैरानी होती है। दुनिया में त्याग नहीं है, प्रेम नहीं है, परार्थ नहीं है, परमार्थ नहीं है-है केवल प्रचंड स्वार्थी भीतर की जिजीविषा-जीते रहने की प्रचंड इच्छा ही-अगर बड़ी बात हो तो फिर यह सारी बड़ी-बड़ी बोलियाँ जिनके बल पर दल बनाए जाते हैं, शत्रमदन का अभिनय किया जाता है, देशोद्ार का नारा लग़ाया जाता है, साहित्य और कला की महिमा गाई जाती है, झूठ है। इसके द्वारा कोई-न-कोई अपना बड़ा स्वार्थ सिद् करता है। लेकिन अंतरतर से कोई कह रहा है, ऐसा सोचना गलत ढंग से सोचना है। स्वार्थ से भी बड़ी कोई-न-कोई बात अवश्य है, जिजीविषा से भी प्रचंड कोई-न-कोई शक्त अवश्य है। क्या है?
याज्वल्क्य ने जो बात धक्कामार ढंग से कह दी थी वह अंतिम नहीं थी। वे 'आत्मन:' का अर्थ कुछ और बड़ा करना चाहते थे। व्यक्त की 'आत्मा' केवल व्यक्त तक सीमित नहीं है, वह व्यापक है। अपने में सब और सबमें आप-इस प्रकार की एक समष्ट-बुद्ध जब तक नहीं आती तब तक पूर्ण सुख का आनंद भी नहीं मिलता। अपने आपको दलित द्रक्षा की भाँति निचोड़कर जब तक 'स्व' के लिए निछावर नहीं कर दिया जाता तब तक 'स्वार्थ' खंड-सत्य है, वह मोह को बढ़ावा देता है, तृष्णा को उत्पन्न करता है और मनुष्य को दयनीय-कृपण बना देता है। कारपण्य दोष से जिसका स्वभाव उपहत हो गया है, उसकी दृष्ट म्लान हो जाती है। वह स्पष्ट नहीं देख पाता। वह स्वार्थ भी नहीं समझ पाता, परमार्थ तो दूर की बात है।
कुटज क्या केवल जी रहा है। वह दूसरे के द्वार पर भीख माँगने नहीं जाता, कोई निकट आ गया तो भय के मारे अधमरा नहीं हो जाता, नीति और धर्म का उपदेश नहीं देता फिरता, अपनी उन्नति के लिए अफ़सरों का जूता नहीं चाटता फिरता, दूसरों को अवमानित करने के लिए ग्रहों की खुशामद नहीं करता। आत्मोन्नति हेतु नीलम नहीं धारण करता, अँगूठियों की लड़ी नहीं पहनता, दाँत नहीं निपोरता, बगलें नहीं झाँकता। जीता है और शान से जीता है-काहे वास्ते, किस उदेश्य से? कोई नहीं जानता। मगर कुछ बड़ी बात है। स्वार्थ के दायरे से बाहर की बात है। भीष्म पितामह की भाँति अवधूत की भाषा में कह रहा है-'चाहे सुख हो या दुख, प्रय हो या अप्रिय' जो मिल जाए उसे रान के साथ, हृदय से बिलकुल अपराजित होकर, सोल्लास ग्रहण करो। हार मत मानो।' सुखं वा यदि वा दुःखं पिरयं वा यदि वाप्रियम। प्राप्त प्ाप्तमुपासीत हृदयेनापराजितः। —शांतिपर्व, 26 1 26
हदयेनापराजितः! कितना विशाल वह हृदय होगा जो सुख से, दुख से, प्रय से, अप्रिय से विचलित न होता होगा! कुटज को देखकर रोमाँच हो आता है। कहाँ से मिली है यह अकुतोभया वृत्ति, अपराजित स्वभाव, अविचल जीवन-दृष्टि।
जो समझता है कि वह दूसरों का उपकार कर रहा है वह अबोध है, जो समझता है कि दूसरे उसका अपकार कर रहे हैं वह भी बुद्धरहीन है। कौन किसका उपकार करता है, कौन किसका अपकार कर रहा है? मनु्य जी रहा है, केवल जी रहा है; अपनी इच्छा से नहीं, इतिहास-विधाता की योजना के अनुसार। किसी को उससे सुख मिल जाए, बहुत अच्छी बात है; नहीं मिल सका, कोई बात नहीं, परंतु उसे अभिमान नहीं होना चाहिए। सुख पहुँचाने का अभिमान यदि गलत है तो दुख पहुँचाने का अभिमान तो नितरां गलत है।
दुख और सुख तो मन के विकल्प हैं। सुखी वह है जिसका मन वश में है, दुखी वह है जिसका मन परवश है। परवश होने का अर्थ है खुशामद करना, दाँत निपोरना, चाटुकारिता, हाँ-हजूरी। जिसका
मन अपने वश में नहीं है वही दूसरे के मन का छंदावर्तन करता है, अपने को छिपाने के लिए मिथ्या
आडंबर रचता है, दूसरों को फँसाने के लिए जाल बिछाता है। कुटज इन सब मिथ्याचारों से मुक्त
है। वह वशी है। वह वैरागी है। राजा जनक की तरह संसार में रहकर, संपूर् भोगों को भोगकर भी
उनसे मुक्त है। जनक की ही भाँति वह घोषणा करता है-'मै स्वार्थ के लिए अपने मन को सदा
दूसरे के मन में घुसाता नहीं फिरता, इसलिए मैं मन को जीत सका हू, उसे वश में कर सका हू'- नाहमात्मार्थमिच्छामि मनोनित्यं मनोन्तरें। मनो मे निर्जितंतस्मात वशे तिष्ठत सर्वदा।।
कुटज अपने मन पर सवारी करता है, मन को अपने पर सवार नहीं होने देता। मनस्वी मित्र, तुम धन्य हो!
प्रश्न-अभ्यास
1.कुटज को 'गाढे के साथी' क्यों कहा गया है?
2.'नाम' क्यों बड़ा है? लेखक के विचार अपने शब्दों में लिखिए।
3. 'कुट', 'कुटज' और 'कुटनी' शब्दों का विश्लेषण कर उनमें आपसी संबंध स्थापित कीजिए।
4. क कस
6. कुटज के जीवन से हमें क्या सीख मिलती है?
7 कुटज क्या केवल जी रहा है-लेखक ने यह प्रश्न उठाकर किन मानवीय कमजोरियों पर टिप्पणी की है?
8. लेखक क्यों मानता है कि स्वार्थ से भी बढ़कर जिज़ीविषा से भी प्रचंड कोई न कोई शक्त अवश्य है? उदाहरण सहित उत्तर दीजिए।
9.'कुटज' पाठ के आधार पर सिद्र कीजिए कि 'दुख और सुख तो मन के विकल्प हैं'
10निम्मलिखित गधयांशों की सप्रसंग व्याख्या कीजिए
(क) 'कभी-कभी जो लोग ऊपर से बेहया दिखते हैं, उनकी जड़ें काफ़ी गहरी पैठी रहती हैं। ये भी पाषाण की छाती फाड़कर न जाने किस अतल गहर से अपना भोग्य खींच लाते हैं'
(ख) 'रूप व्यक्त-सत्य है, नाम समाज-सत्य। नाम उस पद को कहते हैं जिस पर समाज की मुहर लगी होती है। आधुनिक शिक्षित लोग जिसे 'सोशल सैक्शन' कहा करते है। मेरा मन नाम के लिए व्याकुल है, समाज द्ारा स्वीकृत, इतिहास द्वारा प्रमाणित, समष्ट-मानव की चित्त-गंगा में स्नात!'
(ग) 'रूप की तो बात ही क्या है! बलिहारी है इस मादक शोभा की। चारों ओर कुपित यमराज के दारुण नि:श्वास के समान धधकती लू में यह हरा भी है और भरा भी है, दु्जन के चित्त से भी अधिक कठोर पाषाण की कारा में रुद् अज्ञात जलस्रोत से बरबस रस खींचकर सरस बना हुआ है।'
(घ) 'हृदयेनापराजित:! कितना विशाल वह हृदय होगा जो सुख से, दुख से, प्रय से, अप्रय से विचलत न होता होगा! कुटज को देखकर रोमांच हो आता है। कहाँ से मिली है यह अकुतोभया वृति, अपराजित स्वभाव, अविचल जीवन दृष्ट!'
योग्यता-विस्तार
- कुटज' की तर्ज पर किसी जंगली फूल पर लेख अथवा कविता लिखने का प्रयास कीजिए।
- लेखक ने 'कुटज' को ही क्यों चुना? उसको अपनी रचना के लिए जंगल में पेड़-पौधे तथा फूलों-वनस्पतियों की कोई कमी नहीं थी।
- कुटज के बारे में उसकी विशेषताओं को बताने वाले दस वाक्य पाठ से छाँटिए और उनकी मानवीय
- राष्टीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिकषण परिषद द्ा पं हजारी प्रसाद द्वेदी पर बनाई फिल्म देखिए।
शब्दार्थ और टिप्पणी
अंतर्गृह - भीतरी कक्ष
गह्वर - गहरा, गुफा
छद्मतल - छत से परे
भेद लेना - भेद या गूढ़ को चूर
विजितता - रूप को दूर करने वाली
अक्लमंद - जिसे नहीं या किसी से भय न हो, निडर मनुष्य
अभिमानित - अपमानित, तिरस्कार
वितर - कीर्ति-गाथा, प्रशंसात्मक पदवी
स्तवक - गुच्छा, फूलों का गुच्छा
लोल - चंचल, हिलता-डुलता
फक्कड़ - अकेला, केवल, एकमात्र
अनन्यच - जो बहुत कंजूस न हो
अतिविदग्ध - विदग्ध, चतुर
प्रवगम - फैलता हुआ, विस्तृत, व्यापक
मूर्ति - मस्तक, सिर
दुरंत - जिसका पार पाना कठिन हो, प्रबल
कर्पण्य - कृपणता, कंजूसी
उद्धत - घोर घमंडी, शालीन, नष्ट
निपुणता - कुशलता, दिखावा
अवधूत - विरक्त, सन्यासी
तिरस्कृत - बहुत अधिक
भिक्षाचार - बहुत आचार